कच्छ से माउंट आबू और अम्बाजी तक: एक रोमांचक रोड ट्रिप अनुभव

0

कच्छ से माउंट आबू और अम्बाजी तक : एक रोमांचक यात्रा


Cartoon illustration of a traveler with a car, showing mountains, road, storm, and a temple representing a road trip to Mount Abu and Ambaji

प्रकृति का बुलावा और यात्रा की शुरुआत

    प्रियम्वदा !

    मुझे लगता है, कुछ यात्राएं प्रकृति स्वयं हमसे करवाती है। शायद हमें पुकारती है। या फिर यह भी संभव है, कि संयोग ही ऐसे बन जाते है, जो हमें वहीँ ले जातें है, जहाँ स्वयं प्रकृति विराजती है। सैंकड़ों वर्षो की तपस्या में तपकर पत्थर बन चुकी मिट्टी के वे बड़े बड़े पहाड़। जो हर बार मनुष्य को बौना होने की प्रतीति करवाते है। लेकिन मानवसहज भाव है, पृथ्वी की उन प्रत्येक प्रकृति पर अपना प्रभुत्व जमाने का। हमने उन पहाड़ों को बिच से चीरकर भी अपना रास्ता तय किया।


    अमासांत तिथि-पंचांग कह रहा था, कि अमावस्या और एकम एक ही दिन में है। चैत्र का आरम्भ.. जलवायु परिवर्तन का आरंभ। चैत्र अपने साथ एक तीखी धूप लेकर आता है। पतझड़ के बाद आयी बसंत, इस धूप के कंधे पर सवार होकर जड़ हुई प्रकृति में नवचेतना का संचार करती है। नई नई कोंपले विभिन्न रंगों से प्रकृति की रंगोली करती है। चैत्र की आदत है, यह इस एक ही मास में सर्दियां, गर्मियां और बारिश से भी रूबरू करवाता है। गर्मी अपना प्रादुर्भाव करे उससे पूर्व ही एक झलक देती है। जिसे आजकल हीट-वेव्स कहते है। पहले लू कहते थे, गर्म हवाएं बहे, और धूप का तीखापन अनुभव होने लगे, सर्दियों की नमी को शोषने आई हुई शुष्क हवाएं.. लू। अमासांत विक्रमी पंचाग के अनुसार चैत्री नवरात्रि का प्रारंभ हो चुका है। देवी आराधना के दिवस।


Road leading to Mount Abu with mountains and greenery


आंधी-तूफान के बीच रात का सफर

    रात्रि के ढाई बजे रहे थे। सारा ही संसार सोया पड़ा था। दिनभर की लू से त्रस्त हुई प्रकृति भी शायद चंद्रमा से रुष्ट होकर, शैया पर वामकुक्षी करने पसरी थी। क्षयग्रस्त चंद्रमा जरूर से रोहिणी के साथ होंगे, अवकाश में तो अनुपस्थित थे। विकास के आकांक्षी मानवो में से बस सामान के परिवहन करने वाले वाहनों ने ही रोड को कब्जाए हुआ था। अमावस की अंधेरी रात में प्रकृति ने करवट ली। आकाश के अंधेरे को और गाढ़ा करने के लिए बादलों की सेना आ चढ़ी। बिजलियों ने मुक्त मन से बादलों के दल में नृत्य प्रस्तुत किया। चपला के इस नाट्यरम्भ से प्रसन्न होकर वायु ने अपना वेग और बढ़ा लिया। तीव्र गति में बहते वायु के साथ, क्षणप्रभा के इस नाट्यरम्भ के साक्षी, बादलों ने रीझकर बरसना शुरू कर दिया। वायु के वेग के कारण मानव निर्मित वस्तुएं प्रकृति के इस तांडव की साक्षी न रह पायीं। जहां प्रकृति के ही पुत्र वृक्ष धराशायी होने लगे हो, वहां बिल-बोर्ड्स, या फिर मोबाइल नेटवर्क्स टावर की क्या बिसात?


    इतनी भयावह प्रकृति के बीच भी, रोड पर एक कार अपने गंतव्य की ओर बढ़ने में लगी थी। कार की गति को प्रकृति की नज़र लगी थी, या शायद प्रकृति उसे गतिवंत होने से रोक रही थी। बड़े बड़े जलबून्दों से उसका मार्ग अवरोधित करती प्रकृति से यह लोहे की कार लोहा लेने को उतारू हुई लगती थी। तेज हवाएं, जोर की बारिश, बिजलियों की गड़गड़ाहट को अनदेखा करने का कारण बस इतना ही था, कि साढ़े तीनसौ किलोमीटर दूर, शांत प्रकृति को साधने ही वह कार आगे बढ़े जा रही थी। समंदर से सटे कच्छ जिले की आबोहवा ही कुछ ऐसी है। यहां दिन कितना ही सूर्य की अग्नि में तपा हो, रात्रि तो माँ की गोद की जैसी शीतल ही होती है। आंधी-तूफान भरा यह वातावरण तो जैसे रात के सन्नाटे को बिखेरने ही आया होगा। समाचारों ने आगाह तो किया था, लेकिन फिर भी यह कार चालक यानी कि मैं निकल पड़ा था, एक सफर पर। घर से बस पांच-सात किलोमीटर पर ही इस आंधी से साक्षात्कार हो चुका था। वापिस लौटने के बजाए मैंने आगे बढ़ना चुना था।


कच्छ से उत्तर गुजरात : कठिन रास्ते और अनुभव

    तीसेक किलोमीटर तक इस भयावह आंधी से युद्ध करते हुए, मैं इस चक्रव्यूह से बाहर निकल आया था। कच्छ के एक छोटे से गांव सामखियाली में दो रास्ते अलग होते है। एक सौराष्ट्र की और जाता है, एक उत्तर गुजरात की ओर। जीवन मे दूसरी बार इस सड़क पर चढ़ा था, और पहली बार स्वयं से कार चला रहा था। उत्तर गुजरात मे कभी भी जाना हुआ ही नही है मेरा। न ही वहां कोई रिश्तेदारी है, न ही वहां जाने का कोई कारण मिला है मुझे। लेकिन आज कारण भी था, इच्छा भी थी, और समय और संयोग भी। बस प्रकृति थोड़ी सी विरुद्ध थी। सामखियाली से उत्तर गुजरात की ओर जाता आडेसर वाला रोड पकड़ लिया। गत वर्षा ऋतु में हुई अतिवृष्टि ने इस सड़क को कईं जगह चोटिल किया है। फ़टे कपड़े में किए रफ़्फ़ु की भांति, इस सड़क पर कितने ही सारे गड्ढे को काले डामर से लीपा-पोती कर, विकास को साधे रखने का निरर्थक प्रयास, दिवस के उजाले में तो उजागर रहता है, लेकिन रात के अंधेरे में असावध के लिए हानिकारक है। 


    मैं अनजाने रास्ते पर अधिक सजग रहता हूँ। धीरी गति से ही बस आगे बढ़े जा रहा था। न जाने कितने महीनों से हो रहे इस रोड के चौडाकरण योजना के कारण, बार बार डायवर्जन लेने पड़ रहे थे। ऊपर से कितनी ही बार एक ही सड़क में आवन-जावन के दोनों तरफ के वाहन गुजर रहे थे। रात में चलते ट्रक फुल बीम पर चलते है, आंखे चौंधिया जाती है। कितनी ही बार मुझे अपनी कार एकदम ही धीरी कर लेनी पड़ी थी। मेरी अपनी ही कार की लाइट्स, यह सामने से आती हाई-बीम से शरमा कर सड़क को देखती ही नही थी, न ही मुझे दिखा पा रही थी। रात्रि वाहन यात्रा करते हुए कोई लोकल कार दिख जाए, तो उसका पीछा करते रहो, उसे पता होता है, कहाँ गड्ढा आएगा, कहाँ बम्प होगा, या कहाँ तेज चलानी है। सांतलपुर तक धीरी गति में चलने के बाद राधनपुर तक थोड़ी ठीक ठाक सड़क होने का आभास जरूर होता है, लेकिन कुछ ही घंटों पूर्व आयी आंधी ने सड़क पर कईं जगह झाड़ियां बिखेरी थी। एक जगह तो पूरा पेड़ ही आधे रोड पर सोया हुआ पड़ा था। संजोग से मुझे दिख गया, और मैंने अपनी कार कंट्रोल कर ली थी। 


    सांतलपुर में रॉंग-साइड पर एक पेट्रोल-पंप दिखा था, लेकिन मैंने सोचा कहीं आगे अपनी ही साइड पर आएगा। अधिकांश पंप भी आंधी के असर में, सन्नाटे से सने हुए, बेजान पड़े थे। कार ने तो कह दिया था, कुछ ही घूंट शेष बचे है उसके पास। लेकिन राधनपुर तक, सांतलपुर से वह अडतालिश किलोमीटर का सफर, उन बचे कूचे पेट्रोल के घूंटो में पर्याप्त न था। मैं उन प्रत्येक पेट्रोलपंप से निराश होकर लौटता, और धीरी गति से आगे बढ़ जाता। आंधी के कारण बत्तीगुल थी। बिजली के बिना पेट्रोल पंप चले कैसे? राधनपुर से लगभग पांच किलोमीटर पूर्व आईओसी का पम्प था, सुनसान पड़ा था। यहां से आगे और सफर करता, तो बीच रास्ते कार बंद पड़ जाती। सूर्य क्षितिज से थोड़ा ऊपर उठ चुका था। उजियारा हमेशा ही अपने साथ बहुत सारी संभावनाएं ले आता है। बहुत सारी आशाएं भी। 


पेट्रोल की कमी और उम्मीद की किरण

    रात की आंधी से दुबका बैठा संसार धीरे धीरे सूर्य के उगने से संचार में आने लगा था। हाईवे अब पहले जैसा सुनसान नहीं रहा था। ट्रक्स की तादात बढ़ती जा रही थी। और उससे अधिक मोटरसाइकिल्स। पेट्रोलपंप पर उपस्थित एकमात्र अधेड़ कर्मचारी को मैंने अपनी समस्या बताई। उसने मदद करने के ही इरादे से एक बार जनरेटर से पेट्रोलपंप चलाने की बात कही। मैंने कहा था न, उजियारा बहुत सारी आशाएं ले आता है। डीज़ल जनरेटर ने अपना कौशल दिखाया, पंप में पावर आया। और नोज़ल ने कार की टंकी को फिर से आगे के सफर की संभावना प्रदान की। 


    अब कहीं चाय का स्टॉप लेना जरुरी लग रहा था। सामखियाळी से लेकर यह राधनपुर का रास्ता मेरे अनुसार न रहा था। राधनपुर के बाद थरा और शिहोरी पार करने पर एक होटल दिखी। वहीँ स्टॉप ले लिया। बारिश, कीचड़, और रोड पर बिखरी झाड़ियों के बावजूद लगभग ढाईसौ किलोमीटर का सफर हो चूका था। रस्ते की धूल पानी की बौछार में घुलकर उड़ते हुए, कार पर एक परत चढ़ा चुकी थी। आठ बजने में पांच मिनिट कम थी। एक कटिंग (चाय) का आर्डर देकर मैं बस इस ऊपर की ओर बढ़ते सूर्य को देखने में मशगूल था। वेटर ने चाय का कप थमाया। हाईवे पर चाय कप में सर्व की जाती है, वैसे चाय पिने का मजा रकाबी (प्लेट) में ज्यादा आता है। 


    यहां से अब केवल 139 किलोमीटर नापने थे। फिर से एक बार स्टेयरिंग मेरे हाथ मे था। सामने खुली सड़क। सूर्य अब क्षितिज से डेढ़ हाथ ऊपर उठ चुका था। कोई पशुपालक अपनी मोटरसायकल पर चारा ले जाते दिखता। तो कभी कोई ट्रेक्टर धीरी गति से अपने खेत की ओर बढ़ता मिलता। रोड के किनारे पर लगे एक सरकारी बोर्ड पर मेरी नजर पड़ी। लिखा था, "रॉंग साइड आते वाहनों से बचिए।" ऐसा मैंने पहली बार पढा था। मैं काफी देर तक सोचता रहा, मैं अपनी लेन में ड्राइविंग करता हूँ, फिर भी मुझे अपनी ही लेन में रॉंग साइड से आते वाहनों से बचने के लिए सूचित किया जा रहा है। यह भला कैसी बात हुई? RTO एवं पुलिस क्या करेगी फिर? रोड सेफ्टी देना तो उनकी जिम्मेदारी है। अगर कोई वाहन रॉंग साइड चल रहा है, तो उसे RTO को रोकना चाहिए, न कि एक सूचना बोर्ड पर लिखकर अपने कर्तव्यों से पल्ला जाड़ लेना। यह सूचना वैसे सत्य थी, कितने ही सारे वाहन रॉंग साइड में आते ही जा रहे थे। कभी कोई ऑटो रिक्शा, तो कभी कोई ईको-पैसेंजर कार। ट्रेक्टर का रॉंग में चलना समझ आता है, कि रोड से सटे खेत मे जाने के लिए उन्हें यह ज्यादा सहूलियत भरा लगता होगा। है तो हानिकारक ही।


माउंट आबू की ओर : बदलती प्रकृति

    यही सब सोच विचार करते हुए मैं पालनपुर पहुंच चुका था। पालनपुर एक नवाबी राज्य हुआ करता था, आज भी एक बड़ा सिटी मान सकते है। खेरालु, सिद्धपुर, डिसा, राजस्थान, अंबाजी जाने के लिए यहां से सारे रास्ते अलग होते है। मुश्किल से साठ किलोमीटर ही कार चली होगी, कि मैंने एक और स्टॉप ले लिया। यह स्टॉप नाश्ते के नाम पर बस धूम्रपान करने के लिए था। कुछ देर गाड़ी रोककर एक जगह उतरा, थोड़ा टहला, धुंआ उड़ाया, और दस मिनिट के इस छोटे से स्टॉप के बाद अब नॉनस्टॉप जाने का अपने आप से निश्चय किया। लेकिन यह निश्चय भी मेरे अन्य संकल्पों की ही तरह खोखला ही सिद्ध हुआ था। अब केवल बयासी किलोमीटर का सफर बाकी था। राजस्थान की ओर आगे बढ़ते हुए प्रकृति भी बदल रही थी। कच्छ की खाड़ी से सटे भूभाग समतल - नमकिले लेकिन बंजर मरुस्थल से होते हुए आया था मैं। और अब अरावली की पहाड़ियां सड़क की दोनों ओर से खेतों के पीछे दिखाई पड़ती थी। वही अरावली, जिसे कुछ महीने पूर्व सरकार ने दोसौ मीटर से ऊंचा होने पर ही पहाड़ कहे जाने का सर्टिफिकेट बांटा है।


hillstation of mount abu, aravali hills

खतरनाक मोड़ और एक बड़ा हादसा टल गया

    जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, पहाड़ और बड़े तथा नजदीक आते जा रहे थे। इकबालगढ़ के बाद अमीरगढ़ बॉर्डर पहुंचने को था। फॉरलेन हाईवे पर गति मर्यादा अस्सी की थी। सड़क खाली तो थी, लेकिन पूरी तरह से नहीं। अपनी लेन में बायीं और चलते हुए अचानक आगे एक ट्रक वाले ने अपना ट्रक रोड पर ही खड़ा कर लिया। उसके पीछे चल रहे ईको ने भी अपना पूरा जोर आजमा कर ट्रक से एकाध फुट दूरी पर अपनी कार रोक ली। ईको के पीछे मैं ही था। कार को कंट्रोल करते हुए मैंने भी कसकर ब्रेक मारी, आगे वाली ईको से बस सात-आठ इंच की दूरी पर मेरी कार भी रुक गयी। लेकिन यहां डरने की बात अभी खत्म हुई नही थी। मैंने अपने रियर व्यू मिरर में देखा, मेरे पीछे एक ट्रक भरपूर स्पीड से आ रहा था। आइने में दिख रहा था, वह ट्रक ड्राइवर भी पूरी कोशिश कर रहा था, अपना ट्रक काबू करने के लिए। मैंने त्वरित निर्णय लिया, लेन चेंज करने का। लेकिन मेरे आगे खड़े ईको और मेरी कार के बीच इतनी जगह बची नही थी, कि मैं कार को मोड़ सकूं। अब जो होना था, वह ट्रक ड्राइवर के कौशल पर निर्भर करता था। मैंने ईको से सटाकर हो सके उतनी राइट लेन में अपनी कार ले ली, और पीछे से आ रहे ट्रक ने मुझे बचाने के लिए अपना ट्रक रोड से लगभग उतार कर, मेरी बायीं और मेरे बराबर में आखिरकार रोक ही लिया। 


    कुछ ही सेकण्ड्स में बहुत कुछ हो जाने से बच गया था। मेरी कार और मेरे पीछे से आता ट्रक, दोनों अगल बगल में खड़े थे, आधा ट्रक हाईवे से  नीचे था, आधा ही रोड पर था। मुझे यह विचार आया, कि अगर यह ट्रक ड्राइवर रोड से नीचे न उतरता तो..? एक हल्की सी कपकपाहट छूट गयी थी। कपार पर कुछ बूंदे पसीने की उभर आई थी। स्टेयरिंग को मजबूती से पकड़े हुए हाथ मे एक दर्द का अनुभव हुआ, शायद संभावित कल्पना के कारण। थोड़ी सी पीछे लेकर मैंने इन वाहनों को ओवरटेक किया, और थोड़े आगे रोड से उतारकर कार रोक ली। कार से उतरकर एक सिगरेट सुलगाई, धुंआ बहुत सारी कल्पनाओं को उड़ा देने में मददगार साबित होता है। विचारों को धुंधला कर देता है। तेज हो चुकी सांसे धुएं के साथ साथ धीमी होती जा रही थी। लेकिन बार बार आंखों के आगे, कार के उस बीच वाले शीशे में से तेज गति से आते ट्रक का दृश्य धुंधला होने में समय ले रहा था। थोड़ा सा पानी पिया, और फिर से एक बार कार का इग्निशन ऑन किया। रोड पर हादसे इसी तरह होते है, यह कड़वा सत्य है। सबसे आगे वाले ट्रक को शायद वहां हाईवे से उतरती कच्ची सड़क के लिए मुड़ना था, इसी लिए उसने अचानक से ब्रेक मार ली। उसे शायद कोई फर्क नही पड़ता था, कि पीछे कोई वाहन आ रहे है या नही। 


माउंट आबू में पहला अनुभव

    खैर, कुछ ही मिनिटों में रोड के किनारे स्थित एक होटल का गुजराती में बेनर दिखा, "ठंडी बियर अने व्हिस्की अहीं मळशे।" चौंकने की जरूरत लगी नही मुझे। मैं राजस्थान में पहुंच चुका था। जगह थी आबूरोड। अरावली की पहाड़ियों में से एक आबू पर्वत की तलहटी में बसा यह शहर गुजरात मे खूब प्रसिद्ध है। अहमदाबाद और उत्तर गुजरात मे बस्ते शौकीन लोग वीकेंड यहीं बिताते है। और यही कारण है, यहां हिंदी के अलावा गुजराती में भी हर जगह लिखा हुआ रहता है। आज मैं कल्पना करता हूँ, तो पाता हूँ, कि अगर गुजराती लोगों ने कभी इस शहर को अपनाया न होता, तो यह जरूर से एक आम गांव-कस्बा ही रह जाता। मैंने एक दुकान पर कार रोक ली। दुकानदार का पहला ग्राहक मैं ही था। वह अभी तक अपनी दुकान में छोटे से मंदिर में रखी छवियों को धूप-दीप से रिझा रहा था। दुकान को उसने काफी आधुनिक अंदाज़ में सजा रखा था। अलग अलग रंग की कांच की बोतलों में बंद मद्य पर सूर्यकिरणों का प्रकाश देखे बनता था। इस धंधे में यदि दुकानदार पूजा-पाठ न भी करे, तब भी बरकत ही रहती है। क्योंकि मद्य के आदी हो चुके मनुष्य को किसी अवकाशिय इशारे की जरूरत नहीं होती ठेका ढूंढने के लिए। 


    आधा डज़न कोरोना के कैन कार की पिछली सीट पर बिठाए। वे शान्तिपूर्व आगे का सफर मेरे साथ कर सकें, और पहाड़ के घुमावदार रास्तों पे ज्यादा हिले-डुले नही, इसी प्रश्न के समाधान हेतु उन्हें, पिछली सीट से उठाए, और आगेवाली लेफ्ट सीट के नीचे रख दिए। यहां से माउंट आबू बस तीस किलोमीटर था। मैं पहली बार इस हिल स्टेशन में आया था। यहां के घुमावदार रास्तों के बारे में खूब सुना था। चोटी पर स्थित शहर की महंगाई के बारे में भी खूब सुना था। धीरी गति से पहाड़ चढ़ना शुरू कर दिया। खाली रोड था, लेकिन पहाड़ उतरते वाहन थोड़ा तेज़ गति में आते है, और उन्हीं से भय उपजना यथार्थ भी लगता है। समय तो अब याद नही कितना लगा था, लेकिन साढ़े ग्यारह बजे मैं माउंट आबू पहुंच चुका था। वे तीस किलोमीटर के घुमावदार रास्ते, और सतत ऊपर की ओर चढ़ती कार, थोड़ी सी पतली होती जाती हवा, कितने ही वर्षो की तपस्या में लीन वे वृक्ष, और उन पर यहां से वहां कूदते लंगूर। यह सब मैं पहली बार देख रहा था। काफी ज्यादा रोमांचक लग रहा था।


Panoramic view of Mount Abu hills with green forests and clear sky

***


    नीलगिरी, आम, और पलाश इन तीन वृक्षों के अलावा हजारों वनस्पति है यहां, लेकिन मुझे उनकी पहचान नहीं है। कंक्रीट के जंगलों में बड़े हुए को प्राकृतिक जंगल की पहचान ही नही है। मनुष्य का पहला पोषक यह वन ही था। वनों से ही उसने लकड़ियां पाई, विभिन्न जड़ी बूटियां पाई। पानी से लेकर शिकार, और अपना अंग ढकने का चमड़ा भी उसे किसी वन ने ही दिया था। पतझड़ के बाद यह वसंत की कोंपले प्रकृति को अलग ही रंग चढ़ा रही थी। माउंट आबू पर अब मुझे एक आश्रय की तलाश थी। मुझे कोई रम्य और शांत स्थान चाहिए था। ऐसे में सर्किट हाउस से बढ़िया क्या हो सकता था? लेकिन अफ़सोस वहां रुकने की व्यवस्था न हो पायी। नक्की झील के पास ही एक बंगलो था, और उसने थोड़ा बहुत भावताल करने पर रूम दे दिया।


बारिश, ठंड और अधूरी यात्राएं

    रूम अच्छा था। साफ़ सुथरा, और रूम की बालकनी से सीधा पहाड़ दीखता है। बंगलो के पार्किंग लोट में कार खड़ी की। कार की हालात ठीक नहीं थी। एक बढ़िया वाशिंग की शीघ्र जरुरत थी। बैग निकाला, रूम में पहुंचकर सीधे ही बैड पर पसर गया। वाशरूम में जाकर हाथ-मुँह धोये, बारह बज चुके थे। लेकिन यहाँ गर्मी का कोई नामोनिशान नहीं था। इसी कारणवश तो लोग हिल-स्टेशंस की सैर पर जाते है। बालकनी का दरवाज़ा खोलते ही एक पहाड़ की चोटी सामने थी। विभिन्न प्रकार के वृक्षों से सजी हुई, और बड़े विशाल पत्थरों को थामे हुए वह चोटी की ढलान मेरी इस बालकनी में ही थी। मेरे ठीक सामने एक विशाल आम का वृक्ष था। इतने मोटे तने वाला आम का पेड़ मैं पहली बार देख रहा था। लगभग तीन माले की ईमारत से भी ऊंचा यह वृक्ष, बसंत में आयी जामुनी पत्तियों से लदा हुआ था। और भी कुछ वृक्ष थे जिन्हे मैं नहीं पहचानता। 


    बालकनी में कुर्सी और टेबल लगा हुआ था। मोबाइल में कुछ चुनिंदा गानों की प्लेलिस्ट बज रही थी। शांत प्रकृति का आनंद उठाते हुए, कोरोना के दो कैन ख़त्म कर चूका था। दोपहर के दो बज रहे थे। लेकिन पहाड़ियों में सूर्य का अतापता ज्यादा उजागर नहीं रहता। बाथरूम में गर्म पानी आ रहा था। नहा लिया। अब भोजन का प्रबंध करना था। और उसके लिए मुख्य बाजार से उपयुक्त क्या हो सकता है? हल्का सा सुरूर हो तो पैदल चलने में कोई अड़चन नहीं आती। नक्की झील के सहारे-सहारे चलते हुए, चारोओर श्वेत वस्त्र-धारी मनुष्यों की भीड़ दिखाई पड़ती थी। ब्रह्माकुमारी.. मैं नहीं जानता यह संस्था क्या करती है, एवं समाज में इनका क्या योगदान है, लेकिन इस संस्था से जुड़े हुए लोग श्वेत वस्त्र ही धारण करते है। पूर्ण श्वेत वस्त्र धारी स्त्री मैंने सिर्फ यहाँ देखी। खैर, मुख्य बाजार में स्थानिक लोग गुजराती में ही स्वागत करते है, अपने रेस्टॉरेंट की और खिंच ले जाते है। 


    ऐसे ही एक रेस्टोरेंट में दाखिल हुआ। टेबल पर बैठते ही मेनू-कार्ड में से गुजराती थाली ही आर्डर करने जा रहा था, कि एक और गुजराती कपल ने मुझसे कहा, "थाली मत आर्डर करना, दाल मीठी है।" एक तो गुजरात के बहार के लोग पता नहीं गुजराती थाली की दाल में चीनी क्यों डालते है? माना की गुजराती दाल में खड़े मसाले का उपयोग न करने से तीखी कम बनती है। लेकिन वह दाल मीठी तो कतई नहीं होती। फिर भटूरे के नाम पर बड़ी सी पूरी, और छोले के नाम पर कच्चे चने चबाकर, रेस्टोरेंट को कोसते हुए, बिल काउंटर पर पैसे चुकाकर निकल पड़ा। ऐसे प्रवासक्षेत्रो में ठगी न हो तो फिर काहेका प्रवासन क्षेत्र भाई?


गुरु शिखर, देलवाड़ा और अर्बुदा देवी

    मुख्य बाजार में घूमते हुए एक आदमी ने सामने से आकर कहा, "स्कूटी मिल जाएगी घूमने के लिए।" यह सौदा ठीक लगा मुझे। २०० रूपये में रात आठ बजे तक भाड़े पर टू-व्हीलर लेकर घुमा जा सकता है। उससे थोड़ी-बहुत जानकारियां जुटाई, और एक एक्टिवा स्कूटर ले लिया। मेरे लायक, या मेरी पसंद के अनुसार यहाँ देखने लायक तीन जगह थी। एक गुरु शिखर, दूसरा देलवाड़ा के देरासर, और तीसरा सनसेट पॉइंट। दोपहर के तीन बज रहे थे। अभी तो काफी समय पड़ा था। सबसे पहले गुरु शिखर जाना उचित लगा। रस्ते में ही देलवाड़ा के देरासर पड़ते थे, लेकिन मुझे गुरुशिखर पहले देख लेने की इच्छा थी। पहाड़ी रास्तों पर ढलान चढ़ते हुए यह स्कूटर अपनी जी-जान से महेनत करता अनुभव होता था। लेकिन रास्ता ठीक था। घुमावदार था, लेकिन सरल था। यह ऑफ़-सीजन था, इसी कारण से यहाँ बिलकुल ही भीड़ नहीं थी। 


    गुरुशिखर से बस पांच किलोमीटर ही दूर था। आसमान में एक बार पुनः घने बादलों का आगमन हुआ। गर्मी तो थी ही नहीं, ऊपर से हो रही इस बूंदा-बांदी से ठण्ड बढ़ने लगी। इस रस्ते पर कहीं भी बारिश से बचने का आश्रयस्थान था नहीं। एक मोड़ पर वाहन रोकने की जगह थी, वहीँ स्कूटर खड़ा किया। वृक्ष के निचे बारिश की बूंदो से कुछ देर तक तो बचा जा सकता था। सहसा नजर गयी, वह वृक्ष अंजीर का था। और एक पका हुआ फल दिखा। फल को तोड़ते ही अंदर सेंकडो कीड़े थे। मैंने तुरंत वह फल फेंक दिया। ड्राई-फ्रूट के नाम पर हम जो अंजीर बड़े चाव से खातें है, वह यही अंजीर होता है, जो सूखने के पश्चात खाने-लायक बनता है। और अंजीर का वह अलग स्वाद का कारण यह कीड़े ही होते है। अंजीर का फल पकने के बाद गिर जाता है। फल के अंदर हजारो कीड़े मौजूद होते है। वृक्ष से गिरा हुआ यह फल फिर सूखने की प्रोसेस में आता है। फल के साथ-साथ भीतर के वे कीड़े भी फल के अंदर ही सूखकर मर जाते है। और फिर वह सूखा हुआ फल हम तक पहुँचता है। 


    बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। और अब तो वह अंजीर वृक्ष भी वर्षा के एकत्रित बूंद मुझ पर बरसाने लगा था। थोड़ा-थोड़ा भीग भी चुका था, तो थोड़ी ठंड भी अनुभव हो रही थी, वैसे थोड़ी नही, बहुत ज्यादा ठंड अनुभव हो रही थी। पहाड़ी होने के कारण हवाएं एक दिशा में बहती रहती है, और संयोग से उस समय हवाएं मेरी ही तरफ बहती हुई, हड्डियों तक कपकपाहट भरने लगी थी। ठंड से बचने का आश्रय ढूंढना अनिवार्य था। मेरी नज़र पड़ी, रोड के नीचे एक बरसाती नाले के गुजरने का मार्ग था। उस नाले पर बने आरसीसी पुल पर यह सड़क निर्मित थी, तो मैं सड़क से उतरकर उस नाले में प्रवेश कर गया। यहां बारिश में भीगने से तो बचाव हो गया। लेकिन ठंड का उपाय न था कोई। स्कूटर की बूट में रखा एक और कैन ले आया। हाँ! कहीं भी खुले-आम मदिरापान करना कानूनन अपराध है। लेकिन मैं नाले के नीचे था, ऊपर से बारिश के कारण यहां कोई भी नही था। एक और कैन खाली करने के पश्चात थोड़ा सा धूम्रपान और किया। अब गुरुशिखर जाने का कोई अर्थ था नहीं। बारिश रुकने का नाम नही ले रही थी। लगभग आधा घंटा उस नाले में दुबककर बैठने के बाद, बारिश के थोड़े धीरी होते ही फिर से स्कूटर पर निकल पड़ा। 


Scenic view captured from the stone steps of Guru Shikhar, surrounded by lush greenery and hills


    गुरु शिखर पर पार्किंग लॉट में स्कूटर खड़ा किया। सीढियां चढ़ ही रहा था, कि ख्याल आया, सुरा का सेवन कर मंदिर में कहा पैर रखूं? तो सोचा, शिखर पर तो जा ही सकते है.. वहां तो बस पहाड़ियों के नजारे दिखेंगे। पर बारिश ने एक बार फिर से अपना कौशल्य दिखाया। और आधे घण्टे तक मैं एक रेस्टोरेंट में बैठा रहा। एक तो हम ओवर-थिंकर लोग बहुत ज्यादा सोचते है। किसी के रेस्टोरेंट में ऐसे बिना कुछ आर्डर किये कैसे बैठा जा सकता है? यह विचार मेरी अंतरात्मा को हीनभावना से त्राहित करने लगा। पता नहीं यह पहाड़ों पर मैग्गी खाने का ट्रेंड किस 'मैग्गी पगलु' ने शुरू किया था? दस रुपये की मैग्गी का रेस्टोरेंट वाले साठ रुपये तक छीन लेते है। जो भी हो, भरपूर ठंड में गर्मागर्म मैग्गी थोड़ी अच्छी तो लगी थी। अगर गर्म वातावरण होता तो मुझे प्लेट में पड़े केंचुए लगते।


    साढ़े पांच बजे रहे थे। न ही दत्तात्रेय मंदिर जा पाया, न ही गुरुशिखर। ऊपर वेधशाला भी है। पर वातावरण इतना वेधक था, कि वेधशाला भी दूर से ही देख ली। रेस्टोरेंट के ठीक सामने एक दुकान पर काफी भीड़ थी, लोग रेनकोट खरीद रहे थे। दुकानदार भी पचास रुपये के पन्नी वाले रेनकोट देढ़सौ में एक बेच रहा था। ठंड से बचने के लिए मैंने भी एक खरीदा। नीचे उतरना शुरू किया। द्विचक्री वाहनों में यह छोटे टायर वाला स्कूटर नामक जंतु, मुझे जरा भी पसंद नही है। इसके छोटे टायर फिसलते बड़ी जल्दी है, ऊपर से इसका हैंडल भी पकड़ने में वो वाहन चलाने वाली फीलिंग नही आती। बड़ी ही सावधानी पूर्वक घुमावदार मोड़ पर ब्रेकिंग करते हुए आखिरकार देलवाड़ा पहुंच गया मैं। छह बजे चुके थे। देरासर भी बंद हो चुका था। देलवाड़ा के देरासर प्रसिद्ध है। जैन मंदिर को देरासर कहते है, और गुजराती में तो 'दहेरा'.. यह देरासर प्रसिद्ध है संगमरमर में कई गयी बारीक नक्काशी के लिए। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी में बीच इन मंदिरों का निर्माण हुआ था। जटिल शिल्पकला और भव्य वास्तुकला देखने लायक है। लेकिन परिस्थिति मुझसे विपरीत थी। बारिश ने सारा कार्यक्रम बिगाड़ दिया था।

Wet road reflecting the rain, captured while descending from Guru Shikhar with lush greenery around



    51 शक्तिपीठों में से एक, यहां अर्बुदा देवी का शक्तिपीठ भी है। दुर्गा के स्वरूप कात्यायिनी रूप में यहां विराजमान यह शक्ति को 'अधर देवी' भी कहा जाता है। सती के अधर यहां गिरे थे। लेकिन मैं वहां भी न जा पाया। कारण एकमात्र ठंड और थोड़ा सा सुरा का सेवन। इस अरावली सिद्ध क्षेत्र की अधिष्ठाता देवी अर्बुदा ही है। और अर्बुदा शब्द से ही आबू शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। अंग्रेजकालीन राजस्थान/राजपूताने का पोलिटिकल एजेंट भी माउंट आबू में ही बिराजता था। और इसी कारणवश शायद यहां बीकानेर हाउस और जयपुर हाउस जैसे पैलेस भी मौजूद है। देखने लायक यहां बहुत कुछ है, लेकिन मैं असमय पहुंचा था। 


    मुझे माउंट आबू में वशिष्ठ आश्रम भी देखना था। इतिहास में रुचि होने के कारण मैंने एक कथा पढ़ी थी। जब असुरों का उत्पात बढ़ गया था, तब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने सिद्धक्षेत्र आबूराज में तप किया, यज्ञवेदी से चार क्षत्रिय पुरुष उत्पन्न किए। उन चार पुरुषों को इस सिद्धक्षेत्र को असुरों के आक्रमण से बचाए रखने का उत्तरदायित्व सौंपा। उन चार पुरुषों से चार प्रसिद्ध वंश चले, चौहान, चापोत्कट (चावड़ा), चालुक्य (सोलंकी), और परमार। कोई कोई कहानी में चापोत्कट की जगह प्रतिहार होते है। उत्तर, पश्चिम, दक्षिण और पूर्व में यह वंश स्थापित हुए थे। अग्निकुंड से उत्पन्न होने के कारण यह चारो वंश अग्निवंशी क्षत्रिय कहलाते है। कहानी कैसी भी हो, लॉजिक हो न हो.. लेकिन यह बात सत्य है कि यह चारो वंश सत्ता में तो आए थे। यह संभावना विशेष है, कि किसी समय पर जब बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव इतना ज्यादा हो गया होगा, और अहिंसा और शांति के कारण बाहरी आक्रमणों का सामना करने लायक कोई रहा न होगा। तब किसी ऋषि ने बौद्ध या जैन धर्म को धारण कर चुके कुछ चुनिंदा राजविओं को अग्नि की साक्षी में पुनः सनातन प्रवेश करवाया होगा। और बाहरी आक्रमणों को इन वंशों ने रोका होगा।


    सात बजे रहे थे, अंधेरा हो चुका था। स्कूटर जहां से भाड़े से लिया था, वह जगह अब ढूंढने में मुश्किल हो रही थी। संकरे रास्तो में पूछते-पाछते अखरिकर नकी झील के पास वाली मुख्य बाजार तक पहुंचा, स्कूटर वाले को ढूंढा, और उसे उसका स्कूटर सही सलामत सौंपा। अपना ड्राइविंग लाइसेंस सही सलामत वापिस लिया। भुगतान किया। अब रूम पर आना था। पैदल। नकी झील के किनारे चलते हुए ठंड की लहर कभी कान को, तो कभी नाक को सुन्न करने लगी थी। मैंने अजरख को कान ढकते हुए माथे पर लपेट लिया। लोग नकी झील में अभी भी बोटिंग का लुत्फ उठा रहे थे। कोई भूल भटके इस ऑफ-सीजन में आए नवविवाहित जोड़े हाथों की हथकड़ी बनाकर चले जा रहे थे। कोई पांच-छह लड़कियों का ग्रुप सेल्फी खींचने में व्यस्त था। मेरे कानों ने एक बात सुनी, और मैं मन ही मन हँस पड़ा, कोई मित्रो के ग्रुप में एक लड़का कह रहा था, "ऐसी ठंड में हम लड़के अपने हाथों को जेब से बाहर नहीं निकाल पा रहे है, और यह लड़कियां फैशन की मारी आधा शरीर खुला रखकर कैसे घूम रही है?"


Scenic view of hills covered with trees and palm trees, capturing Mount Abu’s natural beauty


माउंट आबू की शांति और आत्मचिंतन

    रूम की बालकनी से ठंडा पवन आता था, आठ बजे रहे थे। वातावरण में अब शांति का एक और अध्याय शुरू होने जा रहा था। निशाचर जीवों के स्वरों के सिवाय बिल्कुल ही सन्नाटा था। आबुराज का यह सिद्धक्षेत्र तपस्वियों, साधकों, योगियों की भूमि रहा है। अरावली की कंदराओं में कभी योगसिद्धि साधना के प्रमाण मिले है, तो कभी महाराणा की वीरगाथा के। यहां मनुष्य शांति को तो पाता ही है। बस शांति की कामना हो, और दृष्टि। अन्यथा यहां भी विलासिता के सिवा कुछ न दिखेगा। नौ बजने को आये थे। सारे कैन समाप्त हो चुके थे। 'अभी न जाओ छोड़कर..' इस गीत को आधा छोड़कर मैंने बालकनी से बाहर झांका, बारिश न जाने कब से शुरू ही थी। भोजनादि का प्रबंध खतरे में पड़ने वाला था। बंगलो का मेनू तो अच्छा था, और भाव तो उससे भी अच्छे थे। अति-प्रसिद्ध पिज़्ज़ा ब्रांड में ऑनलाइन आर्डर प्लेस किया। बंगलो में बाहर से पार्सल मंगवाना अवैध था, लेकिन मैं उन्हें समझाने में सक्षम रहा, कि मैं बारिश के कारण रेस्टोरेंट पर नहीं जा पा रहा हूँ। 


***

नशे की जुबानी... 

प्रियम्वदा, कभी कुछ सफर बस यूँही कर लेने चाहिए। अपने अस्तित्व को पहचानने के लिए। हमारे लिए हमारे अस्तिव से बड़ा कुछ हो सकता है भला? हमारा अस्तित्व ही सबसे अहम और सबसे महत्वपूर्ण है.. क्योंकि हमने उस अस्तित्व के इर्दगिर्द और...

***


    ग्यारह बजे तक तो सारा शहर जैसे सो चुका था। बालकनी से बाहरी प्रकृति से बस जलबून्दों के गिरने का स्वर, झींगुरों का रव, और हवाओं के साथ भीगे वृक्ष-पत्तों के उड़ने का स्वर सुनाई पड़ रहा था। मानव उत्पादित तमाम आवाजें शायद सो चुकी थी। या फिर अपने अपने कमरों में बंद होकर सिमट गई थी। हाँ ! किसी डाल पर से उल्लू जरूर से गुर्रा रहा था। उसकी अजीब सी आवाज़ मुझे अनाकर्षक लगती है, पर उल्लू मेरा पसंदीदा पक्षी है। उसकी बड़ी बड़ी गोल आंखे, और नुकीली चोंच.. खैर, बारिश बंद हुई या नहीं, मैं नही जानता। मेरी आँख लग गयी थी, तो रात्रि के ढाई बजे आंख खुली, ठंड के कारण। रजाई को फिर से एक बार सिर से लेकर पांव तक दाबकर सो गया। साढ़े पांच का मेरा अलार्म बज उठा। सूर्योदय देखने की मेरी तीव्र इच्छा को, त्वरित आलस ने कुचल दिया। फिर आंख खुली तब साढ़े सात बज चुके थे। एक पर्याप्त, अच्छी, गहरी नींद के बाद नया सवेरा। नूतन सूर्यप्रकाश, नवीन कामनाओं पूर्ण प्रभात..!


अम्बाजी की यात्रा और दर्शन अनुभव

    दृश्य। श्वेत मिश्रित हरे रंग की पहाड़ियां। पहाड़ियों पर पड़ता सुनहरा सूर्य प्रकाश। दूर कहीं से आता गुजराती गरबा का सूर। हल्के जामुनी नवपल्लवित पत्तों वाला आम। आम की एक शाख पर बैठा, अलग नस्ल का टोपीदार बुलबुल। ले… ले… ले… करती हुई एक लैला। नीचे बने एक झोंपड़े के आंगन को बुहारते हुए झाड़ू और जमीन के घर्षण का कलशोर। झोपड़े की दीवार पर चावल के दाने चुगती गोरैया, और उसे हटाकर वहां बैठती मैना। पवन की कोई लहर के साथ, अध-सूखे पत्तों के उड़ने से होती सरसराहट। धीरे धीरे मनुष्यों की प्रकृति में बढ़ती दखल। चाय के कप से उठती बाष्प। थोड़ी सी सर्दी, और उसे भगाने को उत्साहित धूप.. चाय की चुस्कियां लेते हुए यह दृश्य मैंने अपनी आंखों में कैद कर लिया। नहाधोकर तैयार हुआ तब नौ बजे चुके थे।


A steaming cup of tea placed under an old mango tree with sprawling branches



    श्वेत वस्त्रधारियों ने फिर से एक बार माउंट आबू के तमाम रास्तें अपने अधिकार में ले लिए थे। शांति की खोज में भटक रही एक गोरी अंग्रेजन मैम का "व्हॉट विल आई डू.." कहते हुए श्वेत लिबास देखा, तो मैं मन ही मन हँस पड़ा। कि हम यहीं के होकर उस अवसर से मुँह फेर रहे है, जिन्हे यह विदेशी कामना करते हुए भटक रहे है। शांति। शांति कोई वस्तु नहीं, शांति के लिए कोई कठिन साधना या धारणा नहीं करनी पड़ती। वह अपने भीतर ही होती है। फिर भले ही इस आबुराज पर सैंकड़ों वाहन लगातार हॉर्न बजा रहे हो। शांति की अनुभूति की जाती है। शांति को धारण किया जा सकता है। पर शांति किसी को सौंपी नहीं जा सकती। शांति के लिए विदेशयात्रा करने की आवश्यकता नहीं होती। 


    निचे तलहटी की ओर अब मेरी कार सरकने लगी थी। रस्ते भर पहाड़ियों के दृश्य इतने ज्यादा आकर्षक थे, कि मुझे एक घंटा लग गया निचे तलहटी तक पहुँचने में। बादलों के ऊपर दिखाई पड़ती पहाड़ी की चोटी, वन-आच्छादित पहाड़ी के बिच, बीते दिन हुई बारिश की चुगली करता नन्हा सा झरना। रोड के किनारे मानवो द्वारा दिए जाते भोजन की राह में बैठे लंगूरों की कतार। मक्के के भुट्टे को भूनते हुए कोयले से उठता धुआं। सतत स्वच्छता अभियान की खिल्ली उड़ाती प्लास्टिक की पन्नियां, नमकिन्स के रैपर्स, तथा बियर की फूटी हुई कांच की बोत्तलें। इन सब से ऊपर परम शांति। प्रकृति की अपनी सुरावली के सिवा परम शांति। 


A serene spot along the Mount Abu to Talahati route, showcasing lush greenery and natural surroundings



    तलहटी मतलब आबूरोड, असल में तो यहाँ कईं सारे गाँव है, छोटे छोटे गाँव, वे सारे मिलकर आबूरोड बनते है। हमारे लिए तो यह पूरा इलाका आबूरोड है। तलहटी में गरमा-गर्म कचौड़ियां तली जा रही थी। सवेरे से चाय और पानी के सिवा पेट में कुछ गया न था। यूँ तो राजस्थानी कढ़ी मुझे नापसंद है। लेकिन यहाँ की कढ़ी-कचौड़ी में स्वाद था। आबूरोड आए, और रबड़ी न खायी तो क्यों आए? आबूरोड की रबड़ी अति-प्रसिद्द है। छोटे से छोटे ठेले से लेकर अच्छे से अच्छे रेस्टोरेंट में रबड़ी सबसे बेस्ट यहीं मिलती है। कढ़ी-कचौड़ी के तीखेपन को बैलेंस करने के लिए रबड़ी से मुँह मीठा करना अनिवार्य ही है। महंगी लगती है, लेकिन स्वाद की पसंदगी के सौदे में क्या महंगा, और क्या सस्ता?


    यहाँ से अब बस बत्तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित अम्बाजी पहुंचना था। माता सती जहाँ हृदय गिरा था, वह सिद्ध शक्तिपीठ, यानि की अम्बाजी। अम्बाजी मंदिर गब्बर नामक पहाड़ पर स्थित है। रोपवे की सुविधा उपलब्ध है। पर्वत की तलहटी में भी भव्य मंदिर है। अधिकतम लोग यहाँ तलहटी के मंदिर में ही दर्शन करते है। मैं ग्यारह बजकर बीस मिनिट पर अम्बाजी पहुँच चूका था। रस्ते में बस गुजरात-राजस्थान की बॉर्डर पर कुछ देर रुकना पड़ा था। राजस्थान, मध्य-प्रदेश या महाराष्ट्र, तीनों में से किसी भी राज्य से गुजरात में प्रवेश करते समय वाहन की सघन चेकिंग होती है। दारुबंदी एक मात्र कारण है इस चेकिंग का। गुजरात में प्रवेशते ही चेकपोस्ट पर उपस्थित अधिकारी द्वारा रुकवाया गया। उन्होंने पूछा "कहाँ से आ रहें है?" मैंने कहा, "माउंट आबू।" उन्होंने फिर पूछा, "कहाँ जाओगे?", मैंने कहा, "अम्बाजी।" उन्होंने अपना सर कार की विंडो से भीतर दाखिल करते, सूंघते हुए पूछा, "ड्रिंक तो नहीं किया है न?" मैंने हँसते हुए कहा, "नहीं सर, अम्बाजी जा रहा हूँ।" और उन्होंने कहा जाओ। 


    आश्चर्य की बात तो थी मेरे लिए। वे सबकी कार खड़ी करवाकर चेक कर रहे थे। लेकिन मुझसे बस सवाल-जवाब कर के ही जाने दिया। खैर, उनकी इच्छा। पहाड़ी की घाटी में चलते हुए मन विभोर हो रहा था। दोनों तरफ अरावली की पहाड़ियां, बिच से गुजरता डामर का हाईवे, कुछ दूरी तक हाईवे के साथ साथ चलती नदी, पलाश के भरचक पेड़, पलाश के फूलों को बीनकर पांच-दस रूपये में बेचती नन्ही सुकोमल बालिकाएं। और कल के वातावरण से समूल विपरीत तीखी धूप और गर्मी।


    अम्बाजी मंदिर के मुख्यद्वार, जिसे शक्तिद्वार कहा जाता है, वहां से ठीक सौ मीटर आगे एक पेड पार्किंग थी। मैंने वहां कार पार्क की। पार्किंग वाला व्यक्ति बोल पड़ा, "मोबाइल मंदिर में नहीं ले जा सकते। और ठीक साढ़े ग्यारह बजे मंदिर बंद हो जाएगा।" मैंने अपना फोन कार के डैशबोर्ड में ही रख दिया। पार्किंग वाला मुझे शॉर्टकट से मंदिर तक ले जाने लगा। अर्थात वह अपने किसी कमीशन वाले स्टाल से प्रसाद की खरीदारी भी करवाएगा। किन्तु सवाल यह था, कि ग्यारह पचीस हो रहा है, और साढ़े ग्यारह को मंदिर बंद हो जाएगा, पांच मिनिट में दर्शन हो पाएंगे? मुझे अपने महाराष्ट्र के अनुभव याद आ गए, वहां चार से पांच घंटे बस दर्शन की लाइन में ही लग रहे थे। (महाराष्ट्र का प्रवास वर्णन यहाँ पढ़ सकते है।) वह पार्किंग लोट वाला व्यक्ति गलियों से ले जाते हुए एक स्टॉल पर ले आया। उसने पांचसौ-छहसौ रूपये की पूरी छाब भर दी, जिसमे से मैंने सिर्फ रेवड़ी ही प्रसादी के रूप में खरीद ली।


    आशा दुबली थी, मैं परेशान था, मंदिर के पिछले गेट से एक संकरा रास्ता, आगे माताजी के 'चाचर चौक' (देवीमंदिर के प्रांगण को चाचर चौक कहा जाता है।) में निकलता था। मैं भाग रहा था, क्योंकि अभी मंदिर बंद हो गया तो फिर साढ़े बारह बजे खुलेगा। चाचर चौक का प्रवेशद्वार बंद हो चूका था। मुझ पर निराशा छाने लगी थी। हताशा बस इस बात की थी, कि अब एक घंटा कहाँ व्यतीत करूँ? एक बार को विचार तो हुआ, कि तब तक गब्बर पर दर्शन कर आऊं। यह सब मनोमंथन को भंग करता एक ढोल जोर जोर से बजता सुनाई पड़ा। शक्तिद्वार से कोई भक्तमंडली ढोल बजाती हुई मंदिर में प्रवेश कर रही थी। उनका आयोजन क्या था, मैं नहीं जानता। उनकी कोई धार्मिक विधि थी, मैं नहीं जानता। मैं उस भक्त-मण्डली में शामिल हो गया। उनके लिए यह चाचर चौक का गेट खोला गया। उनके साथ-साथ मैं भी मंदिर में प्रवेश कर गया। 


    अम्बाजी मंदिर में वर्षों से एक ही जयकारा लगाया जाता है, "बोल माड़ी अम्बे, जय जय अम्बे।" ढोल पर लगातार थाप पड रही थी। झांझ के नाद से वातावरण झंकार रहा था। मंदिर में जयकारों की गूँज बार बार उठती थी। भीड़ नहींवत थी। आराम से दर्शन हुए। दर्शन के बाद मंदिर से बाहर निकलने का मार्ग कुछ इस तरह है, कि मंदिर की प्रदक्षिणा भी हो जाती है। आरस (संगमरमर) पत्थर का बना यह विशाल और भव्य शिल्प-नक्काशी वाला मंदिर सूर्यप्रकाश में और ज्यादा चमक रहा था। मंदिर का शिखर सोने का बन चूका है। गुजरात में सोमनाथ और अम्बाजी, यह दोनों मंदिर स्वर्ण मंदिर बनेंगे। चाचर चौक में आया तो देखा, यहाँ तो बहुत लोगों के पास मोबाइल फोन थे, और लोग तस्वीरें खिंच रहे थे। 


Majestic view of Ambaji Temple with golden architecture, a spiritual landmark near Mount Abu


गब्बर पर्वत और शक्ति पीठ का महत्व

    अब मुझे गब्बर जाना था। थोड़ी सी ही दूरी पर गब्बर पर्वत है। लगभग देवियां पर्वतों पर ही विराजमान है। और प्रत्येक मंदिरों की कहानी यही है, कोई न कोई भक्त उन्हें निचे एक मंदिर बनवाकर पहाड़ से निचे ले आया है। गब्बर एक छोटा सा पहाड़ है। 999 सीढियाँ चढ़नी पड़ती है। या फिर रोपवे से जा सकते है। समय और ऊर्जा दोनों ही बचाने के इरादे से मेरे लिए रोपवे ही एक मात्र विकल्प था। केवल 125 रूपये टू वे की टिकट है। पांच मिनिट में ही रोपवे ने गब्बर के शिखर पर पहुंचा दिया। यहाँ छोटा सा संगमरमर का मंदिर है। न जाने कितने ही वर्षों से यहाँ अखंड ज्योति प्रज्वलित है। यहाँ भी भीड़ न बराबर थी। सरलता से दर्शन हो गए। यहाँ से चोतरफ का दृश्य बड़ा ही निराला दीखता है। यहाँ से निचे वाला स्वर्ण मंदिर चमकता स्पष्ट दीखता है। यहाँ कोई धार्मिक परिवार यज्ञ करवा रहा था। और यञवेदी के पास बैठे ब्राह्मण देवता सतत मंत्रोच्चार करते हुए आहुति प्रदान करवा रहे थे। 


    यज्ञ से एक और बात याद आ गयी। अभी कुछ महीनों पहले ही एक विवाद समाचारों में छाया हुआ था। अम्बाजी से इक्कीस किलोमीटर दूरी पर दांता शहर स्थित है। दांता बनासकांठा जिले का एक तहसील है। किसी समय पर दांता एक स्वतंत्र राज्य हुआ करता था। परमार वंश की बारड शाखा का यहाँ राज्य हुआ करता था। और अम्बाजी शक्तिपीठ पर दांता राज्य का अधिकार हुआ करता था। मंदिर का प्रशासन और देखरेख दांता राज परिवार ही संभालता था। भारत संघराज्य के निर्माण के समय दांता राज्य भी तत्कालीन महाराणा पृथ्वीराजसिंह जी ने भारत में मिला दिया था। प्रत्येक स्वतंत्र राजपूत राज्यों में कोई न कोई देवी स्थान होता है, प्रत्येक राजवियों की देवी आराधना की परंपरा रही है। और नवरात्री यानि की देवी उपासना। अष्टमी को यज्ञ आयोजित होता है। अम्बाजी की परंपरा रही है, कि अष्टमी को यज्ञ में सबसे पहले दांता राज परिवार का श्रीफल होमा जाता है, और फिर सब भक्तो के। 


    लोकतान्त्रिक सरकारश्री ने अम्बाजी मंदिर का ट्रस्ट बनाकर मंदिर व्यवस्था संभाल ली, और अष्टमी के हवन में भी राजपरिवार की परंपरा को कम कर दिया। महाराणा श्री ने कोर्ट केस किया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी गया, और फेंसला राजपरिवार के हक में न आया। निचली अदालत में फिर एक बार महाराणा के केस फाइल किया। फिर से एक बार फैंसला महाराणा के विरुद्ध आया, और इस बार महाराणा को दंड के रूप में कुछ राशि का भी भुगतान करना पड़ा। कितनी विचित्रता है न.. मांग क्या है? परंपरा का निर्वहन करना। मांग कर कौन रहा है? जिसने कभी पूरा राज्य ही सौंप दिया था। (दांता राज्य का एक प्रसंग यहाँ पढ़ सकतें है।) 


वापसी यात्रा और सीख

    दो बज चुके थे। अब यहाँ से घर की दूरी पुरे 371 किलोमीटर, लगभग आठ घंटे का सफर। रात के दस बजे तक घर पहुँच जाता। और अभी तो लंच भी बाकी था। दोपहर की धूप भयंकर थी। सूर्य आग उगल रहा था जैसे। डामर की काली सड़क पर अगर मक्के के दाने डाले हो तो भूनकर फुल्ले बन जाए ऐसी गर्मी। मेरी पसंदीदा प्लेलिस्ट के गाने बजे जा रहे थे। सहसा नजर पड़ी दाहिने और एक पहाड़ी की चोटी पर। चैस का घोडा बैठा हुआ था पहाड़ी पर। असल में एक विशाल पत्थर का आकार ही ऐसा था, कि अम्बाजी से पालनपुर की तरफ जाते हुए मुमणवास गाँव के बाद यह पत्थर एक विशाल घोड़े के सर जैसा दीखता है। प्रकृति है, कुछ भी निर्माण कर सकती है। 


    एक ढाबे पर लंच लेकर मैं फिर से एक बार निकल पड़ा। दोपहर का समय, खाली हाईवे, और पर्याप्त पेट्रोल। कहीं भी फ़ालतू स्टॉप लेने की आवश्यकता न थी। हाँ ! पालनपुर में भयंकर ट्रैफिक जैम का सामना हुआ था। उसके बाद सीधे ही सांतलपुर पहुंचकर चाय का एक स्टॉप लिया था। कड़क चाय पीकर, फिर से एक्सेलरेटर दबा दिया, सीधा आडेसर। अँधेरा उग रहा था, थोड़ी बचीकुची रौशनी थी, सांतलपुर से आडेसर के बिच में एक जगह पर कच्छ के कच्छ के बड़े और छोटे रन का संगम है। वहां रोड के दोनों तरफ दूर दूर तक खाली मैदान दीखता है। हालाँकि एक मेरे प्रसंग में रोड की दाहिनी तरफ पानी था, नमक के खेत का पानी। आडेसर से गुजरते हुए मुझे वह ऐतिहासिक प्रसंग याद आ गया। (वह वीरता और रोमांच भरा प्रसंग यहाँ पढ़ा जा सकता है।)


    रात्रि के साढ़े नौ बजे मैं घर पहुँच चूका था। इस द्वी-दिवसीय प्रवास में मेरे साथ बहुत कुछ घटित हुआ। अनदेखी जगहें देखी। कुछ देखने लायक स्थान बाकी भी रह गए। विनाशकारी एक्सीडेंट से मैं बच गया। आंधी-तूफान से बच गया। इन दो दिनों में मैंने प्रकृति के तीनो स्वरूप, सर्दी, गर्मी और वर्षा देख लिए। इन दो दिनों में मैंने श्रद्धा भी अनुभव की, शांति भी। रोमांच भी, लापरवाही भी। पहाड़, झरना, मैदान, वृक्षों की विविधता, पक्षी-जगत की सुंदरता, प्रकृति की अपनी आवाज़। इन सब के लिए थोड़ा और समय होना चाहिए था। गुरु शिखर नहीं देख पाया, देलवारा के जैन मंदिर नहीं देख पाया, वशिष्ठ आश्रम नहीं देख पाया। परमारों की प्राचीन राजधानी चंद्रावती (आबूरोड में अब पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।) नहीं देख पाया। पर किसी दिन ज्यादा दिनों का समय लेकर मैं फिर से यह प्रवास जरूर करूँगा। 


    शुभरात्रि।

|| अस्तु ||



प्रश्न: माउंट आबू रोड ट्रिप कैसी होती है?
उत्तर: माउंट आबू रोड ट्रिप एक रोमांचक अनुभव है जिसमें पहाड़ी रास्ते, बदलता मौसम, और प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम देखने को मिलता है। यह यात्रा गुजरात से राजस्थान तक एक यादगार अनुभव प्रदान करती है।

***

Q1. माउंट आबू जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

मार्च से जून और अक्टूबर से फरवरी सबसे अच्छा समय माना जाता है।

Q2. क्या माउंट आबू रोड ट्रिप सुरक्षित है?

हाँ, लेकिन रात में और खराब मौसम में सावधानी जरूरी है।

Q3. अम्बाजी मंदिर कहाँ स्थित है?

अम्बाजी मंदिर गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।

Q4. माउंट आबू में क्या-क्या देख सकते हैं?

नक्की झील, गुरु शिखर, देलवाड़ा जैन मंदिर, सनसेट पॉइंट आदि।


प्रिय पाठक !

अगर आपको यह यात्रा अनुभव पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और कमेंट में बताएं कि आप अगली यात्रा कहाँ करना चाहेंगे!

ऐसे ही और ट्रैवल स्टोरी पढ़ने के लिए ब्लॉग को सब्सक्राइब करें 

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:

मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें


#MountAbu #RoadTripIndia #TravelBlogHindi #AmbajiTemple 
#GujaratTravel #RajasthanTravel #HindiBlog #TravelExperience 
#HillStationIndia #IncredibleIndia #TravelStory #NatureLovers

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)