लिखने की आदत और अनकही रचनाओं का अफ़सोस
प्रियम्वदा !
अगर इसी तरह लिखने की आदत छोड़ दूंगा, तो इसका भी हाल उन कविताओं जैसा हो जाएगा, जो कभी जिह्वा पर नहीं खेली। है न.. कितनी सारी कविताएं है.. जिन्हे उनका रसिक नहीं मिला। कितने सारे उपन्यास है, जो अभी उन हाथों तक नहीं पहुंचे, जिन्हे रूचि है, लेकिन जानकारी नहीं। उपन्यासों में एक बड़ी समस्या होती है, कुछ कहानियां आधी पढ़ लेने के बाद पछतावा होने लगता है, कि यह गलत शुरू कर दी। मेरे साथ कुछ उपन्यासों में ऐसा हो चूका है।
ठंडी सुबह, पिता और बातचीत का अंतराल
प्रकृति पुनः एक बार शीतल हो चुकी है। सवेरे आज जब मॉर्निंग वॉक पर निकला था, तो मेरे दौड़ने के बजाए शरीर से सिहरन दौड़ रही थी। लेकिन हाँ ! आज काफी दिनों बाद सवेरे जल्दी उठकर ग्राउंड में पहुंचा था। हुकुम भी वहीँ टहल रहे थे। मैं उनके साथ हो लिया। काफी दिनों बाद उनसे कितनी सारी बातें की है मैंने। प्रियम्वदा ! एक उम्र के बाद पिता-पुत्र का संपर्क कम हो जाता है। यह शायद युवानी का ही जोर है। वृद्धत्व की ओर बढ़ चुकी पिछली युवावस्था आज भी अनुभव के सहारे नई युवावस्था को कईं मामले में चेता सकती है।
आग, धुआँ और दोस्ती का दार्शनिक समय
कुछ दिनों पहले की ही बात है। ऊपर काला आसमान, हवाएं ठंडी और शुष्क, और धुंए को पराजित कर प्रकट हो चुकी अग्नि से ऊष्मा पाते हुए मैं और पत्ता बैठे थे। यकायक मैंने पत्ते से कहा, सच बताना भाई, "शादी करके जीवन में क्या खोया-पाया?
पत्ता दो घूंट लगा लेने के बाद अक्सर दार्शनिक बनते बनते रह जाता है। वह फिर भी बोला, "शादी मतलब, खुद चलकर अपनी आज़ादी किसी और के हाथो में सौंप देना। कि भाई हमारी ज़िन्दगी में काफी सुख चैन है, वो सारा छीन लो.. ज़हर घोल दो पूरा.. मैं मुक्ति के लिए तरसु यहाँ तक तड़पाओ मुझे।"
शादी के चार हालात – एक मित्र की ज़ुबानी
जब तीनों खुश हों – धरती पर स्वर्ग
मैं उसे बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह आसमान की ओर देखकर जैसे, वहां के किसी देवदूत की जुबान बोल रहा था। कुछ देर रुका, जलती अग्नि में से एक लकड़ी उठायी, अपने होठों में दबी सिगरेट सुलगाई, एक लम्बा कस खींचकर धुंए को आसमान को सौंपा, और फिर से अपनी तीव्र गति में चलती जिह्वा को कार्यरत करते बोला, "तुझे पता है.. जीवन में शादी हो जाने के बाद चार स्थितियां निर्माण होती है। देख मैं समझाता हूँ। पहली, तू खुश है, तेरी पत्नी खुश है, और उसकी सास मतलब तेरी मम्मी खुश है। यह सबसे बढ़िया परिस्थिति है। यहाँ तुझे धरती पर स्वर्ग मिल गया समझ। कोई पुण्य की गठरी तुझे बांधनी नहीं है। तू अपना एन्जॉय कर..! लेकिन अब बाकी की जो तीन परिस्थितयां है न.. वहां तुझे यह समझना होगा कि तू बहुत बड़ा पापी है, और यही, तेरा घर ही रौरव है।"
जब पति नाखुश हो – बहुमत का आतंक
पत्ता अपने फेफड़ों को धुंए से सींचने के लिए रुका, और अस्खलित वाणी-विलास की ओर लपका, "देख, अब तू खुश नहीं है, लेकिन तेरी पत्नी और उसकी सास मतलब तेरी मम्मी खुश है, तो तू समझ कि वे दोनों का गठबंधन तुझे कभी ऊँचा उठने नहीं देगा। बहुमति है न उनके पास.. बहु की मति यदि सास भी स्वीकार लेती है, फिर तो तू गया ही समझ.. दोबारा कभी आज़ादी का मुँह नहीं देख पाएगा। अपनी मर्जी का माचिस नहीं ला सकेगा तू अपने ही घर में। गठबंधन के आगे महासत्ताएँ विफल हो जाती है, तू किस खेत का खटमल है..?"
"अबे मेरे को क्यों लपेट रहा है?" मैंने उसकी आक्रामक और मुझ पर आघात की बौछार चलाती जिह्वा को स्थगित करने के इरादे से टोका। लेकिन अगला अब देववाणी बोल रहा था। सुरापान जो कर चूका था। सुर का अर्थ देवता भी है, देवो का पान जिसने किया हो, वह वाणी भी तो देव की ही बोलेगा। लेकिन मैं इस आकाशवाणी में बार बार बेफिझुल में मुझ पर होते उदहारण से त्रस्त हो रहा था।
जब सास नाखुश हो – कोपभवन की राजनीति
उसने मुझे अनसुना किया, और आगे की दो और परिस्थितिया बताने को आग्रहित हुआ, जहाँ फिर से सारा उदहारण का जिम्मा मैं ही रहूँगा। "अरे तू भाई है अपना.. कम से कम रूपक के काम तो आ..? तो मैं कहाँ था.. हाँ ! खटमल। तो आगे सुन.. तीसरी स्थिति। तू खुश है, तेरी पत्नी भी खुश है, लेकिन उसकी सास मतलब, तेरी मम्मी नाखुश है.. भाई तबाही। इसे कुछ यूँ समझ, कि तूने एक आंधी के केंद्र में बैठा है। एक कोपभवन है, उसके मुख्य दरवाजे के बाहर बैठी रहती है वह सास.. बात बात में ताने मारने से लेकर अपने द्वारा दिए गए त्याग और बलिदानों के वे सारे किस्से रिपीट पर सुनते रहना पड़ेगा। जैसे कि, 'मुझे तो तेरे पापा ने एक आइस क्रीम नहीं खिलाई कभी, और यह महारानी को देखो, सिनेमाहॉल में जाकर फिल्मे देखती है। और तू.. तू तो मुझे किराने के दूकान से आगे नहीं ले गया कभी, और इस महारानी के साथ चौपाटी घूम आता है। हाँ ! भूल जाओ सब, मैंने इस घर को बांधे रखने के लिए, चूल्हे में अपनी आँखे झोंक दी है। जरा यह रूपादेवी चूल्हा जलाकर तो दिखाए...!' लेकिन भाई, मेरी बात मान, यहाँ तो यह भी नहीं कह सकता है, कि अपने घर में गैस वाला चूल्हा है।"
मैं अब माथा पिट रहा था, क्योंकि यहाँ बात बात में पत्ता मुझे, और मेरी दयनीय स्थिति का विषाक्त-काल्पनिक दृष्टांत देकर बार बार मुझे ही जलील किये जा रहा था। सच ही कहा है किसी ने, पिए हुए को ज्यादा पुचकारना नहीं चाहिए। क्योंकि वह काट लेता है, या चाट लेता है। खेर, अब उसका एक आखरी परिस्थिति निर्माण बाकी था, जहाँ फिर से मेरा ही उदहारण दिया जाना तय था। मैं अपनी दयनीयतम स्थिति देखने को जरा भी आतुर नहीं था, लेकिन इस दार्शनिक को रोकने का अर्थ था, मेरी उस दयनीय स्थिति की पराकाष्ठा को पुकारना। उसने दूसरी सिगरेट मुझे ही दे दी.. जलाने में जैसे कमी छोड़ दी थी इसने।
लैंडमाइन पर बैठा पति – स्थितप्रज्ञ अवस्था
"चौथी और आखरी सुन.. मेरा भाई है तू.. तू खुश है, तेरी पत्नी खुश नहीं है। लेकिन उसकी सास यानी कि तेरी मम्मी खुश है। देख भाई.. इस परिस्थिति को तू यूँ मान, कि तू एक लैंडमाइन के ऊपर पालथी मारकर बैठ ही गया है। तुझे पता है, तू लैंडमाइन पर बैठा है, लैंडमाइन को पता है, तू बैठा है, लेकिन तेरी मम्मी को नहीं पता। वह तो तुझे यहाँ-वहाँ खींचने की कोशिश करेगी.. लेकिन अगर तू हटा.. तो तुझे पता है क्या होगा। भगवान् कृष्ण ने संस्कृत में कहा है, 'स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।' छोड़, तुझे तो संस्कृत समझ नहीं आएगी। उन्होंने भी यही कहा है, यही वह अवस्था है, जहाँ तुम स्थितप्रज्ञ हो सकते हो। ऐसी ही किसी लैंडमाइन पर पालथी मारकर बैठ जाओ.. फिर तुम्हे सारा घर-परिवार कहेगा, कैसा आदमी है, इसे कुछ भी कहो, कुछ समझता ही नहीं है। क्योंकि तुम बस बैठे रहने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते। न अपनी पत्नी को कुछ कह सकते हो, न अपनी जन्मदात्री को। या फिर यूँ समझो... तुम एक कोपभवन के आँगन में खड़े हो.. कोपभवन का खुला द्वार तुम्हारी पत्नी और माता - दोनों को आकर्षित कर रहा है। और तू तय नहीं कर पाएगा, किसके कोपभवन आवास से तेरी हानि कम होगी।"
आखिरकार इस रौरव के ताप से मैं उठ खड़ा हुआ। "बस कर भाई.. कितना गिराएगा मुझे? सातवे पाताल तक तो पहुंचा चूका है। मैंने क्या पूछा था तुझसे, और तू क्या सुना रहा है मुझे..? सच बता, ओल्ड मोंक थी न आज?"
शराब, व्यवहार और बंधुत्व की भाषा
इस पुरे संभाषण में पहली पत्ता चौंका। अपनी जेब टटोलते हुए मुझे आश्चर्यभरी दृष्टि से देखते हुए बोला, "तू सच्चा भाई है मेरा.. तूने पकड़ लिया। मेरी अर्धांगिनी आज तक नहीं पहचान पायी। तू सच में भाई है मेरा। कैसे पता चला, बताना?" और अपनी टटोली हुई जेब से आखरी सिगरेट निकालकर जलाने लगा।
"अबे तूने जो अभी ज्ञान झाड़ा है, कमजोर लोगो को तो दस्त हो जाए इससे। देख भाई, ओल्ड मोंक नाम में ही अनुभवी वृद्ध है।"
"हाँ! यह बात तो सही कही तूने। लेकिन सोच, अगर शादी ही नहीं की होती मैंने.. तो मेरे पास तो गर्लफ्रेन्डस की कोई कमी थी नहीं। दूसरा मुझे कोई रोकटोक भी न करता। तीसरा, मुझे मेरी आय को अपने ऊपर खर्च करने की पूर्ण आज़ादी होती। चौथा, न ही मुझे कोई जिम्मेदारी निभानी होती।"
"तू नहीं रुकेगा.. सुन, दारू और देह जब संलिप्त हो तब जिह्वा को जोर देकर दबाए रखना चाहिए। क्योंकि कई बार यह जिह्वा बेपरवाह हो जाती है। दारू केवल दारू न रहकर व्यवहारु बन जाती है। यह व्यवहार निभाने लगती है, संबंधो में सांठगांठ का। यह व्यवहार निभाने लगती है, उन दबी-कुचली बातों को निर्भीकता देने के आंदोलन का। यह एक और व्यवहार निभाती है, बंधुत्व का.." और मैंने वही खुले आसमान के निचे जलती रौशनी बुझा दी।
शुभरात्रि।
२४/०१/२०२६
|| अस्तु ||
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