रविवार, गाँव की बात, वॉलीबॉल और बेचैन रात
प्रियम्वदा !
कहाँ मैं यह दैनिक दिलायरी लिखने के चक्कर में फँस गया हूँ। बाकी दिन तो ऑफिस में रहता हूँ, तो लिख भी लेता हूँ कुछ न कुछ जुगाड़ करके। लेकिन रविवार को तो दोपहर तक ही ऑफिस पर होता हूँ। तो रविवार की दिलायरी रह जाती है। चलो फिर अब सुबह सुबह लिख लेते है, क्या करें, लिखना तो पड़ेगा। कम से कम एक साल तो पूरा करूँ।
रविवार की शुरुआत
तो बात ऐसी है, कि आज का रविवार सुबह तक तो ठीक ठाक रहा, लेकिन शाम ढलते ही क्या खूब मजेदार हुआ है। सवेरे अपने दिलबाग में थोड़ी देर टहलने के बाद ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा। उतने में हुकुम ने बताया, 'उन्हें गाँव जाना है।' गाँव जाना यह वाक्य कितना मजेदार है न.. लेकिन उतना ही कड़वा भी है, जब एक लंबा सफर तय करना पड़े, और एक ही दिन में कईं सारे काम निपटाकर वापिस लौटना पड़े। अक्सर जो लोग गाँव से बड़े दूर बसे है, और नौकरी करते है, उनके लिए छुट्टी करके गाँव जाना अपने आप में समस्या है।
गाँव की दौड़-भाग और जिम्मेदारियाँ
एक तो गाँव जाना है, लेकिन ख़ुशी की बात न हो.. तो कैसा हो? किसी की मृत्यु पर शोक जताने जाना हो, दो दिन बाद गाँव में होने वाले विवाह का शगुन देना हो, और जमीन की देखभाल और हिसाब किताब का कागज़ी काम भी निपटाना हो.. यह सब काम इकठ्ठा करके हुकुम यहां से निकल रहे थे। मेरी जरुरत वहां नहीं थी, इसी लिए वे अकेले जा रहे थे। एक तो उन्हें कार ड्राइविंग कोर्स के बावजूद नहीं आयी। चला तो लेते, लेकिन लंबी दूरी पर, वो भी अकेले, मुझे थोड़ा डर रहता है। एक और लड़के को गांव तरफ काम था, वह कार चला लेता है। काम हो गया।
मैं ऑफिस आ पहुंचा। रविवार को हम चाहे तो, सवेरे दस बजे तक फ्री हो सकते है। लेकिन नहीं, हम बारह बजे के बाद ही काम शुरू करते है। फिर मैं भी थोड़ा ज़िद्दी हूँ.. कोई मुझे लेट करवाता है, तो मैं फिर जान बूझकर और लेट काम करता हूँ। दोपहर के ढाई तो ऑफिस पर ही बजा दिए थे। काम तो क्या ही होता है रविवार को? लेकिन इतना धीरे धीरे करता हूँ कि घड़ी शरमा जाए। खेर, ढाई बजे घर लौटा.. और खा-पीकर सोये हुए कुँवरुभा को जगाया।
नाई, जुएँ और बचपन की यादें
बातूनी नाइ के पास जाना था। प्रियम्वदा, तुम्हे पता है? इतने एडवांस शेम्पू के ज़माने में भी सर की जुओं ने अपना अस्तित्व टिका रखा है। मुझे याद है, तब तक बचपन में एक बार मेरे सर में जुएं हुई थी, गाँव से लौटने पर। उसके बाद मैंने कभी अपने सर में जुएं नहीं पायी। न ही कभी किसी को सुना, कि किसी के सर में जुएं पड़ी हो। लेकिन कुँवरुभा पता नहीं कहाँ अपना सर भिड़ाकर आए थे, कि सारा सर जूओंसे भरा पड़ा था। कंघी फेरने भर से कितनी ही जुएं निकल पड़ती।
इसी कारणवश नाइ के पास जाकर मिल्ट्रीकट करवाना था। बिलकुल छोटे बाल.. मिल्ट्री कट हेयरस्टाइल का सबसे बड़ा लाभ यही है, कि कभी कोई झगड़ा हो जाए तो दुश्मन अपने सर के बाल न पकड़ सकें। खेर, नाइ ने कुँवरुभा के साथ तरह तरह की बातें करते हुए हेयर-कट कर दिया। हम वापिस लौटे। वे तो अपना मस्त मगन होकर खेलने में व्यस्त हो गए। लेकिन मेरे पास टाइम-पास करने का कोई भी साधन न था। शाम के साढ़े छह बज रहे थे, और वॉलीबॉल का कोई भी प्लेयर रेडी नहीं था।
शाम की थकान और वॉलीबॉल का खेल
थोड़ी देर पास की एक दूकान पर बैठा, और मोबाइल गेम में टाइमपास किया। और रात को भोजन के बाद चल पड़े वॉलीबॉल के खेल में.. नौ बजे शुरू किया था, रात के साढ़े ग्यारह बजा दिए थे। कल रविवार था, इस कारण से खिलाड़ी भी बहुत सारे थे, दोनों टीमों में आठ आठ प्लेयर हो गये थे। जब नहीं होते है, तो कोई नहीं होता। और आज इतने ज्यादा थे, कि कुछ खिलाडियों को बिठाना पड़ा।
आधी रात की जाग और आत्ममंथन
रात के साढ़े ग्यारह घर लौटा, सब सो चुके थे, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। शायद खेल के उत्साह के कारण। कितनी ही करवटें बदली, कितनी ही रील्स देखी, लेकिन निंद्रा देवी मुझे अपना कृपापात्र नहीं मान रहीं थी। मैं अपने इस सप्ताह का लेखा-जोखा करता पलंग पर पसरा हुआ था। इस सप्ताह में क्या खास हुआ? कुछ भी नहीं.. क्या अच्छा हुआ? कुछ भी नहीं... क्या बुरा हुआ? कुछ भी नहीं। पिछले रविवार को वोटरलिस्ट वेरिफिकेशन के बाद शुरू हुआ यह सप्ताह, कुछ भी ख़ास लाया नहीं था मेरे लिए।
फिर में खुद से ही सोचता हूँ, कुछ ख़ास हमें खुद से बनाना पड़ता है। प्रकृति हमें बस मौका देती है। उस मौके को ठीक से उठा लेना.. वह तो हमारे हाथ में है। बिहार के चुनाव रिज़ल्ट में जीती मैथिलि से सोमवार शुरू हुआ था मेरा, और शनिवार के शुभ स्वस्तिक पर यह सप्ताह समेटा है मैंने। हर रात को वॉलीबॉल खेलना, यही एक मात्र निश्चितता बन पायी है अभी तक। इतने सप्ताह हो गए, मैंने अभी तक ढंग से बॉल पास करना नहीं सीखा है, मोटापे का एक ही नियम होता है, खड़े खड़े खेल लेंगे, भागदौड़ न हो पाएगी।
लिखना क्यों जरूरी है?
मैं सोच रहा हूँ, पिछली २५ दिसंबर से शुरू हुई इस दिलायरी की परंपरा को एक वर्ष पूर्ण होने में अब पूरा पूरा एक महीना बाकी रह गया है। गत वर्ष की २५ दिसंबर से आज तक डेली एक पोस्ट लिखी है, लेकिन यह ख्याल भी बार बार मन में उठ रहा है, कि अब इसे और आगे खिंचा जाए? क्योंकि आज की ही तरह कईं दिन ऐसे आते है जब दिलायरी लिखने का समय नहीं बचता। और एक दिन में दो-दो दिलायरी बस बेमन से लिखनी पड़ती है। मेरा वह नित्यपाठी भी, मेरी प्रेरणा भी अनियमित है..
अगला कदम और एक सवाल
प्रियम्वदा ! कईं बार हम किसी के साथ बिनशर्त रेस लगा लेते है, फिर खरगोश की तरह राह तकते बैठ जाते है। जब आँखे खुलती है, तब तक परिणाम कुछ और ही निर्माण हो चूका होता है। एक तो मेरा मन.. कभी उसे स्नेही याद आता है, कभी उसे घुमनेलायक स्थान.. अभी अभी मन राजस्थान के धोरो में घूम रहा है.. वह भी बाइक से.. अरे हाँ.. मेरा वह ख्वाब तो अब मैं ही भूल चूका हूँ। मुझे किसी समय पर बाइक पर घूमने जाने का कीड़ा काटता था। अब लगता है, वह कितना अनकंफ़र्टेबल है।
शुभरात्रि।
२३/११/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
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