धूप में ठंडक ढूँढना – जीवन के संघर्षों में शांति की खोज || दिलायरी : 07/10/2025

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मौसम और मन का संगम

    प्रियम्वदा !

    अकाल में अधिक मास हमेशा मेरे ही साथ होता है। आजकल मौसम बदल रहा है। दिनभर कड़ी धूप होती है। रातभर ठंडक। सवेरे सवेरे दबाकर औंस गिरती है। सवेरे जब जगा, तब साढ़े छह बजे थे। मैं तैयार होकर कुछ देर दिलबाग में टहला। सोलर प्लेट्स से रिसता हुआ औंस का पानी छत को भिगोए हुआ था। गमलों में थोड़ी नमीं इसी कारण से बनी हुई थी। तो रोज के मुकाबले आज थोड़ा कम पानी सींचा। 


धूप में ठंडक ढूँढना – जीवन के संघर्षों में शांति की खोज

दिनचर्या की थकान और भीतर की बेचैनी

    नौ बजे तक ऑफिस भी पहुंच गया था। लेकिन ऑफिस पहुंचने के बाद से तबियत लड़खड़ाने लगी। फिर से एक बार निंद्रा देवी मुझे अपनी आगोश में लेना चाह रही थी। ऑफिस में रहते हुए सोए भी कैसे कोई भला? माना कि रिकलाइनर चेयर है, लेकिन लंच समय के अतिरिक्त, उस चेयर में फैल के बैठना भी थोड़ा ओड लगता है। 


    ठंड भी लग रही थी, पंखा बिल्कुल धीरे कर, एक फास्टकार्ड जलाया। लेकिन मच्छर भी इस फास्टकार्ड के पहचान वाले निकले। वे थोड़ी देर इस फास्टकार्ड का मान रखने के बाद लौट आए। भरपूर धूप सेंकने का मन था। मैं काफी देर ऑफिस से बाहर टहलता रहा। लेकिन शरीर दर्द, और अनहद नींद, और सरदर्द भी.. सब एक साथ..! साढ़े बारह को सोचा घर चला जाना चाहिए। वहां कम से कम एक झपकी ले लूंगा तो बेहतर महसूस होगा। लेकिन प्रियम्वदा, मेरे शहर का ट्रैफिक जैम.. ऊपर से मैने इस जैम से बचने के लिए दूसरा रास्ता लिया, वहां भी मेरी तरह सोचने वाले पहले से जैम लगाए बैठे थे। कुल मिलाकर पंद्रह मिनिट का रास्ता पौने घंटे में तय हुआ।


    दोपहर को घर पर कुँवरुभा भी सोने देने के मूड में न लगे। आखिरकार आंख लगी, तो सीधे साढ़े तीन को जागा, ऑफिस भागा, और सवा चार को ऑफिस पहुंचा, क्योंकि फिर से पंद्रह मिनिट का रास्ता पौना घंटा खाने को भूखा था। 


संघर्षों में शांति की खोज

    प्रियम्वदा, वो बात अलग है, लोग धूप में ठंडक ढूंढते है। मुझे तो आज धूप में और तीव्रता चाहिए थी। यूँ तो धूप में ठंडक ढूंढना का अर्थ होता है, संघर्षों में शांति की खोज। लेकिन हमने बाद में ac का अविष्कार कर लिया था। हर दिन सूर्य अपनी नई तपिश लेकर आता है, कुछ काम की, कोई चिंता की, या उम्मीद की। हर दिन नया, हर दिन अलग। और हर दिन उसी तपिश को सहना है, उसे ही अपनाना है। क्योंकि यह संघर्ष सदैव से हमारे अपने होते है। किसी और के संघर्ष में हमारी मदद हो सकती है, लेकिन वह पूरा प्रयास कभी हमारा नही होता।


    हर कोई अपनी धूप लिए चल रहा है, हर कोई अपनी छांव का निर्माण खुद करता है, करना पड़ता है। छांव जरूरी है, अनिवार्य है। जब धूप झुलसा देती है, छांव मरहम का काम करती है। यह छांव कोई जगह नही है, यह तो सोच का तापमान है। जो नियंत्रित होती है भीतर से। भीतर से ठंड उठी हो, तब यही धूप बड़ी सुहानी लगती है, जिसकी आम दिनों में परहेजी थी। या यूं कहूँ कि जो मन भीतर से ठंडा है, उसे बाहर की धूप कभी नही जला सकती। 


    दिनभर में ही कितना संघर्ष हम कर लेते है, शाम होने तक मे लगभग ऊर्जा का स्त्रोत सूख जाता होगा, लेकिन फिर निंद्रा के द्वारा हम वह ऊर्जा का स्त्रोत पुनः भर लेते है। कभी कभी ऐसा भी तो होता है, कि शांति ढूंढना चाहते है, उसकी खोज में निकल पड़ते है। हकीकत में तो उस समय उसकी खोज बाहर नहीं बल्कि भीतर ही करनी चाहिए। खुद की आवाज में, खुद के भीतर। वह वहीं पाई जाती है। हमेशा की तरह।


संघर्ष का अर्थ – सिर्फ लड़ना नहीं, मुस्कुराना भी

    संघर्ष का मतलब सिर्फ और सिर्फ लड़ना ही नही है। कईं बार मुस्कुराते रहना भी एक युद्ध है। प्रत्येक उन विपरीत परिस्थतियों को नगण्य करते हुए, एक मंद मुस्कान बिखेर देना भी, होंसला भर देता है, उस विपरीत परिस्थिति से झुझते उन तमाम बलों में। कोशिश तो यही होनी चाहिए कम से कम.. कि परिस्थितियों के सामने डटा जा सकें.. लड़ा जा सकें.. सहा जा सकें। जैसे कुरुक्षेत्र के रन में कृष्ण के मुखारविंद पर सदैव मीठी मुस्कान थी। सिवा उस एक पल के, जब भीष्म के सामने उन्हें रथचक्र उठाना पड़ा था। 


छोटे लम्हों में भी ठहराव की खोज

    जीवन सतत भागता रहता है। भगाता रहता है। कईं बार हम भागने के श्रम में मुस्कुराना भूल जाते है। छोटे छोटे लम्हों में भी खुशियां खोज लेनी चाहिए। और कोई चारा भी तो कहाँ है? वैसे तो दुनियाभर का बोझ लिए घूमते है, इसी चक्कर में जितनी खुशियां जहाँ मिले, बटोर लेनी चाहिए। अमीरी उसी की है, जो आनंदित है। शिकायतें भी तो कितनी होती है हमारे पास.. मुझ जैसे आलसी के पास तो पंखे की गति को लेकर भी शिकायत रहती है। लेकिन जब हममे स्वीकृति आने लगे, तब समझ सकते है, कि भीतर की छाँव घनी हो गयी है। प्रत्येक संघर्ष के साथ एक सीख भी आती है, अनुभव बनता है, तपिश हमें मजबूत कर जाती है। उन बैचेनियों में एक संतुलन जरूर से होता। 


तपिश में छिपा ठंडक का बीज

    ज़िन्दगी कभी भी किसी की आसान नहीं होती है। बस फर्क है, उन कठिनाइयों के केंद्र में छिपा ठंडक का बीज खोज निकालने का। उस ठंडक को महसूस कर पाने की दृष्टि होनी चाहिए। तपिश में ठंडक ढूँढना यही हुआ, जब हम जीवन से ज्यादा शिकायतें न करे, थोड़ा और समझने लगते है। फिर भी किसे समझ आता है? मुझे खुद को समझ नहीं आता.. शिकायतों के बिना तो कैसे निभाव हो? मेरा तो नहीं होता, तुम अपना बताना प्रियम्वदा। 


    शुभरात्रि

    ०७/१०/२०२५

|| अस्तु ||


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