प्रिय ओवरथिंकिंग
छोटी बात, बड़ा बवंडर
प्रिय ओवरथिंकिंग,
तुमसे भला मेरी हालत कहाँ छिपी है? बाल की खाल निकालने की मेरी इस कला को सिद्धहस्त करने में तुम्हारा अनन्य योगदान रहा है। उस बात का मैं जीवनभर आभारी रहूँगा। तुम्हारे ही कारण मैं प्रत्येक प्रसंगों को ओवर-एनालाइज करने लगा हूँ। जरुरत न हो तब भी। क्या मैं यह कह सकता हूँ, कि तुमने ही मेरा बेडा गर्क किया है? अरे नहीं, कहीं तुम बुरा न मान जाओ.. तुम्हारी सौबत में रहकर मेरी कलम भी खूब चली है।
तुम्हे पता है, कईं बार मैं उन ख़याली खिचड़ी पकाने में व्यस्त हो जाता हूँ, कि उस दिन उसने दस मिनिट के बाद रिप्लाई दिया था, तो क्या वह उन दस मिनिटों के दौरान किससे बात कर रहा होगा? जरूर वह मुझे इतना महत्वपूर्ण नहीं समझता/समझती। बात महत्त्वपूर्णता की नहीं रह जाती, बात घमंड तक पहुँच जाती है.. उसकी हिम्मत कैसे हुई मुझे इंतजार करवाने की? जबकि मैं तो ट्रम्प भी नहीं हूँ, फिर भी उसे मुझे इंतजार नहीं करवाना चाहिए था। वह कोई पुतिन थोड़े है?
रात की अदालत
यह तो ठीक है, तुम्हारा असली नशा तो रात में चढ़ता है। जब पूरा संसार शांत होता है, तब तुम अपनी अदालत लगा लेते हो। पुराने केस खोले जाते हैं, नई फाइलें बनती हैं, और मुझे कटघरे में खड़ा किया जाता है। नींद को तो जैसे तुमने अपना दुश्मन घोषित कर रखा है। मैं आँखें बंद करता हूँ आराम के लिए, और तुम उन्हें खोल देते हो सवालों के लिए।
“क्या होता अगर…” की दुनिया
"क्या होता अगर.." इन शब्दों से कल्पनाओं को ऐसा खुला डोर मिल जाता है, और तुम्हारी यानि की ओवरथिंकिंग की ढील.. वह कहाँ जाकर रुकेगा, इस बात का नियंत्रण मेरे पास भी नहीं रहता। "क्या होता अगर आज वह मेरी ज़िन्दगी में होती.." तुम्हे क्या लगता है इस बात की कोई सीमा हो सकती है? अरे तुम्हारे ही भरोसे पर इसी कल्पना में एक सुखी परिवार निर्मित हो जाता है, तुम्हे कहाँ पता होगा यह सब।
शांति और आत्मविश्वास की चोरी
और यह यहाँ समाप्त थोड़े हो जाता है? कोई महीनो पुरानी हुई बात चित के और क्या क्या प्रत्युत्तर हो सकते थे, यह भी तुम्हारे ही आदेश से दिमाग सोचने लगता है। जो घटना अभी हुई ही नहीं, उसकी भी चिंता - तुम्हारे ही प्रादुर्भाव से होने लगती है। अभी यह शिकायतनामा तुम्हे संबोधित कर ही रहा हूँ, तो कहे देता हूँ, तुम्हारे प्रभाव से सबसे पहले छीनी जाती है शान्ति। जिसे मैं शायद अपनी प्रियतमा से भी ज्यादा पसंद करता हूँ। लेकिन तुमने मुझसे वह भी छीन ली।
फैसलों पर ताला
पर तुम यहाँ तक कहाँ रुकने वाले थे? तुमने तो मेरी निर्णायकशक्ति को भी हर लिया। आज मुझे धनिया लेना हो तो भी धनिया के उगने से लेकर इस ठेलेवाले तक पहुँचने की यात्रा तक कल्पना कर लेता हूँ, और इस चक्कर में होते विलम्ब के कारण घर पर ताना भी सुनने को मिल जाता है। लोगो का चेन चुराया जाता है, गहना, लत्ता चुराया जाता है, अरे यहाँ तक कि दिल भी चुराया जाता है, पर मेरा तो तुमने आत्मविश्वास चुरा लिया है।
मुझे तो समझ नहीं आता, तुम प्रत्येक पल को इतना कॉम्प्लिकेटेड क्यों बना देते हो? जहाँ 2 + 2 = 4 होना चाहिए था, वहां तुम 22 कैसे बना सकते हो? बेफिज़ूल के डर तुम्हारे होने से मैंने अनुभव किये है। पर इस बात से मुझे उतनी समस्या नहीं होती है, जितनी तुम्हारे उन विचारों के भार से होने लगती है। माना कि तुमने मुझे कईं बार गलत निर्णय लेने से बचाया भी है, लेकिन उसका अर्थ यह थोड़े है, कि तुम हमेशा के लिए मेरे भीतर ही बस जाओ..
अब थोड़ा कंट्रोल ज़रूरी है
मैंने अपने भीतर अपनी प्रेयसी के लिए जगह बनायीं थी, वो तो नहीं बसी, पर तुमने राशन-पानी के साथ कब्ज़ा कर लिया है। क्या तुम्हे किसी बुलडोज़र का भय नहीं? मुझे लगता है, तुम्हे थोड़ा कण्ट्रोल में रहना चाहिए। तुम्हे एक नकेल की जरूरत है। क्योंकि तुम्हारे कारण बहुत सारे अनचाहे भ्रम उत्पन्न हो जाते है। किसी के साथ बात करते हुए, वह कहता कुछ और है, और मुझे समझ कुछ और आता है। तुम्हारी इतनी ज्यादा दखलंदाज़ी की मुझे जरूरत नहीं है।
हाँ ! एक काम कर सकते है, तुम अगर मेरे प्रत्येक ख्यालों के बजाए, कुछ चुनिंदा ख्यालों की ख़याली खिचड़ी पकाओ, तो हम दोनों की जठराग्नि संतोषी रहेगी। न तुम्हारे प्रभाव से मैं आहात होऊंगा, न मुझे तुमसे शिकायत रहेगी। तो यह सौदा तय रहा ठीक है। और तुम अब से मुझे, या मेरे दिल में झाँकने की कोशिश नहीं करोगे। वहां वैसे भी मैंने बहुत सारे भीड़ इकट्ठी की है, तुम कहाँ उन सबके साथ ख्यालों के प्रसंग निर्माण करने बैठ जाते हो.. चलो फिर, विदा दो।
शुभरात्रि।
२९/०४/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
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