सितारे, काम का बोझ और अधूरी कविता || दिलायरी : 16/12/2025

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आसमान, गुरु और एक शांत रात

    प्रियम्वदा,

    आसमान के सितारों में गुरु की हाजरी छिपाए नहीं छिप सकती। अभी, खुले आसमान में, सबसे ज्यादा चमकीला सितारा एक ही दिखाई पड़ता है। वॉलीबॉल का खेल खत्म हो चुका था, और मैं अपने से उम्र में छोटे, लेकिन कद काठी में बहुत बड़े पीपल के नीचे बैठा था, यूँही आसमान में नजरें गड़ाए। वह सबसे ज्यादा चमकदार और बड़ा सितारा कुछ ज्यादा ही नजदीक दिखाई पड़ता था। मैंने पत्ते से तुरंत कहा, यह गुरु है। पत्ते को प्रत्येक बात प्रमाण के साथ देनी पड़ती है। स्काई टुनाइट का एप्प डाउनलोड करना पड़ा, अपनी तसल्ली के लिए भी। वैसे मुझे पिछली सर्दियां सटीक याद है। दिसम्बर-जनवरी में ही मैंने आसमान में गुरु देखा था। सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह भी, अपने आसमान में एक सितारेभर सा दिखता है। गुरु की गुरुता की भी एक सीमा है। 


पीपल के पेड़ को ध्यान से देखता एक कार्टून किरदार, पीछे बंधा वॉलीबॉल नेट और सादा सफेद पृष्ठभूमि

काम, थकान और मन का दबाव

    आज सवेरे जल्दी उठकर तैयार होकर सबसे पहले गया जगन्नाथ। कितने दिनों से मैं नहीं जा पा रहा था। आलस के ही मारे। दर्शन करके सीधे दुकान पर। और फिर ऑफिस। पूरा दिन ही काम पर काम किया है आज। दोपहर से पूर्व भी ढेरों काम थे, दोपहर के बाद तो आज पुष्पा को बिठाए रखना पड़ा। बेहद काम के बावजूद दोपहर के लंच समय मे मार्किट चल पड़ा था। सोचा था कुँवरुभा की सायकल तैयार हो गयी होगी, लेकिन नहीं.. धक्का जिंदाबाद। मार्किट में खालीफोकट का चक्कर लगाकर वापिस ऑफिस लौट आया। प्रियम्वदा, कईं बार काम ही हमें निकम्मा कर देता है। कईं बार यह महसूस होता है, कि मुझे एक हेल्पर की जरूरत है अब। पहले के अलावा जो काम मैंने सहर्ष स्वीकार किया था, वह ज्यादा थका देने वाला है।


वॉलीबॉल, शरीर की सीमाएँ और स्वीकार

    मानसिक तनाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। लेकिन मैं उसे भी मैनेज कर रहा हूँ। खाली समय में फ़िल्म देखने लगता हूँ। शाम को घर लौटने के बाद गरबी चौक में वॉलीबॉल खेलने चल दिया। हाँ, अब भी उछलकूद तो नही कर सकता हूँ, लेकिन एक जगह खड़े खड़े बॉल को डिफेंड जरूर से कर पाता हूँ। यही काफी है, बड़े दिनों बाद आज लड़के उत्साह में आए। मैंने भी अपनी जगह पर आई बॉल को वापिस प्रतिद्वंद्वीयों के पाले में भेज दिया, लेकिन बहुत सारी बॉल ऐसी भी थी, जिनके लिए आगे पीछे सरकना पड़ता। और एक बार जोश जोश में थोड़ा कूद गया, पैर के घाव पर स्किन खींचने जैसा अनुभव हुआ। तत्काल मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ, कि अभी भी घाव फिर खुल सकता है। 


कविता लिखने की असफल कोशिश

    प्रियम्वदा, सच कहूं तो आज फिर से एक मित्र का कवितापाठ सुनकर मन मे आया, कि आज तो हो ही जाए.. एकाध ग़ज़ल लिख ही डालता हूँ। भला कितना समय हो गया, शब्दों को तुकबंदियों में बांधे हुए.. पर न तो शब्द सूझ रहे थे, न ही नूतन भाव आ रहा था, न ही नया विचार.. यह सब तो नहीं आए.. काम का भरमार आ गया..! कविताओं में वो तेरा-मेरा मैं करना चाहता नहीं था.. वह सबसे आसान तरीका है कविता का। तुम चांद सी महबूबा हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए मर जाऊंगा, या फिर मैं तुम्हारा हूँ.. यह सब कविताएं बड़ी आम लगती है। वैसे लिखना तो यह भी मुश्किल है, लेकिन कविताओं में एक चोट होनी चाहिए। शब्द बिल्कुल भीतर से आने चाहिए। संरचना करते हुए दिमाग लड़ाया जाए, उसमे उतना मजा कहाँ? वैसे तो मैं तो आरंभ ही नही कर पाया था। दो लाइनें लिखी, मिटा दी, फिर लिखी, फिर मिटा दी। खुद को ही तसल्ली नहीं हो पा रही थी।


    कविताओं में एक लय तो कमसे कम होना चाहिए। एक ढलान.. कभी शब्दों का भार उतरता हुआ लगे, तो कभी पारा चढ़ता हुआ। मैं कुछ ऐसी ही कोशिश करने में लगा था। लेकिन मुश्किल प्रयास रहा। गुजराती में भी अब तो थोड़ा कठीन लगता है। प्रैक्टिस छूट गयी.. बड़ी समस्या यही होती है, कि आरंभ कहाँ से लिया जाए? अंत तो मैंने हमेशा ही कविताओं का बीच मजधार में किया है। खेर, सौ बात की एक बात, आज भी मुझसे कविता तो नहीं लिखी गयी.. आरम्भ का एक तुक अगर मिल जाए, फिर तो उसे प्रवाहमय किया जा सकता है। लेकिन पहला पायदान तो हो...


पीपल का पेड़, रहस्यमय पंछी और कल्पना

    वैसे भी ऑफिस में इतना ज्यादा काम था, कि ज्यादा कुछ सोचने का समय किसके पास था? घुमाफिराकर बातें बैंकिंग और एकाउंट्स से जुडी हुई ही रहती है दिमाग में। अभी कुछ दिन पहले क्या हुआ था, कि रात में गरबीचौक में अकेला बैठा था। पीपल के ऊपर कोई तो पंछी है। बड़ा पंछी है। मैं निचे बैठा आग सेंक रहा था। ऊपर से बादाम (Terminalia catappa) फल खाया हुआ बाकी बचा बीज गिरा। एकदम लाल पकी हुई बादाम। एक बार तो लगा कि नक्की ऊपर कोई वेताल आया बैठा है.. और बादाम के बीज भी जैसे लाल रक्त से रंगे हो। मैंने आसपास देखा.. और भी कितने सारे बीज थे। मैंने ऊपर देखा.. बिलकुल वह मुँज्या वाली फिल्लिंग्स हो रही थी। 



    मन में कल्पना तो यही उठी थी, कि जरूर से ऊपर कोई डरावना चेहरा दिखेगा। क्योंकि गरबीचौक में अकेला मैं ही तो था। फिर यह ऊपर से लाल खून से सने दीखते बादाम कौन फेंक रहा था भला..? मैंने ऊपर देखा, कुछ नहीं दिखा। हाँ ! पीपल के पत्ते थरथराये। फिर मन में उत्साह आया, अभी वेताल प्रकट होगा.. और मुझे कोई कहानी सुनाएगा। वैसी ही जैसी विक्रम-वेताल की है। अँधेरे के कारण कुछ दिख तो नहीं रहा था। लेकिन तभी पीपल की एक डाली पर हलचल हुई। अब तो विश्वास हो गया, कि कुछ तो है पीपल पर। वैसे यह मैंने रोमांच बढ़ाने के लिए लिखा है। वास्तव में तो पीपल के बिलकुल टॉप पर कोई बड़ा पंछी है, हम जब वॉलीबॉल खेलते थे, तो मैंने कईं बार उसे वहां उड़ते हुए देखा है। 


वेताल नहीं आया, पर विचार ठहर गए

    लेकिन कौनसा पंछी है, यह समझ नहीं आया कभी। बादाम खाता है, इससे तोता मान तो लू, लेकिन तोता बहुत बड़ा नहीं होता। पहले सोचा था, कि जरूर से शिकरा जैसा कोई बड़ा पंछी है, लेकिन शिकरा या चील फल खाते होंगे? शायद नहीं। फिर लगा पक्का उल्लू होगा। लेकिन यहाँ भी उल्लू फल खाते है या नहीं, मुझे नहीं पता। फिर लगा चमगादड़ है। लेकिन उस पंछी के उड़ने के तरिके से चमगादड़ तो नहीं है यह जान पाया था। वैसे जो भी हो.. रात के एकांत में उसने भय और रोमांच दोनों ही घोल दिए थे। मन तो कर रहा था, कि एकाध पत्थर मार कर उसे उड़ाउँ, ताकि पता तो चले कि आखिर है क्या वह? लेकिन फिर सोचा रात है, बेचारा वह पंछी भी सोने की तयारी कर रहा होगा, उसे क्यों खलल करनी। 


नींद का उद्यम

    आखिरकार न तो वेताल दिखा, न ही पंछी.. और मैं भी कौनसा विक्रम या पक्षीविद था.. होगा कुछ, यह सोचकर बात को रफादफा करते हुए अपनी आग सेंकने में पुनः मगन हो गया था। बहुत सारे उद्यम इसी तरह, होगा कुछ, के कारण तले दबकर बाकी रह जाते है। फ़िलहाल बारह बजने को है। और अब निंद्रा का उद्यम ही उपयुक्त है। 


    शुभरात्रि,

    १६/१२/२०२५ 

|| अस्तु ||


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