स्वस्तिक का इतिहास: अर्थ, उत्पत्ति, नाज़ी प्रतीक भ्रम और भारतीय दर्शन || दिलायरी : 22/11/2025

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स्वस्तिक का अर्थ, इतिहास और पहचान का संघर्ष

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

(हे इंद्र हमारा कल्याण करो, हे पूषा/सूर्य हमारा कल्याण करो, जिनकी चक्रीय गति को कोई रोक नहीं सकता वे गरुड़ हमारा कल्याण करो, अरिष्टनेमि/प्रजापति हमारा कल्याण करो, बृहस्पति हमारा कल्याण। करो)

"Indian writer character standing beside traditional Hindu Swastik symbol drawn for cultural and historical blog context on white background."

    प्रियम्वदा !
    यह ऋग्वेद की ऋचा - स्वस्तिवाचन प्रार्थना नाम से ज्यादा विख्यात है। वैसे आज सुबह दिलबाग में टहल रहा था, और सर्दियों की असर तले मुरझाते अपने पौधों को देखकर मन कुछ निराश था। सारे ही पौधे जैसे कोई लंबी नींद के लिए चले गए हो, और बिलकुल ही ऊर्जाहीन दिखाई पड़ते थे। उनकी चमक जैसे छीन ली गयी हो। मैं घर में आया, और ऑफिस जाने की तैयारियों में लग गया। घर से निकलकर भगवान जगन्नाथ को शीश झुकाया। वहां से निकलकर पास की दुकान से एक धुम्रदण्डिका की आराधना की। और ऑफिस जाते हुए कानों में ब्लूटूथ लगाए हुए - यूट्यूब सुनते हुए निकल पड़ा।

    विडिओ में नाज़ी जर्मन लोगो के बारे में माहिती थी, हिटलर के बाद नाज़ी जर्मन लोगों की क्या हालत हुई.. कैसे उनके देश की बंदरबांट हुई.. पूरा प्रसंग तो इंटरनेट पर उपलब्ध है, लेकिन मुझे यह सुनते हुए विचार आया, हिटलर ने अपना चिन्ह स्वस्तिक ही क्यों चुना होगा? और हमारे देश का स्वस्तिक यूरोप कैसे पहुंचा? स्वस्तिक और Hakenkreuz में क्या अंतर है? Hakenkreuz माने नाज़ी हिटलर का स्वस्तिक.. या वह स्वस्तिक है ही नहीं? मैं इन प्रश्नों के परिणाम तक नहीं पहुँच पाया, लेकिन जितना जान पाया उसे ही यहाँ दिलायरी में सम्मिलित कर रहा हूँ।

स्वस्तिक शब्द की उत्पत्ति और वैदिक संदर्भ

    सु + अस्ति + क से स्वस्तिक शब्द मिलता है। सु वह ध्वनि है, जिसे वैदिक काल में सकारात्मक ध्वनि/ऊर्जा का संकेत दिया जाता था। सु का अर्थ है, शुभ या मंगल। अस्ति अर्थात होना, या अस्तित्व। अंग्रेजी का is - अस्ति से आया हुआ माना जाता है। क एक प्रत्यय है। जो किसी वस्तु या स्थिति को रूप या पेहचान देता है। इस प्रकार स्वस्तिक का अर्थ हुआ, जो शुभ अस्तित्व उत्पन्न करे। वैदिक ग्रंथो में - खासकर ऋग्वेद में स्वस्ति शब्द कईं मंत्रो में मिलता है। जैसे इस लेख के आरंभ में ऋचा लिखी है।

स्वस्तिक की यात्रा – सभ्यताओं से संस्कृतियों तक

    इंटरनेट पर खोजबीन करने से बहुत कुछ मिलता है। कुछ खाली समय मिला, तो लगा खोजने। स्वस्तिक का जो चिन्ह है, वह किसी एक स्थान विशेष की देन नहीं है। इस प्रतिक ने मानव सभ्यताओं के साथ साथ यात्राएं की है। पहाड़ों से मरुभूमि तक, मंदिरों से चूल्हों की आग तक। पत्थर की दीवारों से लेकर मिट्टी के सिक्कों तक। टाइम्स ऑफ़ इंडिया का एक आर्टिकल कहता है, कि 10000 BCE के काल खंड में उत्तरी काकेशस (उक्रैन रशिया रीजन) में हाथी दांत की नक्काशी में स्वस्तिक जैसी आकृतियां पायी गयी है, (सोर्स)। 2600 - 3000 BCE में सिंधु-सरस्वती सभ्यता के स्थान मोहेंजोदड़ो - हड़प्पा में, मिट्टी की मुहरों, बर्तनों और वस्तु में स्वस्तिक का चिन्ह देखने मिलता है।

तिब्बत, ग्रीस, चीन और जापान में स्वस्तिक

    सुमेर उर की 2500 BCE की मेसोपोटामिया सभ्यता के मंदिरों में भी स्वस्तिक जैसा चिन्ह दीखता है। प्राचीन तिब्बत के बॉन धर्म में स्वस्तिक का चिन्ह - चक्र, तत्व, और शुभता के अर्थ में लिया जाता है। यूनानी और रोमन सभ्यता में Gammadion Cross भी स्वस्तिक जैसा ही दीखता है। पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ चीन में "वान" और जापान में "मनजी" नाम से यह स्वस्तिक की आकृति पहुंची। लोह युग के उत्तरी यूरोप में सेल्टिक, वाइकिंग और नोर्स संस्कृति में भी उनकी ढालों पर स्वस्तिक जैसी आकृति मिलती है।

    यह देखकर लगता है, जैसे स्वस्तिक मानव चेतना का सार्वभौमिक पैटर्न है। स्वस्तिक चार दिशाएं, चार तत्व, चार ऋतु और जीवनचक्र का घूमता पहिया है। जैसे उत्तर = सृजन, पूर्व = आरंभ, दक्षिण = परिवर्तन, पश्चिम = समापन। दर्शन के अंदाज़ में कह सकते है, कि स्वस्तिक वह क्षण है, जहाँ मानव ने पहली बार रेखाओं में अर्थ ढूंढा। भारतीय परंपरा में स्वस्तिक दोनों रूपों में स्वीकार्य है। दाहिने तरफ (卍) और बाएं तरफ (卐) भी।

    स्वस्तिक का आधार है एक समकोणीय क्रॉस (+)..! जिसके चारो सिरों पर 90° के मोड़ होते है। स्वस्तिक की आकृति का यदि अर्थघटन किया जाए तो, स्वस्तिक की चार भुजाएं चारो दिशाएं दर्शाती है। उसके चार कोण चार ऋतुएं। स्वस्तिक का घूमता हुआ आकार जीवन चक्र को दर्शाता है। और स्वस्तिक का केंद्र ब्रह्म / शून्य / ऊर्जा का स्त्रोत माना जाता है। स्वस्तिक दिखने में चौकोर लगता है, लेकिन उसके भीतर एक अदृश्य वृत है। गणित, ब्रह्माण्ड, चेतना.. सब कुछ ही इस एक चिन्ह में समाहित हो जाता है।

सनातन, जैन और बौद्ध व्याख्या

    स्वस्तिक या स्वस्तिक जैसी आकृति वाला यह चिन्ह हर धर्म में अलग अर्थ धारण करता है। लेकिन जड़ एक ही है, शुभ, संतुलन, ऊर्जा और निरंतरता। सनातन संस्कृति में यह चिन्ह सूर्य का प्रतिक माना जाता है। इसके चार हाथ है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। सामूहिक रूप से कहे तो पुरुषार्थ चतुष्टय। जैन परंपरा में भी यह एक आध्यात्मिक चिन्ह है। जिसकी चार भुजाएं दर्शाती है, 1. मानव = संसार में जन्म। 2. तिर्यंच (जानवर-पौधे) = प्रकृति / जिव। 3. नरक जिव = अविद्या और कष्ट। 4. देवलोक जिव = स्वर्गीय अवस्था। जैन स्वस्तिक के ऊपर तीन बिंदु और होते है। जो सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के प्रतिक है। उसके ऊपर अर्धचंद्र होता है, जो मोक्ष का प्रतिक है।

    बौद्ध धर्म में 卍 मंजी कहते है। यह बुद्ध के हृदय, करुणा और धर्मचक्र का प्रतिक है। तिब्बती संस्कृति इसे अनादि ऊर्जा कहती है। यहूदी संस्कृति में यह प्रतीक Jewish Kabbalah और कुछ मध्य-पूर्वी सभ्यताओं में अनन्त प्रकाश और याहवेह की ज्योति से जोड़ा जाता था। तथा नेटिव अमेरिकन और ट्राइबल संस्कृतियों में भी यह चिन्ह ऊर्जा या निरंतरता का प्रतिक है।

स्वस्तिक और नाज़ी Hakenkreuz में अंतर

    स्वस्तिक ने हजारों वर्षों तक शांति, समृद्धि, आध्यात्मिक ऊर्जा का अर्थ रखा। लेकिन बीसवीं सदी में दुनिया ने देखा कि एक प्रतीक की आत्मा को उसकी पहचान से अलग कर दिया गया। 1920 में जर्मनी में हिटलर ने नाज़ी पार्टी का चिन्ह एक क्रॉस बनाया, जो बिलकुल ही स्वस्तिक जैसा दीखता है। वह वंश की शुद्धि में विश्वास रखता था। अतः उसने स्वस्तिक के चिन्ह को शुद्ध आर्य का प्रतीक माना। यह प्रतीक पहले विभिन्न जर्मन वोल्किश-नेशनलिस्ट आंदोलनों में उपयोग में था, और नाज़ियों ने इसे “आर्यन पहचान” से जोड़ने की कोशिश की, (source)..!

प्रतीक का दुरुपयोग और गलत अर्थ

    लाल झंडे पर सफेद गोलाकार के केंद्र में 45° पर मुड़े हुए काले रंग के स्वस्तिक चिन्ह वाला ध्वज नाज़ियों ने अपनाया, तो यह डिज़ाइन युद्ध, शक्ति और विस्तारवाद का प्रतीक बन गया। और जहाँ भारत में इसे मंत्रों के साथ घर पर बनाया जाता था, यूरोप में यह बदल गया : भय, हिंसा और नरसंहार के निशान में। नाजियों ने छह मिलियन माने साठ लाख से अधिक यहूदियों को मौत के घाट उतारा। नस्लीय भेदभाव पूर्ण व्यवहार, और विशाल यूरोपियन युद्ध जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध कहा जाता है, उसमे लाखो सैनिकों और नागरिकों की मृत्यु हुई।

    यूरोप और अमेरिका में आज भी स्वस्तिक देखते ही दिमाग में सबसे पहले आता है: नाज़ीवाद, होलोकॉस्ट, नस्लवाद। जबकि एशिया में आज भी यह चित्रित होता है : मंदिरों पर, त्योहारों में, नवग्रह पूजा में, शादी के मंडप में, जीवन की नई शुरुआत में। दोनों अर्थ अब एक-दूसरे के विरोधी हैं।

भारतीय परंपराओं में स्वस्तिक का दार्शनिक अर्थ

    स्वस्तिक का आध्यात्मिक अर्थ हम देखते है तो पाते है, कि चार दिशाओं, चार तत्वों और चार अवस्थाओं के संतुलन से जुड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति स्वस्तिक बनाए या उसे देखे — तो आध्यात्मिक रूप से उसे याद दिलाया जाता है कि : संसार बदल सकता है। लोगों की राय डगमगा सकती है। शरीर बूढ़ा हो सकता है। विचार टूट सकते हैं। परंतु… सच्चा “मैं” — अजर और अमर है। स्वस्तिक कहता है: “तुम चल नहीं रहे, तुम unfold हो रहे हो।”

    स्वस्तिक का उपयोग केवल विश्वास या परंपरा नहीं है। यह एक उर्जात्मक डिज़ाइन लगता है। वास्तु के अनुसार घर मात्र ईंटों से नहीं बनता। स्वस्तिक एक ऊर्जा को संतुलित करने वाला ज्यामितीय सूत्र है। हम घर के प्रवेशद्वार पर स्वस्तिक रेखांकित करते है। तिजोरी पर करते है। नए घर, ज़मीन या धंधे पर स्वस्तिक बनाते है। किसान अपनी खेती के आरंभ में ज़मीन पर आज भी मूंग या गेंहू का स्वस्तिक बनाता है। वहां ओउम का चिन्ह नहीं होता। विचारणीय बात तो यह भी है कि किसी अनपढ़ किसान को वेद ऋचाएं भले न आती हो, लेकिन स्वस्तिक का चिन्ह वह बगैर किसी की सहायता के बना लेता है।

ऊर्जा, विज्ञान और स्वस्तिक का आधुनिक अर्थ

    स्वस्तिक को विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए, तो कितने ही ऐसे वैज्ञानिक लेख मिलते है, जो स्वस्तिक के चिन्ह को Rotation + Symmetry Pattern कहते है। सूर्य की किरणे, चक्रवात की गति, DNA की हेलिक्स संरचना, आकाशगंगा की घूमती संरचना - ये सब स्वस्तिक जैसी घूर्णन ऊर्जा वाली होती हैं। जब स्वस्तिक बनाया जाता है, तो अक्सर यह शब्द बोला जाता है: "ॐ शुभं भवतु" या "शुभ-लाभ" ध्वनि विज्ञान के अनुसार, यह शब्द: वातावरण की कंपन को शांत करता है, और वस्तु या स्थान पर Positive Resonance बनाता है। ऐसा ही प्रभाव तिब्बती साउंड बाउल, चर्च की घंटियाँ, अजान और गुरबानी में भी पाया जाता है।

    प्रियम्वदा ! पौने सात बज गए। इस लेख को लिखने के लिए इंटरनेट के महासागर में गोता तो लगा दिया, लेकिन मेरे अपने ऑफिस के कईं काम बाकी रह गए है। शुभ स्वस्तिक पर लिखते हुए शुभ समय कब सरक गया, कुछ आसार रहा नहीं। फ़िलहाल बैंकिंग के कुछ काम बिल्लिंग्स, और कुछ हिसाब-किताब निपटाने है मुझे। और वहां अब स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर शुरू करना चाहूंगा। स्वस्तिक शायद ऐसा प्रतिक है, जिसे मानव ने बनाने से पहले अनुभव किया, फिर उसे ध्वनि, प्रार्थना और कर्म में ढाला होगा। 

    सभ्यताएं बदली, साम्राज्य ढहें, धारणाएं टूटी, पर स्वस्तिक का अर्थ वही रहा, कल्याण, संतुलन, और सृष्टि का अनंत चक्र।

    शुभरात्रि। 
    २२/११/२०२५

|| अस्तु ||


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