मुसाफिर कैफ़े के तुरंत बाद अक्टूबर जंक्शन पढ़ना
प्रियम्वदा !
एक ही लेखक की लगातार दो दिन में दो पुस्तकें पढ़ ली। नहीं करना चाहिए ऐसा। पढ़ना सिर्फ पढ़ना नहीं होता है। पढ़ने के साथ साथ अनुभूतियाँ होनी चाहिए। पुस्तक के पात्रों के साथ अगर घुलमिल न जाए मन, तो पुस्तक भीतर को छुआ ही नहीं। कुछ पुस्तक होतें है, जिन्हे पढ़ने के बाद कईं दिनों तक उसके पात्र आपको थामे रखते है। वे पात्र आपको अलग कहानियां बताते है, पुस्तक के लेखक की कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वहां से आगे की कहानी।
दिव्य प्रकाश दुबे की मुसाफिर कैफ़े पढ़ने के तुरंत बाद, अक्टूबर जंक्शन लेकर बैठ गया। आज सुबह ही शुरू की थी, और अभी सवा सात बजते ही तुम्हे यह पत्र या पुस्तक की समीक्षा - जो तुम्हे ठीक लगे, वह लिखने बैठ गया। अक्टूबर जंक्शन मुझे इतनी दमदार न लगी। हाँ ! यह मेरी पसंदगी पर निर्भर करता है। संभव है, बहुत लोगो के लिए यह पुस्तक साहित्य का शिखर है। लेकिन मेरे लिए ठीक-ठाक रही।
दिव्य प्रकाश दुबे की सरल और संवादप्रधान भाषा
पीडीऍफ़ संस्करण में यह पुस्तक भी प्रयत्नरहित तरिके से मिला। ज्यादा खोजबीन किये बिना ही, किसी चैट में यूँही नजर पड़ी, तो मुसाफिर कैफ़े और अक्टूबर जंक्शन, दोनों पुस्तक के पीडीऍफ़ मिल गए। डाउनलोड भी कर लिए। बहुत लम्बी-चौड़ी कहानियां नहीं है यह। सौ-सवासौ पन्नों में सिमट जाती है। आज सवेरे ऑफिस पहुँचने पर थोड़ा बहुत काम था, वह निपटाकर पूरा दिन खाली ही मिला था। तो खाली समय का सदुपयोग इस किताब को पढ़ने में करना सर्वथा उपयुक्त था। मुझे मेरे इस ब्लॉग के लिए भी तो कंटेंट चाहिए।
शुरुआती 20-30 पन्नों ने मुझे कनेक्ट कर लिया। अक्सर एक उत्कंठा होती है, जब पुस्तक के नायक-नायिका का विवरण आता है। नायक कैसा है, नायिका कैसी है.. वगैरह। भाषा के विषय तो मैं मुसाफिर कैफ़े वाली समीक्षा में बता ही चूका हूँ। बहुत सरल, और सामान्य भाषा है। कोई डिक्शनरी लेकर बैठने की जरुरत नहीं है। वैसे भी आम-बोलचाल में जो भाषा उपयोग में हम लेते है, वैसी ही भाषा में पुस्तक हो, तो कठिनाई नहीं होती।
बनारस से शुरू होकर भारतभ्रमण तक पहुँचती कहानी
कालक्रम में लिखी यह कहानी, 10 सालों के सिर्फ एक दिन पर आधारित है, लेकिन उस एक दिन में पुरे साल का वर्णन हो आता है। या यूँ कहूं, कि उस एक दिन माने 10 अक्टूबर को पुरे वर्ष का आंकलन हो जाता है। बनारस से शुरू हुई यह कहानी भारतभ्रमण भी करती है। जीवन के उतारचढ़ाव को भी दिखाती है। और भावनात्मक उतार-चढ़ाव भी है। कहानी में एक नायक है, एक नायिका है। नायक स्टार्टअप के द्वारा बहुत बड़ा आदमी बनता है। नायिका एक लेखिका है, और अपने लेखन को लेकर सतत संघर्ष में व्यस्त रहती है। और आखिरकार वह भी प्रसिद्धि को पाती है।
सुदीप और नायिका के संघर्ष, महत्वाकांक्षा और विरक्ति
लेखक के अनुसार यह कहानी अधूरी है। लेकिन इस पुस्तक में भी एक जगह मुझे अंदेशा हुआ, कि ऐसा ही परिणाम आएगा। और पुस्तक के अंत तक में हुआ भी। नायक और नायिका, दोनों ही कथानक के शुरुआत में बनारस में मिलते है। वे जब मिले थे, तब तक नायक अपने जीवन में एक ऊँचे मुकाम को पा चूका था, और नायिका अभी पहले पायदान पर थी। इन दोनों की मुलाकात का दिन था 10 अक्टूबर। और फिर अगले 10 वर्षों तक वे दोनों 10 अक्टूबर को मिलते रहे। वर्ष में केवल एक दिन, 10 अक्टूबर।
लेखक की कहानियों में दिखती समानताएँ
मुसाफिर कैफ़े और अक्टूबर जंक्शन पढ़ लेने के बाद एक बात मैंने कहीं पढ़ी थी, वह यथार्थ होती लगी। लेखक की लेखनी में एक साम्यता होती है। वह अपने हर लेखन में कुछ न कुछ बातें रिपीट करता ही है। यहाँ भी जैसे पहाड़, समंदर, कुछ कुछ महत्वाकांक्षा, और कुछ घटनाएं साम्य लगी मुझे। मुसाफिर कैफ़े का चन्दर और अक्टूबर जंक्शन का सुदीप.. दोनों ही अपने जीवन की सर्वोच्च ऊंचाई से सब छोड़-छाड़ कर निकल पड़े थे। अपने भीतर की खोज में।
लेखक दिव्यप्रकाश दुबे की अक्टूबर जंक्शन इस लिए भी पढ़नी चाहिए, कि यहाँ बहुत सारी रिलेटेबल बातें कहीं न कही हमसे जुड़ ही जाती है। इस कहानी में अलग यह है, कि यह भारत के वर्तमान को भी साथ लेकर बहती है। कईं सारे ज्ञान सरलता के साथ घोल कर पिलाए जाते है। संवाद लिखने में तो लेखक के पास महारथ है ही। बहुत सारे संवाद इतने करीब लगते हैं, जैसे हम भी वहीँ मौजूद हो।
यह कुछ वाक्य है, जो मुझे अच्छे लगे।
- "प्यार की कहानियां इसी लिए प्यार करने वालों के मरने के बाद भी जिन्दा रहती है, क्योंकि उनके अंत में उम्मीद हो न हो, लेकिन उनकी शुरुआत एक सुई की नोक जितनी उम्मीद से होती है।"
- "असल में प्यार को हमने जिंदगी में जरुरत से ज्यादा जगह दे रखी है। हमें प्यार से जगह बचाकर कभी-कभार ऐसे ही शहर से दूर चले जाना चाहिए, जहाँ रिश्ते में प्यार तो हो, लेकिन प्यार का नाम न हो।"
कहानी में क्या कमी महसूस हुई?
अगर कमियों की बात करूँ, तो मैं यह सोचता हूँ, कि मुझे एक गहराई न मिली कहानी में। कहानी एक फ्लो में बस बहती हुई चलती लगती है। कोई एक ऐसा मोड़ हो सकता था, जहाँ से लगें, कि 'आह, क्या कहानी है..!' लेकिन नहीं, कोई ऐसा घुमावदार मोड़, या कुछ भी ऐसा न लगा, जहाँ लगे कि यह भाव का शिखर है।
हाँ ! मुझे वह बात भी बड़ी पसंद आयी, जब विरक्ति का भाव आता है सुदीप में। वह सब कुछ छोड़-छाड़ कर बस बेपरवाह होकर घूमने निकल पड़ता है। पर फिर भी, यह पुस्तक मुझे बाँध नहीं पायी। मैंने पढ़ा, पढ़ने की रूचि को पोषा, लेकिन जो एक पुस्तक के साथ एकाकार होने का भाव उत्पन्न होता है, वह न हुआ।
यह कह सकता हूँ, कि इस कहानी में कोई ऐसी सीख नहीं, पर अनुभव जरूर है।
शुभरात्रि,
०७/०५/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
तो इस कहानी को जरूर पढ़ें… और मुझे बताएं—आप सुदीप होते या चित्रा?
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