बोलने का डर, कहानी कहने का सुख और शब्दों की वापसी || दिलायरी : 29/12/2025

0

श्रोता बनना भी एक कला है


श्रोता और वक्ता के बीच खड़ा एक कार्टून चरित्र, हाथ में माइक्रोफोन, सिर के आसपास बिखरे शब्द और विचार, कहानी और इतिहास का प्रतीकात्मक चित्र

बोलना आसान है, सुनना कठिन

    प्रियम्वदा !

    मैं एक अच्छा श्रोता भी नहीं हूँ.. कल ही प्राप्त हुए इस अमूल्य ज्ञान को आज तुम्हे बता रहा हूँ। मैं देखता हूँ, कि मेरे ही आसपास के मेरे मित्र कितनी सरलता से अपनी बात को व्यक्त कर पाते है। वक्ता बन पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस थोड़ा सा विश्वास, और थोड़ी सी बेशर्मी से, आप अपनी बात को व्यक्त सकते है। सबसे प्राथमिक जरूरत है, तो वह है, निरभिमान होकर बस बोलना। मैं थोड़ा घमंड में रह जाता हूँ, इसी कारण से बात को रख नहीं पाता। अभी कुछ देर पहले ही स्नेहिमित्र ने मेरे हौंसले को एक बार फिर ऊँचे चढ़ाना चाहा..!


    खेर, बीते कल के इवेंट की ही मैं चर्चा कर रहा था। और मैंने अभी अभी अनुभव किया, कि श्रोता बनना भी बड़ा कठिन काम है। क्योंकि कईं बार आपको कुछ पसंद नहीं आ रहा हो, लेकिन आपका फ़र्ज़ बन जाता है, अगले की महेनत को व्यर्थ न जाने देने का। कहीं उसे अफ़सोस न हो जाए, कि उसकी अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिभाव नहीं मिल रहा उसे.. खासकर तब, जब कोई नवोदित हो, या पहली बार अपनी अभिव्यक्ति कर रहा होता है। मैं आज तक कभी कोई लेख का पठन करने की हिम्मत नहीं दिखा पाया हूँ, तो मुझे कोई हक़ ही नहीं बनता किसी और के पठन को नज़रअंदाज़ करने का। 


झिझक, घमंड और फंबल होते शब्द

    मैं फ़िलहाल यह सोच रहा था, कि अगर मुझे अनिवार्यता आन पड़ती कुछ बोलने की, तो मैं क्या बोलता..? उदहारण ही दे देता हूँ तुम्हे। 

    "नमस्कार.. अ.. मैं हूँ दिलावरसिंह, और भारतवर्ष के पश्चिम छोर पर स्थित, क्षेत्रफल में एशिया का सबसे बड़ा जिला कच्छ मेरी कर्मभूमि है। माननीय प्रधानमंत्री जी के अपने प्रदेश गुजरात से हूँ, और मातृभाषा के साथ साथ मौसेरी भाषा हिंदी में जब आज कुछ बोलने की जरूरियात आन ही पड़ी है, तो मेहरबानी करके कोई हंसना मत... और हंसना आ ही जाए, तो ऑडियो विडिओ ऑफ करके ठहाके लगा दीजिएगा। ..." यह होती भूमिका, और फिर मेरी एक पोस्ट है वह मैं पढ़ देता। 


    ठीक यही शब्द मेरे मन में उपज आए, जब मुझे मेसेज मिला था, कि आप तो कुछ बोलिए..! और मैं रुसवा होते होते बच पाया था। वैसे यह लिखते समय बड़ा ही सहज और सरल लगता है, पता नहीं बोलते समय क्या हो जाता है। गजा.. विषैला गजा आज बिना रुके कितना कुछ बोल पाता है। प्रत्येक शाखा को संबोधन करना, और प्रत्येक शाखा में सञ्चालन करना उसे अच्छे से आता है। उसने कितनी ही बार सञ्चालन की जिम्मेदारी मुझे सौंपनी चाही। लेकिन मैं जब भी कभी बोलता हूँ, मेरे मुँह से निकलते शब्द, मेरे मन में चल रहे विचारों से विपरीत दिशा में जाते दीखते है। बस यहीं मैं फंबल करने लगता हूँ। 


    कईं बार मुझे कहा जाता है, संघगीत का विश्लेषण करके सुनाने के लिए, लेकिन तत्क्षण, मैं अवाक् रह जाता हूँ। मुझे लगता है, मेरे मुँह से कुछ ऐसा निकल जाएगा, जिस पर यह सब हसेंगे.. बड़ा शर्मनाक लगेगा.. जब कोई इस तरह हंसेगा..! लेकिन सच बताऊँ, तो जब संख्या कम होती है, और मैं कुछ बोलता हूँ, तो मैं पाता हूँ, कि मैं फनी स्टाइल में स्टोरी-टेलिंग कर सकता हूँ। अक्सर जब हम यार दोस्त बैठे होते है, और मैं कोई इतिहास की कहानी को सुनाता हूँ, तो वह कुछ यूँ स्टाइल में होती है, कि एक बार क्या हुआ.. उधर से मुहम्मद घोरी ने अपनी स्प्लेंडर को किक मारी, और घररर... घररर... करते हुए दिल्ली आ पहुंचा। इधर पृथ्वीराज ने भी अपनी मूछों को ताव देते हुए, अपनी पल्सर का सेल्फ लगाया.. पुरे मैदान में अपनी वाली साइड के सैनिकों को मार काट डालने के लिए उत्साहित किया.. वो उधर से मामद घोरी आया, लेकिन उसकी स्प्लेंडर के टायर ट्यूब वाले थे सोलह बार पंक्चर हुए.. बेचारा बार बार अब्दुल के पास पंक्चर बनवाने जाता, आखिरकार अब्दुलने सत्रहवीं बार ट्यूबलेस टायर दिया। इस बार मामद घोरी रेस में जीत गया, और दिल्ली पहुँच गया। 


जब इतिहास कहानी बन जाता है

    ऐसी ही एक कहानी कुछ दिन पहले मैं अपने यहाँ वॉलीबॉल की मैच पोस्टपोन होने के कारन ताप सेंकते हुए सुना रहा था, कच्छ में एक जगह है, कंथकोट नामक। बहुत प्राचीन किला है, और ऐतिहासिक धरोहर है। तो कईं बार क्या होता है, नए लड़के के सामने इतिहास परोसना हो, तो उसे अगर थोड़ा सरल और मजाकिया कर दिया जाए, तो उसे सदैव याद रह सकता है। कहानी कुछ यूँ थी, कि कच्छ में जाडेजा राजपूतों का शाशन था। कच्छ का नक्शा आज भी सॅटॅलाइट व्यू में देखा जाए तो यह एक द्वीप है। इस भूभाग के चारोओर पानी हुआ करता था। जब सिंधु नदी ने अपना प्रवाह बदला, तब कच्छ का बड़ा और छोटा रन बहार आए। तो कच्छ राज्य को पूर्वी दिशा से, खासकर सिंध के नगरपारकर दिशा से होते आक्रमण से बचाने के लिए एक किले की आवश्यकता थी, और कन्थकोट नामक जगह पर पहाड़ी पर यह किला उपयुक्त निर्माण हो सकता था। और वहां एक किले का निर्माण हुआ भी। लेकिन अब उसे कहानी के रूप में यदि मैं बताता हूँ, तो कुछ इस तरह.. 


कंथकोट किला और कन्थड़नाथ की कथा

    "यह इधर भचाऊ से आगे कन्थकोट का नाम सुना है? कन्थड़नाथ दादा का मंदिर है? उसकी कहानी पता है? तो एक बार क्या हुआ.. यह जाडेजा लोग तब भी ऐसे ही लड़ाई झगड़ा करते थे। यूँ तो कच्छ से बाहर जाते नहीं थे, लेकिन कोई बाहर का आ गया, तो बहुत कसके मारते थे। अब होता क्या था, कि कन्थकोट से थोड़ा उत्तर पूर्व में आगे बढ़ो, तो वहां से नगरपारकर शुरू हो जाता है। मतलब सिंध.. सिंध से बहुत हमलावर इधर आक्रमण करने आते.. और ये जडेजा उन्हें तबियत से कूट दिया करते। तो एक दिन राजा को हुआ, यह बारबार का टंटा ही ख़त्म करते है, एक किला बना देते है। कन्थकोट बढ़िया जगह लगी उन्हें। लेकिन उस पहाड़ी पर पहले से एक नाथ सम्प्रदाय का साधू अपनी जगह बनाए बैठे थे। 


    साधु भी बापु, जाडेजा भी बापु। साधु को भी बावा कहते है, जाडेजाओं को भी बावा कहते है। तो उधर जाडेजाओं ने स्प्राइट पीकर सीधी बात नो बकवास करते हुए कहा, "बावा, जगह खाली करो, हमको इधर किला बनाना है।" बावा भी जैसा तैसा नहीं था, डेरा जमाए बैठा था, नाथ था, कन्थड़नाथ। उधर बावा जगह देने को तैयार नहीं, इधर जाडेजा जगह लेने के लिए अड़ गए। फिर क्या.. एक दिन जाडेजाओं ने बावा को जगह से हटवाया, किले का निर्माण शुरू कर दिया। उधर बावा (कन्थड़नाथ) ने भी मनोमन निर्धार किया, "अच्छा बच्चू हमसे पन्गा.. देखता हूँ कैसे किला बनाते हो?" दिनभर में किले की दीवार बनती। इधर कन्थड़नाथ भी सुई धागे से कंतान (कापड) बुनते। रात होते ही, कन्थड़नाथ अपना बुना हुआ कपडा वापिस खोल देते, और उधर जितना भी किला बना होता, वह बिखर जाता। 


    हफ्तेभर ऐसा चला, दिनभर किल्ले की चिनाई होती, उधर कन्थड़नाथ भी साथ ही साथ कपडा बुनते। शाम होती, कपडे की बुनाई से वे सारे धागे वापिस खोल लेते, और इधर किले की दीवार भी धागे की तरह खुल जाती। जाडेजा बेचारे अपना सर खुजाते.. आखिरकार उन्हें इस नाथ बावा की करामात लगी। यह दुश्मनों को अपनी आँख से डराने वाले जाडेजा, उस नाथ के चरणों में गिर गए। कन्थड़नाथ से क्षमायाचना की। वह बावा भी आखिरकार मान गया। और किले का निर्माण पूरा होने दिया। आज तो वह किला खँडहर बन चूका है। बस प्रवेशद्वार मौजूद है। और विरो के पालिया खड़े है बस। तो यह थी कहानी कन्थड़नाथ की।"


मातृभाषा में बहते शब्द

    इस तरह कहानी कहने से सुनने वाले को मजा आता है। और मैं भी इतिहास की एक छोटी सी कहानी को इस अलग तरह से बताने से कुछ नया करने का आनंद लेता। पर यह तो अपनी मातृभाषा में, गुजराती में सुनाता हूँ, इस लिए ज्यादा मजेदार लगती है। अभी मैंने यह लिखा हुआ, हिंदी में पढ़ा, तो उतना दमदार नहीं लगता है। हाँ ! वैसे यह बोलने के तरीके, शैली पर भी निर्भर करता है। तो बस, यही था आज का दिन.. यही थी आज की दिलायरी.. अभी शाम हो जाएगी कुछ देर में.. दो लिटिल लिटिल लगाएंगे, और घर जाकर वॉलीबॉल खेल लेंगे.. सो जाएंगे..!


कविता की चींटियाँ और गायब होती स्फुरणा

    अच्छा एक बात और.. आजकल फिर से कुछ कविताएं लिखने की चींटियां काटने लगी है मुझे.. लेकिन जब लिखने बैठता हूँ, तो शब्द और भाव दोनों गायब हो जाते है। मैं उस इवेंट में इस कारण से भी गया था, कि कुछ नविन प्रेरणा भी मिले.. लोग क्या सोच रहे है, क्या लिख रहे है, और किस तरह अपने लिखे को अनुभव कर रहे है। लेकिन सच में मुझे प्रेरणा तो मिली, पर वह जो एक चीज होती है न.. एक भाव.. या एक किक.. वह नहीं मिल रही। लौट आएँगे शब्द किसी दिन, जैसे बिछड़ी प्रेमिका लौट आती है ख्वाबों में..!


    प्रियम्वदा, तुम ही बताओ.. क्या करूँ मैं, जबरजस्ती शब्दों को एक पंक्ति में बिठाऊँ? या फिर कोई स्फुरणा के इंतजार में बैठा रहूं..?

    शुभरात्रि। 

    २९/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर आपको भी बोलते समय शब्द साथ नहीं देते,
अगर आपकी कहानियाँ दोस्तों की हँसी में जीवित रहती हैं—
तो यह दिलायरी आपके लिए ही है।

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!


और भी पढ़ें

न भेजे गए ख़त | Unsent Letters, प्रेम, डर और कैथार्सिस || दिलायरी : 27/12/2025

नीरस होते शौक, बोतल से दूरी और मन का बदलता बहाव || दिलायरी : 26/12/2025

समय था, फिर भी नहीं था | सांता क्लॉस, थोथे और थकान || दिलायरी : 25/12/2025

प्रियम्वदा को लिखी 365वीं दिलायरी: एक वर्ष, शब्दों का संकल्प और प्रेम की स्वीकारोक्ति || दिलायरी : 24/12/2025

प्रियम्वदा को न कहे गए शब्द | एकपक्षीय प्रेम, बंधन और आत्मसंघर्ष || दिलायरी : 23/12/2025


#Dilayari #HindiDiary #UnspokenWords #ListenerVsSpeaker #StorytellingIndia #IndianHistoryInHumor #CreativeBlock #WritingLife #PersonalBlogHindi #EmotionalWriting #BolneKaDar #Kathakaar
 

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)