पुरानी बातें, स्मृतियाँ और न भूल पाने का यथार्थ
प्रियम्वदा !
पुरानी बातों पर मिट्टी डालो... ऐसा ही कहा जाता है। लेकिन वास्तव में कोई कभी पुरानी बातें भूल पाया है? वह बस फिल्मों में होता था, जब याददाश्त चली जाती थी। लेकिन असल ज़िन्दगी में हमें वे तमाम बातें याद रहती है, जिनसे हमारा जुड़ाव हो चूका हो। या फिर जिन बातों की हमें जरुरत होती है। वैसे कुछ फ़िज़ूल की बातें भी याद रह जाती है, लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.. जैसे की प्रेम। प्रेम एक फ़िज़ूल की भावना है, लेकिन यह भी लोग भूले नहीं भूल पाते। अक्सर ख्वाब में भी वे अपना प्रेम याद किया करते है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी : पौधे, पंखा और सर्दियों की कमजोरी
लगभग एक सप्ताह होने को है, जब आज तुमसे यूँ रूबरू हो रहा हूँ। कलम और कागज़ के प्रतिक स्वरुप यह कंप्यूटर डिस्प्ले और कीबोर्ड पर अपने मन को उड़ेलना है मुझे। फ़िलहाल समझ नहीं पा रहा हूँ, बात को शुरू कहाँ से किया जाए..? दरअसल जब प्रतिदिन लिखता था, तो मुझे भूमिका के लिए भटकना नहीं पड़ता था, दिनचर्या से शुरू कर दिया करता, और फिर अपने आप कुछ बातें आकर बस जाती इन इ-पन्नों पर।
गर्मियां आने लगी है.. आज पूरा दिन धीरे ही, लेकिन पंखा चलता रहा है। इस बार सर्दियों में एक रात भी पंखा रुका नहीं है। पहले मुझे याद आता है तब तक, पंखा बंद रखने के बावजूद कम्बल को ओढ़े रखना पड़ता था। इस बार की सर्दियाँ कमजोर रही है, मेरे शहर में। लेकिन हाँ ! इन सर्दियों ने मेरे दिलबाग को बड़ी चोट पहुंचाई है। वैसे गलती मेरी भी है थोड़ी। मुझे ठण्ड कम लगती है, इस चक्कर में मैंने अपने सारे पौधों को भी प्रतिदिन भर भर के पानी पिलाया.. काफी सारे मुरझा गए।
तमस : भीष्म साहनी का दंगों पर लिखा गया दस्तावेज़
खेर, कुछ दिनों पूर्व मैंने एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया था। भीष्म साहनी द्वारा लिखित "तमस"..! लेखक भीष्म साहनी अपनी आत्मकथा 'आज के अतीत' में बताते है, कि मुंबई के पास स्थित भिवंडी में हुई धार्मिक दंगो के बाद उन्हें तमस लिखने की प्रेरणा हुई। उन दंगो को उन्होंने करीब से महसूस किया था। और इन दंगों से उन्हें रावलपिंडी के दंगों की याद आयी। वे लिखते गए। तमस की कहानी एक दंगे की ही कहानी है। भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी एक तरह से आम बात ही है। भारत में तो यूँ भी बहुत सारे धर्म बसें है। बस एक ही माइनॉरिटी है, जो बार बार देश की बहुमति को परेशां करती रहती है।
मैंने CHATGPT से यूँही पूछ लिया था, कि बता भाई, पढ़ने लायक कोई उपन्यास बता.. जो थोड़ा अलग विषय लिए बैठी हो। क्योंकि प्रेम और उससे मिली झूली भावनाएं पढ़ने का मन कम था। वैसे भी आखरी बार गुनाहों का देवता ही पढ़ी थी, जिसमे प्रेम को घसीट घसीट कर पिलाया गया था। डार्क हॉर्स और औघड़ पढ़ने के बाद कुछ अलग के तौर पर CHATGPT ने मुझसे कहा, "तमस पढ़ो।" भला हो इंटरनेट की नगरी का.. यहाँ ई-पुस्तकालय भी तो मौजूद है। मेरे कॉलेज कैम्पस के अलावा मैं कभी किसी पुस्तकालय की सीढ़ी नहीं चढ़ा। लेकिन इंटरनेट पर मौजूद पुस्तकों को फोन में डाउनलोड करके, आँखों को त्रासदी देना मुझे मंजूर है।
नत्थू से मुरादअली तक : तमस की कथा यात्रा
नत्थू नामक एक चमड़ा उतारने वाले आदमी से यह कहानी शुरू होती है, और अमन कमिटी में बैठे मुरादअली के साथ समाप्त होती है। यह आरम्भ और अंत के भी भरपूर हिचकोले है। किसी समंदर ही लहरों के हिचकोले। कभी अपने आप क्रोध के साथ जांघ पर थाप पड़ जाती है, तो कभी हरनामसिंह के साथ डर भी लगता है। इस कहानी में वह सब कुछ है, जो एक उपन्यास में होना चाहिए। एक साथ तो समय मिल नहीं पाता मुझे। धीरे धीरे कभी आठ पन्ने, कभी पचीस.. कभी एक ही बैठक में आधा उपन्यास पढ़ लिया। इसी बिच एक फिल्म भी देखी।
साहित्य और सिनेमा : लकी भास्कर और आज का नैतिक संकट
'लकी भाष्कर'.. अच्छी मूवी है। एक बार देखने लायक है। दलकेर सलमान नायक की भूमिका में है। और एक सामान्य वर्ग के परिवार से उठकर उस समय के भारत के सबसे बड़े स्कैम में से थोड़ा सा अपने हिस्से में डालकर सबकी आँखों में धुल झोंककर निकल जाता है। हां ! वैसे मैं थोड़ा परहेज भी करता हूँ ऐसी फिल्मों से। पहले कहानियां होती थी नीतिपूर्ण। अब तो चोर-ठग कहानियों के नायक होते हैं। इस फिल्म में भी कहानी का नायक बैंक और शेयर बाजार में हो रहे स्कैम में से अपना बड़ा सा कट उठाकर देश से निकल जाता है। इस फिल्म से सीख तो यही मिलती है, कि स्कैम हो रहा हो, तो उसे उजागर करने, या रोकने बजाए, अपना भी हिस्सा उठाओ, और देश से भाग जाओ..!
खेर, रविवार को सोचा था, कि यह बुक पूरी पढ़ लूंगा। लेकिन रविवार को और भी कईं काम निकल आए। दिलबाग के लिए एक नया गेंदा ले आया। इस बार संकर गेंदा है, पिले के बजाए, केसरी और पिले मिक्स्ड कलर का गेंदा उठा लाया। एक और पौधा ले आया, नाम तो भूल गया, लेकिन नर्सरी वाला कह रहा था, कि ढेर सारे फूल आएँगे। देखते है। पुराना सूख चूका गेंदा निकालकर गमला खाली किया। मिट्टी निचे तक गीली थी। इसी कारण से पुराना गेंदा गुजर गया होगा। ज्यादा पानी पीकर। खेर, मिट्टी बदली, खाद डाला, और नया गेंदा गमले में बो दिया। एक और खाली गमले में भी नई मिट्टी डालकर वह दूसरा पिले फूलों वाला पौधा भी लगा दिया। यह पिले फूलों वाला पौधा लगाते समय एक भारी मिस्टेक हो गया। नर्सरी वाले पौधे काले प्लास्टिक में उगे हुए होतें है। वो प्लास्टिक की पन्नी हटाते समय मुझे लगा, कि कुछ जड़ें टूट गयी उसकी। देखते हैं, उग आए तो नसीब।
यह दिलबाग के निखार के बाद ख्याल आया, सोलर पेनल्स को दो-तीन महीने हो गए, धोयी नहीं थी। तो क्या फिर मोटा आदमी बाल्टी लेकर स्टूल पर चढ़ लिया। अपने तंदुरस्त नाजुक बदन को मैंने कसरतों से दूर रखा है। इस लिए स्टूल पर चढ़ने जैसा काम मुझे भयावह तो लगता है। फिर भी जरूरी काम होने के चलते आधे पौने घंटे तक कम से कम पानी में सोलर पैनल्स को हो सके उतना चमका दिया। आखिरकार यह काम भी ख़त्म होने के बाद, वहीं सोलर के निचे, पौधों के गमलों के बिच में कुर्सी डालकर, फिर से तमस पढ़ने बैठ गया। इक्कीस चैप्टरों में बँटा यह उपन्यास, आखरी दो चैप्टर बचे थे, वे बाकी छोड़ दिए थे।
धर्म, दंगे और टूटते भ्रम
आज जाकर कहीं इसे पढ़कर पूरा किया। एक सप्ताह लग गया। हालाँकि खाली समय मिलता कम है। उपन्यास की अगर बात करूँ मैं, तो इस उपन्यास की कहानी शुरुआत में बताए गए दंगे की कहानी है, कैसे दंगे को भड़काया जाता है, कैसे मार-काट मचती है। कैसे उसे शांत करने की कोशिशें की जाती है। इस कहानी में अंग्रेज है, कांग्रेस है, मुस्लिम लीग है, युवक संघ है (जो शायद राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ है।), गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी है.. और लाहौर शहर है। लेखक भीष्म साहनी द्वारा इस उपन्यास में सबसे अच्छा दृश्य वर्णन किया गया है। उन्होंने किसी कमरे का आलेखन कहीं किया है, तो मन में बिलकुल उसी कमरे का चित्र उपजता है। छोटे से छोटी चीज का भी उन्होंने वर्णन किया है। मुरादअली एक सूअर को नत्थू के हाथो मरवाता है। और दूसरे दिन किसी मस्जिद की सीढ़ी पर एक मरा हुआ सूअर मिलता है। और फिर दंगों का हाल.. दंगों के बिच कोई कोई अमनपसंद लोग किसी विधर्मी को अपने यहाँ आशरा देकर उसे बचा भी लेते है।
लेकिन एक बात पढ़कर मेरा माथा ठनका.. अपने देश में कईं बार कहा जाता रहा है, कि शांति प्रिय समुदाय सदैव से शांतिप्रिय रहा है। लेकिन इस उपन्यास में पढ़ा कि, "जब गुरुपर्व पर सिखों का जुलूस निकलता तो जामा मस्जिद से उनपर पथराव किया जाता।" यह पढ़कर आज के दृश्य भी आँखों में जिवंत हो उठे। कितनी अजीब बात है न.. मुझे तो लगा था, कि यह अभी अभी की बात है। लेकिन इस विषय पर मैंने कभी ज्यादा सोच-विचार नहीं किया था। और किसी धार्मिक स्थलों से ऐसा व्यवहार होता नहीं है वैसे। सिर्फ यह एक चुनिंदा धार्मिक स्थल है, जहाँ से होते पथराव की खबरे सुनते है हम। मतलब इस धार्मिक स्थल से पथराव होना एक परंपरा रही है..?
क्या तमस आज भी प्रासंगिक है?
खेर, मुझे लगता है, हर किसी को यह उपन्यास एक बार तो पढ़ना ही चाहिए। भले ही इसमें सियासत हो, राजनीतिकरण हुआ हो.. लेकिन बहुत सारे भ्रम तोड़ने के लिए यह उपन्यास एक दवाई समान है। अभी अभी मुझे ज्ञात हुआ, इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बनी है। तमस ही नाम है उस फिल्म का भी। मैंने उस फिल्म का शुरुआती दृश्य देखा, हूबहू उपन्यास का आरम्भ ही है। थोड़ा स्किप करके आगे को सरका, तो फिल्म में भी प्रभातफेरी का वही सिन देखने मिला, जो मैंने उपन्यास में पढ़ा था। लेकिन पूरी कहानी इस उपन्यास की ही है या नहीं.. मैं नहीं जानता।
तो.. यही सब था प्रियंवदा। इन्ही सब उथलपुथल के मजे ले रहा हूँ मैं। और वैसे भी.. यह जीवनरेत कितना ही भींचो.. उसे सरकता रहना ही उसका कर्तव्य है। हमें बस इस सरकती रेत में से हो सकें उतने जीवनमोती बीनते रहना है। क्योंकि यही मोती हमारे जीवन को मजेदार बनाते है। बाकी सरक तो रहा ही है।
चलो अब विदा दो। अब मुझे एक और पुस्तक को पढ़ने में प्रवृत होना है।
शुभरात्रि।
०३/०२/२०२६
|| अस्तु ||
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