दो दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात | चाहत और काश || दिलायरी : 30/12/2025

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दो दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात | प्रियम्वदा को लिखा एक अधूरा पत्र


अधूरी चाहत और अँधेरे विचारों में डूबा व्यक्ति, प्रियम्वदा को लिखी दिलायरी का प्रतीकात्मक चित्र

चाहत क्यों हमारे अधिकार में नहीं होती?

    प्रियंवदा !

    दो दिन की चांदनी, फिर अँधेरी रात..! यह दो तीन दिन की दिलायरियाँ अच्छी निकल गयी.. आज फिर अँधेरा छा रहा है। शब्दों का अँधेरा कहूं, या विचारो का.. बस यही असमंजस है। यह सब प्रियम्वदा का कमाल है। कईं बार हमे किसी की सौबत बड़ी रास आने लगती है। क्योंकि नयी सौबतें नयापन ले आती है। हमें अपनी यंत्रवतता से बाहर ले आती है यह सौबत। फिर हम कामना कर लेते है, उस सौबत को और आगे बढ़ाते रहने की, कभी अलग न होने की.. लेकिन हर किसी की अपनी अलग सौबत होती है.. तोते को मैना चाहिए, मैना को मोर.. मोर का तो दिल मांगे मोर..!!


नई सौबत, पुराना मन और यंत्रवत जीवन

    तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, ऐसा क्यों होता होगा.. हमारी अपनी पसंद कभी हमारे अधिकार में क्यों नहीं होती.. मुझे तुम चाहिए, तब भी मैं तुम्हे नहीं पा सकता.. हर किसी की अपनी अलग चाहत है.. ऐसा बहुत कम होता है, जहाँ दो लोग, दोनों ही एक दूसरे को चाहते हो। वरना हर कोई अपने एक हाथ में गुलाबजामुन लिए, रसगुल्ले के पीछे न भाग रहा होता। वर्तुल या अनंत रेखा कहीं ही खत्म नहीं होती। मैं भी, कईं बार इस मनोमंथन से गुजरता हूँ, कि मैंने कुछ और माँगा था, मेरी कामना कुछ और है..!


मदहोशी, कड़वाहट और मन का मरहम

    प्रियम्वदा, अक्सर यह सब कड़वाहट तभी उतर कर सामने आ जाती है, जब मैं मदहोशी में चला जाता हूँ। पिछले कुछ दिनों से प्रतिदिन कड़वाहट का सेवन कर रहा हूँ मैं। मन में कुछ विषाद बस गया है। सोचा यह भी आज़मा के देखूं। मैं अपनी क्षमताएं जानता हूँ। मुझे अच्छे से मेरी सहनशक्तियों की सीमा का ज्ञान है। मैं सतत उस सीमा का विस्तार करता हूँ.. लेकिन उस विस्तारण की प्रक्रिया के बिच ही कुछ विषादों का अतिक्रमण हो जाता है। फिर मैं अपनी अल्पमति से एक यही रास्ता चुनता हूँ.. अपने आप को स्थिर न रखना। कुछ यातनाएं मन पर होती है.. 


काशों से भरी कल्पनाएँ और अधूरा प्रेम

    कुछ देर के लिए भी, भला यह नशा या सुरूर मन को कुछ इस तरह बहलाता है, जैसे पिंजरे से आज़ाद हुआ कोई पंछी..! इस चीज की कोई लाख बुराइयां क्यों कर ले.. हकीकत यही है, कि यह दवाई तो है ही.. मन का मरहम.. मैं जानता हूँ, इसके प्रत्याघात बड़े बुरे होते है। लेकिन मैं यह भी मानता हूँ, कि जबतक मैं इसे अपने नियंत्रण में रख सकता हूँ, मैं उसे अपना हवाला नहीं सौंपता कभी भी। मुझे अपने कुछ प्रश्नों के समाधान नहीं मिलते है.. मेरा वह असंतोष, मुझे इसके करीब ले जाता है। हर कोई कुछ ऐसे ही कारणों से इसके करीब जाता है। अपने मन के समाधान के लिए। 


विश्वास, अधीनता और तुलना का द्वंद्व

    मुझे तुम से भी शिकायत है प्रियम्वदा ! मेरी परिकल्पनाओं से तुम कभी वास्तविकता में मुझे क्यों नहीं मिली..? कितना सही होता, तुम और मैं किसी किताबी पन्ने पर एक साथ होतें। किसी उपन्यास के पात्रों के विषय में एकसाथ हँसते, एक साथ गंभीर होते, एक साथ भावुक होते। मैं और तुम, अगर साथ होते, मैं तुम पर ही निर्भर होता, तुम्हारे पाश में होता, तुम्हारे बंधनों में होता, तुम्हारे आलिंगन में रहता। सदैव। लेकिन यह केवल काश है.. नीरा काश.. मुझे लेकिन तुम से कभी शिकायत का बहाना न रहता। न ही कभी यह पत्र अस्तित्व में उतरते। 


    अगर यह पन्ने उस प्रसंग के प्रत्यक्ष होतें, तो इन पन्नों पर प्रेम की व्याख्या कुछ और होती। फिर कभी प्रेम की तुलना पीड़ा से न होती। फिर कभी प्रेम को मैं यूँ बेआबरू न करता, फिर कभी प्रेम का धुरविरोधी न होता मैं। मेरी कलम, तुम्हारी आँखों के काजल से लिखती, वे गीत, जो हमेशा मैं गुनगुनाया करता। तुम्हारी गोद में सर रखकर किसी किताब के पन्ने पलटते हुए ही शायद मुझे नींद आ जाती। वह दिनभर की भागदौड़, वह समय के साथ संघर्ष, वह अशांति और क्रोध का एक उपचार होता, तुम्हारा हाथ का मेरे माथे पर फिरना। लेकिन यह भी एक काश है.. कितना अलग होता सब कुछ ही.. मैं स्वयं से घर जल्दी पहुँच जाया करता, तुम्हारे हुक्मों को तामील करता।


अगले जन्म के भरोसे छोड़े गए प्रश्न

    प्रियम्वदा ! इन काशों का काश कोई इलाज होता। तुम मेरे ख्वाबों में यूँ न होती, और मेरी कलम में एक कसक न रहती। नहीं, मैं इस पीड़ा से त्रस्त नहीं हुआ हूँ अभी तक। मैं अपने ऊपर लदे बोझ से शिवालिक के शिखर सर कर सकता हूँ। यह तो आज यूँही अपने भीतर उठती, तुम्हारी किसी और के साथ की तुलना का पन्ना है। मैं तुम्हारे अधीन हो जाता, किसी और के भी अधीन हूँ। तुम्हारी अधीनता में मुझे एक विश्वास होता, बेख़ौफ़ विश्वास। विश्वास में भी कितने स्तर होतें है.. हम एक जैसा विश्वास किसी पर भी नहीं करते है। सबके विश्वास की एक सीमा होती है। 


    मैं सोचता हूँ, आज यह सुरूर मेरे शब्दों को बहुत अलग दिशा में खिंच ले गया है। वह कुछ देर का नशा, मेरी नज़रों में कमाल ही कर गया। हाँ! कुछ अलग और काशों भरी बातें है, लेकिन है तो सच। मन हमेशा एक तुलना तो करता है, तुम्हारे साथ। हमें हमेशा हमारे पास जो नहीं है, वही ज्यादा खलता है। जो होता है, उससे अधिक, और अधिक की यह लालसा कहीं भी जाकर रूकती नहीं.. सिवा तुम्हारे। सच में मेरी तलाश तो तुम पर आकर रूकती है। तुम्हारे लिए मैं अनुभवता हूँ, कि मैं वाकई अपनापन त्याग सकता हूँ। मैं अपनी रूढ़िवादिता से विमुख हो सकता हूँ। लेकिन यह कहाँ सच होने वाला है। शायद अगले जन्म.. 


दिनचर्या, मंदिर, ऑफिस और भीतर का अँधेरा

    जब हमारे पास किसी आशंका का समाधान नहीं होता है, तो हम उसे ऐसे ही किसी जन्मों के मत्थे मढ़ सकते है। यह भी हमारे लिए एक सहूलियत है। यूँ तो आज का दिन काफी आसान रहा है। दिनभर में कोई भी ऐसा काण्ड नहीं हुआ है। सवेरे की शुरुआत ही मंदिरो से हुई थी। पहले शिवमंदिर फिर जगन्नाथ। फिर ऑफिस। आज काम भी कुछ खास नहीं था। बस रील देखी है, और कुछ कविता जैसा कुछ लिखा था, उसे ही इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया। बहुत दिनों बाद इंस्टाग्राम पर कुछ पोस्ट किया है, अल्गोरिदम मेरे विरुद्ध ही चलता पाता हूँ। 


    दोपहर तक मन उदास सा होने लगा था। रम में कुछ घूंट बाकी थे, ख़त्म कर दिए, दिन में ही। लंच करके यह लिखने तो बैठा था, लेकिन बार बार ऑफिस के अन्य काम आते रहते, और यह एक पन्ना, दिनभर के कितने ही अलग अलग घंटों में लिखा गया। फ़िलहाल शाम के सात बज रहे है। बाहर घना अँधेरा है। प्रियम्वदा, चाहत की किरण इस घने अँधेरे को भेद सकती होगी? या वह भी कहीं विलुप्त हो जाती होगी, दिशाहीन होकर.. जैसे रेगिस्तान में दिशाओं की मिलावट हो जाती है। हवाओं का घनत्व रेत को उड़ाकर भर देता है, आँखों को.. जहाँ ख्वाब बस्ते होंगे, किसी प्रेमिका के.. अधूरे ख्वाब। 


    मेरी शिकायत है प्रियम्वदा, तुम्हे इस क़दर मुझे सजा देने का हक़ क्यों मिला?

    शुभरात्रि।

    ३०/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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