सुबह, ट्रैफिक और एक टूटी हुई दिनचर्या
प्रियम्वदा !
आज फिर से दिमाग चकराने लगा है, क्या लिखूं? समझ नहीं आ रहा है। दिनभर थोड़ा बहुत काम निपटाकर मैं बड़ी मुश्किल से ध्यान केंद्रित करने लगा था, कोई ऐसा विषय मिल जाए.. जिसपर आजकी यह दिलायारी निभ जाए। लेकिन नहीं.. ऐसा कोई विषय मुझे नहीं मिला। न ही मेरे आसपास.. न ही रील्स या शॉर्ट्स की दुकान पर।
सवेरे वही अपना साढ़े नौ बजे तक ऑफिस पहुँच गया था। आजकल कार से जाता हूँ, तो थोड़ा बहुत ट्रैफिक परेशान करता है। बाइक तो कहीं से भी निकल जाया करती थी। बाइक से याद आया, आज अगर डॉक्टर टाँके निकाल देता है, तो कल बाइक को भी शोरूम ले जानी है। उसमे है भी मोटा खर्चा.. समझ नहीं आ रहा है। जिससे बाइक टकराई वह था भी कोई मजदूर आदमी.. इस आद्योगिक शहर में लेबर क्लास देखकर पहचान में आ जाती है। मुझे कईं लोगो ने कहा, पुलिस कम्प्लेन कर देनी चाहिए थी आपको.. लेकिन मुझे लगता है, एक तो वह दिख ही लेबर रहा था, ऊपर से उसने चोट भी खायी है, अब उसे पुलिस के झमेले में कहाँ फंसाऊं?
ऑफिस की राह, बाइक की याद और डॉक्टर की उम्मीद
और कोई होता तो उससे तो बाइक का खर्चा निकलवा भी लेता। कल देखते है, अगर ठीक रहा तो पहले शोरूम से एस्टीमेट निकलवाएंगे, अगर उसका बिल ज्यादा बैठता है, तो कहीं बाहर तलाश करेंगे। मेरा अंदाज़ कहता है, कि चौदह-पंद्रह हजार के डिब्बे में मुझे सेट किया जाएगा। बताओ, इसे कहते है, खाया-पिया कुछ नहीं ग्लास तोडा बारह आना। रॉंग साइड से आया वो, ब्रेक लगी नहीं उसकी, और नुकसान मेरा। झुंझलाहट तो पूरी है फ़िलहाल मुझमे।
सीढ़ियाँ, लिफ्ट और अधीर सभ्यता
दोपहर को लंच करके थोड़ी देर आराम करना चाहा, लेकिन रील देखते देखते साढ़े तीन बज गए। तो सोचा दिलायरी लिखने बैठ जाता हूँ, लेकिन वहां भी कोई टॉपिक दिमाग में नहीं आया। यूँही सोचते विचारते अभी छह बज गए। कल क्या हुआ, एक तो वैसे पैर में स्टिचेस लगे है। वो भी स्टेपल वाले.. धागा नहीं, स्टील की पिन लगायी उस कम्बख्त ने। तो सीढ़ी चढ़ने उतरने में समस्या होती है। और कल पुष्पा की गैरहाजरी में मुझे मार्किट जाना पड़ा। वहां दूसरे माले पर जाना था, पहली बिल्डिंग में तो लिफ्ट नहीं थी, तो धीरे धीरे सीढ़ी चढ़-उतर गया। दूसरी बिल्डिंग में लिफ्ट थी, फिर भी सीढ़ी चढ़ गया, और उतरते समय धीरे धीरे उतर रहा था, तो पीछे एक आदमी बोला,"लिफ्ट लेनी चाहिए न.. क्या धीरे धीरे उतर रहे हो।"
बताओ.. अब उसे कौन समझाने बैठे कि मुझे लिफ्ट दिखी नहीं थी कहीं। वरना मैं तो इतना आलसी हूँ कि ठीक होता हूँ तब भी लिफ्ट से ही जाता हूँ। कईं बार दैनिक जीवन में ऐसे उतावले लोग हमें मिलते है। पता नहीं उन्हें कौनसे दस्त लगे होते है, जो इतनी जल्दबाजी में रहते है। कईं बार तो ऐसे उतावले लोग भी मिलते है, कि वे लोग झगड़ा करने भी नहीं रुकते। सॉरी बोलकर तुरंत निकल जाते है। झगड़ा करना अपने आप में एक मजेदार चीज है। बशर्ते अगला आप से ज्यादा शक्तिशाली न हो।
रिश्तों की जड़ में आकर्षण या परिचय?
खेर, एक बात लिखने लायक लगी तो है, लेकिन मैं शायद पहले भी लिख चूका हूँ। तो ऐसा है, कईं बार ऐसा होता है, कि हम किसी के परिचय में आते है। धीरे धीरे परिचय बढ़ता है। निकटता बढ़ती है। यह परिचय बढ़ने का कारण आकर्षण होता है। यही हर बार होता है। गलती वहां हो जाती है, कि हम आकर्षण को सब कुछ मानने लगते है। जैसे किसी पंछी को पिंजरे में दाना-पानी मिल जाता है, तो शुरू शुरू में उसे खूब मजा आता है। लेकिन धीरे धीरे उसे पिंजरा खटकने लगता है। बस वैसा ही होता है एक रिश्ते में। आकर्षण को ज्यादा भाव देने के बदले, अगर परिचय को और प्रगाढ़ करें, तो बहुत सारी समस्याएं सिमट जाती है।
जब आकर्षण, रिश्ता बनने से पहले कैद बन जाए
लेकिन ज्यादातर रिश्तों में आकर्षण इतना हावी हो जाता है, कि नौबत एक दूसरे के बिना न रह पाने से शुरू होती है, और एक दूसरे के साथ न रह पाने की स्थिति आ जाती है। क्योंकि परिचय के बजाए शुरुआती आकर्षण का ही सिंचन कर दिया था। खरपतवार है आकर्षण। रिश्ते को फलने-फूलने नहीं देता वह। आकर्षण एक तरफ़ा ही होना चाहिए। जैसे मैं किसी से प्रभावित हूँ, और उसके प्रति आकर्षण अनुभवता हूँ, तो मैं उसे यह बात बताऊँ ही नहीं। इससे परिचय और प्रगाढ़ होगा, एक विश्वास पनपेगा। और रिश्ता बड़ी दूर तक साथ निभाता चला जाएगा।
वैसे यह सब कहना-लिखने जितना सरल नहीं है। क्योंकि आकर्षण जब होता है, तब और कुछ सोचने का मौका कहाँ देता है? उस समय तो हमें सिर्फ और सिर्फ आकर्षण की ही आपूर्ति करनी होती है। आकर्षण की सीमा भी तो नहीं? उम्र नहीं आड़े आती इसे, न ही रंग-रूप.. तभी तो दुनिया में कितने ही बेमेल रिश्ते आज भी निभ रहे है। आकर्षण का अपना लाभ भी है। यह नया उमंग भर देता है। रिश्ते को नई दिशा पर ले जाने की संभावना यह आकर्षण ही बनाता है। लेकिन तब भी, परिचय को प्रगाढ़ करने में ज्यादा लाभ है।
भँवरा और फूल की प्राचीन कहानी
प्रियम्वदा ! मैं जब भी इस आकर्षण के बारे में लिखता हूँ, मुझे बहुत ज्यादा नियंत्रण रखना पड़ता है अपने शब्दों पर.. कितने ही टाइप हो चुके शब्दों को यह बैकस्पेस निगल जाता है। कारन बस यही है, कि मेरे आकर्षण में तो रस्सा-खेंच चलती है। कभी कोई मुझे अपने पक्ष में ले जाता है, तो कभी कोई और। शायद मन को भंवरा इसी कारन से कहा गया है, क्योंकि वह एक फूल से दूसरे फूल पर जाता ही जाता है। सिवा उस फूल के, जहाँ भंवरा खुद क़ैद कर लिया जाता है। ऐसा कहा जाता है, कि उस फूल से भंवरा इतना आकर्षित होता है, कि वह फूल में ही विलीन हो जाता है। फिर वह फूल अपनी पंखुड़ियां फिर से खोल देता है, नया भंवरा क़ैद करने को।
पीड़ा का कोई जेंडर नहीं होता
कभी पुरुष प्रताड़ित करता है, तो कभी स्त्री। प्रताड़ना शाश्वत है। है न? कहीं न कहीं हम सब एक पिंजरे में होने का अनुभव करते है। क्योंकि हमें हमारे मनानुसार न कर पाने का अफ़सोस होता है। और यह अफ़सोस ही याद दिलाता है, हमारी क्षमता की पहुँच कितनी है। मैं सोच रहा था, कि बाइक पर से तो कूद सकते है, जब दीखता है एक्सीडेंट अनिवार्य है। लेकिन मैंने खुद ने अनुभव किया, कूद पाना आसान नहीं है। बाइक को छोड़ देने पर भी बाइक छोड़ती नहीं। यही हमारी क्षमता है, अनुभवहीन क्षमता भी उतनी ही कमजोर है, जितने पाक्स्तान में मंदिर..!
दस दिन और कैद में मेरी टांग
अरे प्रियम्वदा ! यह तो लोचा हो गया। अभी अभी क्लिनिक से लौटा हूँ। मुझे लगा आज मेरी टांग को यह डॉक्टर टांकों की कैद से मुक्त कर देंगे। मैं तो बड़ा राजी होता हुआ पहुंचा था, साहब फ्री ही थे। उन्होंने पूछा बोलो, मेरे क्या बोलता सीधे टांग आगे की, कि खोलो यह तामझाम। वो हँस पड़े, "अरे अभी तो दस दिन रहेंगे यह। आप तो दो दिन में ही परेशां हो गए?" मेरा मुँह वहीँ उतर गया। फिर उन्होंने पूछा कान दिखाओ, मैंने चेहरा घुमाया, कान ठीक हो चूका है। तो मैंने कहा, "यह जबड़ो की जॉइंट वाली सूजन कम नहीं हुई है अभी।" तो उन्होंने बताया, "बढ़िया अंदरूनी चोट है। दो दिन की और दवाई दे दी, और कहा दो दिन में सूजन न घटे तो आगे अलग कार्यवाही होगी।"
गरबीचौक की शामें और खोया हुआ खेल
मैं और दो दिन की दवाई लेकर लौट आया। घर आकर कपड़े चेंज किए और गरबीचौक में चल दिया। मेरा एक्सीडेंट हुआ उस दिन से लड़कों ने खेलना ही बंद कर दिया है। आलसी है सारे के सारे.. मैं ही हर शाम को उन्हें प्रेरित करता था खेलने को। मेरे साथ एक और लड़का जुड़ जाता था। सबको फोन कर कर के बुलाते थे, और फिर खेलते थे। अब मैं ही दो तीन रात से गया नहीं हूँ, तो सब आलस कर गए। कल रात को फिर सबको फोन कर कर के बुलाया, लेकिन दो दिन से खेल नहीं रहे थे, तो हर कोई इधर उधर व्यस्त हो गए थे। बस दो जने आए।
धुएँ में बातें, बातों में धुआँ
फिर मैं और पत्ता ग्यारह बजे तक बस धुम्रदण्डिका के धुंए को आसमान की और फेंकते बैठे रहे, बकैती करते रहे। ग्यारह बजे एक पैर से लंगड़ाता हुआ एक आदमी घर की ओर चल दिया।
शुभरात्रि।
२८/११/२०२५
|| अस्तु ||
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