आज के समय में गैस सिलिंडर की खुशी वर्ल्ड कप जीत से ज्यादा क्यों है?

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आज के समय में गैस सिलिंडर की खुशी वर्ल्ड कप जीत से ज्यादा क्यों है?

    प्रियम्वदा !

    आज के समय पर भारत के वर्ल्ड कप जितने से ज्यादा ख़ुशी रसोई गैस के सिलिंडर की डिलीवरी पर हो रही है। मेरे पडोसी ने मिठाइयां बांटी है, "मैंने पूछा क्या हुआ?" तो बोला, "डिलीवरी हुई है?" मैंने ख़ुशी से पूछा, "क्या हुआ है?" तो कहता है, "सिलिंडर आया है।" खैर, खुशियां तो मनाई जानी चाहिए। सिलिंडर तो सिलिंडर, महंगा तो महंगा, आ तो रहा है कम से कम। 


गैस सिलिंडर की डिलीवरी पर खुश होता व्यक्ति और आसपास के लोगों की बातचीत व सोच को दर्शाता एक साधारण जीवन दृश्य


गैस सिलिंडर और हमारी बदलती प्राथमिकताएँ

    प्रियम्वदा, अभी अभी एक ख्याल आया.. हमें मानवों को सतत बोलते रहने की जरुरत है। जरुरत कह लो, या आदत..! हमें चुप रहने से दिक्कत होने लगती है। कोई भी, कभी भी लम्बे समय तक चुप नहीं रह सकता। संसद में विपक्ष चुप नहीं रह सकता। रोड किनारे रेडी वाले चुप नहीं रह सकते। कार्यालयों में कर्मचारी, शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षक या विद्यार्थी, कोई भी कभी चुप नहीं रहता। जो बोलते कम है, वे लोग भी या तो लिखकर, या तो सोच-सोचकर अपनी बातें कहते है, लेकिन चुप नहीं रह सकते। देशों के सर्वोच्च नेता न चुप रह सकते है, न ही चुप रहने दे सकते है। 


इंसान चुप क्यों नहीं रह सकता?

    आदमी अकेला होता है, न तब वह हवाओं से भी बातें कर लेता है। किसी चरवाहे को देखा ही होगा, वह अपने पशुओंसे भी बाते करता है। हमें एक और गन्दी आदत है, सबको पहचान देने की। सबको एक नाम देने की। जैसे कोई पशुपालक अपने पशुओं को विविध नाम देता है। और यह परंपरा कितनी पुरानी है, शिव के बैल का नाम नंदी है। हम छोटे से छोटी चीज को एक नाम दे देते है। और फिर उससे बातें भी करते है। बातें करने का यह सिलसिला प्रगतिशील भी हुआ। किसी दिन एक बातूनी आदमी ने चैटबॉट भी बना लिया। एक आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस वाला चैटबॉट। जिससे लोग बातें करते है। अकेलेपन से आहत होने वाला ही होगा कोई इस चीज का संशोधक। 


जब लिखने और पढ़ने का मन नहीं करता

    आजकल कुछ भी लिखने-पढ़ने का मन ही नहीं होता है। आज वे दिन याद तो आतें है प्रियम्वदा, जब प्रतिदिन मैं कुछ न कुछ तो लिखता ही था। हम अक्सर उस भावना को बाद में जरूर से याद करते है, जिससे कभी छुटकारा चाहते थे। समय समय पर हर कोई किसी न किसी भावना के वश सम्बन्ध बदल लेता है। क्योंकि समय की अपनी जरूरतें होती है। अरे हाँ ! नाना पाटेकर की संकल्प वेब सीरीज़ देखी अभी। काफी स्लो सीरीज़ लगी मुझे। एक डायलॉग बढ़िया लगा, "सत्य का सदा ही नजरिये और हालात पर निर्भर होता है। हमारे अपने हालात, और अपना नजरिया तय करता है, कि कोई भी बात सत्य है, अर्धसत्य है, या असत्य है।"


    वैसे तो यह वेब सीरीज़ थोड़ी उबाऊ लगती है। लेकिन मेरे पास भी समय निकालने का और कोई साधन न होने से मैं देख रहा था। एक गुजराती पुस्तक मेरी पठन सूची से अभी भी झाँक कर मुझे पुकारता तो है, लेकिन मैं भी किसी सत्ताधीश की ही तरह उसे अनदेखा-अनसुना कर दे रहा हूँ। और अपना सारा खाली समय या तो यूट्यूब पर, या फिर कोई फिल्म देखने में व्यतीत करने में लगा हुआ हूँ। मैंने पहले ही कहा न, मुझे अभी पढ़ने लिखने में दिलचस्पी नहीं आ रही है। खैर, यह वेब सीरीज़ है तो एक राजनैतिक प्रतिशोध की भावनापूर्ण। 


    देखो तुम मेरी आलस देखो.. यह लिखने की शुरुआत तो हुई थी गैस के संकट पर, और अभी चल रहा है पेट्रोल का संकट। मतलब एक तरह से देखते है, तो मामला स्त्री और पुरुष, दोनों को लपेट लेता है। चूल्हे के गैस का संकट स्त्रियों से जुड़ा हुआ कह सकते है, क्योंकि ज्यादातर रसोई तो स्त्रियों का ही कार्यक्षेत्र है। फिर अभी आया पेट्रोल-डीज़ल का संकट, उसे पुरुषों से जोड़ सकते है। क्योंकि वाहन ज्यादातर पुरुष ही चलाते होंगे। यह ऊपर जो कुछ लिखा है, उसे लगभग दस-बारह दिन हो चुके है। बिच के इन दिनों में, मैं एक गुजराती नावेल पढ़ रहा था। दो दिन आबू-अम्बाजी घूम आया। आज यूँही ड्राफ्ट्स चेक करते हुए यह अधूरा लेखन हत्थे चढ़ गया। 


|| अस्तु ||


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