एक धूल भरी शाम और अनजानी चेतावनी
प्रियम्वदा !
आज तो बढ़िया काण्ड हो गया। चलो शुरू से बताता हूँ।
कईं बार कुछ बातें हमें बाद में पता चलती है। तब, जब हम उस विषय को भूलने भी लग गए हो। बीते कल की दिलायरी में मैंने लिखा था, कि मौसम को दीर्घदृष्टिदोष हुआ था... लेकिन रात को घर पहुंचकर वॉलीबॉल खेल लेने के बाद जब इंस्टाग्राम खोला तो होमपेज पर ही एक रील मिली... उसके अनुसार इथियोपिया देश में एक बारह हजार वर्ष के बाद ज्वालामुखी सक्रीय हुआ, और फटा.. उसकी धूल उडी, और गुजरात पहुंची। अब वह धूल का गुब्बार गुजरात से राजस्थान होते हुए दिल्ली की और बढ़ने लगा। बताओ, कहाँ अफ्रीका, कहाँ गुजरात.. वहां की धूल उड़ते हुए यहाँ तक आ पहुंची।
सोशल मीडिया और एक अजीब डर
खेर, इस रील को देखने के बाद तो रील्स को स्क्रॉल करने का सिलसिला ही चल पड़ा। लेकिन हर तीसरी रील एक ट्रोल रील आ रही थी। एक लड़का और लड़की के फोटो पर अलग अलग मजाकिया वाक्य लिखे हुए मिलते। कोई जोड़ा फिर से रातों-रात फेमश हुआ है। लेकिन हर तीसरी रील पर लोग उस लड़के-लड़की के विडिओ के बारे में ही बात करते पाए.. मुद्दा समझ नहीं आ रहा था, तो कमेंट सेक्शन खोलकर देखा.. वहां लोग लिंक के आदान-प्रदान की बातें करते मिले.. अब मुद्दा स्पष्ट हो चूका था। खजुराहो के शिल्पों का लोग अनुकरण करते हुए उसका विडिओ बनाते है। और फिर वायरल हो जाते है। लेकिन इस विडिओ के वायरल होने का कारन थोड़ा अलग था, लड़की सुन्दर थी, लेकिन लड़का श्यामवर्णी था। बस, चिड़चिड़े लोग कूद पड़े मैदान में, उनका कहना इतना ही था, लंगूर के हाथ ही अंगूर लगता है।
दिनभर की थकान और मिल का शोर
प्रियम्वदा ! आज भी सवेरे जरा मन नहीं था उठने का, और ऑफिस आने का। मैंने जबरजस्ती अपने आप को तैयार किया। ऑफिस पहुंचा, आज कईं सारे काम थे। लेकिन ऑफिस का आदमी आज पूरा दिन ऑफिस से बाहर ही रहा। सवेरे से लेकर अभी साढ़े छह बज रहे है, मैं गाड़ियां लोडिंग करवा रहा था। एक साथ दो तीन स्टाफ छुट्टी मार गए, और आज एक साथ कईं गाड़ियां लोडिंग के लिए आ धमकी.. पुष्पा तो छुट्टी पर आलरेडी था, बचा मैं.. वर्षों बाद मैंने लोडिंग करवाई है। इस इंडस्ट्री लाइन में मुझे हर काम का अनुभव है.. लोडिंग से लेकर बिलिंग तक, बैंकिंग से..
हो गया कांड प्रियम्वदा.. एक्सीडेंट हो गया..! मैं ठीक हूँ, लेकिन सामने वाले के चोट आयी थी, बेहोश हो गया था। उसे एम्बुलेंस में बिठाकर, फिर मैं भी हॉस्पिटल पहुंचा। ठीक है शुरू से शुरू करता हूँ। आज पूरा दिन मिल में भागदौड़ हुई थी, लेकिन चार - साढ़े चार बजे के बाद ऑफिस पकड़ ली थी मैंने। थोड़ी देर दिलायरी लिखने का समय मिला था, तो ऊपर जो लिखा है वह लिख दिया था। लेकिन छह बजे से लेकर आठ बजे तक बिलिंग और हिसाब किताब में लग गया मैं। आठ बज गए, मुझे घर के लिए निकलना था। और एक पुराना सहकर्मी जो अब खुद अपना काम करता है, वह कुछ हिसाब लिखवाने बैठ गया। अब वह हमारे लिए ग्राहक भी है, तो उसके हिसाब बना देने में मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, और वैसे भी मुझे मना करना आता नहीं। तो लगभग सवा आठ ऑफिस पर ही बज गए। घर के लिए निकला तो रास्ते मे पड़ती मारवाड़ी की दुकान से यह सोचकर दो मावा खरीद लिया, कि आज काफी देर वॉलीबॉल खेलूंगा..!
वह मोड़ जहाँ किस्मत टकराई
मैं वहां से निकला, तो पहले ही ओवरब्रिज के नीचे अच्छाखासा ट्रैफिक जैम मिला। जैसे तैसे करके बाइक निकाली, और हाइवे चढ़ गया। हाईवे पर देखा तो सामने से आने वाली लेन पर एक लंबा ट्रैफिक जैम देखकर अंदाज़ लगाया कि आगे वाले ओवरब्रिज पर भी ट्रैफिक जाम मिलेगा। यह अंदाजा सही था, लेकिन इसका अनुसरण करना गलत फैसला रहा। मैंने अगला सर्विस लेन कट लेकर हाईवे छोड़ दिया। इस सर्विस लेन पर ट्रक्स खड़े रहते है, कोई ट्रक वाला अपना व्हील ठीक कर रहा होता है, तो कोई अपनी लाइट्स सही करवा रहा होता है। तो जाहिर सी बात है, यहां स्पीड में चलने का सवाल ही नही। मैं अपना धीरी गति में चले जा रहा था। आगे स्मशान है, इसी सर्विस लेन के किनारे, थोड़ा खुला रोड मिलता है, लेकिन आज मैने वहां स्पीड बढाई ही नहीं। वैसे भी मैं इस स्मशान के आगे धीरे ही चलता हूँ। लेकिन चोट खाना लिखा होगा शायद..
जब शरीर गिरा, आत्मा खड़ी रही
सामने से तेज़ स्पीड में एक बाइक आयी, मैं सर्विस लेन पर अपनी लेफ्ट में था, वह राइट साइड से आया, और सीधे मेरी बाइक में घुस गया। मैंने कसकर ब्रेक लगा दी, मेरी बाइक तो खड़ी हो गयी, लेकिन उससे ब्रेक लगी ही नही, और वह सीधा टकराया। इस टकराहट के कारण मैं उछलकर गिर पड़ा, मेरा सिर सीधा ज़मीन को लगा, इतनी भलाई हुई, कि मैं हमेशा हेलमेट पहनता हूँ। फिर भी मैं इतनी जोर से ज़मीन पर टकराया था, कि 4-5 सेकंड के लिए कुछ समझ ही नही आया। मैंने खड़े होने की कोशिश की, हो नही पाया.. समझ नही आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। मैंने देखा आसपास लोग इकट्ठा होने लगे थे। किसी ने मेरी बाइक उठायी और खड़ी की। मैं अब भी अपने दम पर खड़ा नही हो पा रहा था, पास खड़े एक आदमी से कहा, "हाथ दे"। उसने हाथ लंबाया, मैं खड़ा हो गया।
मुझे एकदम से गुस्सा चढा, एक तो वह बाइक वाला रॉंग साइड से आया, और स्पीड में भी बहुत था, इसको तो पहले झापड़ लगाऊंगा..! लेकिन मैंने देखा, वह बाइक वाला बेसुध पड़ा है, उसके मूंह से होते हुए रक्त उसके शर्ट को लाल कर चुका था। और डर के मारे वह बेहोश हो चुका था। आसपास इकट्ठा हुए लोगों ने उसे चेक किया, चोट तो मामूली थी, लेकिन बेहोश हो जाने से उसने सिम्प्थी पा ली थी.. मुझे और मेरी बाइक देखकर एक आदमी बोला, "धीरे चलो भाई।" एक तो मैं गुस्से में था, ऊपर से यह तो मुझ पर इल्जाम आ रहा था, मैंने आव देखा न ताव सीधा उस पर चढ़ गया, "तुझे पता है क्या एक्सीडेंट कैसे हुआ? वो आकर मुझसे ठुका है, मैंने तो ब्रेक लगा ली थी।" अब वो, 'ठीक है बापु, ठीक है बापु' करने लगा। किसी ने एम्बुलेंस को कॉल कर दिया था, मात्र पांच-दस मिनिट में एम्बुलेंस आ गयी। उसे स्ट्रेचर पर लिटाकर ले गए। उस बाइक पर दो लोग थे, मैंने दूसरे वाले से उसका एड्रेस ले लिया।
उसको ले जाने के लिए आए एम्बुलेंस वाले से मैंने वहीं अपने आप को चेक करवाया, मेरे कान से खून आ रहा था, और मुंह मे खून का स्वाद आया था। उसने मुझे चेक किया, और बोला, "हेलमेट के कारण बढ़िया बचाव हो गया है। चेहरे पर बस दो खरोंच भर है।" मैंने बाइक के मूड चुके शीशे में, अपने मुंह पर फ़ोन की फलेश लाइट से रोशनी करके देखा, मूंछ में एक छोटी खरोंच थी। कान से खून रिस रहा था, उसे पोंछकर देखा तो वह भी बस बाहरी खरोंच थी, कान के भीतर तक कोई चोट नहीं थी। अब मैंने अपनी बाइक की हालत देखी, उसने जिस गति से एक्सीडेंट किया था, मेरा भी बड़ा नुकसान होना तय था। बाइक का हैंडल पूरा मूड चुका था। बाइक के दोनों शीशे साबुत थे, लेकिन ढीले हो चुके थे। सबसे बड़ा नुकसान यह था, कि अगले टायर का मड-गार्ड शॉकर से अलग हो चुका था, टायर भी कुछ पीछे को चला गया था, और इंजिन को छूने लगा था। और इस कारण से बाइक चल नही सकती थी।
टूटी बाइक और मजबूत साथी
अरे हाँ, मैंने उस भूतपूर्व सहकर्मी जो अब व्यापारी है, उसे फोन किया, क्योंकि हम दोनों ऑफिस से एक साथ निकले थे, तो वह भी यहीं कहीं आसपास होगा। मैंने उसे फ़ोन मिलाया, और उसको पूरा वाकिया और हाल बताया। वह रोड की दूसरी तरफ ही था। वह तुरंत आ पहुंचा। मैंने कईं बार उसे फाॅर्स किया, कि आप तो घर पहुंचो, लेकिन अच्छा हुआ वह गया नहीं। उसने भी उल्टा फाॅर्स किया, कि नहीं मैं तुम्हे घर छोड़ने के बाद ही अपने घर जाऊंगा। मैं बाइक पर बैठा, बाइक चालू की.. थोड़े आगे बढ़ी लेकिन आगे वाला टायर घिस रहा था कहीं। मैंने फिर से स्टैंड करके देखा, तो पता चला आगे वाला शॉकर बिलकुल अलग हो चूका था, और टायर इंजिन की तरफ भींच गया था, इस कारन से बाइक आगे बढ़ती, तो मडगार्ड में टायर घिस रहा था।
उस साथी ने जोर लगा कर लोहे का मडगार्ड खिंचा, और थोड़ा बहुत टायर घुमानेलायक कर दिया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो यह थी, कि बाइक का हेंडल पूरा ही मूड चूका था, चलाऊ कैसे? बाइक लेफ्ट साइड की ओर मुड़ती ही नहीं थी। शॉकर के ही कारण। बिलकुल पहले गियर में धीरे धीरे करते घर पहुंचा। मुझे मेरे घर पहुंचाकर वह साथी अपने घर के लिए तभी निकला, जब उसे विश्वास हुआ कि मैं ठीक हूँ। हुकुम ने मेरा हाल देखा, और बोल पड़े, "ले लो और लोहे की बाइक.." हाँ ! यामाहा की FZX में हर जगह लोहा ही लोहा है..! भारी वजनी भी है, लेकिन भागने में भी मस्त है। हुकुम को यह बाइक शुरू से पसंद नहीं है, क्योंकि वे यह बाइक चला नहीं पाते।
हॉस्पिटल, टांके और वो बातूनी डॉक्टर
मैं और हुकुम पास के ही क्लिनिक पर गए। मेरा वह हमेशा वाला बातूनी डॉक्टर को बताया, एक्सीडेंट हुआ है। तो वह बोला, "दस मिनिट एक्सीडेंट के बाद रुक पाए हो, तो दस मिनिट और रुको..!" मैने कुछ देर इंतजार किया। जल्दी ही सारे पेशंट फ्री हो गए। मैं भीतर गया, और पास के ही स्ट्रेचर पर उल्टा लेट गया। डॉक्टर ने घाव साफ़ किये, पैर की एडी के ऊपर एक बड़ा कट था। इतना बड़ा कट, कि पेण्ट खून से सना हुआ था। उसने बातो बातों में तीन स्टेप्लर पिन जैसे टाँके जड़ दिए। और अपनी कामयाबी पर वह बोल पड़े, "देखा, हम लोग यूँही बातों बातों में काम कर देते है।"
जबकि उन्होंने पहला टांका लिया तभी मैं समझ गया था। लेकिन मेरी सहनशक्ति कईं अधिक है, यह मैं जानता हूँ। दाहिने कान में रुई ठूंस दी, ताकि वहां पड़ी खरोंच भी ठीक हो जाए। दाहिना हाथ सूज गया था, तो उन्होंने कहा, पहले अंगूठा मोड़ो, और उसके ऊपर मुट्ठी भींचो.. मैंने किया, सही तरिके से हो गया, थोड़ा दर्द जरूर हुआ। उन्होंने बताया, दबाव के कारण होगा, एकाध दिन हाथ सूजा रहेगा, दर्द करेगा। मूंछ में मतलब नाक के निचे भी एक कट था, वहां उन्होंने कोई ट्यूब लगा दी। और कईं सारी गोलियां दे दी।
घर पहुंचा.. मेरी वॉलीबॉल टीम मेरे इंतजार में थी, उनको सारी बात बताई, और पूरी टीम घर आ गयी। रात साढ़े ग्यारह बजे तक मैंने यह दिलायरी लिखने की कोशिश की, लेकिन फिर शायद दवा के प्रभाव में नींद आने लगी।
सर्विस लेन में रॉन्ग साइड नहीं चलना होता
हमारे यहाँ लोगो को पता ही नहीं है, कि सर्विस लेन रॉंग साइड जाने के लिए नहीं बना है, वह तो बस आपने गलत रास्ता ले लिया हो तो, हाईवे छोड़ने के लिए बना है। लेकिन लोग नहीं समझते। सर्विस लेन में रॉंग साइड चलते है, नेशनल हाईवे पर, बिना हेलमेट के। मैंने हेलमेट पहन रखा था, फिर भी मेरा दाहिना जबड़ा दर्द कर रहा है। साइड फेस के बल गिरा था, दाहिने हाथ पर पुरे शरीर का भार आया था। रात को खाना भी नहीं खाया गया, क्योंकि खाना चबाने के लिए जबड़ा हिलता है, तो दर्द करता है। अगर वह रॉंग साइड में नहीं आता, और उसने हेलमेट पहन रखा होता, तो कोई समस्या न होती। दूसरी बड़ी बात, स्पीड अच्छी चीज है, लेकिन उसके साथ कण्ट्रोल करना भी आना चाहिए। उससे ब्रेक ही नहीं लग पायी, और मैंने ब्रेक लगाकर अपनी स्पीड दस की कर ली थी, फिर भी वह आया और टकराया, क्योंकि उससे ब्रेक लग ही नहीं पायी।
प्रियम्वदा ! रास्तों पर चलना आसान नहीं है। आप कितना ही सीधा चलो, कोई सामने से आकर भीड़ जाए, तो आप क्या ही कर लेंगे? मेरे पास हेलमेट था, तो मेरा बचाव हो गया। हेलमेट की अहमियत मैं शुरू से समझता हूँ।
शुभरात्रि।
२६/११/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अगर यह दिलायरी किसी एक व्यक्ति को भी हेलमेट पहनने पर मजबूर कर दे —
तो समझूँगा, मेरी चोटें व्यर्थ नहीं गईं।
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