प्रिय देर तक सोते रहने की आदत..!
मेरी और तुम्हारी पुरानी दोस्ती
प्रिय देर तक सोते रहने की आदत..!
तुम अगर मेरी ज़िन्दगी में न होती, तो मेरा क्या होता? कितने वर्षों का गहरा संबंध है मेरा और तुम्हारा। मुझे अच्छे से याद है, स्कूल के दिनों में तो सरस्वती शिशुमंदिर वालों ने मुझे तुम से दूर ही रखा था, लेकिन भला हो मेरी युवानी के हॉस्टल का। वह दौर और आज का दिन.. बहुत कम ही प्रसंगों में मैं तुमसे दूर रहा होऊंगा। दुनिया के सारे संबंध एक तरफ, और मेरा-तुम्हारा रिश्ता एक तरफ। तुम्हारे कारण न जाने मैंने कितने ताने सही होंगे.. लेकिन कभी भी तुमसे मुँह नहीं मोड़ा। क्या यह प्यार है?
अलार्म और स्नूज़ की रोज़ की लड़ाई
तुमसे अलग करने के लिए तो मेरे फ़ोन के सवेरे साढ़े पांच के अलार्म से मैं, पांच-पांच मिनिट के अंतराल वाली स्नूज़ लड़ाई तक लड़ लेता हूँ। प्रतिदिन इस युद्ध से मैं गुज़रता हूँ। बस तुम्हारे लिए। मैंने न जाने कितने ही सूर्योदय के क्षण फना किए है तुम पर। मैंने न जाने कितने ही प्रकृति के रंग कुर्बान किए है तुम पर। कितने ही कटुवचनों के उपरांत भी, मैंने तुम्हारे स्नेह को अपमानित नहीं होने दिया। मैं तुम्हारा आदर करता हूँ, जैसे सच्चा प्रेमी करता है, अपने प्रेम का।
तुम्हारे कारण हुए नुकसान (या फायदे?)
तुमने भी तो बदले में कितना कुछ दिया है मुझे। कभी मेरी छाती चौड़ी और कमर पतली हुआ करती थी। तुम्हारी सौबत में कमर और विस्तार कर गयी। तुमने ही तो मुझे यह तोंद भेट की है। तुमने मुझे कभी सवेरे का श्रम करने ही न दिया, जिसके पीछे पूरी दुनिया पागल है। तुम्हारी ही कृपादृष्टि के कारण आज मेरी भी कमर पर जैसे हवा भरा ट्यूब चढ़ा है। तुम्हारे ही आशीष से मैं बिना झुके अपने चरण नहीं देख पाता। मेरी तबियत को तुमने ही तो चार चाँद लगाए है। तभी तो लोग मुझे खाते-पीते घर का समझेंगे। तुम्हारे ही कारण अब हवाओं के झौंके हिला नहीं सकते।
तुम्हारे साथ बिताए हुए “आरामदायक” दिन
पागल है वे, जो तुमसे परहेजी करते है। जो कहते है, तुम्हारे कारण ऑफिस लेट पहुँचता हूँ। या फिर तुम्हारे कारण अपराधबोध लगता है। या तुम्हारे कारण दिन छोटा हो जाता है। वे लोग नहीं जानते, देर तक सोते रहने के कारण अधिक समय तक सपना देखते रह सकते है। वे लोग आरामदायक नींद को नहीं पहचानते होंगे। तभी तो तुम्हे बखानते नहीं। लेकिन उनकी इन प्रतिक्रिया पर तुम मत बदलना। तुम्हारा दायित्व है, लोगों की आदत को बिगड़ैल ही बनाए रखना।
तुमसे दूर होने की असफल कोशिश
मैंने एक बार तुमसे विमुख होने की कोशिश की थी। मेरी गलती थी, मैं जानता हूँ। गलती का अनुभव शिक्षा देता है। मैंने अपने पुरे शरीर में जकड़न अनुभव की थी। जब तुमसे विमुख होकर मैंने शरीर को परिश्रम की अग्नि में उड़ेल दिया था, और फिर दर्द से कराहा था, तब दूसरे दिन तुमने ही तो मेरा ख्याल रखा था। उसके बाद से तो हमेशा मैंने तुम्हारा उतना ही ख्याल रखा है, जितना कोई अपने आप का रखता है।
मेरे अंदर का “डिसिप्लिन वाला इंसान”
मेरे भीतर मेरा एक और अस्तित्व है, जो तुमसे आज भी विद्रोही होने को मुझे प्रोत्साहित करता है। मेरा वह भविष्य की कामना वाला पात्र, मुझे तरह तरह के ख्वाब दिखाता है, जैसे कि तुमसे अलग होकर मैं प्रतिदिन सवेरे जल्दी उठाकर ग्राउंड में शरीर के प्रत्येक अंग को मोड़ने वाला सूर्य नमस्कार करूँ। जैसे कि मैं प्रतिदिन स्वास्थ्य वर्धक उपचारों का आदी हो जाऊं। जैसे कि मैं तुमसे दूर हो जाऊं, बिस्तर से दूर हो जाऊं, नींद से दूर हो जाऊं, आलस से दूर हो जाऊं। लेकिन मैं.. मैं बस उसे अगले दिन का वायदा देकर टाल देता हूँ।
एक समझौते की गुंजाइश
हमेशा इस आदत को बदलने को कृतनिश्चयी होकर भी, मैं उस दिन तक तो तुम्हारा साथ नहीं ही छोडूंगा, जब तक कोई गंभीर मुद्दा सामने न आये। पिछली बार भी गंभीरता के आने पर ही कुछ दिन तुमसे अलग हुआ था। कुछ दिनों की बात होती है वह। तुम ज्यादा फ़िक्र मत करना उस बारे में। पर हमारे इस रिश्ते को दूसरे लोग हीनभावना से देखते है। मैं चाहता तो नहीं हूँ तुमसे दूर रहकर परिश्रमों के परिताप को पालना, लेकिन क्या करूँ, मेरी भी कुछ मजबूरिया, या दुखती रग उनके पास है।
क्या हम एक समझौता कर सकते है? तुमसे पूर्णतया विदाई लेना तो असंभव है, मुझे तो समझौता ही एक मात्र उपाय दिख रहा है। थोड़ी दूरी बनाकर हम साथ नहीं रह सकते? जैसे की हफ्ते में तीन-चार दिन तुमसे दूर हो जाऊं। जैसे बनिया तोलता है, तराजू में। संतुलन बनता है। वैसा ही कुछ.. कुछ दिन मैं परिश्रम के पाश में रहूं, कुछ दिन तुम्हारे प्रेम में। हाँ यह प्रेम ही है। मैं इसे प्रेम की ही संज्ञा दूंगा। क्योंकि तुम्हारे बिना मेरे दिन की कल्पना भी मुझे क्रूर लगती है। जैसे रेगिस्तान में भटकता कोई रैटलस्नेक। जहर से भरा हुआ।
शुभरात्रि।
२८/०४/२०२६
|| अस्तु ||
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