औघड़ उपन्यास समीक्षा
औघड़ शब्द का अर्थ और भाव
प्रियम्वदा !
जिसे लोक-लाज, रिवाज़ या दिखावा बाँध नहीं पाता, जिसे समाज से स्वीकृति की अपेक्षा नहीं होती, और जो जैसा है, वैसा ही रहने का साहस रखता है, वह औघड़ है। मूलतः शैव परंपरा से जुड़ा हुआ यह शब्द 'औघड़' - कभी कभी अघोरी, अवधूत या साधु का पर्यायवाची सा लगता जरूर है, लेकिन असल में औघड़ एक भाव है। एक चरित्र है। अघोरी औघड़ हो सकता है, लेकिन औघड़ का अघोरी होना जरुरी नहीं। औघड़ का जीवन चाहे अस्त-व्यस्त या अव्यवस्थित दीखता है, लेकिन उसकी चेतना स्पष्ट होती है। वह नियमों को नकारता नहीं, बस उनसे परे खड़ा हो जाता है।
नीलोत्पल मृणाल और उनका साहित्यिक संसार
आजकल पुस्तकें पढ़ रहा हूँ मैं। नीलोत्पल मृणाल की एक और पुस्तक मैंने कल रात पढ़कर पूरी की। वैसे सात दिन लग गए। क्या करूँ.. ठीक से समय नहीं मिल पा रहा है। जीवन में कुछ जिम्मेदारियों वाली व्यस्तताओं का साधक हो चूका हूँ मैं। बस वो कसरत वाली भागदौड़ के सिवा तमाम प्रकार की शारीरिक और मानसिक दौड़-भाग मची हुई है जीवन में। इन्ही कुछ व्यस्तताओं के कारण ही मैंने दिलायरी पर टेर्रिफ्स लगाएं है। हाँ ! टेर्रिफ्स ही कहूं.. या आंशिक प्रतिबन्ध - सेंक्शंस। इंटरनेट के आर्काइव्ज में से मुझे नीलोत्पल मृणाल की दो पुस्तकें मिली थी। डार्क हॉर्स पढ़ ली थी, और उसका तो रिव्यु भी लिख दिया था। उसके बाद मैंने यह औघड़ पढ़ना शुरू किया था..
ग्रामीण भारत, जाति व्यवस्था और औघड़
प्रियम्वदा ! भारतीय ग्रामीण व्यवस्था काफी सुलझी हुई है। जातिगत कामों का जिम्मा बंटा हुआ है। बस समस्या किसी समय पर यह हो गयी कि, जातियों में स्तरवाद आ गया। कोई ऊपर हुआ, कोई निचे। सबके दो-हाथ पैर होने बावजूद.. किसी के छू लेने भर से महापातक लगने लगा..! यह छूने वाली समस्या तो रोगों से जन्मी है, कईं तात्कालिक कारण बादमे परंपरा, रूढ़ि या रिवाज़ की शक्ल ले लेते है। बिहार के किसी गाँव की एक कहानी, काल्पनिक कहानी है औघड़ उपन्यास। इस उपन्यास में संवाद से लेकर विश्व के तमाम विचारधारा वाद को सम्मिलित कर, नीलोत्पल ने कहानी को काफी रोचक बनाया है।
बिरंची — एक औघड़ नायक
जातिवादिता कईं बार कर्मों के अनुपात को संभालती तो है, लेकिन कभी कभी दशा बिगाड़ भी देती है। कुछ वैसी ही कहानी है यह औघड़ की। कहानी का मुख्य नायक बिरंचि और बिहार की स्थानिक भाषा को खड़ी बोली में ढालकर इस कहानी के तमाम संवाद एक लय रचते है, और एक गाँव की धुन सुनाई पड़ती है। बिरंचि का उस गाँव के लोगों के प्रति नजरिया ही उसे औघड़ बनाता है। नशीले पदार्थों का सेवन करके भी वह अपने मत को लेकर इतना ज्यादा स्पष्ट दीखता है, जितना अन्य कोई होश में भी नहीं होता है। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा ही होना चाहिए, अपनी मति की एक स्पष्टता जिसने पा ली है, वह फिर औघड़ ही है। या फिर औघड़पन के पहले पायदान पर।
विचारधाराएँ, युवावस्था और यथार्थ
इस कहानी में एक जगह एक बात आयी, जिसे पढ़कर लगा जैसे कितना गहन सत्य हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हम महसूस नहीं कर पाते है उसे.. या उसे बयां नहीं कर पाते, जिसे नीलोत्पल ने सहज तरीके से कह दिया है। “अक्सर ज्यादातर आदमी अपनी जवानी के दौर में समाजवादी, नारीवादी या मार्क्सवादी में से कुछ-न-कुछ जरूर होता है, और एक दौर के बाद वो निश्चित रूप से इनमे से कुछ भी नहीं होता है। सिर्फ कमाता-खाता आदमी होता है।” युवावस्था होती ही ऐसी है। दुनिया के तमाम वादों में से प्रत्येक वाद में थोड़ा थोड़ा झुकाव अनुभवति ही है। और फिर युवा जब प्रौढ़ हो जाता है, तो उसे बस कमाने-खाने से फुर्सत नहीं मिलती।
कहानी के अंत भाग में भारी रहस्य से पर्दा उठता है। करुण-कल्पांत से ओतप्रोत - कहानी का यह सिरा वास्तव में भावुक तो कर ही जाता है। नीति कोई भी हो, भोग लेती है। आर्थिक, मानसिक या शारीरिक भोग देना ही होता है। जब भी नीति कर्तव्यों में प्रतिपादित होती है। चाहे राजनीती हो, या जीवन की भी..! खेर, कहानी का अंत बड़ा ही रोचक है, कुछ कुछ फिल्मों जैसा। इस उपन्यास में वह सब कुछ है, नीति, भाग्य, विश्वास, दगा, कुकर्म.. मैंने यह पढ़ते हुए बहुत बार व्यंग्य पर किए तंज से हंसा हूँ, तो कभी पबित्तरदास पर क्रोध भी उपजा है। कहानी के सारे ही पात्र का इतिहास पढ़ते हुए जिज्ञासा भी हुई है, और मधु के साथ दुःखी भी हुआ हूँ। इस कहानी के अंत तक में कितने सारे प्रतिशोध शेष रह जाते है।
उपन्यास का अंत और औघड़पन की परिभाषा
लेकिन जीवन जीकर दिखाया औघड़ ने - बिरंची ने..! शुरुआत से लेकर उपन्यास के अंत तक.. वह नायक कितने सारे जोड़-तोड़ में लगा ही रहा है। उसने अपने भीतर लोगो को रहस्य घोलकर रखे, किसी पर भरोसा किया, वहां से विश्वासघात भी पाया..! वह नायक है, लेकिन वास्तव में औघड़ है। बेफिकरा, बेमतलबी, बेपरवाह.. पूरा बेपरवाह भी नहीं था। उसे बदलाव लाने की परवाह तो थी ही। हम बहुत बार बस कहीं अटक जाते है। वह अटकता नहीं था। एक के बाद दूसरी उलझनों से लड़ता था।
उपन्यास के अंत में लेखक औघड़ की बहुत सुन्दर व्याख्या करता है, "कलमुँही अँधेरी रात में भी कहीं कोने में दूर जलती हुई एक मद्धिम-सी ढिबरी के पास मुट्ठीभर उजाला खोजते हुए कोई औघड़ ही आ सकता है।" वह रात भी कितनी दुःखद थी.. जब बिरंची घायल था, लेकिन तब भी आशा खोजने निकला था। दुनिया के तमाम अंधेरों के घेर लेने के बाद भी अगर कोई उजियारे की किरण खोजने का प्रयास करता है, वह औघड़पन ही तो है।
माँ का चरित्र और करुण कल्पांत
सबसे ज्यादा इस कहानी में मुझे कोई भावुक कर गया था, तो वह थी बिरंची की माँ। उपन्यास के अंत में जब बिरंची की माँ कल्पांत करती है, वह दृश्य कल्पना में ही भय उपजाता है। माँ का पात्र तो सदा ही उपन्यासों में एक आदर्श का ही रहा है। पिता चाहे कितने ही संघर्ष कर लें.. गणेशी महतो के संघर्ष कम थे.. लेकिन नहीं.. माँ को जितनी कीर्ति मिलती है, उतनी पिता के हिस्से नहीं होती। जिसे अबला कहते है, वह कितनी सबलता से सब कुछ संभाल लेती है। हाँ ! मैं इस कहानी से प्रभावित हुआ हूँ। कहानी किसी पुरानी बॉलीवुड फिल्मो जैसी ही है। लेकिन लेखनी से उपजी तरंगे ज्यादा प्रभाव डालती है।
क्यों पढ़ें ‘औघड़’?
कहानी के चित्रण में किसी और की कल्पना को हम देखते है। जबकि पठन करते हुए जो कल्पना बनती है, वह हमारी अपनी होती है। हमारे अपने मन के उपजाए पात्रों के साथ हमारा अपना बंधन होता है, और हम ही उस कल्पना के तमाम पात्रों के वर्णनों से प्राप्त रेखाचित्रों के साथ उठने बैठने लगते है।
औघड़पन अनुभवना चाहिए, यह उपन्यास पढ़कर।
शुभरात्रि।
२८/०१/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
आपके लिए सवाल:
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