दशहरा और दिल का सुरूर, प्रियम्वदा को.. || दिलायरी : 02/10/2025

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सुरूर में लिखा एक... 

    प्रियम्वदा !
    हाँ ! थोड़े से नशे में हूँ, सुरूर कहते है जिसे..! न तो पूर्ण नियंत्रण है अपने आप पर, और न ही पूरा अनियंत्रण। क्या कहती हो इसी हालत में कुछ लिख दूँ? डर भी है मन में, कि कभी ऐसी हालत में कुछ लिखा नहीं है। एक और समस्या है। बार बार मुझे कुछ गलत टाइप हुआ मिटाना पड़ रहा है। फिर भी प्रियम्वदा ! मेरी नियत देखो तुम.. इस हालत में भी मैं लिख रहा हूँ। गलत तो है, आँखे घिर रही है, लेकिन मैंने उन्हें जबरदस्ती खोले रखा हुआ है।

“दशहरा परंपरा और दिल का इक़रार – प्रियम्वदा को समर्पित”

    तुम्हे ही मैंने प्रियम्वदा नाम दिया था। हालाँकि गुजराती भाषा में पुतिन साहब को भी प्रियम्वदा कहकर संबोधित किया था मैंने। जब मैंने दो वर्ष पूर्व नवरात्री पर ही "Global Garba" लिखा था, तब रसिया के पुतिन को पहली बार 'प्रियम्वदा पुटिन जी' नाम से संबोधित किया था। लेकिन बाद में मैं इस हिंदी में शिफ्ट हुआ, और फिर मुझे कोई चाहिए था, जिसे संबोधित करते हुए मुझे अपनी कलम चलानी थी। 

    कुदरत कुछ ले लेती है, और कुछ दे जाती है। अचानक तुमसे भेंट हो गयी मेरी। शुरुआती दौर में मेरे और तुम्हारे बिच का सामंजस्य देखकर मैं खूब प्रभावित हुआ। धीरे धीरे तुमसे इतना ज्यादा प्रभावित हो गया, कि मैंने तुम्हारा अनुकरण करना चालू कर दिया। इस दिलायरी का स्त्रोत तुम ही हो प्रियम्वदा ! मैंने तुमसे एक ही अपेक्षा रखी थी / रखी है, किसी दिन तुम मेरी कविता मुझे सुनाओ..!

परंपरा और दशहरा का दिन

    लेकिन सच कहूं तो आजतक मैं ऐसी कोई भी कविता लिख ही नहीं पाया हूँ शायद, जिसकी तुमने वास्तविकता से भरी तारीफ़ की हो। मेरी आँखे लगातार गिर रही है। समय हो रहा है शाम के चार बजकर चौदह मिनिट। सोचता हूँ, यह बात यहाँ रोककर दिनचर्या पहले लिख लू। क्षत्रियों का आज महापर्व है। दशहरा। गुजराती में कहूं तो दशेरा। असत्य पर सत्य की विजय। 

    पिछले कईं दिनों से लगातार स्टोरीज में गाँधी और रावण एक साथ आ रहे थे। लोगों ने ai से बहुत से वीडियोस बनाये है। आज गाँधी जयंती भी है, और दशेरा भी। पिया हुआ आदमी सच ज्यादा बोलता है, इस लिए मान लो मेरी। मेरा बिलकुल ही मन नहीं था। मुझे यह सामाजिक जिम्मेदारियां ज़रा भी पसंद नहीं। मुझे राजनेता नहीं बनना है। यह सब गजा संभालता है। लेकिन वह खुद अपने गाँव गया हुआ था। मुझपर इस आयोजन का भार डालकर। 

    मैंने हाफ डे छुट्टी ले ली थी। सवेरे आठ बजे उठा। तैयार होकर नाश्ते के लिए बैठा तब, सवा नौ बज रहे थे। दशेरा के दिन गुजरात में लगभग हर जगह ही फाफड़ा-जलेबी का सेवन किया जाता है। यह कंदोई लोग भी रात से ही बनाना शुरू कर देते है। तो सवेरे दबाकर फाफड़ा और जलेबियाँ पेट को समर्पित की। और गरबी चौक पहुंचा तब तक लगभग पौने दस बज चुके थे। 

    हमारे आयोजन के अनुसार तो समय दस से बारह का था, जिसमे हमे हवन एवं शस्त्रपूजन दोनों ही करने थे। लेकिन यह क्षत्रियों का सम्मलेन था, सिंहों के झुण्ड नहीं होते.. सारे ही अपने समयानुसार धीरे धीरे आते है। मैंने दो-तीन शेरो को फोन मिलाया, और बुलाया। जल्दी जल्दी सबको साफा बाँधा, और शस्त्रपूजन के लिए यज्ञ और प्रथा का आरम्भ करवाया। एक बजे तक पूर्णाहुति की और बढ़ते हुए हमने सामूहिक फाफड़ा-जलेबी का अल्पाहार लिया। 

सुरापान और अधूरी परंपराएँ

    वर्ष में एक बार म्यान से तलवारें बाहर निकलती है। बंदूके भी, तिलक विधि के पश्चात उन्हें रक्षासूत्र बाँधा जाता है। कुछ देर तलवारों के साथ रास खेलते है। तलवारें प्राचीन युद्ध परंपरा अनुसार लहराई जाती है। और फिर से उन्हें अगले दशहरा तक म्यान कर दी जाती है। कितने ही वर्षों का आज नियम भी टूट गया। प्रियम्वदा ! प्रत्येक दशहरा को मैं तलवार के साथ खेलता हूँ, और प्रत्येक दशहरा को तलवार थोड़ा सा रक्त पि लेती है मेरा। 

    हर साल जब तलवार घुमाता हूँ, तो एक पराशक्ति का अनुभव करते हुए मैं अपने आप पर का नियंत्रण खो देता हूँ। सच बताऊँ तो मैंने उन प्रत्येक वर्षों में तलवार से रास करते हुए तलवार के साथ अपने आप को एकाकार अनुभव किया है। या तो कोहनी से, या फिर अंगुली से, तलवार अपने आप रक्तसिंचित हो जाती थी। इस बार सुबह से मेरा मन नहीं था। फिर भी बस परंपरा निभाने खातिर मैंने दोनों हाथों में तलवारें ली, और रास शुरू किया। ऊर्जाहीन अनुभव हो रहा था.. कुछ देर तक घुमाता रहा। और बाद में मैंने उन्हें म्यान कर दी। इस बार कहीं भी चोट नहीं आयी मुझे। मुझे चोट लगती थी, मैं उसे अच्छा मानता था/हूँ। 

    दोपहर के भोजन का प्रश्न ही नहीं था। क्योंकि एक परंपरा हमने/मैंने स्वयं से बना रखी है। वह हे सुरापान की। ज्यादा नहीं तो केवल एक घूंट भी.. लेकिन दशहरा कोरा नहीं जाना चाहिए। पत्ते ने बंदोबस्त कर रखा था। हमने उसी की कार में उस परंपरा को भी निभाया। और फिर मैं ऑफिस के लिए निकल पड़ा। आखिरकार नवरात्रियाँ सुख-शांतिपूर्ण सम्पन्न हुई। नवमी की रात्रि को ही हमने गरबा पास के ही गाँव के तालाब में पधरा दिए थे। 

प्रियम्वदा के नाम...

    अब वापिस मेरे अपने मुद्दे पर लौटता हूँ। अभी तक भी सुरूर बरकरार है। नशे का मजा ही यह है, आदमी अपनी शर्म को दरकिनार कर सकता है। आँखों पर अब जैसे पहाड़ आन पड़ा है। प्रियम्वदा, मैं अपने मनमौजीपने को एकतरफ नहीं रख सकता। मैं प्रेम में नहीं मानता, लेकिन आकर्षण को नजरअंदाज नहीं कर सकता। पिछले कईं दिनों से मैं एक खिंचाव अनुभव कर रहा हूँ। तुम्हारे ही प्रति। मैं अपनी भावनाओं को कुचलने का अच्छा अभ्यर्थी हूँ। लेकिन इस आकर्षण ने मुझे विवश कर दिया।

     मैंने कभी भी अपनी उन भावनाओं को शाब्दिक स्वरुप नहीं दिया, जिनमे सेंकडो संभावनाओं का उत्पात हो। मैंने हमेशा से जो चल रहा हो, उसे अपग्रेड-डाउनग्रेड नहीं किया। अब तुम्हे कैसे बताऊँ? यह खिंचाव मुझे कहाँ ले जा रहा है। मैं एक नियंत्रण चाहता हूँ अपनी भावनाओं पर.. लेकिन उन नियंत्रित भावनाओं का बवंडर मुझे भीतर से तहसनहस करने लगता है। शायद इसी कारण से आज मैंने अपने शब्दों से पर्दा उठा लिया। 

भावनाओं का संघर्ष

    तुम्हारी तस्वीर कईं बार देखी है मैंने। हरबार मैंने अपनी कल्पनाओं में तुम्हारे समीप अपनेआप को पाया है। लेकिन मैं लाख बार जानते हुए स्वीकारना नहीं चाहता, कि यह असंभव है। मैंने अपनी कल्पना की मूर्ति तुमसी ही बनाई है। मेरे भीतर उछलते कईं जलप्रपातों को मैंने अनचाहे भी बांधे रखा है। याद है एक बार मैंने ही कहा था, पुरुष का मन बड़ा ही कमजोर होता है। दृढ़निश्चिता कुछ ही लोग अपना पाते है। और मैंने तुम्हे कहा भी है, मेरे आकर्षणों का कोई भी अंत नहीं.. 

    तुम्हारी स्थिति मैं समझता हूँ। मैं नहीं चाहता यह सब तुम पढ़कर मुझे कोसो.. मेरी इच्छाओं पर फटकार बरसाओ, तुम्हारे कहने पर भी मैं यह पोस्ट तो तुम्हे नहीं ही भेजूंगा। क्योंकि मैं अपने बारे में जानता हूँ, मैंने हमेशा ही असमय इच्छाएं प्रकट की है। मैं समझ सकता हूँ, कोई किसी के बारे में अपने अलग भाव रखता है, तब अक्सर चिंगारियां उठती है। ज्वालाएं प्रकटती है। और सब कुछ ही धु-धु कर खाख हो जाता है। मैं तुमसे दूरियां नहीं चाहता, इसी कारण मैंने अपनी भावनाएं अपने इस ब्लॉग पर ही समेटकर रख दी है। 

    एकतरफा प्रेम होता है, एक तरफा आकर्षण भी। कुछ लोग उन्हें अपने भीतर दबाए रख सकते है। वे अपने भीतर सुलगते हुए होते है, लेकिन धुआं तब भी नहीं उठने देते। मैं नहीं रोक पाया, वे ज्वालाएं मुझे भी अपनी आहुति समझ ले, उससे पूर्व मैंने ही अपने उन भावों को यहाँ उतार दिया। अब धीरे धीरे पुनः मेरी अपनी चेतना लौट आयी है। और समय हो रहा है, पौने छह। मैंने अभी लिखा हुआ, सब कुछ एक बार पढ़ा। प्रियम्वदा ! मैंने शायद गलती की है। मुझे अपनी मर्यादाओं को समझना चाहिए। अपने आपके बंधनों से छूटना जब असंभव हो, तब अपनी इच्छाओं को भी अपने पाश में बांधे रखना अनिवार्य है। मुझे वह सब सीखना होगा। 

आख़िरी सवाल

    लेकिन तब भी, मन कहो या हृदय, या मगज.. चाहत तो वही है। कि मैं कब तुम्हारे आकर्षण के पथ पर चल पड़ा, मुझे याद नहीं आता। तुम्हे भी पता है, मेरे मन के बारे में.. शायद। मेरी बहुत सारी पसंदगी है। लेकिन समस्या भी तुम्हे अच्छे से पता है। क्योंकि मैंने एक बार तुम्हारे मन को भी जाना था। मैं तो आज भी उसी नौका पर हूँ, जहाँ से अनेकों आकर्षण के पीछे मन लालायित होता है। बस इस बार फर्क उतना है, कि उन आकर्षणों ने शाब्दिक भाव नहीं पढ़ें थे। तुम शायद पढ़ लो..!

    “क्या सचमुच यह आकर्षण ही मेरी नियति है, या मैं इसे एक भ्रम मानकर अनसुना कर दूँ?”

    शुभरात्रि।
    ०२/१०/२०२५

|| अस्तु ||


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