असफलता: अंत नहीं, एक नया आरम्भ || Life Failure Story

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सबसे बड़ी असफलता और उससे मिली सीख


असफलता से सीखता हुआ व्यक्ति – failure से growth की ओर बढ़ता हुआ कार्टून चित्र”

असफलता: क्या सच में यह अंत है?

    प्रियम्वदा ! फेलियर या असफलता, कभी न कभी तो इससे वास्ता पड़ता ही है। इससे अछूता भला कोई भी रह न पाया होगा। अच्छा वैसे मैं सोच रहा था, फ़ैल + इयर = फेलियर = बहरा नहीं हो सकता क्या? या फिर फ़ैल + year = फेलियर = पूरा बर्बाद साल भी हो सकता है..? है न? वैसे तुम ही बताओ प्रियम्वदा ! क्या तुम्हे कभी असफलता चोट कर गयी है, जहाँ तुम्हे लगे कि सब कुछ खत्म हो गया है?


मेरी असफलता की कहानी

    मैं अगर अपनी बात करूँ.. तो आज मैं अनुभव करता हूँ, कि मैंने वह पढ़ाई में पायी असफलता आज मेरी बड़ी शत्रु बनकर खड़ी हुई है। उन दिनों तो यह लगता था, कि बस कोई छोटी-मोटी नौकरी करके भी एक आदमी का गुज़ारा तो हो ही जाता है। और यही विचार बड़ा हीनभावना से भरा था। इस विचार में अपने आप में भविष्य के प्रत्येक दायित्वों से नजरअंदाज़ी छिपी है। जीवन किसी का भी सरल न रहा है, न रहेगा। वो बातें बकवास है, कि 'फलाना चांदी की चम्मच लिए पैदा हुआ है, उसे किस बात की टेंशन?' अरे उसे भी असफलता का डर होता है, अपनी वह चांदी की चम्मच को बचाए रखने का। 


असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण: प्रेम और रिश्ते

    प्रेम संबंध से बढ़िया क्या ही उदहारण यहाँ हो सकता है असफलता के मामले में.. उदहारण के लिए मैं और तुम ही प्रेमी बन जाते है प्रियम्वदा। मैं और तुम प्रेम के संबंध में है। एक बार की बात है, तुमने मेरा फोन चेक किया, जिसमे कुछ स्क्रीनशॉट थे, कुछ समय पहले हुई किसी स्त्री के साथ बातचीत के। अब यहाँ तुम्हारे लिए तुम्हारा प्रेम जो मेरे प्रति था, वह असफल रहा। क्योंकि मैं किसी और के साथ भी सम्बन्ध में हूँ। अब तुम्हे यह तलाशना है, कि तुम इस संबंध को कितना खिंच सकते हो? क्या मेरे साथ बातचीत कम कर दोगी, क्या मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार बिलकुल ही भावविहीन हो जाएगा। या फिर तुम बस इसे भाग्य का एक दुःस्वप्न मानकर, जैसा चल रहा है वैसा चलने दोगी? आमतौर पर ऐसे अवसर पर लोग अलग हो जाते है। हो भी जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे संबंध में जहाँ भाव ही न हो, वह बस एक पत्थर की मूरत है। 


    लेकिन अब मानते है, कि मैंने और तुमने शादी कर ली। पात्र बदल देते है, इस बार मैंने नहीं, तुमने मेरे साथ धोखा किया है। तो अब मेरे लिए क्या क्या परिस्थितियां हो सकती है? सामाजिक व्यवस्था में विवाह के पश्चात पुनर्विवाह बड़े खोखले होते है। मैं तुमसे अलग हो जाऊं.. तो मेरे बसे-बसाये परिवार का क्या होगा? या फिर जो कुछ हुआ, उसे मैं नज़रअंदाज़ कर जाऊं? तुम्हे सजा दूँ? मेरे लिए यह प्रसंग मेरे जीवन की एक बड़ी असफलता होगा। जिसकी कामना करतें है, वही मुँह फेर जाए। लेकिन प्रियम्वदा ! इन सब कल्पनाओं में सबसे कठिन तो प्रेम की अपनी असफलता रहेगी। वह प्रेम, जो एक एकपक्षी रह गया। वह आकर्षण, जो कमजोर नींव का रह गया। लोग प्रेम में शायद इसी कारन से पागल हो जाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपना सर्वस्व मान लिया होता है जिसे, वह किसी और की कामना कर रहा था। 


असफलता के बाद क्या होता है?

    अब जब बात एकपक्षी रह गयी है, तो पहला काम होता है, सेल्फ डाउट। गलती प्रतिपक्ष से हुई है, तब भी सबसे पहले हम अपने आप को गरियाते है। 'कि मैंने कहाँ गलती कर दी, जो वह मुझे छोड़ गया।' या फिर 'मैंने अपना प्रेम जताने में कहाँ कसर छोड़ दी थी, कि वह कहीं ओर प्रेम को तलाशने में मशगूल है।' खासकर जब यह शादी वाला पक्ष जुड़ जाता है, तो दिमाग में यह 'लोग क्या कहेंगे' वाला दृष्टिकोण भी घूमता रहता है। जब हम किसी व्यवस्था का भाग होते हैं, तो हमें कईं सारे नियम-कानून मानने पड़ते है। और कईं सारी अप्रिय बातों को सुनना-सहना भी पड़ता है। उन्ही में से एक है 'लोग क्या कहेंगे।' लोग भी बड़े वेल्ले है प्रियम्वदा ! उन्हें कोई न कोई चाहिए होता है, जिसे वे कोस सकें, जिसका उदहारण देकर दूसरे लोगों को समझाते हुए अपनी बात को वजनी बना सके। उन्हें कोई मतलब नहीं होता है, जिसकी वे बात कर रहे होतें है, उसकी परिस्थिति क्या है, वह किस मनोदशा से गुज़र रहा है। उन्हें बस एक मुद्दा चाहिए। लोग वेल्ले है, उन्हें बस बात चाहिए। 


    जब सेल्फ डाउट से पीड़ित हो, ऊपर से यह लोग क्या कहेंगे वाला कोण भी जुड़ जाता है, तब होता है मोटिवेशन डाउन। प्रेरणा की कमी.. हतोत्साह होना। सबसे बड़े सवाल मन में उभरते है, मैं क्या कर रहा हूँ, क्यों कर रहा हूँ, किसके लिए कर रहा हूँ। और इन तीन सवालों का उत्तर तो एक ही मिलता है, मुझे जिसका ख्याल रखना था, वह ही मेरा नहीं है, तो मैं क्यों यह सब करूँ? बस यहीं से निष्क्रियता घेर लेती है। अजगर की भांति लपेट लेती है। अपने ही मन में निर्मित हुए कोपभवन में जाकर हम बैठ जाते है। हमें किसी की भी परवाह नहीं रहती, और हम समाज से, दुनिया से कटकर रहने लगते है। 


असफलता से बाहर कैसे निकलते हैं?

    लेकिन प्रियम्वदा ! इस कोपभवन से हमें और कोई निकाल पाए या नहीं, एक दिन हम खुद से अपने आप ठीक होने लगते है। कोई एक मोमेंट, एक क्षण आता है, जब हमें बोध आता है, जो होना था, सो हो चूका। अब आगे हमें पहले से बेहतर प्रदर्शन करना है। हमें खुद अपने पैरों पर उठना पड़ेगा। अक्सर ऐसी स्थिति से कोई न कोई बाहर निकालेगा ही, कोई बुक, कोई दोस्त, कोई सलाह, या कोई भी प्रेरणा का एक छोटा सा स्त्रोत भी। बस उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। 


असफलता से मिली 5 सबसे बड़ी सीख

    फेलियर भी एक अनुभव है, और अनुभव से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है.. तो इस बात को आधार मानकर हम यदि सोचतें है, तो कुछ सीखने लायक बातें समझ में आती है। 

  • फेलियर एक फीडबैक है, अंत नही। असफलता हमें एक राय देती है, हमारे दृष्टिकोण को तराशती है। पहले जहाँ तक देख रहे थे, उससे आगे की दृष्टि हमें असफलता ही दिलाती है। 
  • टैलेंट माने की प्रतिभा से ज्यादा महत्वपूर्ण कंसिस्टेंसी यानि की निरंतरता है। टैलेंट को डेवलप करने के लिए यह निरंतरता अनिवार्य है। कोई भी काम हम सतत करते रहते है, तो अपने आप महारथ हांसिल होता है। 
  • लोग तो हमेशा बोलेंगे, आप अच्छा प्रदर्शन करते हो तब भी, खराब प्रदर्शन करते है तब भी। उनका काम बोलना है, हमारा काम है, प्रदर्शन को और ज्यादा मजबूत करना। 
  • रिस्क लेना जरुरी है। असफलता के डर से यदि हम कोई रिस्क ही नहीं लेते है, तो उपलब्धि की आकांक्षा खोखली ही रहेगी। हम कुछ चाहते हैं, तो थोड़ा बहुत रिस्क लेना ही पड़ता है। वो कहते हैं न, "रिस्क है तो इश्क़ है।"
  • धैर्य = विकास.. प्रत्येक प्रतिकूल या अनुकूल परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखना है। एक संतुलन बना रहना चाहिए। विकास समय लेता है, धैर्य की कसौटी मांगता है। 

अगर मैं असफल न होता तो?

    एक विचार और भी आता है। अगर मैं फ़ैल न होता तो? तो यहाँ विकल्प तो एक ही है, सफलता का। लेकिन फिर यह ख्याल भी दिमाग में आता है, कि अगर कोई एक ही प्रयत्न में सफलता प्राप्त कर लेता है, वह संघर्ष का, प्रयासों का, उपलब्धियों का मूल्याङ्कन कैसे करेगा? विकास की गति को वह कैसे समझ पाएगा/पाएगी। जो भी हांसिल करने की कामना है, उस तक पहुँचने के अन्य विकल्प क्या क्या हो सकते थे, वह कैसे समझ आएगा? एक मंजिल तक कितने सारे अलग अलग रस्ते जाते हैं, इसकी पहचान हमें असफलता दिलाती है, या फिर पूर्वतैयारी।


असफलता हमें क्या सिखाती है?

    प्रिय पाठक, तुम बताओ, तुम्हे क्या लगता है, असफलता हमें केवल निराश ही करती है? या फिर हमें दूसरा मौका देती है, आउट द बॉक्स जाकर सोचने का। क्या वाकई असफलता हमें पीछेहठ करने को मजबूर करती है, या फिर साप-सीढ़ी के पहले पायदान से पुनः शुभारम्भ करने का अवसर। मुझे तो लगता है, कि असफलता को अगर हम चेलेंज करते है, तो हम खुद की क्षमताओं को और निखार सकते है। हम अपनी काबिलियतों को अच्छे से पहचान सकते है। 


निष्कर्ष: असफलता हमें बनाती है

    फेलियर कभी हमें तोड़ नहीं सकता। बना जरूर सकता है। वैसे यह सारी बातें थोड़ी ओवर मोटिवेशनल जैसी लग रही है मुझे जब मैं यह निष्कर्ष लिखते हुए सारा पढता हूँ तो। लेकिन हकीकत यही है, सच यही है। असफलता का भी अपना योगदान होता है, किसी उपलब्धि को प्राप्त करने के युद्ध में। असफलता के अवरोध को पछाड़ कर जब आगे बढ़ जाते है, तो यह प्रक्रिया दूसरे लोगो के लिए एक उदहारण जरूर बनती है। अपने प्रयास में हमारे द्वारा निर्मित हुआ मार्ग दूसरों के लिए निष्कंटक बनता है। 


    शुभरात्रि। 

    ०८/०४/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

    क्या आप असफलता को हार मानते हैं या एक नई शुरुआत? अपनी राय बताएं। 

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