डार्क हॉर्स उपन्यास समीक्षा : UPSC, संघर्ष और भीतर की जिजीविषा की कहानी

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डार्क हॉर्स : UPSC की तैयारी और भीतर की जिजीविषा की कहानी


Dark Horse upanyas prerit cartoon illustration showing inner struggle, UPSC aspirant mindset, resilience and hope in Hindi literature context

हमारे भीतर बैठा डार्क हॉर्स

    प्रियम्वदा !

    "हम सबके अंदर एक डार्क हॉर्स बैठा है। जरुरत है उसे दौड़ाए रखने की जिजीविषा की।" यह पंक्ति में कितना ज्यादा आशावादिता है। अपने भीतर की सक्षमता, जागरूकता, और जिजीविषा। लेकिन हम जब तक आवश्यकता, या फिर मजबूरी न बन जाए, हम जागरूक नहीं होते। जहाँ तक चलता है, जहाँ तक घसीटा जा सकता है, हम जल्दबाजी नहीं दिखाते। अनिवार्यता आने पर ही कुछ काम पुरे होते है, अन्यथा वे टाले जाते है। और कभी कभी कुछ कामों को हम इस लिए भी प्राथमिकता दे देतें है, कि हमे कुछ कर गुजरना होता है, चाहे भाग्य से क्यों न लड़ना पड़ जाए। भाग्य से लड़ सके, और जीत गए, तब भी दोष या गुण दोनों ही भाग्य के हिस्से होते है। 


एस्पिरेंट्स सीरीज़ और डार्क हॉर्स का साम्य

    तुमने वह यूट्यूब पर आई 'एस्पिरेंट्स' सीरीज़ देखि थी। वही मेरे मन में चलने लगी थी, जब मैं यह "डार्क हॉर्स" नामक उपन्यास पढ़ रहा था। ज्यादा लम्बा-चौड़ा कथानक नहीं है। लेकिन एक बैठकी में लम्बी सैर कराने के क़ाबिल है। मैं तो एक बैठकी में नहीं पढ़ पाया, क्योंकि मुझे नौकरी भी करनी होती है। लेकिन मैं मानता हूँ, कि कोई यह कहानी पढ़े तो उसे बिच में से छोड़ने का मन नहीं करेगा। बिलकुल सरल, सहज और आम भाषा। न कोई साहित्यिक रूपक, न ज्यादा अलंकारों का तामझाम। बस लड़को की बोली। 


लड़कों की बोली और भाषा की सच्चाई

    हाँ प्रियम्वदा ! लड़कों के पास अपनी अलग बोली भी होती है। वह बोली, जो वे आपस में बैठकर बतियाते है। जहाँ शब्द तो होते है, लेकिन उन शब्दों में कितने ही तरह के भाव की संभावनाएं होती है। कुछ वे शब्द भी इस बोली के आभूषण है, जिन्हे आम बातचीतों में कुचल दिया जाता है। अपशब्द। मैं पहले तो चौंक गया था। यह कैसा उपन्यास है भाई, इसमें सरे आम गाली लिखी हुई है.. लेकिन फिर मुझे पुस्तक के प्रारम्भ में लिखी भूमिका का तात्पर्य समझ आया, जहाँ लिखा था, "मैंने अपने पात्रो को उनकी स्वाभाविक भाषा बोलने दी। मैंने उन्हें जरा भी आँख नहीं दिखाई, और उनके कहे पर गर्दन गाँथ कलम चलाता रहा.."


    इंस्टाग्राम पर ही नीलोत्पल मृणाल का नाम पढ़ा था मैंने। किसी कमेंट सेक्शन में। सोचा आजमा लिया जाए। दैनिक दिलायरी लिखने से विराम जो लिया है, तो उसका सदुपयोग पठन में हो, उससे विशेष क्या हो सकता था। सो मैंने यूँही इंटरनेट खंगालते हुए "डार्क हॉर्स" उपन्यास की पीडीऍफ़ प्रति खोज निकाली। वैसे तो तीन-चार दिनों से नौकरी, घर परिवार, और कुछ मानसिक आघातों को झेलते हुए, जब भी समय मिलता, यह उपन्यास खोलकर बैठ जाता। हाँ ! यह ब्लॉग भी तो चलाते रहना जरुरी है। तो बिच में १० बेस्ट बुक की हिंदी एवं गुजराती सूची तैयार करके पोस्ट कर दी थी। आज काफी दिनों बाद फिर से इस कोरे कागज़ के सामने प्रस्तुत हुआ हूँ। 


मुखर्जीनगर : कोचिंग, चाय की टपरी और सपने

    डार्क हॉर्स की कहानी कुछ यूँ है, कि बिहार से एक लड़का दिल्ली UPSC की तयारी करने दिल्ली आता है। दिल्ली में मुखर्जीनगर नामक जगह पर सारे UPSC के लिए आए हुए विद्यार्थी तयारी कर रहे होते है। वहां वह संतोष नामक कहानी का नायक कई लोगो से मित्रता करता है, पहचान बनाता है। और उसके उस आईएएस बनने के सफर के दौरान वह कितने ही संघर्षों से लड़ता है। डटकर मुकाबला करता है। उसके साथीदार धीरे धीरे कर हार मानकर लौट जाते है। कुछ भाग्य को कोसते है, कुछ संघर्षो को। उस नगर का भी क्या मस्त वर्णन किया है, कोचिंग क्लासेज से लेकर चाय की टपरी तक। परीक्षाएं आती है, तो जैसे उस नगर की हवाओं में फैक्ट्स तैरते है। इस तरह के कईं वाक्य है, जो इस कहानी में दिलचस्पी लेने को सावधान करते है। 


हार, जीत और जबरन रचा गया सस्पेंस

    कहानी के अंत तक आते आते यूँ लगता है, जैसे सस्पेंस को जबरजस्ती ठूंसा गया है। नायक के लिए हर कहानी में हार होती है, या जीत। बस इस हार या जित को एक सस्पेंस नामका चौला पहनाया जाता है। इस कहानी में भी हार जीत का फेंसला एक सस्पेंस ही करता है। हार का पर्दा उठाकर कहानी का नायक संतोष जीत जाता है। कहानी के सारे पात्रों की अपनी कहानी भी शामिल है, बिच रस्ते से लौटे अभ्यर्थी की बातें भी बड़ी सिफ़त से शामिल की गयी है। 


सबसे यादगार प्रसंग

    मुझे इस कहानी में सबसे मजेदार दो बातें लगी थी। एक जब मनोहर के चाचा दिल्ली आते है, और मनोहर उसे दिल्ली घुमाता है। दूसरा जब बत्रा पर भाषा को लेकर बहस छिड़ जाती है। और गुरु टूट पड़ता है। संतोष का अपना मोड़ भी काफी मजेदार था। खासकर वह भाग्य बदलने वाला मोड़। सबने जब उम्मीद छोड़ दी थी, तब संतोष ने हिम्मत नहीं हारी। यह पुस्तक प्रेरणा से भर देने वाला है। निराशा से बहार निकालने को सामर्थ्य रखता है।


जब डार्क हॉर्स कहानी से निकलकर भीतर उतर आए

    प्रियम्वदा ! इन कुछ दिनों में मैंने भी एक भीतरी उत्पात झेला है। हालत यह है, कि अब सुबह शाम को मदहोशी महसूस करता हूँ। पूरा दिन इस चकाचौंध की रौशनी में आँखों को तैराता हूँ। रात को अंगीठी के सामने बैठकर जलती अग्नि को अपने भीतर आत्मसात होने का अवसर देता हूँ। अग्नि की ज्वलंतता भी मुझे छूकर जैसे छुताछुत करती है। मेरे भीतर की हिमशिला को नहीं पिघला पाती। वह अग्नि की लपटें बुझ जाती है, मुझे धुंए में सांस लेता छोड़कर। कुछ सालों पहले की प्रतिज्ञा फिर से सर उठाती है। मेरे अस्तित्व को झकझोरने के लिए। मैं सोचता हूँ, अपना यह चरित्र, किसी जुएं में दांव पर लगा दू। और किसी अँधेरे में चला जाऊं।


    लेकिन तुम्हे पता है प्रियम्वदा ! यह मन मेरा वहां भी साथ नहीं देता। वह मुझे उन तमाम तृतीय पक्ष पर खींचता है, जहाँ मैं प्रथम और द्वितीय पक्षों से निजाद पाना चाहता हूँ। 


    शुभरात्रि। 

    २२/०१/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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क्या आप भी कभी अपने भीतर बैठे डार्क हॉर्स को पहचान पाए हैं? 
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