दैवी शेर तथा कुमाऊं के अन्य नरभक्षी : जंगल, रोमांच और सच्ची घटनाओं की अद्भुत पुस्तक..
परिचय
प्रियंवदा !
कभी कभी ऐसा होता है, जब आप किसी चीज़ की कामना करके, फिर कहीं और उद्यमों में व्यस्त हो गए हो। और किसी दिन अचानक से आपकी कामना की हुई वस्तु आपके सामने आ खड़ी हो जाए। होता है, सृष्टि में सब कुछ संभव है। जो असंभव है, वह भी परिस्थिति और तरीके के कारण असंभव है। किसी दिन वह भी संभव होगा। हम सुनते थे, कि महाभारत का संजय लाइव प्रसारण देख रहा था। आज हम भी कितना कुछ लाइव स्क्रीन पर देखते है। बिच के कुछ काल में वह टेक्नोलॉजी लुप्त हो गयी होगी। परिस्थिति और प्रयोग के तरीके पर सम्भावना टिकी हुई है।
जब मैंने सज्जन सिंह लिखित लद्दाख यात्रा की डायरी पढ़ी थी, (यहाँ उस पुस्तक की समीक्षा पढ़ सकतें है।) तब मुझे पता चला था, कि जिम कॉर्बेट ने भी पुस्तकें लिखी हुई है। भारत में आज भी बहुत सारी जगहों पर अंग्रेजों का प्रभाव है। उनमे से एक है कॉर्बेट नेशनल पार्क। स्कूल में जब नेशनल पार्क के बारे में याद करना होता था, तो कॉर्बेट और काज़ीरंगा ही याद रहते थे। कॉर्बेट बाघ के लिए और काज़ीरंगा एकशिंगी गेंडे के लिए।
नरभक्षी बाघों की सच्चाई
मैंने कभी नहीं सुना, कोई सिंह नरभक्षी हो गया हो। लेकिन भारत के अन्य भू-भागो में बसते बाघ और तेंदुए कईं बार नरभक्षी हो जाते थे। जो मांसाहारी पशु किसी कारणवश घायल होकर शिकार करने योग्य न रहते, उनके लिए मानव का शिकार करना सबसे आसान होता था। उत्तराखंड के कुमाऊं में इसी तरह बहुत सारे बाघ और तेंदुए नरभक्षी हो गए थे। अंग्रेजकालीन भारत के नैनीताल में जन्मे एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट मशहूर शिकारी हुए। केवल शिकारी ही नहीं, वे अच्छे पर्यावरणवादी भी थे। और एक फोटोग्राफर भी। जब शेरो के शिकार बहुत बढ़ गए, तब उन्होंने लोगों को शिकार के बजाए वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी के लिए लोगो को प्रोत्साहित किया था। भारत का प्रथम वाइल्डलाइफ रिज़र्व बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। और उनकी मृत्यु के पश्चात उस वाइल्डलाइफ रिज़र्व को उन्ही के नाम से जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क नाम दिया गया।
टेलीग्राम में बहुत सी ख्यातिप्राप्त पुस्तकों की पीडीऍफ़ मिल जाती है। मैंने देवनागरी लिपि में सर्च किया, 'जिम_कॉर्बेट' और मुझे उनकी तीन पुस्तकों का पीडीऍफ़ संस्करण मिल गया। "दैवी शेर तथा कुमाऊं के अन्य नरभक्षी", "रुद्रप्रयाग का आदमखोर बाघ" और "कुमाऊं के नरभक्षी"..! मैं ख़ुशी से झूम उठा। मुझे उनके पांच पुस्तक चाहिए थे। उनमे से तीन तो यही पीडीऍफ़ स्वरुप में मिल गए। दरअसल मैंने जब यह पुस्तक खरीदने चाहे थे, तब हुआ ऐसा, कि मैं इस पुस्तक को प्रकाशित करती संस्था की वेबसाइट तक पहुँच गया।
वहां मैंने उन पांचो पुस्तकों को खरीदते समय पाया, कि वह संस्था - उन पांचों पुस्तकों के इकट्ठे आर्डर पर भी, सबका अलग-अलग डिलीवरी चार्ज वसूल रही थी। पांच पुस्तकों की कीमत बनती थी 1750 रूपये, और डिलीवरी चार्ज वे लोग जोड़ रहे थे 900 रूपये। यानि की 150 रूपये प्रति पुस्तक। यह थोड़ा ज्यादती लगा मुझे। और मैंने पुस्तक नहीं खरीदे। हालाँकि मैंने हर जगह तलाश कर ली। और अब सोच रहा हूँ, लगे तो लगे, लेकिन खरीदने तो पड़ेंगे ही। टेलीग्राम से मिली पीडीऍफ़ में, सिर्फ 'दैवी शेर तथा कुमाऊं के अन्य नरभक्षी' ही पूरी पुस्तक मिली। बाकी दोनों पीडीऍफ़ अधूरी है।
पुस्तक की जानकारी
- पुस्तक का नाम : दैवी शेर तथा कुमाऊं के अन्य नरभक्षी
- लेखक : जिम कॉर्बेट
- अनुवादक : नरेश चंद्र मधवाल
- शैली (Genre) : वन्यजीवन / रोमांच / शिकार कथाएँ
- भाषा : हिंदी (अनुवादित)
- कहानियों की संख्या : 5
अनुवाद से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात
3-4 रात्रियां मिलाकर मैंने आखिरकार यह पुस्तक पूरा पढ़ा। बहुत रोमांचक, भावविभोर कर देने वाला, और हिंसक पशु के प्रति भी एक सहानुभूति हो जाए, ऐसी लेखनी पढ़कर मन आनंद से परितृप्त हो गया। कुल पांच कहानियां, और पांच नरभक्षी का अंत, पांच यात्राएं, पांच लोक-संस्कृति तथा पांच रोमांच, पांच आस्था-श्रद्धा। प्रथम कहानी थी देवीधुरा के दैवी शेर की। अरे हाँ ! बहुत सही हुआ जब मैंने इस पुस्तक के हिंदी अनुवादक नरेश चंद्र मधवाल का 'अनुवादक की कलम से' वाले भाग पर पुस्तक पढ़ने से पहले नजर डाल ली। क्योंकि पुरे पुस्तक में तेंदुए/Leopard को बाघ, और बाघ/Tiger को शेर लिखा गया है। अनुवादक के अनुसार उस पुरे क्षेत्र में इन पशुओं को इसी तरह बोला जाता है। शुरुआत में ही यह बात पढ़ लेने के बावजूद जहाँ बाघ पढ़ता वहां टाइगर ही याद आता, और जहाँ शेर पढता वहां सिंह याद आता था।
बचपन की यादें और शिकार के प्रति रुचि
मेरे बचपन में शिकार के प्रति भी मेरी एक अलग ही उत्सुकता रहती थी। डिस्कवरी और नेट-जीओ यह दोनों टीवी चैनल लगाकर मैं घंटो बैठे रह सकता था। जब अफ्रीकन सिंह विल्डबीस्ट को एक ही पंजे में गिरा देता, तो देखने में एक अलग ही आनंद आता था। इतिहास में रूचि होने से बहुत बार पढ़ा, राजा शिकार खेलने जाया करते थे। वे हिरन, सूअर, सिंह का शिकार खेलने में समय व्यतीत करते। किसी समय पर गुजरात के जूनागढ़ में सिंहों का शिकार बहुत ज्यादा हो गया, और एक अंदाज़ के अनुसार बीस से भी कम सिंह बचे थे, तब जूनागढ़ के नवाब ने सिंह के शिकार पर प्रतिबंद लगा दिया था।
जंगल, रोमांच और जिम कॉर्बेट का साहस
पुस्तक पर लौटते है, जिन्हे जंगल को, जंगल के रुतबे को, और जंगल की रौनक को करीब से जानना हो, जिन्हे वन्यजीवों की, शिकार प्रवृत्ति को जानना हो, उनके लिए यह अनुभवगाथा पढ़ना अनिवार्य ही है। मुझे यह पढ़कर बार-बार आश्चर्य होता था, कि कोई एक नरभक्षी के शिकार के लिए, अकेला - पैदल जंगल में कैसे घूम सकता है? मुझे यह पढ़कर भी आश्चर्य होता था, कि जहाँ अन्य शिकारी मचान बांधकर, हांका करवाकर, हाथियों के ओहदेमें छिपकर शिकार करने का रिवाज़ है, वहां यह साहब अपने एक कान के फ़टे फर्दे, और सूजी हुई एक आँख से प्राप्त आंशिक अंधत्व के उपरांत एक भूखी नरभक्षी शेरनी के पीछे-पीछे कैसे भटक सकते है? बहुत सारी ऐसी बातें थी, जिनपर संदेह हो सकता है, लेकिन लेखक ने पुस्तक के अंत में उन संदेहों के निवारण हेतु कुछ समाधान भी दिए है।
चौंकाने वाले तथ्य (20 गज की दूरी)
इस पुस्तक में दूरी वर्णन गज़ में लिखा गया है। जो की उस समय की नपाई के प्रचलन में था। मुझे तब और आश्चर्य हुआ, जब मैंने पढ़ा की वे एक शेर/Tiger से केवल बीस गज़ की दूरी पर थे। बीस गज़ माने साठ फुट.. साठ फुट की दूरी कुछ भी न हुई, जब सामने एक tiger खड़ा हो। हकीकत में अब उनकी और पुस्तकें जल्द से जल्द पढ़ लेने की क्षुधा मेरी बढ़ गयी है। लेकिन उपाय है नहीं। टेलीग्राम से मिली अन्य दोनों पीडीऍफ़ अधूरी है। जब तक वे अन्य पुस्तक नहीं मिल जाती, तब तक के लिए हिंदी साहित्य की अन्य सुप्रसिद्ध पुस्तक पढ़ लेने का विचार कर रहा हूँ। अगर वह पढ़ी, तो फिर से एक नयी समीक्षा के साथ हाजिर हो जाऊंगा।
शुभरात्रि।
२०/०४/२०२६
|| अस्तु ||
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