ब्लैंक मन, शिकायतें और कर्मपथ | नववर्ष की पहली दिलायरी || 01/01/2026

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ब्लैंक मन, शिकायतें और कर्मपथ | नववर्ष की पहली दिलायरी


नववर्ष की रात एक डायरी लेखक का कार्टून चित्र, सफ़ेद पृष्ठभूमि पर बैठा हुआ थका लेकिन चिंतनशील पुरुष, हाथ में खाली डायरी, पास में बुझती-सी अग्नि और रखी हुई वॉलीबॉल, जीवन के संघर्ष और शब्दों की जंग का प्रतीक।

नववर्ष का पहला दिन और शब्दों की अनुपस्थिति

    प्रियम्वदा !

    आज फिर से एक बार ब्लेंक हूँ। मन में कोई भी ऐसा विचार नहीं उठ रहा जिसे यहाँ उतारूं। अरे हाँ.. सबसे पहले तो तुम्हे इस अंग्रेजी नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं। दिनचर्या से शुरू करता हूँ, लिखते लिखते कुछ न कुछ बात बन जाएगी.. है न? हर बार तो ऐसा ही होता है। दरअसल मैं जब भी ब्लेंक हो जाता हूँ, अपनी दिनचर्या लिखने लगता हूँ। आज पहली तारीख है, कुँवरुभा की स्कूल की छुट्टी थी, तो सवेरे उन्होंने ही मेरे पर कूद कूद कर मुझे जगाया। 


दिनचर्या, मौसम और बदलता पर्यावरण

    सबसे पहले एक चक्कर लगाया दिलबाग में। गेंदा, गुड़हल, क्रोटन, लकी बम्बू, रोज - सारे पौधे मौज कर रहे थे। सवेरे सवेरे कोहरा या धुंध बढ़िया होती है। लेकिन मैं सवेरे नौ बजे घर से निकलता हूँ तब तक सब सामान्य हो जाता है। इस बार तो ठण्ड का अनुभव किया ही नहीं है। कल रात वॉलीबॉल खेले थे तो पूरा पसीने से भीग चूका था मैं। अग्नि सेंकने से गर्मी लगने लगती है, पसीने आए ऐसी गर्मी। पता नहीं सर्दियाँ मानों शहर ही छोड़ गए हो। दिनभर पंखा चालु रहता है, और तो और जैसे यह पर्यावरण भी फिरकी ले रहा है, बादल भेज दिए है। 


    ऑफिस निकलने से पूर्व जगन्नाथ जी को मिलकर गया था। काफी भीड़ थी। हररोज नहीं होती है। दूकान से होते हुए ऑफिस पहुंचा.. और यकीन मानों प्रियम्वदा, आज तो शाम कैसे ढल गयी, कुछ पता नहीं चला। दोपहर को मार्किट में कुछ खर्चे वाले काम करने थे, वे निपटाए। बिस-इक्कीस हजार तो एक ही दिन में निकल गए। खेर, आज पूरा दिन कुछ न कुछ कामों में ही गुजारा है मैंने। बस यही कारण है, आज दिलायरी के लिए कुछ भी नहीं मिला मुझे। मैं हररोज एक जैसी बातें ही तो नहीं लिख सकता। आज तो वह स्नेही भी गायब रहा है, जो मुझे कुछ न कुछ लिखने लायक बता जाता है। 


    प्रियम्वदा ! बड़ी अजीब बात है, मैंने कितनी सारी दिलायरियाँ लिखी है, लेकिन फिर भी मुझे हररोज लिखने के लिए कोई भी टॉपिक खुद से नहीं मिलता है। पता नहीं, यह विषयों की खोज की निर्भरता मेरी कब ख़त्म होगी.. इसका एक कारण तो यही है, कि मेरा छोटा और बड़ा, दोनों दिमाग दिनभर तो नौकरी में ही खर्च हो जाते है। फिर इस दिलायरी के लिए कुछ बचता कहाँ है? फ़िलहाल ऐसा लग रहा है, जैसे दिनभर काम किया है, और अब शाम हिसाब मांग रही है। शाम को हमेशा दिलायरी लिखने का समय होता है।


    दो तीन दिन बढ़िया कुछ तुकबंदियाँ लिखी थी, और आज और कल वे भी नहीं लिखी गयी मुझसे। कुछ तो इस बात का भी मलाल है। प्रियम्वदा ! कुछ दिन ऐसे ही होतें है। और यही वे दिन होते थे, जब मैं सोचता था, कि कब यह 365 दिन की प्रतिदिन डायरी लिखने का चेलेंज पूरा होगा। जब पूरा दिन ऑफिस में बहुत ज्यादा काम किया हो, तब यही होता है। बैंक से लेकर बिलिंग तक.. दिनभर में मानसिक तनावपूर्ण काम ही करना होता है मुझे।


    अरे.. क्या लिखूं.. प्रियम्वदा.. आज तो तुम भी अपना जादू नहीं बिखेर रही.. क्या हो गया है.. 


शिकायतें: नौकरी से ट्रैफिक तक

    कईं देर से मैं बस शौकिया आग जलाने की कोशिश कर रहा था। शौकिया आग, मतलब ठंड नही है, लेकिन बस फिल्लिंगस लेने के लिए जलाई गई अग्नि..! प्रियम्वदा, ऐसे कईं मौके होते है, जहां हमे वास्तव में जरूरत नहीं होती, लेकिन फिर भी कोई काम हम करते हैं, तो केवल अपना शौक पूरा करने के लिए, बस एक भावना को अनुभव करने के लिए। अभी अभी वॉलीबॉल खेलकर लौटा हूँ। गया तो था गरबीचौक आग सेंकने, और कुछ शब्दों को पकड़ने। लेकिन लड़के लोग आ धमके, और फिर वॉलीबॉल का मैच शुरू हो गया। सतत तीन मैच हारने के बाद भी थकान अनुभव नहीं होती। प्रियम्वदा, हारने के बाद भी अगर थकान नही होती तो मतलब साफ है, जंग जारी है।


शब्दों से जंग और वॉलीबॉल के हारते मैच

    और आज तो मेरी जंग मेरे शब्दों के साथ भी है। ग्यारह बज रहे है, रात के। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नही मिल रहा, जिसपर भावनाओं का विस्तारण करूँ। प्रियम्वदा, अब तो शंका होने लगी है, कहीं यह 2026 में दुनिया के बदले दिलायरी तो.. नहीं नहीं, ऐसी बात सोचता ही क्यों हूँ मैं। लेकिन फिर भी बात निकली ही है, तो शिकायतों का सिलसिला शुरू करता हूँ। जीवन मे शिकायत भी कभी कम नहीं होती। दिनभर में ही मैं कितनी सारी शिकायतें करता रहता हूँ। नौकरी क्यों करनी पड़ती है कि शिकायत से सवेरा होता है। एक शिकायत मेरी जगन्नाथ ने भी कईं बार सुनी है, कि जिस चीज की मैंने सबसे ज्यादा कामना की है, वह मुझे क्यों मिली नहीं? इस पर तो शायद जगन्नाथ भी बस अपनी बड़ी सी मुस्कान ही बिखेरते है।


प्रेम, जिम्मेदारियाँ और कोमलता का टूटना

    इसके बाद आफिस पहुंचकर मेरी पहली शिकायत यही होती है, कि यह बैंक वाले सारे ही काम हमसे करवाते है, फिर वे विभिन्न प्रकार के चार्जेस क्यों वसूलते है? उसके बाद लंच टाइम में अगर कोई काम आ जाए, तब तो शिकायत नहीं, शिव का तृतीय नेत्र मैं मांगने लगता हूँ। शाम होने के बाद जब कुछ सरकारी वेबसाइट्स के सर्वर लड़खड़ाते दिखते है, तब मेरी शिकायत शिखर से छलांग लगा देती है। फिर तो सरकारी बाबुओं से लेकर मंत्री जी तक मेरी जिह्वा से उगले गए अगनशब्दो का आस्वाद लेते है। शाम को दिलायरी लिखने बैठता हूँ, और कोई विषय न मिले, तब प्रियम्वदा से लेकर अपने आप को मैं दोषी के कटघरे खड़ा रखकर, खुद ही शिकायतों के विविध रूपकों से मढ देता हूँ। बात यहां भी कहाँ खत्म होती है। घर जाने का समय हुआ, और ट्रैफिक जैम के चलते विलंब होने लगे, तब तो ट्रैफिक हवलदार से लेकर परिवहन मंत्री जी मेरी शिकायतों के अभ्यासी लगने लगते है। 


    घर पहुंचने के बाद खाना अगर कुछ पसंदीदा न हुआ, तब तो शिकायतों का प्रवाह क्रोधाग्नि के रूप में फुट ही पड़ता है। लेकिन जब यूँ इस क़दर दिलायरी में सारी शिकायतें उतारनी पड़ जाए, तब सोचता हूँ, यह भी भला कोई दिवस हुआ? जहां प्रतिपल संघर्ष के सिवा कुछ भी नहीं? और बात यहां भी कहाँ खत्म होती है, इसके बाद तो मुझे वॉलीबॉल के तीन मैच हारने भी होते है। किससे शिकायत की जाए? कहाँ? मोती चमड़ी हो जाती है प्रियम्वदा। जब अफसोस भी प्रकट करने लायक नहीं लगता है। खेर, इस नववर्ष के प्रथम दिवस पर ही जब संघर्ष की सोबत मिली हो, तब तो तुमसे इस वर्ष मुहब्बत का रंग कुछ और ही निखरेगा.. मैं सच कहूं, तो मैंने कभी किसी से मुहब्बत, प्रेम, प्रणय, प्रीत की ही नहीं है। निरुत्साह होकर मैंने बस मेरे साथ घटित हो रहे प्रवाह को झेला है। 


कर्म, अनुभव और निरंतर चलायमान जीवनपथ

    जब जिम्मेदारियों का बोझ बड़ी जल्दी आ जाता है, तब यह प्रेमप्रसंगों से वास्ता बस फिल्मी कहानी में ही दिखता है। वास्तविकता में जब कठोरता के घण पड़ते है, तो कोमलता सबसे पहले चकनाचूर होती है। प्रणय में कोमलता होती है। कठोरता अगर प्रेम में दिखती है, तो वह सिर्फ विरह के वर्णन को यथार्थ करने के लिए दिखाई जाती है। किसी प्रेमी ने कभी कठोर निर्णय लिए भी होंगे, तो उसने विरह के साथ संधि की होगी। कुछ शांति की स्थापना बलिदान मांगती है, यह प्रेम भी बलिदान मांगता है। जीवन का। मैंने जब अपनी जिम्मेदारियां उठायी थी, तब मैं युवावस्था में प्रवेश कर ही रहा था। सदैव छांया में रहने वाले ने धूप की चमक एकदम से देखी थी। चकाचौंध रोशनी को एक टक निहारते हुए, मैं सब कुछ ही भूल गया था। 


    प्रियम्वदा, यह नववर्ष का प्रथम दिन जितनी व्यस्तता में बीता है, उतनी व्यस्तता सदैव रहनी चाहिए। गुण से प्रेरणा, प्रेरणा से कर्म, यही जीवनपथ है। कर्म से अनुभव, और अनुभव से उन्नति, यही जीवनपथ है। उन्नति से विकास, और विकास से श्रेष्ठता, यही जीवनपथ है। जीवनपथ पर कहीं भी विराम नहीं होता। इस पथ पर छांव होती है, लेकिन उस छांव की लालच में अगर रूक गए, तो गंतव्य तक पहुंचने की यात्रा विषम हो जाती है। बस इसी कारण से प्रियम्वदा, जो हो चुका, वह याद रखते हुए, आगे के पथ पर दृष्टि गड़ाए, आगे बढ़ना, निरन्तर यात्रामय रहना, और मन को, चित्त को सदा प्रवृत रखना, यही उद्देश्य उपयुक्त है। शायद इसी कारण से जीवन को एक युद्ध का रूपक दिया जाता है, सदैव लड़ते रहना है।


    इसी लिए कहा गया है,

कंथा रण में जाइके, मत ढूंढे को साथ।

तारा संगाथी त्रण जणा, हैयु, कटारी, हाथ॥


    शुभरात्रि।

    ०१/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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