नर्सरी की ओर एक रविवार: अडेनियम, स्पाइडर प्लांट और भारत-पाक मैच की रात

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क्या लेखनी कभी बदलती है?

    देखो प्रियम्वदा, बात ऐसी है, गुजराती में मुहावरा है, बड़ा सटीक है, "बुढ़ापा मां केश बदले, लखण न बदले लाखा" मतलब लक्षण कभी नहीं बदलते आदमी के। मैंने बिच में कितनी सारी अलग अलग पुस्तकें पढ़ी, सोचा था, उन  पुस्तकों का प्रभाव पड़ेगा मेरी लेखनी पर। लेकिन नहीं। कोई फर्क नहीं है। मैं आज भी वैसा ही लिख रहा हूँ। उल्टा मेरा गुजराती व्यंग्य भी जा डूबा किसी गर्त में। सारा दोष तुम्हारा है प्रियम्वदा। मैं कहाँ इस उम्र में दोष का भी बोझा उठाऊं।


Cartoon illustration of an Indian man holding Adenium and Spider Plant pots, with symbolic highway, bougainvillea flowers, hanging bats, and nursery elements on a plain white background.

नर्सरी की ओर एक अचानक सफर

    यह उबाऊ और नीरस लेखनकार्य के चलते, नया कुछ पढ़ने का मन उतना ही होता है, जितना व्यंजन में स्वादानुसार नमक। मैंने तो 2012 से फ़ैल होने का ही सिलसिला यथावत रखा है। वड़ोदरा, नौकरी, जीवन-स्तर, कविता, लेखनी, ब्लॉग, और अब दिलबाग भी। कल फिर दो नए पौधे ले आया। हुकुम गेट पर ही खड़े थे, जब मैं सिरस्त्राण सा हेलमेट पहनकर बाइक में चाबी लगा रहा था। मुझे देख उन्होंने तीन अक्षर उच्चारे, "किधर?" मैंने भी तीन अक्षरों में प्रत्युत्तर दिया, "आता हूँ !" उन्होंने अपनी आँखे बड़ी की, और फिर बोले, "किधर?" अब की बार "आता हूँ" कह देने से नहीं चलने वाला था। 


    मैंने कहा, "पास वाले शहर।"


    "क्यों?" उन्होंने अपनी बड़ी आँखों को और बड़ी करते कहा। अबकी उनकी आँखों में लाल रेखाएं खींची दिखी। 


    "वहां एक नर्सरी है।" मैंने नई नवेली दुल्हन की तरह नजरें नीची रखते कहा। 


    "तो?" इस बार उनकी आवाज़ में एक कड़ापन भी था।


    "अरे आता हूँ न.. वैसे भी सन्डे है। थोड़ा टहलना भी हो जाएगा।" मैंने बिलकुल ही समर्पण करते हुए कहा।


    "ठीक है, समय पर लौट आना।" और वे गेट से घर में दाखिल होते हुए बड़बड़ाए, "बागवानी करेंगे नवाबजादे, एक पौधा तो ढंग का हुआ नहीं है छत पर।


    मैंने बस पहले वाले वाक्य को सुनकर राजी रहना उचित समझा और निकल पड़ा। रविवार का ढलता दिन, ऊपर से शिवरात्रि, हाईवे काफी खाली पड़ा था। कोई कोई कार गुजरती, वह पूरी फॅमिली से लबालब भरी दिखती, जैसे किसी लम्बे सफर पर वे जा रहे हो, या फिर लौट रहे हो। मेरे आगे आगे एक बिहार पार्सिंग की कार बिलकुल ही माध्यम गति पर चले जा रही थी। रोड के किनारे थोड़े थोड़े अंतराल पर बदलते जा रहे थे। कभी भारत की असल पहचान से खेत दोनों तरफ होते, कभी विकास की चुगली खाती कोई फैक्ट्री आती। कभी कोई सब्जी मंडी, जहाँ अनेकों नर-नारी हाथ में झोला लिए एक लारी से दूसरी लारी सब्जियों की ताज़गी को जांचते घूम रहे होते। 


सरकारी नर्सरी और विशाल चमगादड़

    सीधी रेख में बने काले फोर लेन हाईवे को बिच से चीरते हुए बने डिवाइडर में सारे ही बोगेनवेलिया भरपूर वसंत में थे। कोई लाल, कोई रानी-गुलाबी, और कोई पीच रंग में वे कागज़ी फूल, जैसे इस काले हाइवे का श्रृंगार करने का प्रयास कर रहे हो। थोड़ी ही देर में उस शहर पहुँच गया, जो मशहूर है अपनी ऐतिहासिकता के लिए। जिसके कितने ही लोकगीत है। जहाँ किसी समय पर एक लूटेरा संत बना। और जहाँ आज भी पारम्परिक शस्त्रो की मंडी देखने मिलती है। उस शहर के बायपास से एक रास्ता जाता है। सरकारी नर्सरी। 


    गूगल मैप के सहारे एक लाल-हरे रंग में रंगे गेट के पास पहुँच गया। लाल और हरा रंग सूचित करता है विभाग को। यहाँ आसपास में पचीस-तीस किलोमीटर तक में कोई भी आरक्षित वन्य रेंज नहीं है। फिर भी वन-विभाग यहाँ बैठा है। आयात की हुई लकड़ियों की गिनती करने। खेर, गेट के बाहर एक तकती टंगी थी। "रोपा वितरण बंध छे." फिर भी मुझे कोई निराशा नहीं हुई। सरकारी तंत्र है न। कई सारे नियमों के अधीन चलता है। मैं गेट खोलकर भीतर दाखिल हुआ। एक माली पानी का छिड़काव कर रहा था। प्लांट्स की तादात बहुत ज्यादा थी, लेकिन विकल्प ज्यादा नहीं थे। अब मुझे निराशा होने लगी। 


चार फुट के पंखों वाले मेहमान

    अनेकों नीम, गुड़हल, कनेर और शायद आवड के पौधे थे। बस, और कुछ नहीं। वहीँ टहलते हुए सहसा मेरी नजर एक बहुत ऊँचे वृक्ष पर पड़ी। पतझड़ में उस वृक्ष के बड़े बड़े पत्ते ज़मीन पर गिरते जा रहे थे। लेकिन उसकी तमाम शाखाओं पर जैसे बड़ी बड़ी काली पन्नियां लटक रही थी। थोड़ा नजदीक जाकर देखा, मैंने पहली बार इतने बड़े चमगादड़ देखे। अगर वह चमगादड़ अपने दोनों पंख फैलाए, तो करीब चार फिट का हो जाए। उसका मुँह कुछ कुछ सियार जैसा था। कम से कम पचीस होंगे। और सारे ही उलटे लटकते हुए अपने पंखों को लपेटकर मुँह छिपाए सोए मालुम हो रहे थे। इतने बड़े चमगादड़ मैंने पहली बार देखे। मैं और करीब जाने की सोच रहा था, पर उतने में माली अपना छिड़काव रोक चूका था। इसका अर्थ था, अब बहार चले जाना चाहिए। नर्सरी बंद थी, लेकिन देखने पर मनाही नहीं थी। 


    सारे ही पौधे बड़े वृक्षों के थे, तो मैं बहार चल दिया। गेट से निकला ही था, की सारे चमगादड़ चिचियाते हुए उड़ने लगे। चमगादड़ों का उड़ने का तरीका भी तो अन्य पक्षियों की तुलना में भिन्न होता है। जैसे हवा में सियार कूद रहे हो। उनकी आवाज़ रात में भयजनक हो पड़े। खेर, मैं फिर अपने शहर की ओर लौटने लगा। सोचा वही अपनी पुरानी वाली चुलबुली की नर्सरी चला जाए। मैंने अपना पहला पौधा उसीसे खरीदा था। पिछले कुछ दिनों में उसकी नर्सरी शहर का विकास खा गया था। असल में उसने नर्सरी रेलवे की जमीन पर लगाई है। और वहीँ से पानी की बड़ी लाइन गुज़रनी थी। उसके बड़े हो चुके पेड़ों को JCB मशीन ने तिनकों की भाँती निकाल फेंका था। 


पुरानी नर्सरी, नई जद्दोजहद

    नन्हे पौधों को तो उसने कहीं और शिफ्ट कर दिया था। मैं उस रस्ते से गुज़रा तो, वह कुर्सी पर बाहर ही बैठी थी। उसका पिता फावड़ा लेकर मिट्टी को खोदे जा रहा था। पहले मैंने उनके हाल चाल पूछे। उसका पिता फावड़ा पटक मेरे पास आ गया। अपने उत्तर प्रदेश के लहजे में बोला, "का बताए भैया.. इधर ही से नरम्दा (नर्मदा) का लाइन निकला है। उ देखो, उ सारे बड़े पेडवा तो उखाड़ दिए। ई सारा माल तो अंदर शिफ्ट कर दिए थे। अब फिर से सारा सेटअप बिठाना पड़ेगा।"


    "अरे अभी तो महानगरपालिका वाले भी आएँगे। कहीं और शिफ्ट कर लो समय पर। वरना वो लोग तो अच्छाखासा फाइन भी मारेंगे। सारे प्लांट्स भी उठा ले जाएंगे।" रेलवे लाइन और रोड के बिच डली बड़ी बड़ी नर्मदा की मीठे पानी की लाइन के ऊपर ही यह आदमी अपनी नर्सरी खोले बैठा था। 


    "अरे हम एक प्लाट ले लिए है। इधर से पहला नहीं, दूसरा कट में बाहिने मुड़ते ही एक प्लाट है। उधर भी नर्सरी खोले है। अभी दू-चार दिनों में नए माल का ट्रक आएगा। आप उधर भी आइएगा।" उसने अपनी नई जगह का पता बताते हुए अपने ग्राहक को बाँधने के उदेश से कहा। 


    "अरे वाह, बहुत बढ़िया। चलो अब मेरे को पौधे देखने दो।" मैंने नर्सरी में दाखिल होते कहा, "ए गुड़िया, अडेनियम पड़ा है? दे दे। और वो क्या है.. स्पाइडर प्लांट? वह भी एक दे-दे।"


सांवली किशोरी और पौधों के प्रति लगन

    वह सांवली किशोरी उठी, बिलकुल ही सूखा शरीर। मांस के बदले मानो बांस का सोटा ही है वह। थोड़ी बड़ी, लेकिन हमेशा अपने पौधों को ही देखती उसकी आँखे। नाक थोड़ा तीखा। होंठ भरे हुए नहीं, बल्कि छोटे। अपने काले बालों की एक चोटी बाँध रखी थी, लेकिन देखते ही पता चलता था, कि रस्ते पर वाहनों के गुज़रने से उड़ती धूल ने उसके बालों का श्यामवर्ण छिपा लिया है। वह अपने दुबले पतले हाथों में एक अच्छा सा फूटती कोंपलों वाला अडेनियम का पौधा ले आयी। उसका पिता फिर से फावड़ा लेकर मिट्टी को कूटने लगा था। अडेनियम रखने के बाद वह एक दोरंगी पत्तियों वाला स्पाइडर प्लांट भी ले आयी। वह कभी नजरें नहीं मिलाती है। मैंने लगभग सारे ही पौधे उसीसे लिए है। फिर वह बोली, "खाद नहीं लीजियेगा? खाद.. खातर।" वह शायद जानती है, कि मैं गुजराती हूँ। इस लिए वह खुद ही खाद को गुजराती में खातर बोली। 


    "नहीं DAP पड़ा है। पिछली बार जब यहाँ लाइन का काम चल रहा था, तो मैं किसी और नर्सरी चला गया था। उसीसे खरीदा।" मैंने स्पष्टता दी। 


    "अरे बाप रे, गर्मी में नहीं दीजिएगा। सारा पौधा जलभुन जाएगा।" उसकी पौधों के प्रति अलग ही लगनी दिखती है। हालाँकि होनी भी चाहिए, काम है उसका। कुछ रूककर फिर से बोल पड़ी, "बर्मी कॉम्पोस (वर्मी कम्पोस्ट) ले जाइये, गर्मी में मिटटी को नरम रखेगा।"


    लेकिन मैं वह अनसुना करते हुए और प्लांट्स देखने लगा। पर्पल हार्ट की जामुनी पत्तियां मुझे आकर्षित तो कर रही थी, लेकिन फिर हुकुम का वह वाक्य याद आ गया, जिसे मैंने अनसुना किया था। वह किशोरी कुछ देर खड़ी रही, फिर वापस कुर्सी में जाकर बैठ गयी। मैंने कुछ और रटे-रटाये प्लांट्स को देखा, अपनी गमलो की तंगी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था। तो बस, इन दो पौधों की कीमत चुकाई और चल दिया। 


अडेनियम और स्पाइडर प्लांट की रिपोटिंग

    आसमान के सिरे पर बैठा था, वह नारंगी गोला अब दिख नहीं रहा था कहीं। दिन का शोरगुल संध्या वंदन करने को ही शांत हुआ था शायद। वातावरण में एक गुलाबी ठण्ड बिखरने लगी थी। मैं छत पर गया। दो पौधे वही रखे। पास में ही चल रहे कंस्ट्रक्शन से एक बाल्टी भर रेत ले आया। अडेनियम को मिलावटी मिट्टी पसंद है। काली मिट्टी पानी के मिलते ही सख्त पत्थर जैसी हो जाती है। थोड़ी रेत मिला दी जाए, तो मिट्टी ढेला नहीं बनती, और पौधों को अपनी जड़ें फैलाना सरल हो जाता है। मेरे लगभग गमलों में निरि मिट्टी भरी है। 


मिट्टी में रेत मिलाने का विज्ञान

    अँधेरे ने सब कुछ घेर लिया था। छत पर लाइट का कोई बंदोबस्त नहीं है। मोबाइल की टोर्च ऑन की। एक प्लास्टिक की बरनी में मिट्टी भरकर मैंने पोर्टुलका लगाए थे। सर्दियों में वे नामशेष हो गए थे। तो उस बरनी को खाली किया। उस बरनी वाले गमले की मिट्टी निकालने में मेरे पसीने छूट गए। पानी पी-पीकर वह मिटटी पत्थर जैसी मजबूत हो चुकी थी। एक तसले में नयी मिट्टी और रेत समान मात्रा में मिलाई। उस गमले के निचे एक ड्रैनेज होल बनाया। अडेनियम की वह नर्सरी वाली मिटटी हटाई। और इस नए गमले में रिपोट कर दिया। उसी तरह एक और खाली गमले में स्पाइडर प्लांट को भी रिपोट किया, बस उसकी नर्सरी वाली मिट्टी ज्यों की त्यों रहने दी। 


शिवरात्रि, उपवास और भारत-पाक मैच

    घर में सभी का शिवरात्रि का उपवास था। अरे कुँवरुभा स्वयं सवेरे से मात्र फलाहार का सेवन कर रहे थे। उनकी शाला में उन्हें बताया गया था कि आर्मी वालों के लिए एक दिन का उपवास रखना है। पुलवामा के शहीदों के लिए। मैंने कोई उपवास नहीं रखा था। अतः मेरे भोजन के लिए तो तब भी रसोईघर में अग्नि प्रज्वलित हुई। पास के पंजाबी ढाबे से मैं अपने लिए दाल-तड़का ले आया। ढाबे पर पार्सल का आर्डर देकर बेंच पर बैठा ही था, कि वहां बैठे सभी को अपने अपने फ़ोन में नजरें गड़ाए पाया। कमेंट्री की आवाज सुनाई पड़ रही थी। 


    मुझे याद आया, आज तो भारत-पाकिस्तान का मैच है। मैं हमेशा से उस विचार का पक्षधर रहा हूँ, जो मानते है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार का संबंध नहीं होना चाहिए। क्रिकेट मैच का भी नहीं। मैं तो वैसे भी क्रिकेट देखता नहीं हूँ। कभी-कभार कोई आईपीएल देखि होगी, या फिर एक बार भारत-पाकिस्तान की ही मैच देखी थी, जब भारत की टीम बुरी तरह से हारी थी। क्रिकेट एक ऐसी चीज है, जो अनजान लोगों को भी बात करवा सकती है। मैंने उसी बेंच पर बैठे व्यक्ति से स्कोर पूछा। जबकि मुझे क्रिकेट में जरा भी दिलचस्पी रहती नहीं। कोई बात भी कर रहा होता है, तो मैं ध्यान नहीं देता हूँ। तो उस व्यक्ति ने अपना फोन ही मेरे तरफ घुमा दिया। अगला अपने मुँह में शायद अमूल्य गुटखा भरे हुए था, जिसे अभी थूकने की नौबत आयी नहीं थी। 


पटाखों के बीच सोती हुई रात

    मेरा पार्सल लेकर घर लौटा। रात्रिभोजन के पश्चात कुछ देर छत पर टहलता रहा। और रात्रि के अस्तित्व को स्वीकारते हुए सोने चल दिया। कुछ ही देर में पटाखों की गूँज सुनाई पड़ी। बिस्तर में लेटे लेटे ही मैंने भारत की पाकिस्तान पर इस नूतन विजय से गौरवान्वित होकर आँखों को आराम दिया। 


    शुभरात्रि। 

    १५/०२/२०२६

|| अस्तु ||


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