Unsent Letters और अधूरा साहस | एक ऑनलाइन ई-मुशायरे की आत्मकथा || दिलायरी : 28/12/2025

0

प्रियम्वदा के नाम एक पत्र, जो कभी भेजा नहीं गया

    प्रियम्वदा,

    सिर्फ तुम्हे संबोधित करने ही मैंने यह फोन फिर से चार्ज किया है। मैं चाहता था कि अभी जो मेरे मन में है, वह कल सुबह दोबारा नहीं आ पाएगा। अभी अभी एक ज़ूम कॉल पर हुई ई-सभा में सहभागी होकर लौटा हूँ। अच्छा यह बात गजा पढ़ लेगा तो बुरा मान जाएगा, क्योंकि उसके कितने ही ऐसे आमंत्रण को मैंने धृष्टतापूर्वक मना किया है।


Mature adult man listening quietly to an online mushaira with unsent letters theme cartoon illustration

इंकसंघ का Unsent Letters ई-मुशायरा

    शुरू से शुरू करता हूँ। दरअसल इंकसंघ नामक इंस्टाग्राम पेज ने एक ऑनलाइन इवेंट होस्ट किया था। पेड इवेंट था, और ई-मुशायरा प्रकार का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम का विषय था, unsent letters.. जो पत्र कभी भेजे नहीं गए। या फिर कोई भी पत्र जिसमे किसी को संबोधित कर अपनी भावना जताई गई हो। जैसे कि यह मैं तुम्हे लिखता हूँ। कुछ कुछ ऐसा ही। दो दिन पूर्व ही आयोजन की घोषणा हुई थी। और आज सवेरे एक व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया गया, और वहां इस ई सभा की लिंक दी गयी। रुको रुको ऐसे मजा नहीं आएगा। मैं दिन के प्रारंभ से आरंभ करता हूँ।


आलस, रविवार और सुबह के समोसे

    तो बात ऐसी है प्रियम्वदा जी, कि अपन के मूल स्वभाव में आलस सबसे ज्यादा निर्माण हुई है। जहां तक जरूरत नहीं होती, मैं करवट तक नहीं बदलता। तो बस इसी बात पर मैं आज आराम से आठ बजे इसी कारणवश उठा था, कि रविवार का दिन है, और क्या पता हुकुम फाफड़ा जलेबी ले आए हो। लेकिन भाग्य भी तो आलसी हो गया है, फाफड़ा के बदले सुबह सुबह समोसे प्रकट हुए मेरे सामने.. अब तेल से सने समोसे देखकर अपनी तोंद ने खुला विरोध किया, लेकिन फिर भी दो समोसे किसी घूंस की तरह दबा भी लिए। पेटपूजा के बाद ईश्वर ही याद आती है, बड़े बड़े कवियों ने कहा है, भूखे पेट भजन नही होते। तो जगन्नाथ भी अपनी बड़ी बड़ी आंखों से, मुझे आता देख सुभद्राजी से जरूर कहा होगा, "देख बहना, स्वार्थी मोटा आ पहुंचा, अभी अपने कपाल पर हमेशा की तरह तिलक करेगा, हाथ जोड़ेगा, मांगेगा कुछ नहीं, प्रदक्षिणा करेगा और चल देगा।"


    उसके बाद पहुंचा दुकान पर, एक सिगरेट और एक मावा को मुखारपन कर ऑफिस के लिए निकल पड़ा। वाछटीया(मेरी मोटरसायकल) एक्सीडेंट के बाद पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है। तो तिरछी शक्ल का वह वाहन मुझे ऑफिस के लिए ले तो जाता है, लेकिन आज भी मंत्री जी मेहरबानी से मिले ट्रैफिक जैम से वह भी कुछ मायूस लगा। ऑफिस पहुंचकर सबसे पहले तो बीते कल की दिलायरी शेयर की। परमसनेही का सुप्रतिभाव मिला। और मैं तो हूँ ही फुलनसी.. जरा सी तारीफ क्या की किसीने, सातवे आसमान में उड़ने लगता हूँ। आयज वैसे सातवे आसमान से जल्दी लौट आया, क्योंकि रविवारीय नौकरी भी मुझे ही करनी होती है। मजदूरों को उनके हक की कीमत अदा करते-करते दोपहर के तीन बजे गए। तुम्हे तो पता है प्रियम्वदा, मैं तो अपने पलटूरामजी से भी बड़ा दलबदलू हूँ। दो दिन पहले ही मैंने सुरापान से जुड़ी कुछ बातें लिखी थी। 


    लेकिन कल भाग्य ने कुछ यूं करवट ली, कि कौए को पतासा मिला। अरे मैं अपने आपको कुछ ज्यादा आत्महीनतापूर्ण रूपक नहीं दे रहा हूँ? मैं हूँ भी इसी लायक। कल रात क्या हुआ था कि सरदार को क्या सूझी, कि सारे स्टाफ को राजी करना चाहिए, सबको अद्धा बांटा गया। हाँ अद्धे का अर्थ एक ही होता है। पाबंदी है, पर मिलता सब कुछ ही है, बस सरे आम नहीं। तो सारे स्टाफ के लिए व्हिस्की मंगवाई गयी। मुझे व्हिस्की से ज्यादा बियर प्रिय है। लेकिन 31 दिसंबर नजदीक है, बियर कहीं मिल नही पाई। तो मैंने सदाबहार ओल्ड मोंक ही मंगाई। नसीब से मिल भी गयी। कल थोड़ा सा सेवन किया था, और सोचा था, आज दोपहर को काम आएगी। और हुआ भी.. तीन बजे फ्री हो गए हम। बहादुर के रूम के बैठकी लगाई। ठंडे दिनों में रम की गर्मी शरीर को एक अलग ही हूंफ देती है। बैठकी के मेरे अपने नियम है, और मैं इस मामले में अपने मन को नियंत्रित करना अच्छे से सीख चुका हूँ। दो ग्लास का सेवन कर घर पहुंचा। चार बजे क्या ही भोजन? फिर भी मोटे शरीर को टिकाए रखने के लिए थोड़ा सा भोजन लिया। और चल पड़ा नाई के पास।


    घर से खाना खाकर तुरंत निकलने के पीछे मुख्य कारण था, हुकुम की घर मे मौजूदगी। मैं वैसे ही उनकी आंख में आंख नही मिलाता, तो आज तो मैं काम भी अपने स्वार्थ का कर के आया था। नाई ने सीट पर मुझे बिठाकर कुतरना चालू किया, और अपनी जिह्वा से कुतरना भी। और आज भी संयोगवश वह भूतपूर्व सरपंच मेरी बगल वाली सीट पर आरूढ़ हुआ था। वही सरपंच जिसे एक दिन मैंने इसी नाई के दुकान में कह दिया था, कि पिछला सरपंच रोड कहा गया था, आप तो सारी गटरें..!!! खेर, मैंने आज अपने पर नियंत्रण रखते हुए आंखे बंद करके बस नाई की कैंची की आवाज़ पर ही ध्यान केंद्रित किया। आधे घण्टे में उसने अपनी कारीगरी को पूर्णाहुति देते हुए मुंह पर मेरे धुर-विरोधी टेलकम पाउडर को चुपड़ दिया, जिसे मैंने तुरंत रुमाल से पोंछ लिया। खेर, साढ़े पांच बजे रहे थे, घर आया, कपड़े चेंज किए, चाय पी, और अब मुझे एकांतपूर्ण जगह चाहिए थी, जहां मुझे कोई डिस्टर्ब न करे। 


पहली ऑनलाइन साहित्य सभा का डर और उत्सुकता

    जगन्नाथ के अलावा मुझे कौन सहारा दे भला? छह बज रहे थे, मैं अपनी पोस्ट में कुछ तलाश रहा था, कि अगर नौबत आन पड़ी, और कम्पलसरी कुछ बोलना पड़ गया, तो कहीं ब्लेंक न हो जाऊं मैं..! इंकसंघ के इस आयोजन के व्हाट्सएप ग्रुप में ठीक सात बजे कार्यक्रम की लिंक आनी थी। अच्छा अब मेरी नजरों से कार्यक्रम की अवधारणा..! मैंने बस ओपन mic वाले कार्यक्रमों की रील्स देखी है। कभी ऐसे कार्यक्रमों में सहभागी नहीं हुआ हूँ, न ही ऑडिएंस भी बना हूँ। यह पहला ही कार्यक्रम था, जिसे मैने बस इसी आशंका के समाधान हेतु पसंद किया, कि आखिरकार यह मसला क्या है। ठीक सात बजे यह कार्यक्रम शुरू होना था, और आयोजन के मुताबिक एक घण्टे दस मिनिट का कार्यक्रम होगा यही मैंने समझा था। लेकिन मैं भूल कर गया, भूल गया कि यह कवि और लेखकों की सभा है, कवि बदनाम होते है, एक ही पंक्ति को दो बार सुनाने के लिए।


    सात बजे रहे थे, भगवान जगन्नाथ की आरती हो चुकी थी, झालर शांत हो चुकी थी, घंटारव भी भगवान के विश्राम के हेतु मौन होने लगे थे। अंधेरा हो चुका था, लेकिन मानवीय प्रकाश ने हर जगह अंधेरे को नहीं पहुंचने दिया था। मैं एक पोस्ट सेलेक्ट कर चुका था, बस यही सोचकर, कि कोई बहुत ज्यादा दबाव बनाएगा, तो मै भी बेशर्म होकर बक दूंगा..! उतने में ग्रुप की घण्टी बजी। लिंक आयी थी। लिंक पर क्लिक किया तो पहले बफर हुआ, व्हाट्सअप से जम्प करके गूगल क्रोम खुला, वहां से रेडिरेक्ट होकर प्लेस्टोर में मुझे फेंका गया। फोन कह रहा था, पहले गूगल मीट को तो अपडेट कर.. मेरा फोन भी मेरी तरह आलसी है, जबतक जरूरत न पड़े, एप्प्स को अपडेट नहीं रखता। (ऑटो अपडेट मैं जानबूझकर ऑफ रखता हूँ।) यह जगन्नाथ की कृपा थी, फोन का इंटरनेट भी तगड़ा चल रहा था, की महज दस सेकंड के भीतर ही एप अपडेट भी हो गया, और लिंक ने भी काम कर दिया। 


कैमरा, माइक और आत्मसंकोच

    मैं थोड़ा सा पढा-लिखा गंवार भी हूँ। तकनीकी क्षेत्र में थोड़ा कम अपडेट होता हूँ। अब यह एप चलती कैसे है, वह अपने को नहीं मालूम। यहां-वहां धड़ाधड़ क्लिक्स करने के बाद भी जब लिंक काम करती मालूम न हुई, तो मैंने उसी व्हाट्सएप्प ग्रुप में मेसेज छोड़ दिया, कि लिंक काम नहीं कर रही। मेरे अगुवाई लेते ही, मेरे जैसे कुछ और आलसी भी मेरी क़वेरी में सम्मिलित हो गए। आयोजकों के कोई रिप्लाई आए उससे पहले मैंने फिर से लिंक पर क्लिक्स की बौछार चला दी.. आखिरकार लिंक ने अपना अभिमान त्यागा, और मेरे लिए उस सभा का द्वार खुल गया। आयोजक लोग हम जैसों के इन्तेजार में बैठे मालूम हुए.. कुछ देर में इस कार्यक्रम की रूपरेखा और भूमिका बताई गई। कार्यक्रम का विषय तो मैंने उपर बता दिया था, पत्र.. जो कभी भेजे नहीं गए। कार्यक्रम की शुरुआत हुई परिचय से। प्रत्येक सहभागी को अपना परिचय बताना था। 


    तुम्हे तो पता है प्रियम्वदा, मैं कैसे थरथर कांपता हूँ, अनजान लोगों से बातचीत करने में। वह भी अगर स्त्रियों का समूह है, तब तो मेरी आत्मा भी भूल जाती है, कि मैं क्षत्रिय हूँ। शर्म या एक पर्दा सदैव से रहा है समाज मे। और मैं उस पर्दे को लांघ नहीं सकता। मेरी स्क्रीन पर सामने सात स्त्रियां.. पुरुष मैं अकेला..! बुरा फंसा..! न तो कहीं पर वीडियो ऑफ करने का बटन मिल रहा था, ना ही डिसकनेक्ट कर पा रहा था। स्वाइप अप किया तो पता चला, कुछ और नर भी उपस्थित थे। मेरी आत्मा पुनः मेरे शरीर मे लौट आयी। सामने दिख रही स्क्रीन में मैंने तमाम फंक्शन को आजमाने की फिराक में था, कि आयोजको में से एक प्रियांशीजी ने मेरा नाम परिचय देने के लिए पुकार लिया। अचानक से बोले गए मेरे नाम से हड़बड़ा गया, और मैं अपने असली नाम से प्रकट हो गया। तुरंत मैंने अपना उपनाम दिलावरसिंह बोलते हुए बात को मोड़कर, ऑडियंस हूँ, और बोलना नही आता कहकर परिचय पूरा किया। हमेशा से ऐसा ही होता है, मैं अक्सर हड़बड़ाहट कर बैठता हूँ।


    खेर, परिचयविधि के पश्चात लोगों ने अपने पत्र सुनाने शुरू किए। आधा घंटा बस यह परिचय में ही निकल गया था। पौने आठ बज रहे थे, एक तो यहां कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ है, और घर से खाना खाने के लिए फोन आ जाएगा, यह शंका बारबार उठने लगी। एक एक कर पत्र शुरू हुए। काफी रसप्रद थे, मुझसे यह सारे लोग काफी छोटे रहे होंगे उम्र में, लेकिन साहित्यसेवा में कतई छोटे नहीं है। मैं फिर से नाम भूल गया, इंस्टाग्राम पर वह छोटी सी लड़की है, "हाँ तो एक कविता है वाली.." उसकी उम्र के मुकाबले उसकी कविताएं बहुत आगे है.. और पठन की शैली भी..! उनकी बारी आई, मैं गौर से सुनने लगा था, और तभी फोन की घण्टी बज उठी.. हुकुम के फोन को तो मैं बेहोशी में भी इग्नोर नहीं कर सकता, यह तो एक साहित्य का कार्यक्रम था। हुकुम का सख्त आदेश था, "खाना गर्म हो तब तक खा लेना चाहिए, बासी रोटी जानवर के हिस्से होती है।" हुकुम और उनके शब्दतीर मुझे हमेशा घायल करते है।


नदी किनारे बैठा एक श्रोता

    मैंने कान में ब्लूटूथ लगाए, जगन्नाथ को शीश झुकाकर निकल पड़ा। ई कार्यक्रम को फोन में मिनिमाइज किया, कान में पत्रों के पठन को सुनते हुए, गले से बाजरे की रोटी का निवाला भी उतरता रहा। जितना हो सकें उतना जल्द भोजनादि से निवृत होकर घर से निकलना चाह रहा था, क्योंकि मन मे एक भय यह भी था, कि कहीं इस एप में अपने आप mic चालू न हो जाए.. वरना सारी ई सभा पत्र को दरकिनार रखकर गुजराती संवादों को सुनने लगेगी.. जहां हुकुम मुझ पर कसे जाते व्यंग्यों की वर्षा कर रहे होतें हैं। खेर, मैं घर से पुनः एक बार निकला, तब तक भी mic तो ऑफ ही था। यह एक बड़ी संतोषपूर्ण घटना थी मेरे लिए। पहले सोचा ग्राउंड में जाकर बैठता हूँ, शांति भी होगी, और नेटवर्क का भी इशू न होगा वहां। लेकिन वहां अंधेरा घुप्प था, और मैंने अपना वीडियो ऑन किया तो सिवा काला पुरुष काले अंधेरे में घुला हुआ लगा। वहां से निकला, सोचा एक और पुरानी जगह है, जहां शांति भी होगी, उजियारा भी होगा। नदी के किनारे.. कोई नया व्यक्ति पढ़ रहा होगा तो उसके लिए, यह नदी कभी नदी हुआ करती थी, आज तो यह आधुनिकता की भेंट चढ़ गई है। विकास का नाला बन चुकी है, बस दुर्गंध नही मारती इसी कारण इसे नदी कहता हूँ। तो किनारे पर एक मंदिर है, और उस मंदिर की लाइट्स रातभर चालू रहती है, तो यहां मैं वीडियो ऑन भी कर सकता था। 


प्रेम की परिभाषाएँ और चुप्पी का चयन

    हाँ अब तक मुझ में अपना वीडियो ऑन रखने जितना साहस आ चुका था। सारे पत्र पढ़ लिए गए थे, मुझे उनमे से दो तीन बहुत पसंद भी आए, एक तो वही कविता वाली लड़की, मुझे अभी तक उनका नाम याद नहीं आया। वैसे किसी कवि की रचना, या उसकी शैली की प्रसिद्धि ही उस कवि की पहचान होती है। उसके बाद एक और पुरुष ने की हुई अभिव्यक्ति। माफ करना, उनका नाम भी मैं भूल रहा हूँ। एक शिखा या साक्षी नाम से थे, उन्होंने भी अच्छा वर्णन किया था। धीरे धीरे समापन की ओर बढ़ते हुए, बात आ पहुंची थी प्रेम की परिभाषा पर। प्रियांशीजी ने प्रेम को परिभाषित करते हुए समर्पण कहा। मैं अब इस प्रेम की परिभाषा पर कुछ नही कहूंगा.. क्योंकि अब मैं प्रेम को उन प्रत्येक स्वरूप में स्वीकारने की कोशिश कसरत हूँ, जहां से यह मुझसे बस टकरा जाए एक बार.. फिर तो मैं हूँ और यह प्रेम है..! अरे अरे मैं तो अपनी खुन्नस पर आ पहुंचा।


    नदी किनारे, मुझे अपने फोन में घुसा हुआ देख, एक बुझुर्ग ने मेरी ओर देखा, और फिर ठंड से लड़ने हेतु अपने अग्नि प्रज्वलन प्रोग्राम में प्रवृत्त हुए। मैं ऑडियो वीडियो ऑफ करते हुए शांति से सबको सुनता हुआ, इस वृद्ध की चेष्टा भी देखते जा रहा था। वे आग को जलाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अग्नि भी जैसे आलसी हुई थी। वे बेचारे कहीं से एक सूखी झाड़ी लाए, और गोबर के सूखे उपले पर उसे जलाने की कोशिश करते, लेकिन अग्नि थी, कि बस अंगारों से आगे बढ़ ही नही रही थी। अंगारों को तो एक फूंक की जरूरत होती है बस। उन्होंने अपनई बीड़ी तीसरी बार जलाई, और तीसरी ही बार माचिस की तीली विफल रही इस अग्नि को जलाने में। मैंने उन अंगारों पर एक फूंक मारी, और झाड़ी जलने लगी। इधर कार्यक्रम में बस ऑडिएंस को नींद से उठा रहे थे वे लोग, कि तुम भी कुछ बोल लो.. क्या ढाई घण्टे से ऑडियो वीडियो ऑफ किए अजगर की माफिक पड़े हो.. लेकिन मेरी मोटी चमड़ी पर तब भी जू नहीं रेंगी। 


तीन घंटे का साहित्य और समय की फिसलन

    उतने में एक वॉलीबॉल प्लेयर ने मुझे यहां देख लिया। बड़ा बातूनी आदमी है, और मैं उसे देखकर बूत ही बन गया, कि कहीं यह अपनी न शुरू कर दे, वरना एक साथ दो महफिलों का लुत्फ उठाने की अभी मेरी काबिलियत कहाँ? तो उन्हें बड़ा कड़क बहाना चिपकाया, कि हेड ऑफिस से फोन है, टाइम लगेगा। लेकिन तब तक वे मुझे गरबीचौक ले जाने के लिए मना चुके थे। तो उनकी बाइक पर मैं गरबीचौक पहुंच आया। यहां गरबीचौक में नेटवर्क का थोड़ा प्रॉब्लम है। पंछियों का चबूतरा बना हुआ है। मैं सीढ़ियों से उसके ऊपर तक चला गया। पहले माले पर बैठकर मैंने अपनी फीस वसूलने के चक्कर मे शुभरात्रि सुन लेने तक सभा का त्याग न किया था। गुजराती आदमी हूँ न.. रुपिया वसूले बिना खाना नहीं पचता। मजाक। यहाँ चबूतरे के उपर चढ़ा तब बात हो रही थी भाषा की, हिंदी की। उतने में मुझे कुछ देर पहले मिले कुछ सुनाने की फरमाइश पर अपनी वह हिंदी वाली पोस्ट (यह थी वह पोस्ट) सुना देने का द्विमती द्वंद्व उठा.. दिल कह रहा था, सुना दिया जाए.. लेकिन दिमाग कह रहा था, कि अपने को पठन करने का कोई अनुभव नहीं है.. बोलने कुछ और जाओगे, और मुंह से कुछ और निकलेगा.. खामखा जगहँसाई होगी..! दिल कह रहा था, अब बचे की कितने है, लेकिन दिमाग कह रहा था, कि रहने दे, फिर कभी..! और बस यह फिर कभी वाली आलस को मैंने आत्मसात कर लिया।


    साठ मिनिट का यह निर्धारित कार्यक्रम दस बजे तक भी खत्म नहीं हुआ था। ब्लूटूथ ने तो कबके प्राण त्याग दिए थे, कुछ और देर तक यह कार्यक्रम चलता, तो मैं अपनी दी गयी राशि वसूलने के चक्कर मे फोन की चेतना को भी गंवा बैठता। लेकिन आखिरकार, तीन घण्टे के इस साहित्य समंदर का भी एक किनारा आया.. किसी ने गीत गाया, किसी ने बांसुरी पर धुन सुनाई, और किसी ने बहुत ज्यादा बोला भी। किसी ने बहुत अच्छा पत्र सुनाया, किसी ने सुंदर कविता। किसी ने परिभाषा बताई, विचार रजु किए। सबने सबकी बात पसंद की, सब ने सबकी तारीफें की। संक्षेप में कहूँ, तो यह कार्यक्रम बहुत ज्यादा सुंदर, सरल और सहज रहा। न विशेष तामझाम, न विशेष आयोजन। बस एक मंच, एक पठन, और श्रोता की सहनशक्ति.. अरे मजाक.. श्रोता भी सारे सही थे। क्योंकि हर कोई धिरजता से हर किसी को सुनने के लिए तत्पर था।


    कार्यक्रम की तारीफें की है, तो थोड़ी सी गलतियां भी बतानी चाहिए। समय की पाबंदी नहीं थी। साठ सत्तर मिनिट का कार्यक्रम तीन घण्टे चलता है, मतलब अच्छा रहा है, लेकिन एक समय मर्यादा का बंधन अनिवार्य होता है किसी भी आयोजन के लिए। दूसरी बात, ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कोई आयोजन होतें है, तो उस कार्यक्रम में सम्मिलित सभी सहभागियों को कुछ सविशेष ध्यान रखना पड़ता है। जैसे कि किसी के घर मे कूटे जा रहे मसालें की आवाज मैं सुन पा रहा था। कोई नरपुंगव अपना mic बंद करना भूल गया, और पुरुषसहज भाव से अपशब्द उच्चारित कर गया।कईं बार ऐसे आयोजनों की पूर्वतैयारियाँ होती है, लेकिन यह पहली बार आयोजित कार्यक्रम था, इस कारण यह सब गलतियां नज़रअंदाज़ की जा सकती हैं। लेकिन समय का सविशेष ध्यान रखना चाहिए। एक मुझे इस संस्था का प्रचार भी ठीक नहीं लगा। मेरा मतलब है, कि प्रचार तो होना ही चाहिए, जब कोई आयोजक किसी कार्यक्रम का आयोजन करता है, तो उसे प्रचार करना अनिवार्य है, लेकिन इस पेज या संस्था का उद्देश्य मेरे दृष्टिकोण में सबल नहीं लगा मुझे। यह मेरा निजी मत है। संस्था या पेज के कार्यों को मैं अनुचित या अनुपयोगी नहीं कह रहा हूँ मैं। प्रारंभिक चरण में है यह पेज इस कारण से मैं ऐसा अनुभवता हूँ, यह भी संभावना है।


जो कहा नहीं गया, वही दिलायरी बन गया

    रात्रि के साढ़े बारह बज रहे है। मैं अगर उस द्विधा में न फंसता, कि मैं भी पठन करूँ या नहीं.. तो यह दिलायरी कि बातें कुछ और ही हो जाती.. है न प्रियम्वदा..! अक्सर हम कुछ बातों का समय बीत जाने के बाद अफसोस प्रकट करते ही है। तो मैंने भी अपने मनोभाव तुम्हे जाहिर कर दिए। वैसे मैं नहीं कर सकता पठन। कभी अकेले में भी जब ट्राय किया है, तब भी आत्मविश्वास मुझे स्वयं को यकीन नहीं दिला पाया है, कि वह मेरे साथ है..!


    शुभरात्रि।

    २८/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा पत्र है,
जो लिखा गया… मगर भेजा नहीं गया—
तो इस दिलायरी को पढ़िए,
और चाहें तो टिप्पणी में अपने unsent words छोड़ जाइए।
कभी-कभी न कहे गए शब्द भी सुन लिए जाना चाहते हैं।

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें

न भेजे गए ख़त | Unsent Letters, प्रेम, डर और कैथार्सिस || दिलायरी : 27/12/2025

नीरस होते शौक, बोतल से दूरी और मन का बदलता बहाव || दिलायरी : 26/12/2025

समय था, फिर भी नहीं था | सांता क्लॉस, थोथे और थकान || दिलायरी : 25/12/2025

प्रियम्वदा को लिखी 365वीं दिलायरी: एक वर्ष, शब्दों का संकल्प और प्रेम की स्वीकारोक्ति || दिलायरी : 24/12/2025

प्रियम्वदा को न कहे गए शब्द | एकपक्षीय प्रेम, बंधन और आत्मसंघर्ष || दिलायरी : 23/12/2025


#Dilayari #UnsentLetters #OnlineMushaira #HindiBlog #Priyamvada #UnsentWords #HindiLiterature #PersonalDiary #EmotionalWriting #IndianWriter #HindiPoetry #LetterNeverSent 

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)