आकर्षण का सिद्धांत और संयोगों की श्रृंखला | प्रयाग और काशी || दिलायरी : 02/01/2026

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आकर्षण का सिद्धांत और संयोगों की श्रृंखला


“प्रयाग और काशी के आकर्षण के बीच बैठा एक चिंतनशील व्यक्ति, सफ़ेद पृष्ठभूमि पर कार्टून शैली में संयोगों और यात्रा की चाह को दर्शाता दृश्य।”

काशी और प्रयाग — मृत्यु, संगम और मन का खिंचाव

    प्रियम्वदा !

    तुम्हे याद है वह आकर्षण का सिद्धांत.. या फिर वह संयोगो की श्रृंखला। जहाँ एक आकर्षण का केंद्र है, और उस आकर्षण के केंद्र से जुड़े हुए कुछ संयोग अपने आसपास भ्रमण करते दिखे..! मुश्किल लग रहा है, समझाना। आकर्षण का सिद्धांत क्या कहता है, कि आप किसी पर भरपूर आकर्षण रखते हो, तो प्रकृति उस तक अपने आप पहुँचाने में कार्यरत हो जाती है। और संयोग की श्रृंखला, जिस चीज के प्रति आकर्षण है, उसके प्रति का भाव कम न हो, वह बार बार हमें अपने आसपास दिखाई पड़े, सुनाई पड़े, वह हुई संयोग की श्रृंखला। 


“सुरतनु जमण अने काशीनु मरण” — एक मुहावरा, एक दर्शन

    दरअसल मुझे प्रयाग और काशी.. यह दो जगहें बहुत आकर्षित करती है। ज्यादा आकर्षण तो काशी का रहा है। इस  आकर्षण का कारण भी थोड़ा विचित्र है। गुजरात में मुहावरा है, "सुरतनु जमण अने काशीनु मरण"। मतलब भोजन में सुरत श्रेष्ठ है, और मृत्यु के लिए काशी। पता नहीं, अब मृत्यु ने मुझे इतना आकर्षित किया है, या काशी स्वयं ने.. मैं आजतक नहीं समझ पाया हूँ। काशी मेरे आकर्षण का केंद्र है, लेकिन प्रयागराज ने मुझे तब आकर्षित किया, जब उसका नाम इलाहाबाद से प्रयागराज हुआ। शाला में पढ़ते तो थे, कि प्रयाग में त्रिवेणी संगम है, लेकिन कभी उस पर ध्यान नहीं दिया था। फिर जब पिछले वर्ष महाकुंभ का आयोजन हुआ, तब महत्ता जान पाया। और तब से मेरे आकर्षण में बढ़ोतरी हुई, काशी के साथ साथ प्रयाग की। 


यात्रा की चाह, नौकरी की हकीकत

    प्रियम्वदा, आज सवेरे फिर से एक बार प्रयाग आने का न्यौता मिला। फिर से एक बार मन विचरण को उत्सुक हुआ। जब भी यात्रा का विषय होता है, मेरा मन उत्सुकता के अतिरेक में बहने लगता है। जैसे बचपना करने लगता हूँ मैं। जाना है तो जाना है। बस और कुछ सोचना-विचारना नहीं। फिर मुझे और कुछ कामों में मन ही नहीं लगता है। सवेरे सवेरे मुझे इस प्रयाग के ख्यालों में कोई छोड़ गया था। लेकिन ख्यालों से पेट थोड़े भरता है प्रियम्वदा ! पेट के लिए कमाना पड़ता है। नौकरी करनी पड़ती है। और हमे नौकरी करने वालों को तो खर्चे ही मार डालते है। सवेरे जगन्नाथ के दर्शन करके बाइक को शौरूम वालों को दे आया। 


मोह, आलस और बाइक की कीमत

    एक बड़ी गलती मुझसे यह हुई थी, कि मैंने फिर से एक बार आलस की। बाइक का हैंडल टेढ़ा था, और मैंने सोचा अगली सर्विस में ठीक करवा लूंगा। आज यही यामाहा वाले, अपने उस अधूरे काम का फिर से मेहनताना मांग रहे है। खेर, उस दिन अगर बाइक ठीक करवाके लाने के बाद मेरे पास समय होता तो मैं उन्हें फिर से जमा करवा देता। लेकिन आलस के चक्कर में आज समय मिला, आज सौंप आया। और आज फिर से पांचेक हजार का चुना तो यह यामाहा वाले मुझे लगाएंगे ही। प्रियम्वदा ! जिस चीज से मुझे सबसे ज्यादा मोह होता है, वही हमेशा विश्वासघात करता है। हाँ ! चुकाएंगे..  इंसान को अपने मोह की भी कीमत चुकानी पड़ती है। 


सिनेमा, इतिहास और प्रयाग का पुनः आगमन

    दिनभर काफी ज्यादा काम रहा है आज भी। कल परसो एक रील देखी थी। एक फिल्म की छोटी सी क्लिप थी। मुझे पसंद आयी थी। तो सोचा पूरी फिल्म देख लू। लंच में घंटेभर का तो खाली समय मिल ही जाता है। कईं बार जबरन यह खाली समय मैं लूट लेता हूँ। आज मैंने इस खाली समय को जबरन खाली ही करवाया है। काम तो लंच समय में प्रकट हुए थे, लेकिन यह फिल्म देखने के लिए टाल दिए। तेलुगु फिल्म थी, मिराई/मिराय नाम से। हिंदी डब में वैसे काफी ठीक फिल्म लगी मुझे। यह सुपरहीरो कहानी कुछ कुछ एवेंजर एन्डगेम की कॉपी लगती है। 


मिराई फिल्म, अशोक, रामायण और कोदंड

    दरअसल कहानी कुछ अशोक के कलिंग आक्रमण के बाद शुरू होती है। कलिंग युद्ध के पश्चात शांति और धर्म की स्थापना के लिए, अशोक ने अपनी दैवीय शक्तियां नौ ग्रंथो में बाँट दी। नौ ग्रंथो के नौ रक्षक थे। एक आदमी इन नौ ग्रंथो के रक्षकों को मारकर अमरत्व प्राप्त करना चाहता है। और उसे रोकने के लिए नववें ग्रन्थ की संरक्षिका एक योद्धा को तैयार करती है। वह इस कहानी का महानायक, सुपरहीरो बनता है। यह कहानी धीरे धीरे रामायण से भी जुड़ने लगती है। सुपरहीरो के पास हथियार के रूप में बस एक लाठी थी। लाठी को ऐसी-वैसी कैसे रहने दे सकते है? तो उस लाठी को दिव्य शक्तियों से जोड़ा गया। 


    कहानी के अंत में हीरो और विलेन का युद्ध हुआ। ठीक उसी समय, जब प्रयागराज में महाकुंभ हो रहा था। हीरो तो सुपरहीरो है। वह कभी मरते कहाँ है? आखरी सस्पेंस रिलीज़ हुआ, बेचारा विलन अमरत्व को पाकर भी मरा। क्योंकि सस्पेंस यह निकला, कि हीरो की लाठी सामान्य नहीं थी। असल में वह कोदंड था। कोदंड भगवान राम के धनुष्य का नाम है। उस हीरो ने फिर कोदंड से तीर मारा। और अमरत्व को प्राप्त कर चुके विलन का अणुबम विस्फोट जैसे प्रहार में परखच्चे उड़ जाते है। हीरो तो अपना सुपरहीरो था। वरना जिसने शिवधनुष उठाया हो, उस राम का कोदंड कोई उठा सकता है भला? लेकिन हीरो अपना सुपरहीरो था। 


क्या संयोग सच में हमें बुलाते हैं?

    इस फिल्म में फिर से एक बार प्रयागराज का उल्लेख देखकर लगा, जैसे प्रयागराज स्वयं मुझे बुला रहें है। सवेरे भी प्रयाग, शाम को भी प्रयाग.. तो प्रियम्वदा ! बात तो वहीँ आ पहुंची.. आकर्षण का सिद्धांत.. और संयोग की श्रृंखला। सवेरे किसी ने प्रयाग का न्यौता दिया। शाम तक एक फिल्म में प्रयाग में हो रहे कुम्भ का दृश्य.. है न एक श्रृंखला.. एक ही चीज, घटना, या आवाज़ का बार बार सामने आना। कुछ देर पहले कोई बातें कर रहा था, उसने भी बातों बातों में प्रयाग का ज़िक्र किया। मतलब साफ़ है, वो हकले ने कहा था न, किसी चीज को सिद्द्त से चाहो तो सारी कायनात तुम्हे उससे मिलाने में लग जाती है। 


चाहत पर नियंत्रण और अनुभव से उपजा संयम

    लेकिन मैं अपनी हकीकत जानता हूँ। मैंने जहाँ जहाँ अपनी चाहत का जिक्र किया है, वहां वहां से मैंने चोट खायी है। इस लिए मैं अब अपनी चाहत पर भी नियंत्रण रखता हूँ। उसे भी तोलता हूँ, नफा-नुकसान के तराजू पर। प्रेम, आकर्षण, गंभीरता या हास्य.. मेरे सब नपतुले रहते है। मैं कभी एक्सट्रीम हुआ करता था। अब नहीं रहा। मैं पहले अतिशयोक्ति का आराधक था। अब बस घटित होते प्रवाह के साथ बहता हूँ। 


    तो मैं प्रयागराज की कामना तो कर रहा हूँ, लेकिन जा नहीं सकता। सर्दियों की कामना तो कर रहा हूँ, लेकिन पा नहीं सकता। दो दिनों से ठण्ड में कुछ इजाफा तो हुआ है, लेकिन दिवस में टीशर्ट पहनकर घुमा जा सकता है। इस बार की विंटर अजीब है, विंटर-जैकेट पहनो तो पसीने छूट जाते है। तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, बार बार होते संयोग बस हमारे दिमाग की उपज मात्र है? या वास्तव में कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है, जो हमें हमारी मंजिल तक वाकई पहुंचाती भी है। पता नहीं होता होगा कुछ। 


कम व्यवहार, कम भागदौड़ — जीवन का नया सूत्र

    फ़िलहाल साढ़े सात बज रहे है, और आगे की प्लानिंग यह है, कि आज फॅमिली के साथ रेस्टोरेंट डिनर का प्लान है। ज़माना हो गया, कहीं इकट्ठे इस तरह भोजन किए को। समस्या एक और भी है, एक इनविटेशन भी मिला है, वह भी आज शाम का ही है। ऊपर से बाइक भी मेरी रिपेयर होकर मिली नहीं है। कल मिलेगी। तो सोच रहा हूँ, कि पहले फॅमिली को डिनर करवा लाऊँ.. उसके बाद उस दूकान वाले के न्यौते का मान रखने के लिए मिल आऊं। इस दुकानदार के साथ मेरा सिर्फ सवेरे की सिगरेट का ही व्यवहार है, लेकिन अगले ने फिर भी अपने घर पर फंक्शन में आने का न्यौता दे दिया। अब मैं सोच में हूँ कि क्या मुझे इस व्यवहार को और बढ़ाना चाहिए? क्योंकि मैं मानता हूँ, कि व्यवहार जितने कम हो, उतनी भागदौड़ कम होती है। 


    वैसे मुझे तो मुँह छिपाने की आदत है। पता नहीं मैंने ऐसे कौनसे अपराध किये है, कि मुझे लोगों से घुलने मिलने में बड़ी दिक्कत होती है। खासकर रिश्तेदारों से तो बहुत ज्यादा। अनजान लोगों से तो मैं फिर भी सतर्कता के साथ थोड़ा व्यावहारिक बनने की कोशिश कर भी लेता हूँ। 


    जो भी हो.. होगा वह देखा जाएगा। 

    शुभरात्रि। 

    ०२/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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