UGC एक्ट, आरक्षण और ‘तेरे इश्क़ में’ : व्यवस्था, जाति और स्वार्थ का कटु सच

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UGC एक्ट, आरक्षण और प्रेम की राजनीति

    प्रियम्वदा !

    ऐसे ही थोड़े किसीने कहा होगा, कि "जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।" वर्तमान केंद्र सरकार यही नीति पर चलती दिख रही है। भाजपा को सवर्णों की सरकार माना जाता रहा है। वैसे यह बात अपने आप में ही कितनी विचित्र है। सवर्णों की सरकार, या दलितों की सरकार.. भारतवासी नागरिकों की सरकार कोई है भी या नहीं? UGC एक्ट के बारे में आजकल हर कोई चर्चा कर रहा है। मुझे तो यही समझ नहीं आ रहा है, कि अगर जातिवाद मिटाना ही है, तो फिर सबसे आरक्षण ख़त्म क्यों नहीं करते तुम..?


सफेद पृष्ठभूमि पर बना व्यंग्यात्मक कार्टून जिसमें एक भारतीय व्यक्ति UGC एक्ट की किताब, टूटा हुआ दिल, झुका हुआ मेरिट-आरक्षण तराज़ू और नीला अशोकचक्र दिखाता है

जब सरकार नागरिकों की नहीं, वर्गों की सरकार बन जाए

    प्रियम्वदा ! एक तरफ तो यह लोग कहते है, कि ब्राह्मणों को हटाओ, दूसरी तरफ खुद वे सारे काम हथियाना चाहते है जो ब्राह्मणों के पास थे। यह वो वाला मसला है, कि शाशन तो चलता रहेगा, बस क्षत्रिय के सिवा और लोग करेंगे। करो भाई, हमे क्या समस्या है.. लेकिन यह मत करो, कि क्षत्रियों को बिलकुल ही दरकिनार कर देंगे। 


आरक्षण बनाम जातिवाद: समाधान या नई खाई?

    प्रियम्वदा ! मैं यह सोच रहा था, कि सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बना देनी चाहिए, कि चार स्तर है, सवर्ण, OBC, SC, और ST.. अब ऐसा करना चाहिए, प्रत्येक वर्ग का अपना कॉलेज। OBC वाले OBC कॉलेज में ही पढ़े, उन्हें पढ़ाने वाले भी OBC समुदाय के ही हो। SC ST के भी अपना अलग शैक्षणिक संस्थान हो। वहां आचार्य से लेकर प्रधानाचार्य भी SC/ST से हो। इससे क्या होगा, कि वो जातीय भेदभाव वाला मसला ही मिट जाएगा। अब कोई अपनी ही जाति में तो भेदभाव करेगा नहीं। इससे दो लाभ होंगे.. एक तो आरक्षित वर्ग को अपने ही जैसे आरक्षण का लाभ पाकर नौकरी पर आए शिक्षकों से पढ़ने मिलेगा। और उस संसथान में सवर्ण वर्ग से कोई होगा ही नहीं इस लिए जातिय भेदभाव भी नहीं होगा। 


नीट, मेरिट और व्यवस्था पर उठते असहज सवाल

    वैसे ही कल परसो मैं देख रहा था, नीट की एग्जाम में कोई -40 अंको के साथ उत्तीर्ण हुआ है। बताओ.. प्रियम्वदा ! माइनस चालिश अंक प्राप्त किया हुआ आरक्षण का लाभार्थी कैंडिडेट अगर शिक्षण संस्थान में पढ़ाने आ गया, तो वह कितनी ख़ुशी के साथ अपने ही आरक्षित समाज को पढ़ाएगा। आगे चलकर हमारे देश में आरक्षण वाले वैज्ञानिक आएँगे.. अवकाश में नीले रंग के रॉकेट छोड़ेंगे। कितना मजेदार दिखेगा। वह आरक्षण का लाभार्थी, देश में उन्नति और क्रांति लाएगा। ब्राह्मण हटाओ, देश बचाओ का नारा देने वाला क्या पता किसी दिन AI की तकनीक में भारत को उन्नत कर दे। UGC एवं एट्रोसिटी के तहत देश के तमाम सवर्णों को जेल में ठूंसकर, कोई आरक्षण का लाभार्थी देश को फिर से सोने की चिड़िया बना दे.. नहीं, सोने की चिड़िया नहीं.. शायद नीली चिड़िया।


‘तेरे इश्क़ में’ : प्रेम नहीं, स्वार्थ की कहानी

    खेर, यह तो चलता ही रहेगा, देश में सबका अधिकार है, तभी तो अशोकचक्र का रंग नीला है, गहरा नीला। केंद्र में उन्हें स्थान दिया, लेकिन वे कंधे पर बैठकर कान में.. छोडो प्रियम्वदा, कल मैंने वो धनुष वाली फिल्म देखी। "तेरे इश्क़ में" देखो, कहानी तो प्रेम की हमेशा ही वह प्रेम चोपड़ा वाली रहेगी। तुम्हे मेरी बेटी चाहिए, तो पहले यह करो.. वो करो.. इसमें भी ऐसा ही था। एक लड़की थी, एक लड़का था। लड़का लड़की से प्रेम करता है, लेकिन लड़की नहीं करती। लड़का प्रेम में पागल है, लड़की को कोई मतलब नहीं। लड़की ने अपना स्वार्थ साध लिया, और अपने रस्ते चली गयी। उधर लड़का बर्बाद.. उसके सर तो आशिकी चढ़ी थी.. 


जब प्रेम में सिर्फ एक ही पक्ष टूटता है

    लड़की का बाप शर्त रखता है, लड़का पूरी करता है। लड़की किसी और से शादी कर लेती है। और लड़का विरहा गाता है। प्रियम्वदा ! लड़की कितनी स्वार्थी है.. देखो खाली। एक तो उसने लड़के को खुद बर्बाद किया, और तो और जब लड़का वादा करता है, तो उसका वादा पूरा होने से पहले किसी और से शादी भी कर लेती है। मुझे तो यह समझ नहीं आया, उसे कैंसर था, बेवडी हो गयी थी, फिर भी वह प्रेग्नेंट क्यों हुई? उसे तो पता ही था.. वह जीनेवाली नहीं। जब उसे पता चला कि उसका पति ऐसे युद्ध में गया है, जहाँ से उसका लौटना तय नहीं। मर भी सकता है। उस समय उसे अपने उस आशिक़ की याद आयी। वह उसे खोज तो रही थी, लेकिन तब जब आशिक़ विरह में गुस्सैल हो चूका था। अपने बाप तक को खो चूका था। 


स्त्री-पुरुष, स्वार्थ और नैतिक असहजताएँ

    खेर, उधर हीरो अपना जंग में जाना चाहता है, तब यह लड़की फिर उसे युद्ध से रोकने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे बच्चा होने वाला है। मतलब वो लड़की कितनी स्वार्थी है देखो तुम प्रियम्वदा, उसे पता है, उसका पति जंग से लौटने वाला नहीं, तो कम से कम इस बच्चे के लिए अब वह अपने आशिक़ को भी रख लेना चाहती है। जब वो गिड़गिड़ा रहा था, तब तो नखरे कर रही थी। अब जब उसके पास न तो पति, न तो प्रेमी वाली स्थिति है, तो वह चाहती है, कि कोई तो लौटे -  दोनों में से कोई एक तो वापिस आये..! उसे फिल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक बस अपना ही सब चाहिए था। शुरुआत से ही स्वार्थी थी वो। 


    पहला स्वार्थ, अपनी डॉक्टरेट। दूसरा स्वार्थ, इस लड़के से पीछा छुड़वाना। तीसरा स्वार्थ, मरने से पहले कोई तो वापिस लौटे.. अपना पति न सही, यह आशिक़ भी चलेगा। वो बेचारे लड़के के बाप ने नौकरो के पैरों में नाक रगड़ी थी, उसका कुछ नहीं? बाप खुद मर गया उसका कुछ नहीं। लेकिन अब वह आयी है, तो हीरो को रुक जाना चाहिए उसके पास.. भला हो बेचारा हीरो, जो खुद मर गया.. वरना ऐसी स्वार्थी औरत का भला क्या भरोसा। शादी के बाद क्या पता अपने किसी और स्वार्थ के लिए पति बदल लें.. भगवन बचाए भला ऐसे वाहियात प्रेम से तो। 


    भगवन मुझे भी सद्बुद्धि दें.. क्योंकि मैं अब रांझणा भी देखने वाला हूँ.. क्योंकि इस फिल्म में थोड़ी बहुत लिंक रांझणा से कनेक्टेड है। अब भगवान मुझे हिम्मत भी दे ही दे। 

    शुभरात्रि। 

    २९/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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