प्रियम्वदा : युद्ध, गाँव और आम लोगों की कीमत – एक रूपक कथा

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प्रियम्वदा : युद्ध, गाँव और आम लोगों की कीमत


गाँव के झगड़े और युद्ध का आम लोगों पर प्रभाव दर्शाता कार्टून

ठाकुर का कुआँ और सत्ता की शुरुआत

    प्रियम्वदा !

    एक बार की बात है। गाँव के मुखिया अमरीकसिंह ने देखा, कि पास के खेत में निखालिस मदिरावाला बड़े आराम से वहां जुला जुल रहा था। उस जुले के पास काले पानी का एक कुआ था। बड़े बड़े कवि कहकर है, कि कुआ ठाकुर का। तो बस उसी उक्ति के आधार पर अमरीकसिंह ने आव देखा न ताव और सीधे खेत में घुसे, निखालिस मदिरावाले को जुले से उतारा, और कुआ हथिया लिया। अब तो सो आना सिद्ध हो चुका था, कि कुआ ठाकुर का। 


जब डर से शुरू हुआ संघर्ष

    कुछ दिनों तक कवियों ने, लेखको ने हो-हल्ला किया, कि कुआ तो ठाकुर का नहीं होना चाहिए। वह तो निखालिस का ही रहेगा, लेकिन अमरीकसिंह के आगे कोई कुछ बोल सकता है क्या? तो मामला शांत हो गया। लेकिन गाँवों में कभी भी शांति कायम कहाँ रहती है? शहरी लोग गाँव की प्रकृति की कामना करते है, गाँव वाले शहर की सुविधा को चाहते है। एक दिन अचानक इज़रालुद्दिन ने फारसखान को उठाकर पटक दिया। सारा गाँव जमा हो गया, मामला क्या हुआ यही सब जानना चाहते थे। 


    इज़रालुद्दिन का कहना था, कि यह फारसखान दिन-ब-दिन बड़ा होता जा रहा है, एक दिन मुझे मारेगा। यह मुझे मारे उससे पहले मैं ही इसे क्यों न कूट दूँ? और इतना कहकर वह फारसखान पर पत्थरों की बरसात करने लगा। फारसखान के कपार में एक पत्थर लगा। वह तो वही ढेर हो गया। वो डायलॉग है न, बाप का, दादा का सबका बदला लेगा यह फैज़ल। फारस का बेटा मोगेम्बो आगबबूला होकर कूद पड़ा। अब इस फसाद की खबर अमरीकसिंह तक न पहुंचे यह भला हो सकता है?


एक झगड़ा और पूरा गाँव जल उठा

    अमरीकसिंह की नजर तो फारसखान के कुँए पर भी थी। लेकिन पहल करना नहीं चाहता था। जब इज़रालुद्दिन ने पहल कर ही दी, तो फिर अमरीकसिंह के लिए भी मैदान तक पहुँचने का मार्ग अकंटक हो गया। अब इधर मोगेम्बो अकेला, उधर इज़रालुद्दिन और अमरीकसिंह दोनों.. बेचारा मोगेम्बो तो किसे मारुं, और किससे बचूं वाले दोमुंहे पर फंस गया। लेकिन मोगेम्बो होशियार है। सोचा इन दोनों से जब हाथापाई करनी ही है, और अपना मार खाना तय ही है, तो क्यों न पूरा गाँव इस होली की आंच का अनुभव करे..?


    मोगेम्बो ने अपने अड़ोस-पड़ोस में हर जगह पथराव किया। पथराव करना तो मोगेम्बो के खून में होता है। था तो मोगेम्बो की बस्ती में दिवाली, लेकिन अब खून की होली खेलने का समय आ गया था। मोगेम्बो ने अबू ताम्बी को मारा, मोगेम्बो ने मटर को मारा, मोगेम्बो ने सौदागर को भी न छोड़ा। सौदागर के कुँए पर लगे रहट पर एक पत्थर मारकर तोड़ दिया। सौदागर, अबू ताम्बी, मटर.. सारे हैरान थे मोगेम्बो के इस व्यवहार से। लेकिन मोगेम्बो के पास भी और कोई चारा न था। उसे पता था, अमरीकसिंह बड़ा गन्दा मारता है, कुछ दिनों पहले ही मदिरावाले को उसने उसके घर से उठा लिया था। 


चूल्हे की आग और आम लोगों की परेशानी

    अब अमरीकसिंह और इज़रालुद्दिन दोनों ही मिलजुलकर पथराव करके, मोगेम्बो के मोहल्ले में तोड़फोड़ मचा दी। मोगेम्बो बड़ा नाखुश हुआ, तो उसने अपने मोहल्ले से गुज़रते रस्ते को कब्ज़ा लिया। बोला, न जाऊंगा, न जाने दूंगा। अब पूरा गाँव सदमे में है। क्योंकि मोगेम्बो ने रास्ता भी वही कब्ज़ा लिया है, जहाँ से सबके चूल्हे की अग्नि भी गुजरती है। तब तक तो किसी को भी आपत्ति नहीं थी, जबतक चूल्हे की आंच तीखी थी। लेकिन जैसे जैसे चूल्हे की आंच धीमी होती जा रही है, गाँव के लोग भी परेशां होने लगे है। 


    उन तीनों के झगड़े में, भरतभाई के मोहल्ले का बुरा हाल हो गया। लोग अपने नलाकार लोहे के पात्र को लेकर लंबी कतार लगाए बैठे है, कि कब चूल्हा जले। भरतभाई तो कह भी रहे थे, "भाइयों-बहनों.. चूल्हे में फूंक न मारनी पड़े, इस लिए यह नलाकार लोहा ले जाओ.." लेकिन आज तो वो लोहा न जल रहा है, न जला पा रहा है। लोग लकडिया मांग रहे है। खैर, यह तो अमरीकसिंह पर निर्भर है, और उस इज़रालुद्दिन पर भी.. वे कब तक इस झगड़े को जारी रखते है। भरतभाई भी ज्यादा दिनों तक यह चूल्हे की आंच वाला बोझा झेल नहीं पाएंगे। 


    तो उस नलाकार लोहे के पात्र पर बैठे बैठे मैं यही सब सोच-विचार कर रहा था, उतने में पत्ते का फोन आया। बोला, "यार ज़िंदगी में किसी दिन तो काम आओ.." उसका यह कहना था ही, कि पता चला कि लोहे का डिब्बा तो आज भी खाली ही रहेगा। पत्ते का कहना था, कि मैं उसके लिए थोड़ा जलाने की लकड़ी का बंदोबस्त कर दूँ। क्योंकि उसका भी वह लोहे का लाल डिब्बा खाली ही होने वाला है। हालात तो सबके ही यही है, शुरुआत में तो जो लोग अमरीकसिंह और इज़रालुद्दिन के पक्ष में रहकर वाहवाही कर रहे थे, वे भी अब दलबदलू का तमगा धारण करने को तैयार होते दिख रहे है। 


युद्ध का असली बोझ कौन उठाता है?

    प्रियम्वदा ! हम हमेशा युद्ध के पक्षधर तभी हो सकते है, जब तक युद्ध दूर हो रहा हो। युद्ध में कभी भी केवल दो राजा ही नहीं लड़ते है। उन तमाम प्रजा को भी लड़ना होता है, कहीं न कहीं अपना योगदान देना ही होता है। युद्ध सबका ही बलिदान मांगता है। किसी को भी नहीं छोड़ता। ऑपरेशन सिन्दूर अगर थोड़ा और लम्बा चलता, तो सबसे पहले सहूलियतों के आदि ही विरोध पर उतरते। हजारों किलोमीटर दूर चल रहे उस युद्ध की असर आज हम यहाँ अनुभव कर रहे हैं, तो क्या होता जब भारत और पाकिस्तान लड़ रहे होते। 


    वैसे अब यह प्रतिदिन नहीं लिख रहा हूँ मैं, तो मेरे पास काफी ज्यादा खाली समय बचता है प्रियम्वदा। दो दिन पूर्व ही एक शादी में गया था। गाँव में शादी थी, और शादी में भीड़ बहुत होती है। रात्रि शयन के लिए दूसरे गाँव में एक अन्य रिश्तेदार के वहां चला गया था। उनका गाँव डैम के किनारे है, मेरे गाँव से कुछ ही दूरी पर। सोचा था, रात का ग्यारह बज रहा है, सिंह-दर्शन होने की भी शक्यता है, लेकिन वह स्वप्न ही रहा। तेंदुआ भी न दिखा कहीं। गांव वास्तव में बचपन के उस चित्र जैसा है, जिसमे हम पहाड़, मकान और नदी एक ही पन्ने पर चित्रित करते थे। थोड़ा सा घुमावदार रास्ता, एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ डैम का भरपूर पानी। और हरियाली का तो क्या कहना। रात का आसमान.. मैंने एकजगह कार रोकी, और काफी देर तक आसमान को ताकता रहा। यह वही आसमान है, जो मेरे शहर में प्रदुषण की परत के पीछे छिपा रहता है। 


    छोडो यह सब प्रियम्वदा, तुम बताओ, तुम्हारा क्या हाल है?

    शुभरात्रि।

    १२/०३/२०२६

|| अस्तु ||


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