लेखन : मजबूरी, इच्छा या क्षणिक शौक?
ब्लॉगों का जन्म, तपता मध्यान्ह और इंटरनेट की काशी
प्रियम्वदा !
मैं आज समझ नहीं पा रहा हूँ, लेखन मेरी मजबूरी है, या मेरी इच्छा है, या फिर चार दिनों का शौक..! सच में, एक त्रिशंकु स्थिति बनी है मेरे भीतर। मैंने अच्छे खासे ब्लोग्स के उदय देखे है। और तपता हुआ मध्यान्ह भी। आज वे ब्लॉग बस इंटरनेट का कोई कोना पकडे हुए चुपचाप पड़े है, जैसे काशी में पड़ी कोई लाश.. कुछ देर के लिए कुछ जगह को घेर कर रखती है वह। और फिर भष्मीभूत।
डायरी लेखन और निजता का चीरहरण
डायरी लेखन का नियम तो यही कहता है, कि जितना लिखा जाए, बिलकुल ही निष्पक्ष रहकर बिना कोई भारी बहावों की खींचतान किये, स्पष्ट और सरल लिखा जाए। लेकिन मैं तो वाकई उस बात को इस खुली किताब में नहीं निभा सकता। क्योंकि मेरी अपनी निजता को, अपने आडम्बर का अपने ही हाथो चीरहरण कैसे कर लेता। मैं सदैव से तुम्हे संबोधित करते हुए लिखता रहा, सदैव से मेरा तात्पर्य है एक वर्ष, लेकिन मैंने अपने इस एक वर्ष में यह तो ज्ञान पाया ही है, कि हमेशा नहीं लिखा जा सकता।
पढ़ने, देखने और ठहर जाने के दिन
पिछले कुछ दिनों से मेरा झुकाव पठन में है। वो आईसीयू में श्वसन और रक्तचाप की वह ऊपर निचे उठती हुई रेखा जैसे मेरे शौक का झुकाव चलता रहता है। कुछ दिनों को फिल्मों में जोंक देता हूँ मैं। कुछ दिनों को बस देखते रहने में, और कुछ दिनों को पढ़ने में। तुम्हे बताना ही भूल गया इसी बिच - मेरे दिलबाग का गेंदा गुज़र गया। पता नहीं एकदम से सूख गया। शायद उसे वर्षा के प्राकृतिक पानी के बाद, यह फिल्टर्ड आर.ओ. वॉटर से अपच हो गया। गुज़रने से पूर्व भरपूर फूलों से दिलबाग को सजा दिया था उसने।
दिलबाग के पौधे और पहला प्रेम
मधुमालती का तो तुम्हे क्या बताऊ.. वे तो बस सूखी डंडी ही बची है। लेकिन आज ही सवेरे ध्यान से देखा मैंने। उसमे नवांकुर फुट रहे है। मुझे तो लगा था कि वही होगी मेरे दिलबाग की सबसे पहली धोखेबाज़। लेकिन नहीं, पहला प्रेम लौटता तो है, कम से कम पौधों के मामले में तो लौटा ही। मैंने सबसे पहले मधुमालती ही बसाई थी अपने दिलबाग में। बड़ा ही परोपकारी पौधा है। कुछ ही दिनों में ढेरों फूल देने लगी थी। अरे इतना जल्दी तो कोई प्रेमिका भी अपना हृदय नहीं सौंपती, जितना जल्दी इसने मेरे दिलबाग में श्वेत, लाल और हरा रंग भर दिया था। सारे पत्ते गिर जाने के बाद फिर से नयीं कोंपलें फूटने लगी है।
सर्दियों में सोती प्रकृति और भीतर के संघर्ष
कितनी सही व्यवस्था है न.. सर्दियों में प्रकृति भी सो जाती है। गर्मियों के लिए मानों ऊर्जा एकत्रित कर रही हो। कुदरत का अपना संघर्ष चलता ही रहता है। जैसे कोई प्रगतिशील देश संघर्ष कर रहा हो, या कोई मंदिर के चबूतरे पर खड़ा कोई आशावान संघर्ष करता है - आकांक्षा का और उत्तरदायित्वों का। हमारे भीतर भी तो कितने सारे संघर्ष हो रहे होते है दिनभर में। पैसा खर्च करने से लेकर बचा लेने का संघर्ष। संघर्षों का दायित्वबोध भी अगर समझ में आ जाता है, तब भी कितनी सारी समस्याओं का समाधान मिल जाता है। या फिर कम से कम एक होंसला तो मिल ही जाता है, आने वाले प्रसंगों से सांगोपांग पार उतर जाने का।
आलस बनाम लालसा : लेखनी का महासंग्राम
तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, इस लेखनी को लगा आलस का जंग हट जाएगा? है तो यह आलस ही.. लेकिन साथ ही लिख लेने की लालसा भी जागृत रहती है। आलस और लालसा इन दोनों के युद्ध में खुवारी मेरी ही होती है। पर मैं इस महासंग्राम में प्रतिभागी होने के बजाए, उस तीसरी दुनिया में शामिल हो जाता हूँ, जो हमेशा से किंगमेकर रही है। हमेशा से अनिर्णायक लोगोने केवल एक निर्णय लेकर तक़दीर बदली है। कृष्ण की एक अनिर्णायकता, कि शस्त्र नहीं उठाऊंगा.. युद्ध की दिशा ही बदल दी थी इस एक निर्णय ने। दुर्योधन नारायणी सेना मांग बैठा। जबकि उनका शस्त्र तो सदैव से पांडवो के पक्ष से लड़ा ही है। तत्काल निर्णय शक्ति।
निरर्थकतावाद और नाइलीस्ट पेंगुइन
दुनिया में इतने सारे वाद है, एक और सही ठहरा है.. निरर्थकतावाद। कईं बार हमे सब कुछ ही निरर्थक लगता है। जैसे मुझे यह लिखना भी.. लेकिन कभी दिल की तरंगों को यहाँ के सितार पर बाँध लेना भी चाहता है। कईं बार कुछ अर्थों को खोजने की जरुरत नहीं होती, बस यात्रा की निरंतरता ही किसी न किसी अर्थ को उस यात्रा के परिणामस्वरूप अर्थ प्रदान कर देती है। जैसे उस पेंगुइन की अनंत यात्रा। वह बस चल पड़ा.. सारे अर्थों के भ्रमों को त्यागकर। शायद इसी कारणवश हर किसी ने उस पेंगुइन को अपने आप से जोड़ लिया.. अपनी जीवनी से जोड़ लिया। नाइलीस्ट पेंगुइन कहकर सबने ही उसे अपना सा पाया।
अकेली यात्राएँ और अंतरात्मा से मुलाक़ात
लोग भी कितना निराश होंगे.. जिन्हे एक पेंगुइन से अपनापन लगने लगा..! उस पेंगुइन का सारा झुण्ड दरिया की ओर लौट रहा था, जीवन की ओर। लेकिन वह, पता नहीं उसे क्या हुआ.. वह उस एकांत की ओर बढ़ गया, जहाँ बस वह ही वह था। मृत्यु थी वहां। फिर भी वह आगे बढ़ा.. उस पथ पर उसे पता था, उसका कोई भी हमराही नहीं है। उसका कोई साथीदार नहीं है। कभी कभी हम भी तो ऐसी ही कुछ यात्राएं करते है। अपने अंतरात्मा से मिलने की यात्रा। जहाँ हमारे साथ कोई नहीं होता। हमे हमारा ही साथ निभाते हुए बस चलते रहना होता है। बिलकुल उस नाइलीस्ट पेंगुइन की तरह।
निरर्थकता का बोध पाकर।
शुभरात्रि।
|| अस्तु ||
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