मार्च एंडिंग, बाज़ार की भागदौड़ और एकांत की तलाश: अकेली ड्राइव का सुकून

0

मार्च एंडिंग, बाज़ार और एकांत की तलाश


Thoughtful Indian man sitting in a parked car at sunrise symbolizing March ending stress and solo self-reflection

मार्च एंडिंग का हउआ और बाजार की सच्चाई

    प्रियम्वदा !

    बात ऐसी हो गयी है, कि अब मार्किट में हउआ आनेवाला है, जिसे हम लोग मार्च-एंडिंग के नाम से पहचानते है। और मैं तो पेशे से, हूँ भी इसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ, जो दिनभर कंप्यूटर के आगे बैठकर, कीबोर्ड को कूटने के लिए कुख्यात होते है। काश हमारा भी कोई मार्च-एंडिंग होता। खेर, मार्किट में धड़ल्ले से छापे पड़ते सुनाई पड़ते है। और यह छापामार युद्ध के आगे तो मुग़लिया सल्तनत नहीं टिक पायी, तो हम क्या ही है। छापामार टीम भी बड़ी अजीब होती है, बाल की खाल तक नोंचते है। और इस मेहनत का मेहनताना जब तक तय नहीं हो जाता, युद्ध जारी रहता है। 


    एक बार मैं इस युद्ध में प्रतिभागी हुआ था। लेकिन उस बार छापा मारने वाले दिशाहीन भी थे, और उन्हें ज्यादा रस भी न था उस आक्रमण में। साइड बिज़नेस टाइप का युद्ध था। वे युद्ध की लूट में मेरे रुफ्फ़ कागज़ ले गए थे। सोचा होगा, खजाना है, लेकिन वास्तव में रद्दी था। बेचारे। अरे प्रियम्वदा ! यह खत पढ़कर कहीं जयकांत का ईगो हर्ट न हो जाए। छोडो, तुम तो यह बताओ, कि अपनी बैलेंस शीट कब मैच होगी?


फिल्मों में खोया मन

    कल फिर से एक ही दिन में तीन मूवीज देख ली। एक तो चिरंजीवी की "मन शंकर वर प्रसाद गरु" देखी। ठीकठाक लगी। एक प्रभास की "द राजसाब" भी देखि, जिसमे संजय दत्त विलेन है। यह भी ठीकठाक ही रही। फिर देखी अक्षर कुमार वाली " खेल-खेल में", यह भी ठीक ही रही। इतनी सारी फ़िल्में देखने का एक ही कारण है, मैंने एक बुक डाउनलोड कर रखी थी, वह पता नहीं कैसे अपने आप डिलीट हो गयी, या मैंने कर दी। अब एकसौ साथ मेगाबीट्स की फाइल फिर से कौन डाउनलोड करे, इसी आलस में फिल्मे देखता रहा। 


    अभी, आज एक और फिल्म देख ली, तापसी पन्नू की अस्सी। फिल्मे देखकर ही कुछ ढूंढने में लगा हूँ शायद मैं। मुझे भी नहीं पता। शायद एकांत। अस्सी अच्छी मूवी है। कोर्टरूम ड्रामा है। और रैप केस पर आधारित है। फिल्म का दृष्टिकोण आज भी वही है, जो हमेशा से रैप केस का होता है। लेकिन फिर भी देखने लायक है मूवी। कुछ बातें सीखने लायक। वैसे बातें भी वही है, जो हमेशा ऐसी फिल्मों में होती है। बॉलीवुड कहानियों के मामले में पिछड़ता जा रहा है। दक्षिण भारत इनोवेशन से लेकर फिल्म के प्लाट तक, आगे है।


    जीवन में भारी उथलपुथल मची हुई है। एक तरफ शादियों का सीजन है, एक तरफ मार्च की एंडिंग। हर कोई अपनी अपनी एंट्रीज सुलझाने में लगा हुआ है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा के बदले अभी तो, तुम मेरा माल बिक्वाओ, मैं तुम्हे कमीशन दूंगा वाला हाल चल रहा है। एक तो यूपी-बिहार की लेबर होली मनाने अपने गाँव लौट गयी है, ऊपर से यह डॉलर कूदि मारने में लगा है। और धंधा रेंगते हुए बढ़ रहा है। 


अकेले सफर का आनंद

    सोच रहा हूँ, कुछ दिनों बाद एक विवाह प्रसंग में हाजरी देने जाना है। कार लेकर चला जाऊं। प्रियम्वदा, मैं जब भी अकेला होता हूँ, अकेले ड्राइविंग करता हूँ, तब मुझे अपने आप का साथ बड़ा रास आता हूँ। यह पसंदगी का कारण एक ही है, सारे फैसले मेरे अपने होते है, सही, गलत, सब मेरा। और दोष देने के लिए बस मेरा भाग्य। भाग्य कभी प्रत्यक्ष होकर वाद में नहीं उतरता। उसे कितना ही कोस सकते है, कितनी ही गालियां दे सकते है, वह प्रत्युत्तर नहीं देता कभी। मैं जब भी अकेले किसी सफर पर निकला भी हूँ, तो मैं एक अलग ही अंदाज़ में होता हूँ। 


    एक बार कहीं अकेले ही गया था। मुझे पता नहीं क्या सूझी, मैं दूकान पर गया, उससे मैंने सिगार मांगी। एक लाइटर भी खरीदा, और सिगार फूंकते हुए सफर जारी रखा। आज तो याद भी नहीं, वह टेस्ट कैसा था। अपनी मर्जी का सफर हो, अपने तरीके से उसे बिताने में अलग ही आनंद होता है। जहाँ मैं पांच घंटे का सफर नॉनस्टॉप करता हूँ, वहीँ उसी रोड पर अकेला होता हूँ, तो पंद्रह मिनिट में दो स्टॉप ले लेता हूँ। रोड के किनारे गाडी खड़ी करके, बाहर रोड से सटे खेत में यूँही टहलता हूँ। मुझे कोई लेनादेना नहीं होता है, उस खेत की फसल से। फिर भी अगर खेत का किसान दिख जाए, तो उससे पूछ भी लेता हूँ, कि "शुं क्ये ओणनी सीजन?"


सूरजबारी का सूर्योदय और नमक के खेत

    अकेला सफर कर रहा होता हूँ, तो उगते सूरज को निहारने के लिए ठहर जाता हूँ। जबकि वह सूर्य हमेशा ही वैसा ही उगता है। वैसा ही दीखता है, जैसा मेरी छत पर उगता है। एक केसरी गोला। लेकिन सूरजबारी के नमक के खेत पर से वह उगता हुआ सूरज जरूर आकर्षित करता ही है। और मैं अगर अकेला हूँ, तो बस उसे क्षितिज से उठकर आसमान में ऊपर की ओर बढ़ते हुए देखता रहता हूँ। उस समय मुझे परवाह नहीं होती, हाईवे से गुजरते ट्रकों के हॉर्न्स की। या कितना समय व्यर्थ जा रहा है, मंजिल तक पहुँचने की देर मुझे सुई नहीं चुभोती। अकेला चल रहा होता हूँ, तब भी रात्रि का अंधकार मुझे अपने भीतर समा नहीं लेता। वह मुझे टिमटिमाते अनगिनत सितारों और एकम के चन्द्रमा की लकीर की ओर आकर्षित करता हुआ अनुभव होता है। उस समय निंद्रा भी मुझसे अटखेलियां करती है। 


एकांत की ध्वनियाँ

    एकांत का अनुभव करना चाहिए। घड़ी में चलती हुई सेकंड वाली सुई की टिकटिक बड़ी आवाज़ में सुनाई पड़ती है। और ज्यादा एकांत होता है, तब अपनी खुद की साँसों की भी आवाज सुनाई पड़ती है, फेफड़ों के फूलने और सकुचाने तक। उससे भी अधिक, हृदय की धड़कन तक सुनाई दे सकती है। 


    ड्राइविंग करते समय, अक्सर मौन रहते हुए भीतर कितने सारे विचारों की माला बनती-बिगड़ती रहती है। ऐसा लगता है, जैसे दो भिन्न परिस्थितियों में एक ही समय पर विचर रहे हो। अपने से आगे चल रही कार कहीं बाएं तो नहीं मुड़ जाएगी? और यह विचार चल रहा होता है, उसी क्षण एक और विचार यह चल रहा होता है, मैं जहाँ जा रहा  हूँ, वहां से बस पचास किलोमीटर की दूरी पर वह समन्दर का किनारा देखने लायक है, वही चल दिया जाए क्या? यह प्रश्नोत्तरी चलती ही रहती है। पुरे सफर तक। 


    शुभरात्रि। 

    २२/०२/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

👉 क्या आपको भी अकेले ड्राइव करते समय खुद का साथ अच्छा लगता है?
👉 क्या मार्च एंडिंग आपके जीवन में भी हलचल मचा देती है?

कमेंट में अपने अनुभव साझा करें।

अगर लेख पसंद आया हो तो शेयर करें और ऐसे ही आत्ममंथन भरे लेखों के लिए ब्लॉग को फॉलो करें। 

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:

मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

🔎 और भी पढ़ें

🌿 नर्सरी की ओर एक रविवार: अडेनियम, स्पाइडर प्लांट और भारत-पाक मैच की रात

❤️ वैलेंटाइन डे का इतिहास और वैलेंटाइन वीक का बाज़ार

🍷 गजग्राहपुराण : शराब, जिद और हाई कोर्ट ड्राइवर बनने तक की कहानी

🚶‍♂️ मैं खुद से मिलने निकला हूँ..! || Day 30 || मैं अपना हूँ..

🎮 एक रविवार, एक गेम-जोन और पिता होने की कीमत | प्रियम्वदा के नाम चिट्ठी


#MarchEnding #AkeleSafar #SoloDrive #Ekant #HindiBlog #LifeReflections #MarketLife #SelfDiscovery #HindustaniWriting #SafarAurSoch


Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)