खाली समय, यादों का शोर और मन का बहकावा | दिलायरी : 17/12/2025
खाली समय का मज़ाक या मन का एहसास?
प्रियम्वदा,
अभी कुछ देर पहले ऑफिस वाले बुधा को फोन किया था, "मैंने पूछा क्या कर रहा है?" तो कहता है, "खाली हूँ।" मुझे तो पहले से पता था, यह दिमाग से खाली है। लेकिन यार इस तरह कौन कबूलता है भला? तो उसका खालीपन दूर करने के लिए मैंने उसे दो तीन काम दे दिए। अब अगला कम से कम काम से तो खाली नहीं है। लेकिन हिम्मती तो है वैसे वह। वरना आज नौकरी करने वाले कोई भी नहीं कहते हैं, कि मैं फ्री हूँ, या मेरे पास समय है।
मैं यह भी सोच रहा था, कि भला समय भी खाली हो सकता है क्या? मैं खुद अपनी दिलायरी में कईं बार लिख देता हूँ, कि खाली समय में मैंने यह किया, वह किया.. लेकिन वास्तव में समय खाली था या फिर मेरे पास कोई काम नहीं था? खाली समय का नाप भी मिनिट या घंटे में नपता होगा या फिर काम की गंभीरता से? क्या लगता है, कोई खाली है, मतलब कितना खाली होगा? एक-दो लीटर या ज्यादा? अरे, लीटर नहीं। एक दो मिनिट या ज्यादा?
तुम भी खाली हो पाठक.. तभी यह पढ़ रहे हो। मैं तो अपने खाली समय का निवारण कर रहा हूँ.. तुम्हारे पास भी खाली समय है क्या? याद करो, कुछ तो काम याद आएगा..! मुझे तो याद आ रहा है। मुझे स्पेशल ऑप्स का सीजन 2 देखना है। लेकिन फोन की बैटरी डाउन थी, और उसे चार्जिंग में लगाया है, इस कारण यह लिखने बैठ गया हूँ। यह तो हो गया कारण.. अब दिलायरी की दिनचर्या भी लिख लेते है..? तो क्या हुआ, आज तो सवेरे जल्दी उठ गया था, क्योंकि बिस्तर में कंबल में घाव पर कुछ भार आया होगा, और दर्द हुआ, तो आँखे खुल गयी।
ऑफिस की गणित और मन का कोलाहल
अब फिर से सो जाने का मन तो आज हुआ नहीं.. तो क्या करता, सवेरे सवेरे हर कोई बस तैयार ही होता है। मैं भी हो गया। जाना कहा है? वहीँ जहाँ हररोज जाता हूँ। छह बाय छह की केबिन है, वुडेन डेस्क पर एक ऑल इन वन कंप्यूटर है। उसके सामने एक चक्केवाली कुर्सी है। उसे ऑफिस कहते है, और दिनभर दिमाग को दौड़ाना मेरा काम है। गणित.. जिसे मैं बचपन में बिलकुल पसंद नहीं करता था, वही मेरा कार्यक्षेत्र बना हुआ है। डायामीटर से लेकर घनफुट तक.. जोड़ना, घटाना, गुना करना, और प्रतिशत निकालना.. सारा दिन इन अंकों में ही उलझ जाता है।
सवेरे तैयार होकर पहले तो गया दिलबाग में। ठीकठाक है। फिर निकला जगन्नाथ जी के पास। लेकिन ध्वज प्रणाम करके दुकान पर ही रूक गया। सिगरेट का धुंए से वातावरण को दूषित करके निकला, तो याद आया, लगे हाथ पर्यावरण को दूषित करने में कसर नहीं छोड़नी चाहिए। पेट्रोल फिलअप करवाया। अब ऑफिस पहुंचकर बैठा ही था, कि याद आया, बीते कल के कुछ काम आज के लिए छोड़े थे। लेकिन बीते दिन की दिलायरी भी तो बाकी है? कल रात को थोड़ी ही लिखी थी। तो उसे पहले पूरी की।
फिर लग गया ऑफिस के गाणितिक अभियानों में। साथ साथ जहाँ काम न होता, उस समय में स्पेशल ऑप्स का सीजन दो भी देखता रहता। सच कहूं तो आजकल यह फिल्मे देखने में जो मजा आ रहा है, क्या बताऊँ.. वैसे बताने की जरूरत ही कहाँ है? पिछले दिनों की दिलायरियाँ सनी पड़ी है, फिल्मो की बातों से। खेर, दोपहर को लंच करने में कुछ ज्यादा समय लग गया, और आज दोपहर को कुँवरुभा की सायकल लाने नहीं जा पाया। सोच तो रहा हूँ, अभी घर जाते हुए ले जाऊं.. लेकिन देखते है, याद रह जाए तो...
बाहर का शोर और भीतर की आवाज़ें
प्रियम्वदा ! शाम के सात बज रहे है। ऑफिस का अकेलापन भंग करने, कोई आकर बैठ गया है। वातावरण अभी भी पर्याप्त शांत हुआ नहीं है। मिल का कर्कश सुर अभी भी वातावरण को दूषित करने में लगा हुआ है। कुछ देर पूर्व संध्या ने एक पीला प्रकाश बिखेरा था, लेकिन कुछ ही देर में काले अँधेरे ने सब कुछ निगल लिया। वह बस आवाजों को नहीं निगल सकता। फ़िलहाल रोड से गुजरते हुए ट्रक्स के साथ, मिल में लकड़ी और लोहे के घर्षण से होता कर्ण को अप्रिय आवाज़ ही सुनाई पड रहा है। और कैलकुलेटर के दबते बटनों से उठती आवाज।
कईं बार वे आवाज़ें भी सुनाई पड़ती है, जो बाहर से नहीं आती। भीतर के सवालों से उठती है वह आवाज़.. किसी के इंतजार की आवाज, या किसी के प्रत्युत्तर के काल्पनिक संवाद की आवाज़। या कईं बार तो भय, और आक्रन्द की आवाज़ भी उठती है। अपने खुद के अलावा और किसी को नहीं सुनाई पड़ते वह स्वर। और कभी कभी जब यह स्वर आततायी हो जाते है, तो खुद ही बहरे हो जाने की इच्छा भी होती है। कभी कभी खुद की भूलों पर होते पछतावे के स्वर खास.. इन आवाजों से तो कानों पर हाथ रखकर भी पीछा नहीं छुड़वाया जा सकता। पागलपन लग सकता है यह। लेकिन कभी कभी ख्यालों का उफान उठता है।
यादों की सृष्टि और थकते हुए मन की यात्रा
एक बात तो तय है, मन को बहलाने के कितने ही उपाय कर लो.. कुछ बातों से मन कभी छूट नहीं पाता। उसे संलिप्त रहना ही होता है, उन यादों से, जो क्रूर वेदना की जनक होती है। या उन यादों से, जो हमे ही खा जाने की कोशिश करती है। कुछ यादें संभलने तक का मौका नहीं देती.. मतिभ्रम कर जाती है। कुछ यादें हसीं होती है। कुछ संवेदना भरी यादें उन क्रूर यादों का संतुलन बनाए रखती है। जब भी कभी यह संतुलन डगमगाता है, मति और गति, दोनों ही दिशाहीन हो जाती है।
यूँही शाम ढलते हुए कभी मन क्यों नहीं ढल जाता.. प्रफुल्लित कर देने वाली यादों के बदले क्रूर पिटारा क्यों खोल देता है? तुम्हे पता है प्रियम्वदा, यह मन कभी कभी यादों के बहकावे में अघटित प्रसंगों की एक काल्पनिक सृष्टि खड़ी कर देता है। उस सृष्टि में इस संसार से विपरीत, वे सारी संभावनाएं सच होती है, जिनसे कभी वास्तविकता में मुँह मोड़ लिया हो। उस सृष्टि में वे व्यक्ति भी आ मिलते है, जिनसे कभी रूबरू हो नहीं पाए हो। या फिर वे लोग भी कभी दखल कर जाते है, जिनसे हम खुद भी मुँह छिपा रहे हो। यह आत्मबोध, या आत्मचिंतन, या आत्मालोचना की सृष्टि कभी कभी वास्तविकता के लिए प्रेरणा की दिशा दिखा जाती है। तो कभी कभी घोर मनोमंथन की थकान दे जाती है। उन अघटित प्रसंगो के इस सृष्टि में तमाम विकल्पों के रचे जाने के बाद, मन थककर चूर हो जाता है। इसी के लायक है मन... थकने के ही।
शुभरात्रि,
१७/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
“यदि कभी आपके ‘खाली समय’ में भी ऐसे ही विचारों का सैलाब उमड़ा हो, तो नीचे टिप्पणी में अपने शब्द ज़रूर लिखिए।
और इस दिलायरी को साझा करना न भूलिए — क्या पता, किसी और के मन के शोर को भी एक आवाज़ मिल जाए।”
📌 और भी पढ़ें:
• सितारे, काम का बोझ और अधूरी कविता — दिलायरी : 16/12/2025
• कुर्सियों का समाज, जोखिम का रामसेतु और असमय न्याय — दिलायरी : 15/12/2025
• जेठालाल जैसी सुबह से सिडनी हमले तक — दिलायरी : 14/12/2025
• तीन ख्वाहिशें, एक जिन और अधूरी चाहतें — दिलायरी : 13/12/2025
• व्यस्तता, आलस और त्याग का एक दिन — दिलायरी : 12/12/2025

