आज का दिन और खालीपन की आवाज़
प्रियम्वदा !
आज फिर से समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं? इंटरनेट पर कुछ मुद्दे तलाशे.. लेकिन ऐसा कुछ खास न मिला। मिल पर दो दिन से काम बंद है, और पूरा दिन खाली रहता हूँ। आज तो लाइट भी नहीं थी। पूरा दिन ऐसा खालीपन में सना हुआ था, कि अभी तक समझ नहीं आ रहा, करूँ तो करूँ क्या..? हाँ थोड़ा बहुत काम भी था, स्ट्रेस्फुल भी था। लेकिन उसके बाद करने को कुछ भी नहीं।
जब पहली बार कोई नया सिस्टम सीखना पड़ता है
अभी तक यही सोच रहा हूँ, कि आज के दिन में ऐसा क्या हुआ, कि उसे यहाँ उतार सकूँ? क्योंकि जब ऐसे ख़ालिखम दिन होते है, तो यह सोचना पड़ता है, कि आज मैंने क्या उखाड़ा है... हाँ ! सच में.. मैं अक्सर सोचता हूँ.. हम ज्यादातर दिनों में कुछ न कुछ ऐसा करना चाहते है, जिससे यादगार रहे। और जब मैं यह सोच रहा हूँ, तो मुझे बस इतना समझ आ रहा है, कि हम जो भी काम पहली बार करते है, वहां हमें पल पल कैसे बीत रहा है, उसकी अनुभूति हो रही होती है। लेकिन वही काम जब दोबारा करते है, तो उतना उत्साह नहीं होता।
कुछ सप्ताह पूर्व मुझे एक पेमेंट करनी थी, इम्पोर्ट्स से संबंधित कार्यक्षेत्र है मेरा। तो यहाँ कुछ मामलों में एडवांस पेमेंट्स करनी पड़ती है। बैंकिंग का यह क्षेत्र ही मेरा नया कार्यभार है, या यूँ कहूं कि पहले जो काम करता था, उसके अलावा अधिक काम है यह मेरा। तो पहली बार मुझे एक एडवांस पेमेंट करनी थी। मैंने जो सिस्टम सीखी थी, उस हिसाब से पहले बैंक से रेट लेना है, और उसके बाद पेमेंट करनी है। तो बैंक के ट्रेज़री दफ्तर में मैंने फोन मिलाया, ताकि फलानि करेंसी का कन्वर्शन रेट ले सकूँ..!
वहां स्थित कर्मचारी ने बताया कि, "पहले आप बैंक की प्रोसेस तो कर लो, उसके बाद मुझसे रेट लेना। अगर मैंने रेट बुक कर दिया, और आप पेमेंट नहीं कर पाए, तो अनेकों चार्जेज लग जाएंगे।" अब उसके अनुसार उसने प्रोसेस करने को कहा, लेकिन प्रोसेस में क्या करना है, वह मुझे नहीं पता था। मैंने इधर उधर फोन घुमाए, सब ने यही सिस्टम समझाया, कि पहले रेट बुक करना है, और फिर पेमेंट। लेकिन मैं रेट लेना चाह रहा हूँ, तो ट्रेज़री वाला कहता है, 'पहले प्रोसेस पूरी करो।'
दिमाग की नसें फटने को थी। क्योंकि यहाँ एक टाइम लिमिट होती है। निश्चित समय मर्यादा में सारी विधि हो जानी चाहिए। फिर एक पडोसी एक्सपर्ट को बुलाया.. वह भी सेम बैंक का ही कस्टमर है, और उसे यह विधि आती भी थी। उसने आकर मुझे प्रोसेस सिखाया.. बिलकुल ही इजी था। पहले बैंक की वेबसाइट पर एक फॉर्म फिलप करना होता है। और बस उसे सब्मिट कर देना होता है। बैंक खुद से कांटेक्ट करेगी, रेट बुक करने के लिए।
मैंने उस दिन वह फॉर्म वाला प्रोसेस तो कर लिया। लेकिन उसके बाद दो बजने को आए, लेकिन बैंक की ओर से कोई भी प्रत्युत्तर नहीं मिल रहा था। यहाँ मेरा ब्लड प्रेशर हाई होने लगा था, कि कोई गड़बड़ न हो जाए बस। क्योंकि हम जो भी काम पहली बार करते है, उसमे हमें पता नहीं होता है, कि हमने सही किया है या गलत। उस दिन मैंने दिनभर में लगभग दस-बारह बार ट्रेज़री वालों को फोन मिलाया था, और अब वे मेरी कम्पनी के बजाए मुझे आवाज से पहचानने लगे थे।
आखिरकार ढाई बजे करीब बैंक ने अप्रूव कर दिया। और मेरी पेमेंट सफलतापूर्वक पूर्ण हो गयी। आज भी मुझे वही काम दोबारा करना था। सवेरे एक तो बार बार बिजली आ जा रही थी। और आज भी पेमेंट सफलतापूर्वक पूर्ण करना अनिवार्य था। आज तो सारा सिस्टम समझ आ गया था, और मुझे कोई परवाह भी न थी। मैंने अपनी और से बैंकिंग वेबसाइट पर सारा कुछ डाटा फिलअप करके अपलोड कर दिया। और एक बजते ही घर के लिए निकल पड़ा। तीन बजे वापिस लौटा। पता है, काम तो कुछ है नहीं।
लगभग साढ़े तीन बजे बैंक के ट्रेज़री डिपार्मेंट से कॉल आयी। और वह आदमी सामने से बोलता है, "क्या बात है सर, आज आपने कोई फोन नहीं किया?" मैं उसकी आवाज़ पहचान गया। यह वही व्यक्ति था जिसे पिछली बार मैंने कईं फ़ोन मिलाकर परेशां किया था। क्योंकि मैं खुद असमंजस में था। तो मैंने उससे हँसते हुए कहा, "आज तो सिस्टम सीख चूका हूँ भाईसाहब।" और फिर उसने मुझे कन्वर्शन रेट बताया, और पेमेंट बुक हो गयी।
पहली बार और दूसरी बार के अनुभव में फर्क
इस प्रसंग का तात्पर्य इतना ही था, कि जब हमें कुछ पता नहीं होता है, तब हम ज्यादा उत्सुक होते है। लेकिन बाद में हम यूज़ टू हो जाते है। और वह व्यक्ति भी काफी मजेदार था। पिछली बार उसने मेरे प्रत्येक कॉल पर बड़ी ही शालीनता से बात की थी, मैंने कितने ही फोन किए हो.. क्योंकि उस दिन मैं खुद परेशान था, परेशानी से ज्यादा एक झुंझलाहट थी। सिस्टम न समझ पाने की झुंझलाहट। लेकिन आज जब मुझे रिवाज़ पता था, तो मैं बड़े आराम से अपना लंच ब्रेक भी निभा आया।
लोग जवाब जल्दी देते हैं, सुनते कम हैं
मुझे लगता था, आजकल लोग सुनते कम है, जवाब ज्यादा ढूंढते है। सुनना और जवाब देना - इन दोनों में बहुत अंतर है। हाँ ! इस मोबाइल युग में हर कोई बात पूरी होने से पहले अपने मन में तीर सजाए तत्पर होता है। बहुत कम लोग होते है, जो शालीनतापूर्वक आपको सुनते है। और आपको सुनने के बाद सलाह मशवरा करते है। मैं खुद किसी से बात करते हुए अपने दिमाग में सैंकड़ों तीर तैयार करने लगता हूँ। आजकी ही बात है, किसी कारण वश वह एडवांस पेमेंट करने के लिए मैं बैंक साइट पर डाटा फिलअप कर रहा था, और किसी कारणवश पेज रिफ्रेश हो जाता, तीन से चार बार मैंने यह प्रक्रिया दोहराई।
इस दौरान दो-तीन लोग मुझे बार बार दूसरे-तीसरे काम के लिए बिच बिच में टोकते थे। मेरा पारा अचानक से चढ़ गया, और मैंने बिलकुल ही मुंहफट तरीके से उससे कहा, "क्या खा के आए हो तुम लोग, दीखता नहीं मैं कुछ जरुरी काम कर रहा हूँ।" है तो यह तिरस्कार और अपमानित करने वाला वाक्य.. लेकिन उन लोगो ने समझदारी दिखाते हुए मेरी इस हरकत को नज़रअंदाज कर दिया। उन्हें भी मेरी जरूरत थी, तभी तो वे लोग बार बार मुझे बुला रहे थे। पर मेरे लिए यह काम ज्यादा जरुरी था, क्योंकि पैसे से जुड़े कामों में मन में हमेशा डर रहता है, पैसे खोने का।
प्रियम्वदा ! हर जगह राय है, प्रतिक्रिया है। हर किसी को सलाह देना बड़ा जरुरी काम लगता है। मैं खुद अपनी कितनी ही दिलायरियों में सलाहें बाँट देता हूँ। अगर सलाह देने पर टैक्स वसूला जाए, तो मुझे लगता है सोशल मीडिया नामशेष हो जाएगा। क्योंकि सलाह मशवरों का अड्डा ही यह इंटरनेटी दुनिया के सोशल मीडिया एप्प्स है। और जहाँ आवाजें बहुत ज्यादा होती है, वहां कुछ सुनना बड़ा मुश्किल हो जाता है। यही सोशल मीडिया है, सब्जी मंडी है एक तरह की यह.. यहाँ तरह तरह की आवाज़ें उठती है। हर कोई चीखता है, आज मैंने यह किया.. जैसे मैंने इस दिलायरी में अपनी चीखपुकार रखी है।
मौसम, मन और धीमा संगीत
अरे अरे.. मैं भी माहिर होता जा रहा हूँ, अपने ही उड़ाए तीर को वापिस लेने में.. मुझे अपने आप को अलग रखकर सलाहें बांटनी चाहिए.. है न प्रियम्वदा? लेकिन क्या करूँ.. आजकल मानसिकता ही ऐसी हो गयी है, प्रत्येक परिस्थिति में मैं खुद को पाता हूँ। विपरीत परिस्थितियों में तो खास। छोडो, मौसम पर चलते है। यह भी मेरी बातों की दिशा की तरह बार बार बदलता रहता है। है तो सर्दियाँ, लेकिन आज कुछ अजीब सा दिन बना हुआ है। अभी कुछ देर पहले ऑफिस से बाहर यूँही टहलने निकला था, तो कुछ लोग आग सेंकते दिखे।
हवाएं ठंडी बह रही है, और मौसम को भी जैसे दीर्घदृष्टिदोष हुआ है। सब कुछ धुंधला-धुंधला कर दिया है प्रकृति ने। आमतौर पर ऐसा वातावरण सुबह सुबह होता है, औंस जैसा। लेकिन अभी शाम के छह बजे.. ठंडी हवाओं के साथ पता नहीं जैसे बादल उतर आएं है। प्रकृति का यह रूप बहुत कम देखने को मिलता है, खासकर यहाँ जहाँ मैं बसा हूँ। सर्दियां मुझे सदैव से पसंद है, क्योंकि सर्दियों में थकान महसूस नहीं होती, आलस जरूर से होती है।
इस मौसम में तो हाथ में ग्लास हो, सामने भभकती अग्नि की लपटे, और धीमा धीमा कोई संगीत.. कोई धून, कोई गीत.. जैसे वह गीत.. "हुज़ूर इस क़दर भी न इतराते के चलिए.."
शुभरात्रि।
२५/११/२०२५
|| अस्तु ||
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