न भेजे गए ख़त : प्रेम, डर और अधूरे शब्दों की कहानी
भूमिका की ज़रूरत और मुद्दे की नींव
प्रियम्वदा !
आज मेरे पास मुद्दा तो है, लेकिन उसे कैसे लिखूं.. मैं न जाने कब से ही इस मुद्दे की नींव ही कैसे लिखूं यही नहीं समझ पा रहा हूँ। कुछ बातें ऐसी होती है, जो भूमिका की मोहताज़ होती है। जैसे किसी समारंभ का मुख्य अतिथि के आमंत्रित करने से पूर्व उसका परिचय दिया जाता है। कुछ इसी तरह कुछ मुद्दों को अपना मत रखने से पूर्व एक भूमिका चाहिए होती है। भूमिका उस मुद्दे के लिए नींव बनती है, और फिर उस नींव पर शब्दों की एक ताश के पत्तों सी ईमारत खड़ी होती है। उस ईमारत को ढहाने के लिए हमेशा से एक टीका काफी रही है। बस एक टीका।
Unsented Letters क्या होते हैं?
मुद्दा सरल है, वे खत जो कभी भेजे ही नहीं गए..! जैसे मेरी यह दिलायरी भी एक तरह के खत ही है, लेकिन यह हमेशा भेजी गयी है। खुले खत के रूप में। खेर, मुझे फ़िक्र नहीं है, कि इसे कोई पढ़ लेगा.. अक्सर जो खत भेजे नहीं जाते है, उसके पीछे की मुख्य वजह तो यही होती है, कि कोई पढ़ें नहीं बस। यह थोड़ा अजीब मामला है वैसे.. अगर भेजना नहीं था, तो लिखा क्यों? चलो लिख लिया, पर अब भेजने की हिम्मत नहीं है.. तो यह तो समय और भावना.. दोनों का ही व्यय हुआ। लेकिन नहीं.. हर कोई अपने जीवन में कभी न कभी इस प्रक्रिया से तो गुज़रता ही है। अब कागज़ नहीं तो फोन की किसी नॉट के ड्राफ्ट में यह मसला पड़ा रहेगा.. अपनी बारी आने के इंतजार में।
दिलायरी
लो.. एकांत चाहिए था मुझे, और ऑफिस को बातूनियों ने घेर लिया। चलो फिर अपनी उस बात को रोककर सुबह से शुरू करता हूँ। आज भी सवेरे उठने में लेट हुआ। और इसी कारण से ऑफिस पहुँचते पहुँचते पौने दस बज गए। वैसे आज काम उतना ज्यादा था नहीं। सवेरे पहले दिलबाग में गया, सारे पौधें सर्दियों में सिकुड़ से गये है। मधुमालती तो ख़त्म ही हो गयी। बस कुछ पत्ते खोती जाती उम्मीद तो संभाले हुए है। आज तो कुछ ज्यादा ही हैवी ट्रैफिक जैम रहा है। मार्किट जाना ही असम्भव था। यह ट्रैफिक जैम हर महीने लगता है। लेकिन अपने माननीय सड़क एवं परिवहन मंत्री जी तो आजकल पर्यावरण की चिंता करने में व्यस्त है। दिनभर में और कुछ ऐसा खास हुआ नहीं, जो यहाँ उतर आए। हाँ ! आजकल सोशल मीडिया पर बहुचर्चित जावेद अख्तर और मुफ़्ती की डिबेट जरूर से देखी।
मैसेज लिखकर मिटा देने की मनोस्थिति
अपने मुद्दे पर लौटता हूँ। आजकल उन उनसेंट लेटर्स का रूप बदला भी है। कईं बार ऐसा होता है, हम कुछ मेसेज टाइप करते है, और फिर उन्हें मिटा देते है। क्योंकि हमारे ख्याल जागृत हो जाते है। अपने ही संवाद का कईं अर्थों में विघटन किया जाता है। और जब यह सिद्ध हो जाए, कि इस वाक्य का सीधा और सरल एक ही अर्थ होता है, तभी हम उसे भेजते है। कभी कभी किसी की चैट में एक अच्छा-खासा लंबा मेसेज हम टाइप तो करते है.. लेकिन भेजते समय अंगूठा काँप जाता है। क्यों? हिम्मत जवाब देने लगती है? होंसले बिखरने लगते है। खासकर उनके साथ तो यह होता ही है, जो अभी फ्रेंडजोन में टहल रहे होतें है। और भावनाएं आकर्षण के रूप में एक खिंचाव को ऊंचाई पर ले जाती है।
फ्रेंडज़ोन, आकर्षण और हिम्मत का काँपना
कुछ खत इस कारण से भी नहीं भेजे जाते है, क्योंकि उस खत के भीतर लिखे गए शब्दों से संतोष नहीं होता है। बहुत सारी ऐसी बातें होती है, जिन्हे सम्मिलित तो करनी थी, लेकिन शब्दों की मर्यादा आड़े आ जाती है, उस खत के कागज़ पर। वह महज़ एक कागज़ का टुकड़ा फिर कागज़ नहीं रह जाता। वह एक भावना का पर्याय बन जाता है। कईं खत आज भी क़ैद पड़े होंगे कईं अलमारियों में.. जिन्हे कभी मंजिल तक पहुँचने का सौभाग्य न मिला.. और कईं खत बस चींथड़े होने से भी बच गए होंगे। क्योंकि कुछ प्रस्ताव का प्रत्युत्तर कागज़ों को सहन करना पड़ता है, अपने देह को चूर कर के।
खत न भेजने का सबसे बड़ा डर : खो देने का भय
लिखा हुआ खत न भेजने का सबसे बड़ा कारण तो बस खो देने का भय होता है। कुछ रिश्ते बस कह देने भर से बदल जाते है। और यही डर एक प्रमुख कारण बनता है, कागज़ के अनकहा रह जाने के लिए। बस एक आशंका.. कि अभी जो मौजूद है, वह भी कहीं छीन जाए अगर.. तो.. कईं बार दो अलग व्यक्ति अलग दृष्टिकोण से एक दूसरे के करीब आते है। और यह दृष्टिकोण उन्हें तब तक ही बांधे रखता है, जब तक उस दृष्टिकोण को उजागर न किया गया हो। थोड़ा पेचीदा है, लेकिन सही है। कोई मुझे अपना मित्र मानता है, लेकिन मैं उसमे अपनी प्रेमिका खोजता हूँ, तो यहाँ सिवा कबाड़े के कुछ नहीं निकलता। हाँ ! वह बिनपते का पत्र जरूर शेष बचता है।
अस्वीकृति की आशंका और रिश्तों की सम्भावना
अस्वीकृति की आशंका कुछ खतों को अपनी यात्रा करने से रोक लेती है। इस एक आशंका के चलते एक रिश्ते की सम्भावना ही अस्तित्व में आने से अटक जाती है। स्वयं ही जब उस खत में लिखे भाव को प्रत्युत्तर की अवधारणा में बाँधने लगते है, तो एक आशंका बेरोक उठती है। अस्वीकृति की आशंका.. कि कहीं मेरे यह पत्र - संभावित भविष्य के बदले वर्तमान की स्थिति भी न बदल दें। कईं बार दिमाग और दिल का द्वंद्व एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाता। दिमाग तो रिस्क लेने के लिए तैयार हो जाता है। संभावित प्रसंगो के लिए कटिबद्ध हो जाता है। लेकिन दिल.. वह तो बस वर्तमान में निभ रहे व्यवहार को ही सर्वस्व मानकर पहल नहीं करता।
इन नहीं भेजे गए खतों का पहिया कईं बार इस वजह से भी रूक जाता है, कि वह कहीं वाकई में किसी और के साथ व्यस्त हो, खुश हो, उलझा हुआ हो.. उसकी स्थिति क्या है, यह न पता होने के कारण अपना खत उसके पते पर नहीं पहुँचता। हम खुद ही नहीं चाहते है, कि उसका संतुलन बिगड़ जाए। क्योंकि हमारी अपनी भावना क्या पता उसके जीवन में भूचाल बन जाए? हम उसके साथ साथ उसकी स्थिति को भी सही होनी चाहते है। कईं बार हम जिसे चाह रहे होतें है, वह खुद किसी और की कामना में प्रवृत होता है। ऐसी स्थिति में हमारी भावना उसके अपने पथ में विक्षेपकर्ता बन जाती है। और शेष बचती है, सदा की विमुखता।
कैथार्सिस: जब खत सिर्फ़ दिल के लिए होते हैं
प्रियम्वदा, कभी तो स्याही ही सूख जाती है, क्योंकि हमारे भीतर एक मनोमंथन चल रहा होता है, क्या यह भावना स्थायी है, क्या मैं सच में यही कहना चाहता हूँ.. इस असमंजस में ही स्याही शब्दों के छपने से पूर्व सूख जाती है। और कभी कभी कुछ खत इस कारण से भी नहीं भेजे जाते है, कि जवाब न मिलना, नकारात्मक जवाब से कम तकलीफदेह होता है। हम तैयार ही नहीं होते है, नकारात्मक प्रत्युत्तर के लिए। एक असमंजस भरी स्थिति भी खतों को अपने पते तक पहुँचने से रोक लेती है। और कईं बार हमारे आसपास का वातावरण.. रिश्ते, मर्यादाएं, या हालात हमें रोक लेते है। उस खत को उसके पते तक पहुँचाने से। हर कोई मिलकर कहता है, "मत भेजो।"
कुछ खत मैं लिखता हूँ, वैसे होते है। उन्हें कहीं पहुंचना भी होता है, और नहीं भी। एक अंग्रेजी शब्द सुना था, कैथार्सिस (catharsis) जिसका अर्थ होता है, अपने दिल का बोझ हल्का करना। मतलब कुछ खत कम्युनिकेशन के लिए होते ही नहीं है। वे तो बस अपने दिल का बोझ हल्का करने के लिए अलमारी में इकठ्ठा होतें है। उनका अस्तित्व ही इस पर निर्भर होता है, कि लिख दिए, दिल हल्का हो गया, बस भेजने की जरुरत नहीं।
अधूरे खत और साहित्य की सुंदरता
और अपने इस मुद्दे की पूर्णाहुति की ओर बढ़ते हुए बता देना चाहता हूँ प्रियम्वदा, कि कुछ खतों की सुंदरता ही उनके अधूरेपन में होती है। यह कभी न भेजे गए खत, साहित्य के सेवक बनकर समाज के सामने प्रस्तुत होतें है। इन खतों में साहित्य की खदान के वे तमाम जवाहरात मौजूद होतें है, जो समाज के लिए एक सन्देश दे जातें है। प्रेम का सन्देश। इन खतों में अक्सर प्रेम ही अंकित होता है। भर भरकर प्रेम। यहाँ रूपक होतें है, दृष्टि से परे। यहाँ दृढ विश्वास और कटिबद्धता होती है। यहाँ कृतनिश्चयता होती है। इन नहीं भेजे गए पत्रों में एक काल्पनिक रिश्ते की मौजूदगी होती है, जिसके पास कभी वास्तविकता बनने की सम्भावना थी।
कुछ बातें कह देने से छोटी हो जाती है, लेकिन न कहने से उम्रभर साथ निभाती है।
शुभरात्रि।
२७/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा ख़त है
जो लिखा गया, पर भेजा नहीं गया—
तो इस दिलायरी को पढ़कर
शायद आप अपने ही शब्दों से मिल लें।
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