क्या हर मोड़ टर्निंग पॉइंट होता है? | स्वतंत्रता से स्वच्छंदता तक मेरी कहानी

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एक सवाल जिसने सोचने पर मजबूर किया

    प्रियम्वदा !

    CHATGPT से बतियाते हुए उसने अचानक से पूछ लिया, "बताओ, तुम्हारी लाइफ का टर्निंग पॉइंट क्या है?"


young student at life crossroads confused between freedom and discipline cartoon illustration

क्या सच में हर किसी की जिंदगी में टर्निंग पॉइंट होता है?

    अब हकीकत में तो इस सवाल का जवाब देने भर से कुछ भी बदलने वाला तो नहीं है, लेकिन इस यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजते हुए मैंने कितनी बार अपनी पिछली जिंदगी में झाँका है। मैंने न जाने कितने ही बदलाव लिए है, और मैं आज तक खुद को भी नहीं समझा पाया हूँ, कि वे वास्तव में टर्निंग पॉइंट्स थे या नहीं? किसी मनचाही सड़क पर से कोई अनजान मोड़ पर टर्न क्यों लेगा? या तो वह मूर्ख है, या तो विश्वासी। मैं न तो मूर्ख था, न ही विश्वासी, मैंने बस अपनी कुतूहलता के दमनार्थ ही टर्न लिए है। 


    किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करते ही शरीर एक अनन्य ऊर्जा अनुभव करता है। जैसे बछड़े को आए हुए नए सींग। वह हर उन जगह सींग भिड़ाना चाहेगा, जहाँ उसे मौका मिले बस। उन दिनों भारत के हर घर में इंजीनियर या डॉक्टर बनाने की चाहत हुआ करती थी। नोकिआ अपने अनब्रेकेबल मोबाइल के लिए प्रसिद्द था। और तब तक घरों में से लैंडलाइन लुप्त न हुए थे। मुझे कुतूहलता थी, या अस्पष्टता, मैं नहीं जानता, लेकिन मैं जानना चाहता था, कि परिवार से दूर कैसे रहा जाता है? हॉस्टल लाइफ.. इसे मेरे जीवन का एक मोड़ कह सकता हूँ। 


पहली आज़ादी – या पहली भटकन?

    मैं भी इंजीनियर बनने घर से चारसौ किलोमीटर दूर, जीवन के एक विचित्र खंड की रेखाएं खींचने में व्यस्त था। लेकिन यह रेखाएं कभी भी सीधी रेखा में नहीं खिंच पाया... बहुत ही ज्यादा टेढ़ीमेढ़ी बनती गयी। दसवीं कक्षा के बाद सीधा ही डिप्लोमा ज्वाइन किया। उस समय तक अप्रोच नेगेटिव या पॉजिटिव नहीं हुआ करती थी, बस जो मिल जाए उसे ही अपना लिया जाता था। स्वतंत्रता भी कितनी सही चीज है.. स्वछंदता में तब्दील होने में देर नहीं लगाती। मानवमन को कोई न कोई लगाम चाहिए ही होती है। वरना अंग्रेजो से स्वतंत्रता लेकर भी शासनपद्धति तो वही रही थी, बस गोरो के बदले देशी लोग चढ़ बैठे, बस राजाओं की जगह समूहों में से कोई एक चुनकर आने लगा। व्यवस्था को स्वतंत्रता चुनौती दे सकती है?


जब स्वतंत्रता, स्वच्छंदता बन गई

    जहाँ कभी सवेरे सात बजे तो सायकल खींचते हुए स्कूल के लिए निकल जाना पड़ता था, वहां इस हॉस्टल में सवेरे उठने की कोई बंदिशें न थी। न उठो तो भी कोई टोकने वाला तो हो..! अचानक से किसी पिंजड़े में क़ैद पंछी को आज़ादी मिल जाए, तो वह इतनी ज्यादा ऊर्जा से उड़ता है, कि लम्बी दूरी नहीं तय कर सकता। वह बस वहीँ आसपास के किसी पेड़ की शाख तक ही पहुँच पाता है। जब कॉलेज का पहला लेक्चर ही दोपहर को डेढ़ बजे हो, तो सवेरे क्यों उठना? और वैसे भी कॉलेज के यह लेक्चर तो अंग्रेजी में होते थे। THIS और THAT, तथा THESE और THOSE वाला मसला कोई कम था? गुजराती माध्यम से आए हुए ने अचानक इस बदलाव से झेंपना किसे कहते है यह अच्छे से पहचाना। 


    वो जो अचानक से बहुत सारी स्वतंत्रताएं मिली थी, वे उतनी ही जल्दी स्वछंदता में परिवर्तित हुई। देर तक सोते रहना, रात-रात भर जागना। सवेरे मेस में सबसे पहले पहुंचकर चाय-नाश्ता को डिनर के रूप में खाना, और फिर सो जाना। मेस की पानी जैसी दाल से मुँह फेर कर कैंपस के बाहर वाले ठेले से सेव-उसळ ठूंसना। भाषा का माध्यम जब बदला, तो सबसे पहली असर पर परीक्षाओं की गंभीरता पर। पहले ही साल छह में से पांच विषयों में लगी केटी। केटी माने पुनःपरीक्षा देनी होगी। लगातार केटी पर केटी आती गयी, तीसरे सेमेस्टर में पहले सेमेस्टर की दो केटीयों के साथ बैठने में कोई हिचक न होना ही, स्वछंदता के स्तर का मापदंड मान सकते है।


गिरावट का वो दौर

    खाना, पीना, रहना.. यह तीनों बातें हॉस्टल से बेहतर कोई नहीं सीखा सकता। कैसे घर से आये किसी फ्लोर-मेट का भी नाश्ता, पहली ही रात में ख़त्म कर जाना। या फिर छोटे से छोटी बात पर भी किसी से पार्टी वसूलना। जन्मदिन कोई बताता नहीं था अपना, क्योंकि जन्मदिन वाले दिन बैठनेलायक पुष्ट्भाग रहता नहीं था। बंद दरवाजे को खटखटाकर भाग जाना, और पहले माले से कूद कर वापिस चढ़ जाना, यह कोई स्वतंत्रता या स्वछंदता के हिस्से नहीं हुआ करता था। सुरा सेवन से लेकर, आकर्षण को याद करके कसम देना, और झूठ बोलकर घर से पैसे मंगवाना..


    आकर्षण.. किसे नहीं होता? स्वच्छंदता में एक और उपलब्धि। आकर्षण के पीछे भटकना इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है, जितना पाइनेपल केक में पाइनेपल का होना। कैंपस की कैंटीन में बाहिने ओर का पहला टेबल, यह टेबल अपने आप में इतना ज्यादा नेगेटिव था, कि टेबल की ओर होते तमाम दृष्टिपात में एक डर या ईर्ष्या देखे जा सकते थे। यहाँ वही हॉस्टल के स्वच्छंदी छात्र बिराजते थे। जावा और कोडिंग से जुडी लैंग्वेज तो सीखने में कठिन लगती थी, लेकिन सड़क पर दौड़ती सरकारी बस की छत पर बैठकर, माचिस की आखरी तीली से सिगरेट जला लेना आसान। इन सब उपलब्धियों के पोषण हेतु कईं सारे लेक्चर बंक लगते है। और जब बहुत ज्यादा लेक्चर बंक हो जाए, तब विधार्थी को किया जाता है डिटेन। 


शायद असली टर्निंग पॉइंट…

    इतनी विभिन्न उपलब्धियों के बिच भी बस एक गुण सौभाग्य से मिला। पठन.. पाठ्यपुस्तकों का नहीं, साहित्य की किताबों का गुजराती भाषा के कुछ धुरंधरों की पहले थोड़ी बहुत पहचान थी। लेकिन यहाँ कुछ और मिले। जिन्होंने मेरी इस तृष्णा को और मृगजल दिखाकर लम्बी मजल तय करवाई। इसी तृष्णा के चलते साहित्य में वर्णित भावो से प्रत्यक्ष हुआ। मैंने अपने भीतर एक बदलाव अनुभव किया, दृष्टिकोण का बदलाव। जहाँ मैं कठोरता और निश्चिंतता को सर्वोपरि मानता था, वहां अब एक कोमलता के भाव ने भी प्रादुर्भाव किया। आकर्षण के प्रति तो कोमलता शायद कभी नहीं आयी, लेकिन उन कल्पनाओं को मैंने अपने समक्ष खड़ा कर पाने का कौशल तो कदाचित अर्जित किया। 


एक नया दृष्टिकोण

    तृतीय वर्ष के आरम्भ में, जहाँ मेरे साथ वालों का आखरी वर्ष था, वहीँ मेरे हिस्से अभी तक पहले सेमेस्टर की केटीयाँ जुबान निकालकर चिढ़ाती दिख रही थी। ऐसे में बड़ा आसान काम लगा - पीछेहठ कर लेना। मुझे अपनी स्वतंत्रता अब खोखली दिखने लगी थी। मेरी उस स्वतंत्रता में किसी और का पुरुषार्थ बल दे रहा था। उन साहित्यिक पन्नों ने मुझे संघर्ष की पहचान करवाई। मुझे पता चला, स्वतंत्रता भी भीतर से प्रकट होता भाव है। उसे चाहिए वह पुरुषार्थ भी मेरा अपना होना चाहिए। स्वच्छंदता तो अब पता नहीं कौनसे कोने में दुबक कर बैठ गयी थी। अब वह मेस की पानी जैसी दाल पर कोई उलाहना न थी। 


    भीतर के उस मंथन से यही नवनीत मिला था, कि अब बस अपना पुरुषार्थ, अपनी स्वतंत्रता। 

    शुभरात्रि।

    ०३/०४/२०२६

|| अस्तु ||


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