अधूरे सपने और ज़िम्मेदारियाँ
सपनों का धुंधला सच
प्रियम्वदा !
पहली बात तो मुझे सपने आते ही कम है, और दूसरी बात, अगर कोई सपना आया भी, तो सवेरे बहुत महेनत लगती है उसे याद करने में। बार बार ऐसी अनुभूति जरूर होती है, कि आज कोई बढ़िया सपना आया था। लेकिन जब याद करने की कोशिश करता हूँ, तो हरिओम तत्सत। कुछ भी याद नहीं आता। लेकिन हाँ ! कईं बार वर्तमान में अनुभव होता है, कि यह मैं पहले किसी सपने में कर चूका हूँ / या देख चूका हूँ। और यह घटना बहुत सारे लोगों के साथ होती है, पता नहीं यह कैसे काम करता है..!
एक सपना: पहाड़ों में बाइक चलाने का
खैर, अभी कुछ दिनों पहले एक सपना आया था, जो मुझे नसीब से याद रह गया। सपने में मैंने देखा, कि मैं पहाड़ों में मोटरसाइकिल चला रहा हूँ, वह भी खड़े खड़े। अजीब है, भला खड़े खड़े क्यों चला रहा होऊंगा में? मोटरसाइकिल में सीट तो होती है। बंजर पहाड़ थे, जैसे लेह-लदाख में होते है। खुला साफ आसमान था। और धीरी धीरी मोटरसाइकिल आगे बढे जा रही थी। मोटरसाइकिल कौनसी थी, वह तो याद नहीं आ रहा है। लेकिन बाइक में पीछे बैग भी था। उससे भी अजीब बात, मैं किसी के साथ बातें कर रहा था। कौन थी वह याद नहीं आ रहा।
जब सपनों पर हकीकत भारी पड़ती है
सच कहूं तो किसी समय पर यह मेरा सपना ही था। मुझे बाइक से रोडट्रिप करने के बहुत कीड़े काटते थे। मैंने ख्वाब को हकीकत में उतारने के भरसक प्रयास किए थे। मुझे असल में लेह-लदाख की रोड ट्रिप करनी थी। नहीं, सिर्फ यूट्यूब पर आती मोटो-व्लॉगिंग से ही यह स्वप्न नहीं उभरा था। मुझे लेह-लदाख और स्पीति, तीनों जगह के बंजर पहाड़ों में घूमने की वास्तविक इच्छा थी। लेकिन मुझे यह हकीकत भी पता थी, कि ट्रिप वाकई एक मुश्किल काम है। सबसे बड़ी बाधा तो अनुमति ही रहने वाली थी।
परिवार की सोच और जिम्मेदारियाँ
एक दिन घर में शांत और अनुकूल वातावरण देखकर बोल ही दिया, कि "मुझे बाइक से लेह लदाख जाना है।" और सारे घरवाले बढ़िया ठहाका मारकर हँसे। मुझे हंसी नहीं आ रही थी, चिढ रहा था मैं। मैं सोच रहा था, यह कैसी बात हुई भला? मैंने अपनी कोई इच्छा प्रकट की है, और यह लोग मुझे स्पोर्ट करने के बजाए डिमोटिवेट कर रहे है? बात को गंभीरता से लेने के बजाए, बात की महत्ता को ही मजाक मान रहे है? मुझे क्रोध आ रहा था। मैंने उनसे फिर से कहा, "मजाक नहीं कर रहा हूँ, मुझे सच में जाना है।"
माताजी यह सुनकर थोड़ी गुस्से में बोलीं, "पहले ढंग से कमाना-धमाना करो, यह शौक-वौक उनके लिए होतें है, जिन्हे कल की फ़िक्र नहीं होती। अपने पिताजी से सीखो, गाँव से शहर, और शहर से गाँव, यह दो सफर ही किये है, इसी लिए यह सर पर छत है।"
पिता के संघर्ष की कहानी
बात कड़वी थी। यहाँ स्पष्ट निर्देश था, तुम्हारे पास कुछ सहूलियतें है, इस लिए तुम्हे यह घूमने-वुमने के ख्याल आतें है। और एक छिपा हुआ सन्देश भी झांक रहा था, कि पहले अपने दम पर अपना आश्रय बना, बाद में यह सब सोचना। मेरे मन में यह मंथन चल रहा था, तब तक माताजी ने नया सांस भरकर अपना वाक्प्रहार पुनः शुरू किया।
"अपने पिताजी को देखकर ही सीख लो, तुम्हारी उम्र में वे इस अनजान शहर में काम ढूंढते हुए आए थे। कुछ नहीं था जेब में। किसी परिवहन कम्पनी में नौकरी पायी, तीनसौ रूपये महीना। अपना खाना-खर्च निकालकर घर पर भी पैसे भेजने होते थे। दिनभर काम करने के बाद ऑफिस के बाहर बेंच पर ही सो जाना पड़ता था। क्योंकि किराए पर घर लेने से, घर पर भेजे जाने वाले पैसे में कटौती हो जाती। आजकी तरह तब तूफ़ान की अग्रिम सूचनाएं नहीं मिलती थी। वे बन्दर में थे, और तूफान आ गया था। बारिश, तेज हवाओं, और ऊँची ऊँची लहरों में वे एक ट्रक की केबिन पर पूरी रात रहे थे। पानी के दबाव से ट्रक पूरा हिल जाता। फिर भी वे डटे रहे थे। भूकंप में भी वे घर में ही थे, आगे की दो मंजिला बिल्डिंग कभी घर की और झुकती, तो मेरी भी सांसे थम जाती थी। उन दो मिनिट के कम्पन ने पूरा शहर तबाह कर दिया था। आज भी चारो-ओर पड़े मलबे से झांकती कोई जीवनरेख याद आ जाती है, बिलकुल ही किसी दुःस्वप्न की तरह। ऐसी ऐसी विपदाओं के बावजूद, पुनः उठकर खड़ा होना, और अपना बसेरा स्थापित करना, इसे शौक बनाओ। घूमना कोई शौक न हुआ।"
माँए हमेशा ऐसा करती है। वे अपने पति से कितनी ही बातों में असहमत हो तब भी, अपने संतानों के मन में उनके पिता को हीरो की ही तरह स्थापित करती है। अपने पति के उन तमाम संघर्षों से संतानों को परिचित कराने का कोई मौका नहीं छोड़ती। जायज़ भी है यह। मैंने अभी तक कोई भी ऐसा संघर्ष किया न था। एक संघर्ष मुझे कर दिखाना था, लेकिन मैं वहां से भी उलटे पाँव लौट आया था। पढाई। मेरे पास मेरा कोई अधिकार न था, कि मैं इनके विरुद्ध जाकर अपना शौक पालूं। मैं निराश हुआ। और उनकी बातों में बस हाँ में हाँ मिलाता गया। मुद्दा स्पष्ट था, पहले स्थिर होना है।
एक कोशिश… जो अधूरी रह गई
थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद हुकुम ने कहा, "कितने किलोमीटर होता है यहाँ से?"
"1800-1900 के लगभग।"
"आने जाने का या खाली एक तरफ का।"
"एक ही तरफ।"
"कोई नहीं, इतना लम्बा सफर है, पहले कुछ प्रैक्टिस तो करनी होगी।"
निराशा के खारे महासमुद्र में यह मीठी लहर देखकर कुछ आशा तो उत्पन्न हुई। लेकिन यह क्षणभर की आशा उतनी ही त्वरा से डूबी, जितनी जल्दी लहर समंदर में वापिस लौटती है। मैं अपने हुकुम को नहीं जानता हूँ क्या? वे हमेशा से किसी बात को कहने से ज्यादा कर दिखाने के तरीके को प्राधान्य देते आएं है। और वह भी तुरंत। बोले, "सुबह जल्दी उठकर कल से मेरे साथ ग्राउंड में चलना। थोड़ा शारीरिक श्रम जरुरी है। उससे सांस संतुलित रहती है। फेफड़े मजबूत होतें है।"
मुझे लगा, उनका हर आदेश स्वीकारना मेरे शौक के नजदीक पहुँचने का एकमात्र तरीका बन सकता है। मैंने अपनी आलस को नज़रअंदाज़ करके यह सोचा था। मैं अपनी आलस से टक्कर लेने वाला था अब। सुबह पांच बजे का अलार्म रखकर रात को दस बजे ही सो गया। लेकिन जो व्यक्ति हमेशा रात बारह बजे तक इंटरनेट को निगलता हो, उसे भला दस बजे कैसे नींद आ सकती है? इंटरनेट का विकल्प अभी तक खोजा नहीं गया है। इंटरनेट पर खोजबीन करनी अनिवार्य थी, सर्च किया, "जल्दी नींद लाने के लिए क्या करें?" इंटरनेट ने जवाब दिया, "चार सेकंड में सांस खींचो, सात सेकंड तक सांस भरी हुई रखो, और फिर आठ सेकंड तक सांस छोडो।"
पौने बारह बजे तक यह प्राणायाम पलंग पर पसरे हुए करता रहा। आखिरकार नींद आयी। वही बारह बजे के आसपास। जब नींद ही बारह बजे आयी हो, तो पांच का अलार्म क्या खाक जगा पाएगा? लेकिन नहीं, यहाँ पता नहीं कोई अपवाद काम कर गया, या फिर मेरे घूमने जाने की इच्छाशक्ति। पांच बजकर पांच मिनिट पर आँख खुली। पर क्या फायदा? मोबाइल में समय देखकर फिर सो गया। आलस इतनी हावी थी, की चद्दर तानकर सोना सबसे सर्वोपरि लगा।
सवेरे हुकुम को मूंछ में हँसते देखा, तो कह दिया, "होता है, पहला दिन था, सवेरे जल्दी उठने का। कल देखिएगा आप।"
दूसरे दिन सवेरे उठा। ग्राउंड तक पहुंचा। हुकुम अपनी तीव्र चाल में चल रहे थे। उन्होंने मुझे देखा, और कहा, खाली चलने से कुछ नहीं होगा, थोड़ा दौड़ लगाओ, फेफड़े खुल जाने चाहिए पुरे। दौड़ के बाद पंद्रह-बिस दंड-बैठक। और उसके बाद थोड़ी सी स्ट्रेचिंग। और बारह सूर्य नमस्कार। बस, इतना करके घर आ जाना।
पहला दिन था, पुरे जोश में था। जोश-जोश में सब कुछ कर दिया। बहुत तरोताजा अनुभव हो रहा था। बहुत दिनों बाद शरीर में स्फूर्ति की यह अनुभूति रोमांचक लग रही थी। सुबह उगते सूर्य को निहारना, ठंडा वातावरण, और शांति। कसरत किए शरीर को शांत करने के लिए थोड़ी देर का ध्यान। जितना रोमांचकारी यह सुबह लग रही थी, उतनी ही कष्टकारी शाम साबित हुई। काफी महीनों बाद एक ही दिन में इतनी ज्यादा कसरत कर लेने से शरीर के तमाम जोड़ कराह रहे थे। जैसे बगैर ऑइलिंग चलता कोई यंत्र। रात तक में पूरा बदन दर्द करने लगा था।
सोचा आज एक दिन की कसरत से छुट्टी ले लेनी चाहिए। कल से फिर शुरू करेंगे। वह कल दोबारा आया नहीं। और जैसे वह कल दोबारा न आया, वैसे वैसे जीवनयापन की और भागदौड़ में यह स्वप्न भी कहीं दूर पीछे छूट गया। ऐसा ही होता है, ऐसा ही होता आया है। हम अपने भविष्य की दौड़ में बहुत सारे वर्तमान को पीछे छोड़ते जाते है। और भविष्य वाले वर्तमान में वह स्वप्नों वाला भूत सामने आ-आकर सताता रहता है।
अधूरे सपनों की असली ताकत
सपने पीछे छोड़े जा सकतें है। अधूरे सपने होना भी कोई बुरी बात तो नहीं है। अधूरे सपने हमें उम्मीद देते है, और लड़ लेने की। और थोड़ा अपने आप को धकेलने की, अपनी क्षमताओं को तराशने की। ऐसा भी जरुरी नहीं है, किसी एक ही सपने के सहारे हैं हम। नया सपना भी निभाया जा सकता है, सजाया जा सकता है। समय समय पर हमें सपनों की श्रेणी को सुधारता रहना पड़ता है। किसे कब प्राधान्य दिया जा सकता है, किसे और देखा जा सकता है। और किसे अभी जिया जा सकता है।
शुभरात्रि।
१३/०४/२०२६
|| अस्तु ||
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