"बारिश में गरबा : नवरात्रि 2025 का अनोखा अनुभव" || दिलायरी : 28/09/2025

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नवरात्रि 2025 और गरबा की शुरुआत

    पता था, बारिश आनी तय है। और आ गयी। फिलहाल ग्यारह बज रहे है। मौसम में एक उमस वाली गर्मी है। और बूंदाबांदी चालू है। बारिश में गरबा करने का मजा तो खूब है, लेकिन कोई अकेला गरबा कैसे करें भला? अपने गरबी चौक में इलेक्ट्रिसिटी के पॉइंट्स की थोड़ी समस्या है। खूब जुगाड़ बिठाया, खूब सोच-विचारकर वायर खिंचे, लेकिन साउंड सिस्टम चालू करने का कोई भी सिस्टम नही बन पाया। और मौसम तो अभी भी घिरा हुआ था। नवरात्रि की स्थापना होती है, इस कारण रात्रि में आरती तो करते ही है हम। तो आज बिना साउंड सिस्टम के सब ने खुदसे आरती गाई। पुराना रिवाज यही तो था।


बारिश में गरबा खेलते श्रद्धालु – नवरात्रि 2025

मंदिर का प्रसंग और नीति-अधिकार का सबक

    सवेरे उठने में काफी देर हो गयी थी, क्योंकि लगभग तीन बजे तो सोया था। साढ़े सात उठा, तैयार होकर चौक में गया। हवन किया, और फिर ऑफिस। काम तो वही ढाई बजाने तक का होता ही है। घर आकर अधूरी निंद्रा को पूरा किया। पाँचेक बजे थोड़े दूर हमारे सहायक कुलदेवी का मंदिर है, वहां चल पड़ा। नवरात्रि में ज्यादातर देवियों के मंदिर में भीड़ रहती है। लेकिन अभी पांच ही बज रहे थे, तो मंदिर में कोई न था। काफी विशाल और बड़ा मंदिर है। आस्था की बात है, कि एक बार मेरी फेमिलीं में से एक के कान का इयरिंग उस मंदिर के प्रांगण में कहीं गिर गया था। और दो घंटे के बाद मिलना भी असंभव ही तो है। लेकिन स्वर्ण का मोह सबको होता है। मैं दोपहर बारह बजे वापिस मंदिर गया। इतने बड़े प्रांगण में मैंने खोजना शुरू किया। न जाने कितने लोग वहां से गुजरे होंगे, कितनो के पैरों से बचते हुए वह इयरिंग एक जगह दो पेवर के बीच की दरार में पड़ा हुआ मुझे ही मिला। 


शाखा में सीखी अनमोल पंक्तियाँ

    मैं नीति में जरूर से मानता हूँ। और अधिकार में भी। मेरे हक़ का होगा, तो वह मुझे कहीं से भी आकर मिलेगा ही। मेरी नीति सही होगी, तो मेरा नुकसान न होगा। और यह दोनो बातें मैंने अनुभव की है, तभी लिखी है। नीति और अधिकार..! वापिस लौटकर शाखा का आयोजन था। शाखा में आज थोड़े से विलंब के चलते बौद्धिक छूट गया। लेकिन सहगान की दो लाइन मुझे काफी आकर्षक लगी, "भूल न जाना यह आंसू है, हँसियों का श्रृंगार रे..! यह वीणा अनूठी है.." और एक पंक्ति थी, "नमक की गुड़िया बनकर, मैं तो लगा नापने सागर को.." ... आंसू कितने प्रभावशाली होते है, और कितने सहज.. दुःख और पीड़ा में भी बहते है। और हर्षोल्लास में भी बह निकलते है। ऐसा माना जाता है, कि पीड़ा के आंसू गर्म होते है। और आनंद के शीत। दुःख के आंसू में दयाभाव उठता है, और हर्ष के आंसू से सौहार्द..! हर्ष या आनंद का चरम भी यह आंसू ही है।


    किसी को नापना हो, या किसी को जानना-समझना हो, तो उससे घुलना मिलना पड़ता है। दूसरी पंक्ति यही थी, नमक की गुड़िया बनकर मैं तो लगा नापने सागर को। सागर का जल क्षारयुक्त होता है। क्षार से नमक बनता है, किसी के साथ स्नेह बढ़ाना है, तो हमे अपने आप मे थोड़े बदलाव करके उससे घनिष्ठता बांधी जा सकती है। स्वयं को नमक सा बनाकर, समंदर में घुल जाने से, समंदर के तल तक पहुंच सकते है। समुद्र के तल में मोती है। मोती प्रतीक है, अपने भीतर की अंतरात्मा स्वरूप.. या किसी अन्य की अंतरात्मा स्वरूप, जिसे हम पाना चाहते है। खेर, यह पंक्तियों के यदि विस्तारण करने चाहे तो बात बहुत दूर तक जा सकती है। शाखा के बाद मैं और गजा बैठे रहे चौक में। नौकरियों से जुड़े गप्पे लड़ाते हुए हमने साढ़े आठ बजा दिए। आसमान में धीरे धीरे बादलों का जमावड़ा होता जा रहा था। मैंने सोमवार को ही देखा था, शनि-रविवार बारिश की संभावना थी ही। और आज तो हर जगहसे खबरें मिली थी बारिश की। 


गरबा और रास का असली अंतर

    नौ बजे वापिस चौक में लौटा तो आंधी से पवनो ने धूल को आसमान में उड़ा रखा था। साथ ही वर्षाबुंदों का आगमन हो चुका था। प्रारंभिक वर्षा सदैव धीमी होती है। देवी माँ की गरबी को तिरपाल ओढ़ाकर संरक्षित किया, लेकिन आरती बाकी थी। वापिस खोला। हमने सबने मिलकर आरती गाई। आरती उतारी। और लगभग पहली बार, खुद से गरबा गाते हुए, खुद ही खेले भी। आरती खुद से गाने में कईं क्षतियाँ रह जाती है, इस कारण से हम लोग आरती को साउंड सिस्टम में बजाते है, साथ ही गाते है, और उतारते है। आजकल गुजरात मे कुछ जगहों पर ट्रेंड बना हुआ है। 'पुराने दौर में लौटो।' मतलब खुद ही गरबा गाओ, और साथ ही साथ खेलो। गांवों में आज भी वही परंपरा है। कोई वाद्य यंत्र का संगीत का साधन, वहां नही होता। एक व्यक्ति गरबा गाएगा, दूसरे लोग उस गरबा की पंक्ति को दोहराते हुए, गाते जाएंगे और खेलते जाएंगे।


    कुछ गांवों में सिर्फ ढोल का उपयोग होता है। कोई जगह पर एकमात्र नोबत, और कुछ जगह केवल मंजीरा-झांझ। पांच गरबा गाने के बाद समाप्ति कर दी जाती है। हाँ, रास खेलते है तो वहां वाजिन्त्रों का महत्व ज्यादा है। क्योंकि रास में कभी तीव्र, तो कभी मंद गति चाहिए होती है। गरबा एक ही सुर में, एक ही ताल में चलता है। गरबा सिर्फ हाथों की तालियों द्वारा खेलते है। रास में विविधता होती है। मशाल रास, तलवार रास, मटुकी रास, और डांडिया रास...वगेरह वगेरह और भी कईं प्रकार है। इस पर मैं अपनी पिछली कोई पोस्ट में लिख चुका हूँ, मिल गयी तो लिंक दे दूंगा। (Click Here) तो हमने माताजी के पांच प्रदक्षिणा करते गरबा खेल लिए। और फिर बारिश भी थोड़ी तेज होने लगी थी। इच्छा तो खूब थी, भीगते हुए खेलने की।


आज के गरबा आयोजनों की चुनौतियाँ

    हमने हर वह कोशिशें आजमानी चाही की, कमसे कम एक mic loud speaker भी चल पाए, तो हमे गरबा खेलने का अवसर मिल जाए। लेकिन नही बन पाया। तो थोड़ी निराशा भी हुई। हमने पुनः गरबी को तिरपाल से ढककर समापन करते हुए, सब कुछ बन्द कर दिया, और घर लौट आए। यह खाली समय मुझे दिलायरी लिखने में काम आ गया। अच्छा ही हुआ। खामख्वाह बारिश में खेलते हुए वीजशोक का भय भी रहता है। वैसे गांवों वाले गरबा का भी अपना आनंद है। बिना कोई वाद्ययंत्रों के सिर्फ गरबा गाते हुए खेलना, अपने आप मे मजेदार है। यहां सम्पूर्ण भक्ति के सिवा कुछ नही होता है। क्योंकि आप जब स्वयं गाते हो, तो आप शब्दों को भी समझने में तल्लीन हो जाते हो।


    और इसी व्यस्तता के कारण आप किसी और विचार को अपने भीतर स्थान नही देते। मुझे यह जो पास वाली आयोजित नवरात्रियाँ होती है, उससे चीड़ है। अभी 2-3 दिन पहले ही, वडोदरा की ओर से एक वीडियो आया था। एक कपल ने चालू गरबा में चुंबन कर लिया। लोग गरबा का महत्व भूलकर इसे बस नाचने-झूमने का पर्व समझ लिया है। गरबा में रास खेलने लगे है। हमने यह सोचकर संधि कर ली, कि कृष्ण के रास भी गरबा में खेल सकते है, क्योंकि कृष्ण भी तो भगवान है। डांडिया रास कृष्ण जन्मोत्सव के पर्व पर होने चाहिए। विवाह उत्सव में चल सकता है, लेकिन गरबा में केवल गरबा होना चाहिए। वहां रास खेलते भी है, तो वह माताजी का होना चाहिए। यह कोई नाचने का पर्व नही है, नही है, नही है।


पारंपरिक गरबा गीत जो अब लुप्त हो रहे हैं

    अब तो वे प्राचीन गरबा भी लुप्त हो चुके है, "सोनल गरबो सिरे, अंबे माँ, हालो धीरे धीरे..." "पावा ते गढ़ थी उतर्या महाकाली रे..", "खोडियार छे जोगमाया, मामड़ियानी..", "रुडे गरबे रमे छे देवी अम्बिका रे..", "अंबा अभयपद दायिनी रे.." ऐसे कईं सारे है..! लेकिन आज चलते कुछ और ही है। ज्यादातर इससे विपरीत नैन-मटक्का के भी गाये जाने लगे है। रास के गीत भी गरबा में गाये जाने लगे है। यह सब करा-धराया वह आयोजन वाली नवरात्रियों का है। जहां हजार हजार रुपये की टिकटें खरीदकर लोग जाते है। गायक कलाकार कुछ भी गाते है, लोग भी कुछ सुने-समझे बिना बस बहरी भीड़ बनकर उछलते-कूदते है। (Click Here)


अर्थशास्त्र और आधुनिक नवरात्रि

    आवेश में बहुत सारी बातें कर दी। लेकिन जरूरी भी थी। हर नवरात्रि में शायद मैं यह स्पष्टीकरण देता ही हूँ। गरबा अलग है, रास अलग है, नाचना अलग है। लेकिन पता नहीं फिर भी यह खिचड़ी एक साथ ही पकती है। वैसे अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखे तो यह उत्सव कितना बलशाली है। लोग नवरात्रि के नाम पर वो 'लोक' जैसे कपड़े पहनते है। जो शायद किसी समय पर कुछ निश्चित जाति की वेशभूषा हुआ करती थी। लेकिन अब इन नौ दिनों में हर कोई उसे धारण करने लगा है। समस्या तो यह भी है, कि अब इन कपड़ों में भी कटौती होने लगी है। देह दिखाने की होड़ मची है। नवरात्रि के चौक में माताजी के सानिंध्य में आंखे चार होती है, और भी आगे की विधियां है, जिन्हें में उल्लेखित करना नही चाहता। 


    खेर, जैसी माताजी की इच्छा..! 


    शुभरात्रि,

    २८/०९/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

“आपके अनुसार असली गरबा क्या है – संगीत के साथ खेला जाने वाला या खुद गाकर खेला जाने वाला? कमेंट में ज़रूर बताइए।”🌿

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