मन की बातें और उनका बोझ
प्रियम्वदा !
कुछ बातें होती है, जिनका प्रतिसाद हम सुनना नहीं चाहते। बस हमने उन बातों को कह दिया, हम मुक्त हो गए। जैसे डाकिया हुआ करता था। वह हर किसी की बातों को इधर उधर करता, लेकिन स्वयं निर्लिप्त रहता। कोई उससे खत पढ़वाता, वह खत पढ़कर सुना भी देता, लेकिन उसने उस खत के सन्देश से अपने आप को एक निश्चित दूरी पर जरूर रखा। हाँ ! जहाँ जरुरत लगी वहां उसने अपना सहयोग दिया। हम भी कभी कभी अपने भीतर के भाव बस यूँही फेंक देना चाहते है। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, उन बातों का क्या असर होगा। कुछ ऐसा ही किया था मैंने कल।
जब भी कभी जरुरत लगे, मन का भार हल्का कर लेना चाहिए। हृदय इतना बड़ा कभी था ही नहीं, कि कईं सारे भाव, कईं सारी बातें, और कईं सारे लोगो को अपने भीतर रख पाए। मुठीभर का ह्रदय सदैव से बस चाहतों को जन्माता आया है। उन चाहतों के पीछे मन दौड़ने लगता है। और शरीर अनुकरण करता है। इसी कारण से कितने ही दबे भाव, किसी समय पर क्रोध बनकर फुट पड़ते है। और क्रोध से बातें बिगड़ती है, सुलझती नहीं कभी। वे भावनाएं क्रोध में परिवर्तित हो, उससे पहले किसी कागज़ पर उन्हें उतार देना ही बेहतर है।
सही और गलत से परे कुछ सच
आज सवेरे पहला काम ही गलत किया है। अपनी शर्म को यथावत रखने के लिए, इसके बदले वह किसी को भेज दिया। हम कईं बार कुछ बातों को गलत मानते है, और कुछ बातों को सही। लेकिन तीसरा प्रकार भी होता है। कुछ बातें ऐसी होती है, जिनका सही और गलत के मायने अलग होते है। मेरे लिए सही है, किसी और के लिए नहीं। क्योंकि वहां कईं सारी बंदिशें होती है। कईं सारे परमाने होते है, उम्र, रूप, गुण, दोष, भावना, संबंध, व्यक्तित्व.. इन सब को संभालते हुए कोई कदम भरा जाता है। मैंने भी इन सबको ध्यान रखते हुए, अपनी पोस्ट शेयर की।
वातावरण मैंने अपनी पिछली दिलायरियों में कहे अनुसार आज पर्यन्त ग्रे ही रहा है। काफी दिनों बाद अच्छी नींद ली, दो कारण है, नवरात्री समाप्त हो चुकी, दूसरा अपने ह्रदय में उठे तूफानों को शब्दों में उतार दिया। ग्यारह बजे सो जाने के बाद भी सवेरे साढ़े सात को उठने का जरा भी मन नहीं था। मैंने अपने दिलबाग को भी नहीं देखा है। सच में यह नवरात्रियाँ काफी ज्यादा व्यस्तता ले आयीं थी। तीन दिन से बारिश हो रही है, इस कारण दिलबाग के पौधे बस भरपूर पानी पि रहे होंगे, यही समस्या है।
जीवन की यात्राएँ और अनिश्चितताएँ
प्रियम्वदा ! आदमी उत्साही होता है किसी बात के लिए, तो वह बहुत कुछ भूल जाता है। दिवाली २० तारीख को है, और मैं उसे २२ तारीख की समझ रहा था। उत्साह तो खूब है मन में, मेरी दिली इच्छा है यह रोडट्रिप.. लेकिन जैसे जैसे दिनांक गतिवन्त है, मन भी मुरझा रहा है। क्योंकि अभी तक इस निश्चय पर नहीं आ पाया हूँ, प्लान ऑन है भी या नहीं..! पुरुषों की यात्राएं ऐसी ही रही है। खासकर दोस्तों के साथ.. क्योंकि एक दोस्त ऐसा होता ही है, जो आखरी मोमेंट पर पानी में बैठ जाता है, और पूरी ट्रिप रद्द हो जाती है। मेरी इस ट्रिप में भी कुछ ऐसा ही है। एक सहयात्री अभी तक तय नहीं कर पाया है।
नियंत्रण से जन्मी नयी राहें
मैं जब भी कुछ लिखने बैठा हूँ, हमेशा होता है। कुछ बातें बहुत स्पष्ट लिख देता हूँ। फिर याद आती है मर्यादा। और फिर कुछ बातें पन्नों पर नहीं आ पाती। उनकी मौजूदगी जरुरी थी, लेकिन उन्हें मर्यादा के बाँध ने रोक लिया। इससे उन बातों की महत्वपूर्णता पर कोई फर्क नहीं पड़ता.. किसी भी रचना में कुछ न कुछ काट-छांट होती ही है। वे बातें जरुरी ही थी, तभी तो वे किसी रचना में शामिल हुई थी। लेकिन फिर कुछ राज़, राज़ रखने के लिए उन बातों को फिर से किसी अज्ञातवास में भेज दिया जाता है।
कुछ बातें लिखते हुए अंगुलियां कपकपाती है। मन भी मानो मुँह मोड़ लेता है। या कुछ बातें ऐसी भी होती है, जिन्हे लेखक बस लिखता नहीं। उन्हें छोड़ दिया जाता है, पाठक की समझ पर, पाठक की कल्पना पर।
अधूरेपन का सौंदर्य
प्रियम्वदा ! कभी कभी कुछ तरकीबें सफल हो जाती है, उसका आनंद कितना सही लगता है। कुछ बातें लिखी जा चुकी हो, वे कभी न कभी तो सामने आती है। लेकिन कुछ बातों से हमें रूबरू होने में एक अनचाहा भय लगता है। मैं अपनी ही बात कर रहा हूँ। कुछ बातों का अधूरा रह जाना ज्यादा बेहतर होता है। क्योंकि पूर्णता में अंत होता है। समाप्ति से आगे विस्तारण नहीं हो सकता। अधूरापन अनंत है। अधूरा है तो संभावनाएं शेष है। अधूरेपन का अपना जूनून होता है। कोई अधूरा गीत याद हो वह ज्यादा गुनगुनाया जाता है।
कोई अधूरी चिट्ठी अपने शब्दों में अनेकों अर्थ लिए बैठी होती है। और एक अधूरी मुलाकात की याद, जीवनभर साथ निभाती है। अधूरेपन से व्यक्तित्व निखरता है। पूर्णता में शान्ति जरूर होती है, लेकिन वहां उत्साह, जिजीविषा, प्रयत्न, यह सब समाप्त हो जाते है। जबकि अधूरेपन में यह सब होता है। शायद अधूरे प्रेम भी इसी कारण से ज्यादा रोमांचक होते है। कुछ अधूरी बातें भी..
एक तरफा प्रेम भी अधूरा होता है। क्योंकि वहां सहमति नहीं होती किसी की। वह अपने अंदर से उठता है। और वह उफान अपने भीतर ही समाहित हो जाता है। हाँ ! जानता हूँ प्रियम्वदा, आज की बातें काफी विचित्र है। लेकिन इसका कारण तुम ही हो। नशा कभी कभी कर लेना चाहिए। इससे हिम्मत मिलती है, हृदय खाली हो जाता है। भीतरी भावों से नियंत्रण छूट जाए तब भी नयी संभावनाएं अपना अस्तित्व खोजने निकलती है।
शुभरात्रि।
०३/१०/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
“क्या आपके जीवन में भी कुछ अधूरी बातें रह गई हैं? उन्हें यहाँ कॉमेंट में लिख डालिए — शायद वही आपके मन का बोझ हल्का कर दें।”🌿
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