सवा सात बजे की असंभव दिलायरी
प्रियम्वदा !
असंभव है, अभी सवा सात बज रहे है, और दिलायरी लिखकर पूरी कर पाना असम्भव है। असंभव इस लिए कह रहा हूँ, क्योंकि अभी तक दिमाग में ऐसी कोई बात आयी नहीं है जिसपर आज की दिलायरी निभे। वैसे एक विचित्र ख्याल आया तो है, लेकिन थोड़ा धूलित हो गया, एक अभी अभी आए काम के चलते..! हमारे समाज में चार वर्ण पहले से प्रसिद्द है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। तो मैं यह सोच रहा था, कि मैं जन्म से क्षत्रिय हूँ, लेकिन फ़िलहाल कर्म से तो पता नहीं किस केटेगरी में आता हूँ, लेकिन सरकार अब भी मुझे जनरल यानी की सरकारी सहायों से वंचित रखने योग्य तो मानती है।
क्षत्रिय कुर्सी – चक्कों पर दौड़ता रुआब
तो अभी दिमाग में आयी अफलातून कल्पना यह है, कि अगर कुर्सियों का कोई समाज होता, तो क्या होता..? मैं सोच रहा था, कि यह जिस पर मैं बैठा हूँ, वह चक्के वाली ऑफिस की कुर्सी होगी क्षत्रिय। क्योंकि यह हर दिशा में त्वरा से दौड़ सकती है, आगे पीछे जुक सकती है, अपनी ही जगह पर गोल गोल घूम सकती है। और इसका रुआब अलग ही है।
ब्राह्मण कुर्सी – लकड़ी, सादगी और शिक्षक
अगर यह क्षत्रिय कुर्सी है, तो फिर ब्राह्मण कुर्सी भी होनी चाहिए..? तो मुझे ख्याल आता है, कि कुर्सियों के समाज में वह कुर्सी जरूर से ब्राह्मण के स्तर पर होगी, जो लकड़ी की बनी होती है, और लकड़ी के चार पायों पर खड़ी रहती है। बिलकुल सादगी पूर्ण। हमारे समय पर शिक्षकों के पास वह लकड़ी की कुर्सी होती थी।
वैश्य कुर्सी – वैभव में डूबी रिक्लाइनर
फिर वैश्य कुर्सी भी तो होनी चाहिए.. है भी.. वो रिक्लाइनर कुर्सी.. सोफे जैसी.. वैभव से परिपूर्ण। आराम की उद्घोषक। पुराने सारे व्यापारी शेठ शरीर में काफी हेवी रहते थे, वैभवशाली भी। तो रिक्लाइनर चेयर हुई वैश्य कुर्सी।
शूद्र कुर्सी – खुले आसमान तले सेवा
अब बच गयी शूद्र.. शूद्र स्वयं भी अपने आप को बाकी समाज से पिछड़े हुए मानते है, सुख सुविधाओं से वंचित.. लेकिन वास्तविक समाज के आधार वे ही लोग है। तो मुझे लगता है, कहीं किसी बगीचे में, या किसी पहाड़ी के रस्ते पर, या कहीं समंदर के किनारे, थकान को भगा देती बेंच या कुर्सी होती है, वह होनी चाहिए शूद्र कुर्सी। जिसे सिर्फ सेवा से मतलब है। वह कामना नहीं करती है, कि मैं क्यों इस तरह खुले में हूँ.. खुले आसमान के वातावरण को झेलते हुए। उसे सिर्फ थके हुए आश्रय देना आता है।
सर्दियों की सुबह और आलस का सच
हैं न थोड़ी अजीबोगरीब कल्पना..! छोडो प्रियंवदा, आज तो सवेरे मन ने चाहा था, फिर भी उठ न पाया। सवेरे मुझे जल्दी उठकर सोलर प्लेट्स धोनी थी। लेकिन उठ ही नहीं पाया। सर्दियाँ है न.. कंबल ओढ़कर पड़े रहने में जो मजा है, वह शायद इस समय तो स्वर्ग में भी न होगा। तैयार-वैयार होकर ऑफिस के लिए निकला। आजकल जगन्नाथ को केवल ध्वज प्रणाम ही कर पाता हूँ। जानता हूँ, कि पांच मिनिट और लेट पहुंचू तो मुझे नौकरी से निकाल नहीं दिया जाएगा.. लेकिन फिर भी, जगन्नाथ के पास जाने से भी आलस मुझे रोक लेती है।
ब्लूटूथ, बाजार और अधूरे कामों की सूची
ऑफिस पहुंचकर आज तो ज्यादा कुछ काम नहीं थे, लेकिन दोपहर तक दिलायरी लिखने में और अन्य काम करने में व्यस्त रहा था। दोपहर को मार्किट जाना था। क्योंकि एक कान का ब्लूटूथ तो मेरे एक्सीडेंट वाले दिन ही शहीद हो गया था। जाते जाते उसने मेरे दाहिने कान को एक जबरदस्त आलिंगन दिया था। ऐसा आलिंगन कि कान में अभी भी निशाँ बना हुआ है। तो अब एक कान के बचे हुए ब्लूटूथ से तो अपनी पार पड़े नहीं। आजकल फोन में ऑडियो जैक तो आते नहीं। ब्लूटूथ का जमाना जो आ गया है। तो मैंने C PIN TO AUDIO JACK CONVERTER मंगवाया था। वह चला नहीं, उसमे मेरे सैमसंग वाले वायर्ड इयरफोन लगाने चाहे, लेकिन चले नहीं।
मार्किट इसी कारण से जाना था, कि एक वायर्ड इयरफोन ले आऊं। लेकिन लंच समय में भी आजकल मेरे पास अनिवार्य कामों की सूचि आ धमकती है, जिन्हे पूरा करना होता है। उन सब कामों को पूरा करते करते शाम के छह बज गए। तो एक व्यापारी हमारे यहाँ के प्रसिद्द बिहारी के समोसे ले आया। अब समोसों को भी तो समय रहते न्याय देना चाहिए। ज्याफत उड़ाई कह सकते है वैसे उसे। देखो प्रियम्वदा, इतना सारा लिख दिया, लेकिन अभी तक किसी एक विषय पर नहीं पहुँच पाया हूँ।
आठ बजने में बस पांच मिनिट की देर है। अपने शहर में एक मेला लगा है, सोच रहा हूँ आज कुँवरुभा को घुमा लाऊँ। अगर गया, तो यह दिलायरी में आगे उस मेले के बारे में बातें विस्तार से लिखूंगा। फ़िलहाल, आगे की दिलायरी मोबाइल फोन पर टाइप होगी, अभी घर के लिए निकलना है। लो फिर अगले दिन की सुबह पर यह बीते दिन की दिलायरी पूरी करने में प्रयत्नरत हुआ हूँ।
रिस्क है तो इश्क है – लकड़ियों का रामसेतु
यह इतना अधूरा लिखा हुआ छोड़कर ऑफिस से बहार निकला, तो मिल पर हो-हल्ला होता दिखा। मामला यह था, कि ट्रक में फोर्कलिफ्ट आया था, उसे निचे उतारना था। गंभीर समस्या यह हुई कि इस पांच टन के वजनी मशीन को नीचे उतारा कैसे जाए? पहले तो हाइड्रो क्रेन बुलाया गया, लेकिन उसके बस की थी नहीं। वह वापिस लौट गया। बाजू में एक जगह पर्याप्त ढलान देखकर वहां ट्रक के प्लेटफार्म को लेवल लगाना चाहा, लेकिन वह ढलान भी ट्रक के प्लेटफॉर्म से नीची रह गयी। आखिरकार रिस्क है तो इश्क़ है वाली योजना लागू की गयी।
मिल में कईं सारी लकड़ियां है, मोटी लकडिया.. उनसे एक रेम्प बनाया गया। रिस्क तो था, कि जब मशीन उतरेगी तो लकडिया टूट जाएगी, और मशीन पलटी मार जाएगा। मैं इस आईडिया के सख्त खिलाफ था। मैं चाह रहा था, की एक और हाइड्रो क्रेन बुलवाई जाए, जिनमे सीलिंग वायर के बजाए बेल्ट लगी हो। उसके सहारे मशीन आराम से उतर सकती थी। लेकिन नहीं, सरदार अपने इस रिस्की आईडिया पर अड़ा रहा। आखिरकार बहुत सारी लेबर ने मिलकर लकड़ियों का रेम्प बनाया।
एक मशीन, टूटी लकड़ियाँ और बचता हुआ जीवन
यह दृश्य कुछ कुछ ऐसा ही लग रहा था, जैसे राम सेतु बन रहा हो। ट्रक के प्लेटफॉर्म से लेकर ज़मीन तक एक टेम्पररी पुल बनाया गया। लकड़ियों का पुल - जो कभी भी ढह सकता था। कारीगरों ने अपनी अपनी बुद्धि लड़ाई.. लकड़ी के इस रेम्प को मजबूती देने के लिए बहुत सारे आड़े-टेढ़े सपोर्ट दिए। फोर्कलिफ्ट चालू की गयी, धीरे धीरे वह ट्रक से इस रेम्प पर चढ़ी.. लकड़ी के रेम्प में कड़ाके की आवाजें उठने लगी। आधे पुल पर पहुंची ही थी फोर्कलिफ्ट, कि लकडिया टूटने लगी..! फोर्कलिफ्ट का ड्राइवर होशियार था, उसने अपनी स्पीड बढ़ाकर जल्दी से निचे तक आ गया। और सफलतापूर्वक यह अभियान पार हुआ।
Criminal Justice और असमय न्याय का सवाल
घर पहुंचकर कुछ काम तो था नहीं, गरबीचौक में लड़के वॉलीबॉल खेलकर चले गये थे। मैं गरबीचौक जाते जाते वापिस लौट आया। बिस्तर में पड़े पड़े क्रिमिनल जस्टिस के तृतीय ऋतु का अंतिम भाग (एपिसोड) मेरा देखना बाकी था। एडवोकेट माधव मिश्रा फिर से एक बार जीत जाता है। एक पेचीदा केस में वह सांगोपांग सही सलामत न्याय को न्यायालय में सिद्ध करता है। लेकिन उसे इस न्याय से संतुष्टि नहीं मिली थी। उसका उद्देश्य था, अपने पक्षकार को बेगुनाह सिद्ध करना। वह उसने कर दिया। लेकिन असलियत में उसे कुछ कमी महसूस हो रही थी। असली कहानी की कमी।
वह लौटता है, न्यायालय द्वारा पाए दोषी के पास.. उससे सारी बाते उगलवाता है। लेकिन एक न्याय कुदरत ने भी किया था। और वकील माधव मिश्रा उस कुदरत के न्याय को बरकरार रहने देता है।
प्रियम्वदा ! यह न्याय की प्रक्रिया ही इतनी ज्यादा जटिल है, कि इसे न्याय नहीं, असमय न्याय कहना चाहिए।
शुभरात्रि,
१५/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अगर यह दिलायरी आपको कहीं रोक ले—
तो नीचे अपनी अनुभूति लिखिए।
और अगर शब्दों में अपना दिन दिख जाए,
तो इस रचना को किसी अपने तक पहुँचा दीजिए।
👉 दिलायरी पढ़ते रहिए, क्योंकि हर दिन लिखा जाना चाहता है।
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