नौकरी, जीवन, थकान और हँसी || दिलायरी : 24/11/2025

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आज का दिन और लिखने की मजबूरी

    प्रियम्वदा !

    तो क्या हुआ आज सवेरे ही एक दिलायरी लिखी है। दूसरी भी आज ही लिखनी पड़ेगी। नया सप्ताह, नया उमंग.. लाना पड़ेगा। न हो तब भी..! कैसा हो, जब दोपहर से पहले पिछले सप्ताह की समीक्षा की हो, और दोपहर बात नए सप्ताह का आरंभ.. क्या करे प्रियम्वदा, इस लिखने वाले रोग का कोई इलाज नहीं.. यहाँ बस एक खाली पन्ना चाहिए होता है.. डिजिटल पन्ना.. वो कागज वाला दौर अब नहीं है। 


“एक व्यक्ति आईने में खुद को बूढ़ा रूप में देखता हुआ — समय, थकान और जीवन के विरोधाभास का प्रतीकात्मक चित्र।”

उम्र, शरीर और समय का धीमा परिवर्तन

    जैसे जैसे दिन बीतते जाते है, शरीर भी वृद्ध होता जाता है। यह वृद्धता की और अग्रसर होता हुआ हमारा शरीर हमें एक झटके अनुभव नहीं होता.. हररोज थोड़ा थोड़ा वृद्धत्व हमें अपने पाश में लेते जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे हमारी हड्डियां विकसित हुई है.. हमने कभी अनुभव नहीं किया, हमारे शरीर के आधार स्तंभ जैसा यह हड्डियों का ढांचा कब विकसित हुआ? बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक.. धीरे धीरे कर शरीर की हड्डियां बढ़ती रही है। लेकिन हमें कभी भी वह दर्द महसूस न हुआ क्यों? 


    हड्डियां टूटती है तो हमें दर्द अनुभव होता है, लेकिन विकास के उस क्रम में हमें कभी यह अहसास नहीं हुआ..! शायद विकास की गति ही ऐसी है। उत्साहपूर्ण। लेकिन जब विकास थम जाता है, तब दर्द, कराह, पीड़ा यह सब समझ में आते है। प्रकृति ने गति के साथ उत्साह दिया है, लेकिन स्तंभन के साथ एक पीड़ा भी दी है। 


नौकरी, पैसा और प्रेम का तर्क

    आज सवेरे बिस्तर में बस पड़े रहने का मन था, उठने का जरा मन नहीं था। लेकिन नौकरी करते आदमी की मजबूरी है ऑफिस पहुंचना। क्योंकि वहां और कोई हो न हो, काम आपका इंतजार उसी शिद्द्त से करता है, जितना कोई उधार दिया हुआ आदमी अपने पैसों के वापिस आने का इंतजार करता है। तुम्हे क्या लगा, मैं प्रेमी के इंतजार की बात करूँगा? नहीं प्रियम्वदा अब मेरी जो उम्र है, वहां प्रेम से ज्यादा पैसा महत्वपूर्ण है। मुझे अब वो बात बेकार लगती है, जब कोई कहे, प्रेम है तो सब कुछ है। मैं अब मानता हूँ, कि पैसा है तो सब कुछ है। 


    पैसा प्रेम से बड़ा है। पैसे से प्रेमी की हड्डी तुड़वा सकते है। प्रेम से पैसे वाले की नहीं। क्योंकि पैसे वाले के पास सुरक्षा अधिक होती है। प्रेम तो कूड़ेदान में पड़ा रह सकता है। पैसा नहीं। पैसा है तो ऐश्वर्य अपने आप आएगा। प्रेम के साथ महेनत लगती है। किसी कठिन रस्ते पर प्रेम पूर्वक चल सकते है, लेकिन उसी कठिन रस्ते पर पैसे से सहूलियतें निर्माण हो सकती है। पैसा जेब में रह सकता है, प्रेम को दिल चाहिए.. 


दिनभर की भागदौड़ और दफ्तर का जीवन

    प्रियम्वदा ! छोडो यह सब.. मैं तुम्हे एक और अजीब बात बताता हूँ। हमारे यहाँ पानी की सप्लाई नहीं हो रही है। गर्मियों में पानी की कटौती समझ सकते है। लेकिन यहां तो सर्दियों में ही पता नहीं किस कारणवश पानी नहीं आ रहा। दोपहर को मार्किट चल पड़ा, थोड़ा बहुत सामान लाना था, और वैसे भी ऑफिस पर पुष्पा छुट्टी पर गया है, तो लंच टाइम में काम का प्रेशर न बढ़ जाए, इसी लिए। घर पहुंचकर एक पानी के टैंकर वाले को फोन किया, और मंगवाया। 


    खेर, लंच के बाद ऑफिस आकर कुछ देर झपकी ले ही रहा था, की बहादुर आकर चाय दे गया। बताओ.. कितना कर्मनिष्ट है हमारा बहादुर.. ऑफिस टाइम में आराम करने नहीं देता। यही असलियत है, नौकरी करने वालों की.. हमें काम के समय आराम की सख्त जरूरत होती है। क्योंकि हमें काम के समय काम के अलावा सारे विचार आतें है। जैसे कि अभी विचार हो रहे है, कि यह काम करना ही नहीं पड़ता तो कितना आसान था?


    जैसे कि आज भी हम जंगलों में रह रहे होते, शिकार करते हुए जीवनयापन कर रहे होते। न एक जगह स्थायी होने की झंझट, न ही एक निश्चित दायरे में रहकर कार्यक्षेत्र बनाना पड़ता, न ही एक परिवार होता, समस्त जगत अपना होता, समस्त सृष्टि अपनी.. न पैसा होता, न प्रेम, न ही ऐश्वर्य.. बस पहनने के लिए कुछ कपडे, रक्षण हेतु एक शस्त्र, और कार्यक्षेत्र का दायरा पूरी पृथ्वी। खेर, यह तो एक दिवास्वप्न है, और दिवास्वप्न बस रेत के टीले पर इकट्ठी हुई धूल के कण से होते है। झौंके के साथ उड़ जाते है। 


    समय हो चूका साढ़े पांच, सरदार की होशियारी काबिले-दाद है। मशीने दो-तीन बंद रहनी है, तो भाईसाहब थोथे उठा लाए.. बोले छुट्टी है, इसे ही निपटा लेते है। आज के इस अध्यतन युग में भी कागज़ पर एक एक कलम उतारनी, बड़ा ही सरदर्दी भरा काम है। लेकिन मैंने कहा न, हमारा (नौकरी करने वालों का) मन काम के अलावा हर जगह चलता है। मुझे पता है, यह थोथे मुझे ही निपटाने है, वह भी एक समय मर्यादा के भीतर.. फिर भी मैं लगा हुआ हूँ इस दिलायरी में अपना दिन उतारने। 


असंतोष, विरोधाभास और मन की बातें

    शाम ढल चुकी है, अँधेरा छाने लगा है। चिड़ियों की चहचहाट सुनाई पड़ रही है.. ठण्ड अपनी पकड़ ज़माने लगी है। लो जी.. कुछ देर ऑफिस का काम क्या कर लिया, अँधेरा तो पूरा ही छा गया। कुदरत भी बड़ी मनमर्जियां चलाती है। अँधेरे को हराने इंसान बस एक स्विच दबाता है, पता नहीं इंसान भी क्या चाहता है.. अँधेरा है, तो उजियारा ढूंढता है। धूप है, तो छाँव ढूंढता है। ठण्ड है तो गर्मी चाहता है। बारिश में छाता लेकर निकलता है, और गर्मियों में बारिश जैसा शॉवर लेता है। फेसबुक पर पश्चिमी सभ्यता का विरोध करता है। सवेरे दौड़ लगाने जाता है, और शाम को चीज़ पिज़्ज़ा खाता है। 


    अपने आप में विरोधाभास का जो चरम होता है न, वही इंसान स्वयं है। फ़िलहाल साढ़े सात बज गए, बाहर ठण्ड ने अपनी शीतलहर ओढ़ा दी है। एक कुत्ता भोंक रहा है। लाइट्स ने सफेद चादर बिछाई है। और मैं ऑफिस में बढ़ चुके मच्छरों से तंग आ चूका हूँ। यह लिखता रहूं, उन्हें उडाता रहूं? करूँ क्या? एक तो इस इंडस्ट्रियल एरिया में मच्छरों ने पता नहीं कौनसा बोर्नविटा पि लिया है.. सबके सब मक्खियों से साइज में कॉम्पिटेशन करने में लगे है। इतने मोटे हो चुके है, कि इन्हे हाथ से झापड़ मारकर भगा सकते है।


    खेर, सच कहूं प्रियम्वदा ! आज लिखने का मन तो नहीं था, पर कीबोर्ड पर उँगलियाँ रखते ही जैसे यह दिलायरी इस डिजिटल पन्ने पर उतरने लगी। वैसे पढ़ा मैंने अभी जो भी लिखा है, उतना मजेदार नहीं है। लेकिन क्या करें.. मजबूरी है.. एक कलम घिसने वाले की मजबूरी। 


    शुभरात्रि। 

    २४/११/२०२५

|| अस्तु ||


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