वैलेंटाइन डे का इतिहास और वैलेंटाइन वीक का बाज़ार

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वैलेंटाइन डे का इतिहास: संत या कथा?

    प्रियम्वदा !

    रोमन सम्राट क्लॉडियस द्वितीय का मानना था, कि अविवाहित पुरुष बेहतर सैनिक होता है। इस लिए उसने सैनिकों के विवाह पर प्रतिबंध लाद दिया। तो उसी नगर में रहते एक संत ने छिप-छिपकर कईं प्रेमी जोड़ों की शादिया करवाई। उन संत का मानना था, कि यह तो अन्याय है, प्रेम पर कोई पाबन्दी नहीं होनी चाहिए। लेकिन एक दिन सम्राट को इस संत का पता चल गया, जो राजाज्ञा की अवहेलना करते हुए, लोगों की शादियां करवा रहा था। सम्राट ने संत को क़ैद किया, और चौदह फरवरी को मृत्युदंड दे दिया। कहते है, जब वह संत जेल में थे, तो उन्हें जेलर की अंधी बेटी से लगाव हो गया। अपनी फांसी से पहले उन्होंने उसे एक पत्र लिखा, जिसके अंत में लिखा था, "From your Valentine.." तब से यह पंक्ति प्रेमियों की पहचान बन गयी। 


Minimalist cartoon illustration on white background showing a thoughtful Indian writer holding a diary at the center, observing a confused young couple with a deflating heart balloon and a teddy bear with a price tag, surrounded by Valentine Week commercial symbols like chocolates, perfume, shopping bags, and a hotel silhouette, with a Roman emperor and a saint in the background.

क्या प्रेम पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है?

    मध्यकालीन इंग्लैंड और फ़्रांस में ऐसी मान्यता थी, कि 14 फरवरी से पंछियों का जोड़ा बनना शुरू हो जाता है। और धीरे धीरे यह दिन प्रेम-प्रस्ताव और प्रेम-उत्सव से जुड़ गया। यही कहानी है, प्रेमियों के महापर्व चौदह फरवरी के वैलेंटाइन्स डे की। बताओ.. है कुछ सीखने लायक इस प्रसंग में? एक सनकी सम्राट है, एक संत है, जिसे जेल में रहकर एक अंधी से आकर्षण हो जाता है। वह भी संत होते हुए? और उसे फांसी लगती है, क्योंकि वह शादियां करवाता था। और शादी करवाना अपराध था.. मतलब कुछ भी..? कुछ तो लॉजिक हो कहानी में..! लेकिन लोगो ने खोज निकाला.. कुछ लोगो को लगा, कि प्रेम प्रस्ताव करने का भी एक दिन होना चाहिए.. तो रख दिया, चौदह फरवरी। 


प्रेम या शरीर की आवश्यकता?

    छोडो प्रियम्वदा ! प्रेम तो वैसे भी फटा दूध है। है तो निरुपयोगी, लेकिन पनीर भी बन सकता है। जिनके पास कोई लक्ष्य नहीं होता, किसी सिद्धि की कामना नहीं होती, और ढेर सारा समय होता है, वह प्रेम-प्रेम खेलते है। एक दूसरे को निहारते रहते है। चॉकलेट का आदान-प्रदान होता है। विलायती रुई भरे गुड्डे को भेंट दिया जाता है। गले मिला जाता है। बजरंगदल न टकरा जाए उसकी मन्नतें मानी जाती है। और फिर किसी रूम में प्रेम के कलुषित पर्याय को निभाया जाता है। और फिर कुछ दिनों में एक-दूसरे की आदतों से तंग आकर अलग हो जाने का एकपक्षीय निर्णय ले लिया जाता है। और बस, एक आगे बढ़ जाता है, दूसरा कुछ दिनों तक देवदास का स्वांग रचकर फिर अपने अपने जीवन में नए प्रेम को खोजने में व्यस्त हो जातें है। 


क्यों प्रेम किशोरावस्था में अधिक होता है?

    तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, प्रेम का एक चरण शरीर से होकर क्यों गुज़रता है? जब जब शरीर को आवश्यकता होती है, उस समय प्रेम का स्वांग देखना, वह दुनिया की तमाम खुशियां चरणों में लाने को तत्पर होता है। जब जब शरीर की आवश्यकता कम होती है, प्रेम स्थिर हो जाता है। जैसे sideways चल रही शेयर-मार्किट। उस समय में जीवन को निभाने के ख्याल ज्यादा होते है, जब प्रेम का चंगुल कम कसा हुआ रहता है। कभी किसी ने भरपूर तनाव के बिच अपने प्रेम का ज़िक्र किया है? इसी लिए कहता हूँ, शरीर ही निर्धारित करता है, कब प्रेम करना है, कब नहीं। कोई किसान हल चलाते हुए बादलों को रिझाने के गीत गाएगा, न कि अपनी वामांगी को। 


    एक चीज यह भी तो है, जिस चीज का अनुभव नहीं होता, उसका उत्साह भी तो बहुत होता है। बस यही मुख्य कारण है, कि प्रेम हमेशा किशोरावस्था और युवावस्था के संधिकाल में होता है। जिसने दुनियादारी देखी हो, शरीर को समझ लिया हो, उसे प्रेम के प्रति एक समान भाव अनुभव होगा। कभी किसी बुड्ढे को किसी बूढ़ी के पीछे लट्टू होतें नहीं देखा-सुना। 


वैलेंटाइन वीक – क्या यह बाज़ार की रणनीति है?

    मैं सोच रहा था, कि यह जो वैलेंटाइन वीक है, एक पूरा सप्ताह। जब प्रेम की बौछार हो रही होती है चारो-और। यह हकीकत में एक बाजार प्रेरित चाल है। तुम सोचो प्रियम्वदा, फरवरी में वरना बाजार गर्म करने का कोई अवसर है भला? गिफ्ट्स इंडस्ट्रीज, और कार्ड कम्पनीज ने दुनिया को प्रेम के चोंचले में फंसा दिया। अपने फायदे के लिए यह इंडस्ट्रियल लोग, पानी के बदले टॉयलेट पेपर खोज निकालते है, तो भला यह तो प्रेम जैसा पागलपंती भरी भावना, और युवा जोश को बहकाने का सुअवसर कैसे जाने दिया जा सकता है? 


रोज़ डे से किस डे तक – किसका फायदा?

    तुम ही बताओ प्रियम्वदा, सात फरवरी को रोज डे.. मतलब या तो बगायत किसान जो गुलाब उगाता है, उसे फायदा, या फिर वह आर्टिफीसियल गुलाब बनाने वाली इंडस्ट्री को फायदा। आठ फरवरी को प्रोपोज़ डे.. अब आदमी प्रोपोज़ जैसी महा-घटना को अंजाम देने वाला है, तो कपडे से लेकर बालों के महंगे जेल तक तैयार होगा, मतलब इन सब से जुडी इंडस्ट्री को लाभ.. और प्रोपोज़ कोई ऐसे ही थोड़े करता है? एकाध कार्ड-वार्ड भी तो खरीदेगा। कार्ड बनाने वाले खुश। नौ फरवरी.. चॉकलेट डे..! चॉकलेट बनाने वाली कंपनी के कर्मचारी के लिए तो मानों दिवाली के आर्डर पुरे करने है। चॉकलेट की विभिन्न तरह की एड्स बनाकर एडवरटाइजर इंडस्ट्री को भी तो इस प्रेम-महापर्व का आर्थिक लाभ मिलता है। 


    दस फरवरी माने टेडी डे.. बताओ.. एक रुई भरे गुड्डे का किसी ने नहीं सोचा था, कि ऐसा पर्व आएगा। बचपन में लड़कियां खेलती थी उस गुड्डे से, बड़े होकर युवक-युवतियां भी ऐसी टेडी के पीछे आकर्षण का शिकार होतें है। बस फायदा है, वह कपडे के भीतर पुराने अखबार और थोड़ी रुई भरकर, सौ रूपये का गुड्डा, टेडी के रूप में हजार रूपये में बेचने वाली इंडस्ट्री को। अरे हां.. ग्यारह फरवरी.. प्रॉमिस डे.. माँ की झूठी सौगंध खा लेने वाले भी, अपनी प्रेमिका को जीवनपर्यन्त साथ निभाने के वचन दे बैठते है। उसके बाद आता है हग डे.. गले मिलने का दिवस। गले मिलना है, तो शारीरिक गंध को छिपाना पड़ेगा। महंगे परफ्यूम बनाती कंपनियों को भी तो इस प्रेम के महापर्व का कुछ लाभ मिलना चाहिए। 


गिफ्ट इंडस्ट्री और युवा भावनाएँ

    मुझे तो इस बात का आश्चर्य है, चुम्बन का भी एक निश्चित दिवस बनाया गया है। कितना बुरा होगा जब किसी को इसी दिवस पर झुकाम लग जाए। या फिर खासी। अच्छा, क्या होगा, जब चुम्बकत्व के पाश में बंधे हो, और छींक आ जाए? खेर, इन सब तिथियों के उपरांत आता है, वैलेंटाइन्स दिवस। देखो, गिफ्ट्स इंडस्ट्री, कार्ड्स वाले, परफ्यूम वाले, क्लोथिंग इंडस्ट्री, इन सब का लाभ हो रहा है, तो बची एक ही इंडस्ट्री। होटल इंडस्ट्री। वे लोग तो अपनी होटल को सजाते-धजाते है भाई। कोई कोई कैमरा सेटअप भी कर लेता है। मेडिकल वाले भी खूब कमाते है इन दिनों में। दोनों जेंडर द्वारा मेडिकल स्टोर को भरपूर लाभ दिया जाता है। वैसे सबसे मजेदार मुझे तब लगता है, जब कुछ जोड़े पकडे जाते है, अपने परिवार द्वारा, या किसी जान-पहचान वाले के द्वारा। घर ले जाकर उनका अलग से बेलन-टाइन मनाया जाता है। 


    खेर, छोडो प्रियम्वदा, सबका लाभ, सबका विकास। ऐसे महापर्वों पर ही देश को पता चलता है, देश का युवा कहाँ जा रहा है? वैसे प्रियम्वदा, तुम्हे भी संत वैलेंटाइन्स के दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 

    शुभरात्रि,
    १४/०२/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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