“दीवार में एक खिड़की रहती थी” क्यों अलग है? || Book Review in Hindi

0

दीवार में एक खिड़की रहती थी: जब कहानी नहीं, अनुभव पढ़ा जाता है


दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास पढ़ता हुआ व्यक्ति और खिड़की के पीछे कल्पनात्मक संसार का चित्रण

एक साधारण रविवार, जो साधारण ही रहा

प्रियम्वदा !

ऐसा हुआ, कि अभी दो दिन पूर्व ही रविवार था। रविवार वैसा ही रविवार था जैसा हमेशा होता है। शाम वैसी ही थी जैसी शाम होती है। अँधेरा, अँधेरे जैसा ही था। ग्राउंड वैसा ही था, जैसा हररोज होता है। मैं भी वैसा ही था, जैसा मैं शनिवार को था। बस इतना बदला था, कि रविवार को आधे दिन की छुट्टी मिलती है। पेड़ हरे थे, घास कहीं कहीं हरी थी, कहीं कहीं कत्थई, संक्षेप में घास भी घास जैसी ही थी। 


एक दोस्त, एक किताब और बिना योजना की शुरुआत

फोन की घंटी बजी, मैंने उठाया, फोन करने वाले ने पूछा, "कहाँ?" मैंने कहा, "ग्राउंड में।" उसने कहा, "आता हूँ।" और फ़ोन कट हो गया। गजा अब सरकारी ड्राइवर है। शनि-रवि घर आता है, तो मिलने का हो जाता है। आखरीबार हम एक फार्म-पार्टी में मिले थे। रात के डेढ़ बजे घर लौटे ऐसी पार्टी थी। खैर, वह आया। एक बुक मेरे हाथ में थमाई। हिंदी साहित्य की यह पुस्तक सुप्रसिद्ध है। मुझे पढ़नी थी, खरीदनी नहीं थी। गजे ने खरीदी थी, वह दे गया। कुछ देर बैठा, फिर वह अपने घर, मैं अपने घर। ग्राउंड हमारे जाने के बाद भी वैसा ही रहा। घास भी, और पेड़ भी। 


“स्टोरी चढ़ाना” – दिखावे की डिजिटल दुनिया

पुस्तक था, 'विनोद कुमार शुक्ल' का "दीवार में एक खिड़की रहती थी"..

आजकल कोई भी साहित्य पठन करने से पूर्व, एक विधि का पालन करना प्रचलन में है। उसे आम बोलचाल की शैली में कहा जाता है, 'स्टोरी चढ़ाना।' मैं भी दुनिया के रिवाज़ों से अनभिज्ञ तो हूँ नहीं। मेरी भी अपनी एक अलग छवि है सोशल मीडिया पर। भले ही मेरे व्यक्तित्व से अलग हो, आडम्बर से परिपूर्ण हो। फिर भी मेरा कर्तव्य बनता है, दुनिया को महितगार करना। कि 'मैं यानि की दिलावरसिंह, अपनी इच्छा से, और कर्तव्यपालन की निष्ठा से, समस्त सोशल मीडिया समाज को सूचित करता हूँ, कि मैं यह पुस्तक पढ़ने जा रहा हूँ।'


यह सन्देश लिखा नहीं जाता। क्योंकि लिखी-पढ़ी बातों से ज्यादा वजनदार होता है, दृश्य साक्ष्य। सबूत और गवाह में भेद है। अपने एक हाथ में पुस्तक को थामकर, दूसरे हाथ में फोन से एक तस्वीर खींचनी होती है। और फिर उसे स्टोरी पर लगाना होता है। अन्यथा यह दोरंगी दुनिया कैसे विश्वास करेगी? कि मैं सच में एक पुस्तक पढ़ रहा हूँ, जिसका नाम  है, "दीवार में एक खिड़की रहती थी".. दुनिया को कदम दर कदम हमें साक्ष्य देने होते है, कि हम भी कुछ तो कर रहे है। फिर भले ही हम रील देख रहे हो, हमें एक रील को स्टोरी पर इस लिए भी चढ़ाना होता है, कि कोई हमारी स्टोरी देखकर अपनी भावना व्यक्त करे। या तो वह लाल वाला दिल भेजे, या वो हँसने से आंसू निकलने वाला गुड्डा। 


दीवार में एक खिड़की रहती थी आखिर अलग क्यों है?

साढ़े नौ बजे पुस्तक का पहला पन्ना खौलकर बैठ गया था। सवा ग्यारह बज गए, 80 पन्ने लगभग पढ़ चूका। और सो गया। समय के आभाव में कल पुस्तक पूरी हुई। मैं आश्चर्य में डूब चूका था, कहानी ख़त्म हुई, सार क्या था? मुझे जबरन पुस्तक के अंत में लिखा अनुकथन पढ़ना पड़ा। ऐसी किसी पुस्तक से मेरा पहली बार पाला पड़ा था। अधिकांश मैंने पढ़े उपन्यासों में एक नायक होता है। उसके अपने संघर्ष होतें है। हास्य, विनोद, प्रेम, करुणा और क्रोध जैसे भावों के साथ उन उपन्यासों की कहानी मन में आंदोलन की श्रृंखला उठाती है। और किसी न किसी भावुक मोड़ पर वह कहानी अपने अंत तक पहुँचती है। 


जब कहानी नहीं होती, फिर भी कहानी होती है

इस "दीवार में एक खिड़की रहती थी" की कहानी उन सब उपन्यासों के चाल-चलन से अलग है। असल में यहाँ कोई कहानी है ही नहीं। बस बदलते दृश्य है। कहानी का मुख्य पात्र रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित का शिक्षक है। और कहानी बस इतनी है, कि वह हररोज महाविद्यालय जाता है, और घर लौटता है। बस उसके यह आने-जाने भर की आम घटना को एक ढाईसौ पन्ने की कहानी बना देना कोई आम बात तो नहीं है। उसके घर के पीछे एक खिड़की है, जहाँ से एक अलग वातावरण में वह आ-जा सकता है। खिड़की के पीछे एक छोटा सा वन है, कईं सारे वृक्ष है, कईं सारे तालाब, पुष्प, और पंछी। रघुवर प्रसाद और उसकी पत्नी सोनसी, वे अपनी प्रेमपूर्ण रात्रियाँ इसी वन में बिताते है। 


रघुवर प्रसाद और एक असाधारण साधारण जीवन

इस उपन्यास की खूबी यही है, कि इसमें दृश्य वर्णन बहुत सुंदर है। और भाषा अलबेली है। मैंने अपने शुरुआती अनुच्छेद में लिखा, वैसी। संवाद बड़े मजेदार लगते है, जब कोई कहता कुछ और है, और सामने वाला सुनता कुछ और है। वह बात भी बड़े निराले अंदाज़ में लिखी गयी है, जब कोई भी कुछ बोलता नहीं है, लेकिन फिर भी संवाद चलता रहता है। हाँ ! यह उपन्यास पढ़ते हुए दिमाग को जागृत रखना जरुरी है। अन्यथा कईं सारी बातें बस पढ़ी जाएगी, समझ कुछ नहीं आएगा। कुछ दृश्य कल्पना करते हुए रोमांचक लगते है। कुछ दृश्य में रघुवरप्रसाद की झिझक हमें भी अनुभव होती है।


भाषा, शैली और संवाद का अनोखा खेल

अनुकथन के अनुसार इस उपन्यास में पांच भाषाएं है। भाषा से तात्पर्य है, शैली। सामान्य संवाद से अलग, जब सोनसी और रघुवरप्रसाद बात करते है, वह अलग है। रघुवर प्रसाद अपने विभागाध्यक्ष, और प्राचार्य से बात करता है वह अलग है। और एक वह भाषा जब बोला कुछ और जाता है, सुना कुछ और। जब हाथीवाले साधु से बात करता है, तो अलग। संक्षेप में कहूं तो साहित्य की दृष्टि से बहुत अलबेला उपन्यास है यह। कहानी नहीं है, फिर भी कहानी है। हास्य-विनोद भी है, रोमांच भी। खिड़की के पीछे का दृश्य इतना मोहक है, कि पढ़ते हुए वहां पहुँच जाने का मन करता है। 


निष्कर्ष : हर कहानी समझने के लिए नहीं होती

खैर, इस उपन्यास को पढ़ लेने के बाद, इतना तो दावे से कह सकता हूँ, कि हर कहानी का सार हो, यह आवश्यक नहीं। हर कहानी में भावनाओं की लहरें उठे यह अनिवार्य नहीं है। हर उपन्यास का एक बहुत लम्बी खींची हुई कहानी होना जरुरी नहीं। कुछ कहानियां बस अनुभव करने के लिए होती है। यह "दीवार में एक खिड़की रहती थी" अनुभव करने की कहानी है। इसमें लेखक ने कोई रटा-रटाया ज्ञान नहीं बांटा है। लेकिन भाषा पर पकड़ देखकर एक आदर्श भाव तो उपजता ही है। यह उपन्यास पढ़ते हुए कई बार लगा कि मैं कुछ खोज रहा हूँ, कोई मोड़, कोई निष्कर्ष, कोई ठोस बात… लेकिन अंत तक पहुँचकर समझ आया, कि यह खोज ही शायद इस कहानी का हिस्सा थी।


शुभरात्रि।

१५/०४/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

    अगर आपने भी दीवार में एक खिड़की रहती थी पढ़ी है, तो आपका अनुभव क्या रहा? कमेंट में जरूर बताइए। 

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:

मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!


#BookReviewHindi #VinodKumarShukla #HindiLiterature #ReadingExperience #HindiBlog #BookLovers #IndianAuthors #LiteraryFiction #MinimalStory #DilawarWrites

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)