गजा की सफलता का दिन – 11/02/2026
प्रियम्वदा !
की हुई महेनत कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। प्रत्यक्ष उदहारण आज गजा बना है। वही.. विषैला गजा। पिछले काफी टाइम से बहुत महेनत कर रहा था, आज सफल हुआ। ड्राइवर बन गया। अरे, ड्राइवर मतलब, हाई कोर्ट का ड्राइवर। सरकारी नौकरी में पोस्ट छोटी हो सकती है, लेकिन समाज में सरकारी नौकरी का कद नहीं। सरकारी नौकरी का कद समाज में हमेशा से बहुत ऊँचा रहा है। फिर भले ही वह प्यून/चपरासी ही क्यों न हो.. अभी शाम ढलने से पूर्व उसने फोन करके यह शुभ समाचार दिया, आज तारीख है, ११/०२/२०२६..
बचपन का पुल, किले और युद्ध वाले खेल
प्रियम्वदा ! एक दिन पत्ते की पोल खोली थी मैंने (यहाँ पढ़ा जा सकता है।), आज विषैले गजे को घसीटा जाएगा। अब तो मुझे याद नहीं है, कि हमारी पहचान कैसे हुई थी, लेकिन इतना याद है, कि हम पडोसी थे, साथ खेलकर बड़े हुए है। गजा उस समय से ज़िद्दी और अड़ियल तो रहा है। वैसे यह दोनों उपाधि कम है, उसे धूनी कहना चाहिए। जिस समय पर उसे जो धून सवार हुई, वह वही गीत गाता रहा। एक ही जाति के है, लेकिन शाखा अलग है। और दोनों को ही इतिहास में गाढ़ रूचि रही है। इतिहास के पन्नों पर तो हम दोनों दुश्मन रहे है। इतिहास में उसका वंश, और मेरा वंश समय-समय पर लड़ता रहा है। बस फर्क इतना है, कि वे लोग हमसे पहले उखड़ गए, हम थोड़ा बाद में..!
इतिहास, जाति और दोस्ती की टकराहट
प्राकृतिक रूप से हमारे खेल भी कुछ वैसे ही थे, युद्ध निर्णायक वाले। मुझे याद आता है, पास में एक स्मशान है। स्मशान के ऊपर से अंग्रेज कालीन नेरोगेज ट्रैन का ब्रिज गुजरता है। नेरोगेज तो उखड़ गए, लेकिन यह अंग्रेजो की याद सरीखा, पत्थर का पुल ज्यों का त्यों खड़ा था। हम बचपन में / किशोरावस्था में वही खेल खेलते थे, पुल पर एक रेतीला टीला बना था, वह बनता मेरा किला, और गजा इस किले पर चढ़ाई करता। उस खेल में, एक दूसरे को लाठी लग भी जाती। क्योंकि लाठी को भाला मानकर सच में फेंका जाता, वह भी सीधे सर का निशाँ लेकर।
एक्सट्रीमिस्ट स्वभाव – गुटखा, सिगरेट और शराब
हम लोगों ने उसी पुल पर बीड़ी के बंडल फूंके है। अरे गुटखे से तो पुल के पत्थर लाल किये है। पुल के पत्थर से याद आया.. वह दौर था, शिलालेखों का। आज अगर वह पुल होता, तो वहां आज भी वे पत्थर साक्षी होते, कि कभी गजे ने, और कभी मैंने भी.. उन पत्थरों पर अपने पहले आकर्षण के नाम का प्रथमाक्षर अपने-अपने नामों के प्रथमाक्षर के साथ दिल बनाकर कुरेदे थे। वह पुल हमारे आकर्षणों का साक्षी रहा है। वह पुल साक्षी था, कि हम लोग लोमड़ियों से लोहा लेने निकल पड़े थे, बस अपना जिगरा-बहादुरी-बेवकूफी दिखाने को। लोमड़ियों का झुण्ड बहुत करीब आ गया, तब उनपर हमने पथराव किया था।
दसवीं के बाद मैं डिप्लोमा करने वड़ोदरा चला गया था। गजा मुझसे साल-दो साल छोटा है। मुझे देख-देख उसने भी डिप्लोमा चुना था। बस, मैं फ़ैल होकर वापिस लौट आया, और उसने मेहनत करके पास किया। खेर, हम दोनों ही नौकरी चढ़ चुके थे। मैंने तो एक लाइन पकड़ ली, और आज भी वहीँ हूँ। लेकिन गजे ने काफी उतार-चढ़ाव लिए। वह एक जगह टिकने को तैयार न था। कभी यहाँ, कभी वहां। और एक दिन वह पूरा परिवार ही कहीं नया मकान लेकर शिफ्ट हो गया। थोड़े दूर चला गया, लेकिन गजा आज भी हमारे वहां ही भटकता पाया जाता है।
दोस्ती की दूरी और सामाजिक दबाव
खेर, वह सदैव से एक्सट्रेमिस्ट रहा है। जो भी करो, हद पार करके करो। उसने गुटखा खाना शुरू किया, पूरा दिन चबाता रहता था। उसने तम्बाखू खाना शुरू किया, पूरा दिन मुँह में भरकर रखता। उसने सिगरेट फूंकना शुरू किया, तो सारे दिन में पैकेट्स खत्म कर देता। और फिर वह दौर आया, जहाँ मुझे इस गजे से आपत्ति होने लगी। मैं इससे दूरी बनाने लगा, दूरी से मतलब है, दोस्ती में नहीं, लेकिन एक ऐसी लकीर, जहाँ तक दोस्ती निभायी जा सके। वह दौर था, जब गजे ने बेहद शराब पी।
मुझमे और उसमे बस फर्क यही था, मैं अपनी हद में रहा, और एवरेज बना रहा। वह कभी भी एवरेज नहीं रहा, सदा ही एक्सट्रेमिस्ट। जो भी किया, बेशर्म होकर, खुलेआम किया। आज भी वह काफी बातें होती है, मुझे बताने लायक तो पहले बताता है। कभी कभी राय पूछ लेता है, काश वह पिने के मामले में राय पूछ लेता। जब वह शेयर बाजार में कूदा, तब मुझे भी उससे राय लेनी पड़ती थी। क्योंकि भाई एक दिन में सात-आठ हजार छाप लेते थे। उसने लगभग चीजे मुझे देखकर की, और मुझसे बेहतर की।
वह दौर था, जब वह शराब पीकर गिरा पड़ा हुआ मिलता। तब मैंने उससे मुँह मोड़ा था। बस इसी कारण से, क्योंकि मेरे भी घर पर मुझे कोसा जाने लगा था। क्योंकि हम दोस्त थे, जब भी वह पकड़ा जाता, मुझे मेरे घर पर मेरा मुँह सुंघाना पड़ता। उसे कितना समझाया, कितना बेइज्जत किया, लेकिन अगला बेशर्म होकर बस पीकर पड़े रहने में आनंद लेता था। कितनी बार मैंने उसे संभाला है, जब वह पीकर फ़ैल हो जाता था। गरबीचौक में ठन्डे पानी से नहलाया है, ताकि उसका नशा उतरे, और उसके घर पर पता न चले। उसके नशे की लत के चलते एक दो बार कूटा भी है। लेकिन सुधरने के बजाए वह और पीता। जब भी पूछते, कि समस्या तो बता, क्यों पीता है इतना, तो कहता बस मजा आता है। समस्या कुछ भी नहीं है। जिगरी तो है ही.. उसने भरे बाजार में बैठकर शराब पी है।
फिर एक दौर आया, हम लोग अपनी अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए। हमारा संपर्क भी कम हो गया। अरे हाँ.. कोरोना के लॉक-डाउन में जब कुछ भी नहीं मिल रहा था, तब मैंने उसे कईं बार तम्बाकू सप्लाय की है। एक दिन उसने बताया, कि उसने शराब छोड़ दी। मैं क्या राज़ी हुआ था उस दिन। कि हाश.. अब तो सुधरा। शराब छोड़ने की दवाई दिलवाई थी उसके परिवार ने। लेकिन गजे की इच्छा देखो, उसने यह चेक करने के लिए एक दिन शराब पि, कि दवाइ लेने के ऊपर शराब पिने से होता क्या है? पूरा लालमलाल होकर बैठा था मेरे सामने। हमने क्या गालियां निकाली थी उस दिन उसे..! लेकिन बड़ा बेशर्म है। हँसते हुए सारी गालियां पचा गया।
सरकारी नौकरी की तैयारी और छह महीने का संघर्ष
बीचमे करीब छह महीने घर बैठा। नौकरी नहीं कर रहा था। जब भी पूछो तो कहता, सरकारी भर्ती की तयारी कर रहा हूँ। उस छह महीने, मैंने और पत्ते ने उसे खूब भला-बुरा कहा। क्योंकि वह बेरोजगार होकर घर बैठा था। हालाँकि परिवार सक्षम है। लेकिन फिर भी शादीशुदा मर्द कभी घर पर बैठा, हमारा समाज स्वीकारता नहीं है। मैं भी सामाजिक प्राणी ही हूँ। लेकिन अगला अड़ा रहा था। मैंने जब यह सरकारी नौकरियों की भर्ती की परीक्षाएं दी थी, तो एक समय पर मैंने पीछेहठ कर ली थी। और मैंने स्वीकार लिया था, कि यह मेरे बस का नहीं। क्योंकि मैंने दी हुई तीन में से दो परीक्षाएं पेपर लीक होने के नाम पर रद्द कर दी गयी थी।
असफलताओं से जूझता गजा
लेकिन गजा तब भी अड़ा रहा था। उसने नौकरी छोड़ी, बस यह तैयारियों के लिए। उसकी लगन ही थी, वह हर उन परीक्षा की तैयारियों में जुट जाता, जिसमे उसे लगता कि वह कर सकता है। बस फारेस्ट की नहीं देता, क्योंकि वहां उछल-कूद ज्यादा होती है। शारीरिक कसौटी ज्यादा होती है। अरे.. सवा आठ बज गए, बाकी कल लिखूंगा।
हाई कोर्ट ड्राइवर – मंज़िल मिली
तो बात ऐसी है, जहाँ चाह वहां राह.. उसने भरपूर महेनत की, कितनी ही परीक्षाओं में कुछ अंकों से नापास भी हुआ, लेकिन अपने आप पर भरोसा करते हुए, एक मुकाम पर तो पहुँच ही गया। शाम को फिर मैंने उसे फ़ोन करके चिढ़ाया, "चलो ड्राइवर गाडी निकालो।" जज का ड्राइवर भी तो जज जैसा ही होता है। खेर, अभी कुछ दिन पहले मुझे किसी ने बताया, कि गजा फिर से बेवड़ेपन की राहों पर चल पड़ा है। मैंने और पत्ते ने प्लान बनाया, कि इसे बुलाते है, और अबकी बार तसल्ली से धमकाते है। फ़ोन मिलाया, तो ढंग से बात करता पाया गजे को। मतलब सूफी था। तो हमने उस दिन टाल दिया। और बाद में हम भी भूल गए।
दोस्ती, धमकी और दुआएँ
फिर अभी तीन-चार दिन पहले ही उसका फोन आया, वही जौ के पानी के लिए। तो उस दिन खुलासा हुआ। असल में गजे ने एक दिन पार्टी की तो थी, और शराबबंदी की दवाई खाने से रिएक्शन भी हुआ था। और उसी कारण वह अपने ऑफिस पर ही सो गया था। तो बस, यही बात मुझे किसी ने यह कहकर बता दी, कि गजा फिर से भरचक पिने लगा है। खेर, अब तो उसे यही धमकी दी है मैंने, कि अब पिने की खबर आयी, तो उसके घर पर जाकर मैं ही रूबरू बता दूंगा। खेर.. हम दोस्तों में बहुत उठापटक चलती रहती है। गजे का एक काण्ड लिखने की इच्छा तो है, लेकिन क्या पता, वह यह पत्र के बारे में भी अपने घर पर बता दे, क्योंकि भाई का पेट छिछरा है, तुरंत अपने घर पर बता देता है सारी बातें।
चलो, फिर, आज अब यह गजग्राहपुराण को यहीं समाप्त करता हूँ। गजे को और विषपूर्ण होने के भविष्य की अनंत शुभकामनाए। उत्तरोत्तर सामाजिक गतिविधियों को अपनी विषाक्त वाणी से सींचता रहे। और सतत उन्नति के शिखर सर करे, और शेषनाग बन जाए, यही शुभेच्छा।
शुभरात्रि।
१३/०२/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अपनी राय कमेंट में लिखिए।
“दिलायरी” पढ़ते रहिए — क्योंकि हर दिन एक नया सच जन्म लेता है।
Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
और भी पढ़ें :
एक रविवार, एक गेम-जोन और पिता होने की कीमत | प्रियम्वदा के नाम चिट्ठी
कट्टर भक्ति, ओवरवॉटरिंग और दिलबाग : बॉर्डर 2 से गार्डनिंग तक एक आत्मकथा
तमस : दंगों की स्मृति, साहित्य की सच्चाई और एक आम आदमी का आत्मसंवाद
UGC एक्ट, आरक्षण और ‘तेरे इश्क़ में’ : व्यवस्था, जाति और स्वार्थ का कटु सच
#दिलायरी #गजग्राहपुराण #सरकारीनौकरी #जहाँचाहवहाँराह #दोस्ती #संघर्ष #सफलताकीकहानी #हाईकोर्ट #जीवनडायरी #MotivationHindi


Congratulations gaja bhai
ReplyDelete