जेठालाल जैसी सुबह और फाफड़ा-जलेबी का लालच
प्रियम्वदा !
जेठालाल जैसी सुबह थी.. आलस के मारे उठने का मन नहीं था, लेकिन बिस्तर में पड़े पड़े सुना कि फाफड़ा-जलेबी है नाश्ते में.. तो पड़े रहने में फिर वह स्वाद कहाँ, जो फाफड़ा जलेबी में है। फटाफट नहाधोकर तैयार हो गया। लेकिन किस्मत देखिए, फाफड़ा उतना बचा नहीं, जितना उत्साह था। उत्साह के जाते ही आलस लौट आयी। आराम से दस बजे तक ऑफिस पहुंचा। रविवार की सुबह ऑफिस पर क्या काम हो? कुछ नहीं..!
ऑफिस, ट्रैक्टर और करोड़ों के हिसाब में उलझा दिन
दिलायरी पब्लिश की। और फिर लगा मिल में टहलने। कंपनी ने नया ट्रेक्टर लोडर खरीदा है, तो चढ़ बैठा मैं ड्राइविंग सीट पर। हालाँकि जीवन में सिर्फ एक बार ही ट्रेक्टर चलाया है, वह भी मात्र दोसो मीटर तक। कुछ देर यूँही टहलने के बाद बारह बजे तक धीरे धीरे ऑफिस का कार्यभार बढ़ता गया। दोपहर के तीन बजे ऑफिस का काम निपटाया। हिसाब किताब में जोर यही था, कि कईं बार हम लोग करोडो के हिसाब में कुछ सौ रूपये का फर्क ढूंढने बैठ जातें है। प्रियम्वदा ! मैं यही सोच रहा था, कि यह भी भला कैसी समस्या है, किसी अंक के पीछे कितने ही ज़ीरो लग जाए, लेकिन अपनी मालिकी का वह अंक नहीं तो किस काम का?
पानी, प्यास और जिम्मेदारियों की बेड़ियाँ
घर से फोन लगातार आ रहे थे, कि मेहमान लोग विदा हो रहे है, जल्दी घर आ जाऊं। लेकिन उन्हें कैसे समजाता कि मुझे यहाँ हिसाब किताब के गणित ने ऐसा बाँध रखा था, कि मैं पानी पीना तक भूल गया था। सवेरे से लेकर दोपहर हो गयी थी, पानी पीया ही नहीं था। सर्दियों में प्यास कम ही लगती है। तीन बजे घर पहुंचा, और घर से निकल पड़ा मार्किट के लिए। कुँवरुभा हमारे बड़े तोड़फ़ोड़िये किस्म के कुँवरुभा है। सायकल का हेंडल ढीला कर दिया था, टायर के साइड सप्पोर्टर ढीले कर दिए। सीट का तो अस्तित्व ही खतरे में आ चूका था।
सायकल, मार्किट और रविवार की भीड़ का गणित
सायकल को डाली कार की पिछली सीट में, और निकल पड़ा। साढ़े चार बज रहे थे। मार्किट उतना तेजी में नहीं था। फिर भी भीड़ तो काफी थी। जहाँ से वह सायकल खरीदी थी, वहां पहुंचकर उसे रीपेरिंग काम के लिए दी। और फिर कुछ घर के सामान की खरीदारी करनी थी। तो सुपर मार्किट चला गया। हमारा शहर ही ऐसा है, नया नवेला पार्किंग लोट लोगो के अवैध कब्जे से छुड़ा तो लिया गया है, लेकिन थोड़ा दूर पड़ता है। सुपरमार्केट में भी रविवार के हिसाब से दुनियाभर की भीड़ रहती है। और मुझे बड़ी जल्दी रहती है। मैं बड़ी ही तेज़ी के साथ सुपरमार्केट छान लेता हूँ। क्या चाहिए, और भीड़ को छंटते हुए कैसे पहुंचा जाए, अब मुझे बड़े अच्छे से आ गया है।
सॉरी, ट्रॉली और सुपरमार्केट का अनकहा हास्य
मुझे अब शर्म नहीं होती सॉरी कहने में। मैं भूल करने के बाद तुरंत सॉरी कह सकता हूँ। और वहां तो एडवांस में सॉरी कर देता हूँ, जहाँ मैं जोर-जबरदस्ती करता हूँ। सुपरमार्केट में रविवार की भीड़ को चीरना मतलब सॉरीयों का अंबार उतारना। लोग भी बड़े अजीब है, सुपरमार्केट के रास्ते में ट्रॉली खड़ी करके सामान की एक्सपायरी डेट देखने खड़े हो जाते है। ऐसे में एक बड़ा मजाक करने का मन भी होता है। कोई इस तरह ट्रॉली को बिच में रख देता है, तो मैं अपनी ट्रॉली से उसकी ट्रॉली को धकेलता हुआ, बड़े दूर तक ले जाकर छोड़ देता हूँ। फिर वापिस मुड़कर देखता हूँ, तो वह व्यक्ति अपनी ट्रॉली ढूंढता हुआ दीखता है।
खेर, कईं बार मैंने रस्ते में खड़े लोगो को हटने का कहने पर भी हटने के कारण ट्रॉली से धक्का दिया, और सॉरी कहकर आगे बढ़ गया। समझदार होते लोग, तो यूँ सुपरमार्केट में ट्रॉली का रास्ता छोड़कर खड़े होते। खेर, घर पहुँचते हुए कुँवरुभा ने बताया, कि उन्हें के वाटर बोतल भी चाहिए स्कूल के लिए। वापिस एक दूकान पर स्टॉप लेना पड़ा। और फिर चल दिया, सीधे घर। अंधेरा तो ही चूका था। और वॉलीबॉल खेलने तो मैं जा नहीं पाता। क्या किया जाए? कुछ काम ही नहीं.. कुछ देर टीवी देखी, और फिर डिनर के बाद चल पड़ा गरबी चौक।
आग, सर्दी और लिखने से पहले की बेचैनी
सर्दियों के मजे ही है आग सेंकने में। आग प्रज्वलित की, और दिलायरी लिखने बैठ गया। लेकिन बार बार आग धुंए में तब्दील हो जाती। ठंड तो अभी इतनी गाढ़ी नहीं हुई है, कि इस आग की जरुरत पड़े। लेकिन फिर भी एक वाइब लेने के चक्कर में आग को जलती हुई रखी है मैंने। लिखने का मन नहीं हो रहा था। तो सोचा फिल्म ही देख ली जाए। तो देख ली.. नई नवेली सुपरहिट मूवी, धुरंधर।
धुरंधर फिल्म समीक्षा : कहानी, अभिनय और सीमाएँ
धुरंधर है तो एक धांसू मूवी। लेकिन मुझे यह फिल्म इतनी मजेदार लगी नहीं। कहानी तो हमेशा ही जैसी एक जासूसी फिल्म होती है, वैसी ही कहानी है। रणबीर सिंह, आर माधवन, अर्जुन कपूर, अक्षय खन्ना, संजय दत्त जैसे बड़े सितारों ने अपना स्टारडम बिखेरा है। भरपूर एंटरटेनमेंट है, लेकिन फिर भी यह मूवी मुझे उतनी इंटरस्टिंग नहीं लगी, क्योंकि इस मूवी में दिमाग लड़ाने की कहीं जरुरत ही नहीं.. बस एक के बाद एक प्रसंग यूँही चलते जाते है। पटकथा तो यूँही ही है, कंधार हाइजेक के बाद पाकिस्तान में भारत को अपना जासूसी नेटवर्क बिछाने की तत्काल जरूरत पड़ी थी।
पाकिस्तान, आतंकवाद और ‘Bleed India’ की नीति
Bleed India with a Thousand Cuts की मिलिट्री डॉक्ट्रिन अपना कर ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, और उसके बाद आए तमाम पाकिस्तानी हुक्मरानों ने एक ख्वाहिश मांगी होगी अपनी मैली कुर्सी पर बैठकर। कि भारत को छोटे छोटे कईं सारे घाव दिए जाए। सीधी लड़ाई में पाकिस्तानी कभी भारत से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। तो इसी तरह परदे के पीछे से आतंकवादियों को पनाह दी जाए, उन्हें ट्रेनिंग दी जाए, तो भारत में तबाही के तौर पर भेज दिया जाए। वर्षों से यही निति आज भी पाकिस्तानियों की रही है। भारत का जासूसी नेटवर्क पाकिस्तान में इसी कारन से मजबूत करने की जरुरत पड़ी है।
भारत का एक जासूस हमजा अली मज़ारी नाम से पाकिस्तान के ल्यारी में प्लांट हुआ। रणवीर सिंह इस जासूस के किरदार में बिलकुल सटीक बैठता तो है, लेकिन उतना जचता नहीं है। यह वास्तविक प्रसंगो के साथ बनी घटनाओं पर बनी फिल्म है। करांची के ल्यारी में उन दिनों गैंग वॉर अपनी चरम पर थी। काला नाग, अरशद पप्पू, बाबू डकैत, रहमान डकैत जैसे गुंडे मवाली, कराची के उस छोटे से टुकड़े ल्यारी पर अपनी धौंस जमाना चाहते थे, और आए दिन गुंडागर्दी और मौत का खेल खेलते थे।
26/11, ताज हमला और जासूस का मौन दर्द
इस फिल्म में रणवीर जासूस के भेस में रहमान डकैत की गैंग में शामिल हो जाता है। रहमान को ल्यारी का सबसे बड़ा गुंडा बनने में मदद करता है। और फिर रहमान को मिलने आते लोगो पर नज़र रखते हुए, भारत को इंटेलिजेंस पहुंचाता रहता है। इस फिल्म में बिलकुल सटीक अंदाज़ में दिखाया गया है, कि पाकिस्तान किस तरह से आतंकवादियों को भारत पर हमला करने के लिए मददगार होता है। एक्टिंग में सब ही दमदार थे, खासकर सिन बहुत शानदार था, जब भारत का एक जासूस पकड़ा जाता है, और उसे रणवीर सिंह के सामने ही तड़पाया जाता है।
कितना भयावह और ह्रदयविदारक प्रसंग होगा, कि एक जासूस के सामने ही उसके एक साथी को इस तरह तड़पाया जा रहा हो, और उसे बस देखते रहना पड़े। वह कुछ भी नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी जिम्मेदारी अभी भी जिवंत है। भारत को सतत इनपुट्स देते रहना। ताज हमले में पाकिस्तान की भूमिका भी इस फिल्म में अच्छे से दिखाई है। इस सिन में भी रणवीर सिंह की आँखों में वह दर्द दिखाने का भरपूर प्रयास किया गया है। रणवीरसिंह ने खबर पहुंचाई थी भारत में, कि बड़ा अटैक होने वाला है, लेकिन भारत उसे विफल नहीं कर पाया, और 26/11 हो गया।
इन्शोर्ट यह फिल्म काफी मजेदार है, और इसका सेकंड पार्ट भी आएगा। मजेदार बात यह भी है, कि इस फिल्म के अंत भाग में हमजा यानि की रणवीरसिंह, रहमान डकैत यानि की अक्षय खन्ना को मारने में सफल हुआ। उसे प्रतिशोध लेना था, 26/11 हमले का। रहमान डकैत को मारकर वह बदला ले भी लेता है। इस फिल्म में बलोच क्रांति को भी सिफ़त से सम्मिलित किया गया है। संक्षेप में यह फिल्म एक बार तो देखने लायक है ही। खासकर पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों को अच्छे से समझने के लिए।
सिडनी हमला : धर्मांधता, हिंसा और वैश्विक प्रश्न
खेर, पाकिस्तानियों की बात निकली ही है, तो ऑस्ट्रेलिया के शहर सिडनी में इन पाकिस्तानियों ने कहर ढा दिया। सिडनी में बोंडी बीच पर यहूदी लोग अपना हनुक्का उत्स्व मना रहे थे। तभी दो लोगों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। पृष्टभूमि की जांच तो जारी है, लेकिन abp न्यूज़ के अनुसार वे दोनों हमलावर पाकिस्तान से है, और सिडनी के शहर Bonnyrigg शहर के निवासी थे। पाकिस्तानी प्रजा जहाँ कही रहे, उनके खून में है, लोगो का खून बहाना। असुर प्रजाति है, लोगो का बहता खून देखकर ही इन्हे संतोष मिलता है।
सोचने लायक बात है, कितने ज्यादा धर्मांध लोग होंगे वे.. कहाँ इजराइल, कहाँ पाकिस्तान.. कहाँ और कहाँ ऑस्ट्रेलिया..! खेर, ईश्वर उन दिवंगतों को शांति प्रदान करे।
शुभरात्रि,
१४/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
आप इस दिन को कैसे देखते हैं?
क्या यह सिर्फ एक डायरी है,
या हमारे समय की एक सच्ची तस्वीर?
👉 अपनी राय कमेंट में लिखिए
👉 इस दिलायरी को साझा कीजिए
👉 और अगर शब्दों से रिश्ता है, तो दिलायरी को नियमित पढ़ते रहिए
और भी पढ़ें :
• तीन ख्वाहिशें, एक जिन और अधूरी चाहतें || जिनी मेक अ विश पर एक दिन की दिलायरी : 13/12/2025
• व्यस्तता, आलस और त्याग का एक दिन || दिलायरी : 12/12/2025
• कांतारा चैप्टर 1 – दैवीय चेतना, परंपरा और अच्छाई की अनंत विजय || दिलायरी : 11/12/2025
• The Family Man Season 3 Review: प्रियम्वदा, अधूरे प्रश्नों के बीच एक पूरा दिन | दिलायरी : 10/12/2025
• मन, कल्पना, प्रकृति और अस्तित्व की गहराइयों में एक दिन || दिलायरी : 09/12/2025

