हर दिन बच जाना ही एक जीत है || दिलायरी : 29/11/2025

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पहचान छुपाकर लिखने की मजबूरी

    प्रियम्वदा !

    यह पहचान छिपाने वाला मामला भी बड़ा मस्त है। लेकिन यार दोस्त स्टोरी पर चढ़ा देते है तब थोड़ी परेशानी हो जाती है। आज सवेरे ऑफिस के लिए निकला ही था, कि पत्ते का फोन आया। उसने बताया कि उसे कहीं जाना है, तो उसे हाईवे पर छोड़ दू, वहां से वह किसी और के साथ निकल जाएगा। एक तो सुबह सुबह पत्ता पता नहीं कौनसे नशे करता है,  इधर बुलाता है, और खुद उधर पहुँचता है। खेर, उसे उसके घर से उठाया, पहले गया जगन्नाथ, फिर हाईवे पर एक दूकान, और वहीँ दूकान के पास उसे उतार फेंका। 


हर दिन बच जाना ही एक जीत है — सफेद पृष्ठभूमि पर शांत और थका हुआ आम आदमी

दोस्त, स्टोरी और डर

    साढ़े नौ बज गए थे। मैं ऑफिस पहुंचा तब दस बज गए थे। थोड़ा बहुत काम संभाला, उतने में फोन की नोटिफिकेशन बजी, और इंस्टाग्राम की ओर से आयी नोटिफिकेशन्स में तुरंत ही देखता हूँ। अच्छा हुआ यह भी तुरंत ही देखी.. पत्ते को आज इस लिए अचानक प्यार उमड़ आया था भाई पर, क्योंकि कल-परसो वाली दिलायरी में उसे मैंने सम्मिलित किया था, हमारे एक साथ हुए एक्सीडेंट वाले किस्से पर। भाई को लगा, भाई को फेम दिलानी चाहिए, और भाई ने भाई की ओरिजिनल आईडी को स्टोरी पर मेंशन कर दिया। अब मैं टेंशन में, कि स्टोरी कोई देख न ले, क्योंकि मुझे अपने नाम से यह लेखन का शौक पालना होता, तो कभी मनमौजी भी न होता, और न होता यह दिलावरसिंह। 


    उस गधे को दो फ़ोन तुरंत किये, लेकिन अब अगला फोन न उठाये.. इधर मुझे समस्या यह भी थी, कि उसकी और मेरी आईडी में कितने ही म्यूच्यूअल लोग है, भांडा फुट जाएगा। थोड़ी देर बाद उसका कॉल बैक आया, और तुरंत उससे स्टोरी हटवाई। शनिवार है प्रियम्वदा ! शनि का वार.. शनि के प्रभाव में अच्छी खासी समस्या हो जाती मेरे लिए। खेर, आज तो ऑफिस पर न बराबर काम है, सवेरे से बस एक काम था, वह निपटाकर सुबह से अच्छाखासा टाइमपास करने में लगा हूँ। 


ऑफिस, थकान और नींद

    प्रियम्वदा ! कईं बार ऐसा भी होता है, कि कुछ लोग समय की अहमियत नहीं समझते। असमय प्रकट होकर समस्याएं खड़ी कर देते है। आज दोपहर को लंच करने के बाद दो गोलियां निगलि, और फिर नींद आने लगी मुझे। मैं अपनी रिक्लाइनेर चेयर पर ही लंबा होकर नींद लेने पर उतारू था, लेकिन एक आदमी बार बार फ़ोन करके आयी हुई झपकी को भंग कर देता। मैंने तीन बार उसके फोन काटे फिर भी वह न समझा। कुछ लोग अड़ियल होते है, उन्हें लगता है सब कुछ मेरी मिल्कियत है। 


जीत का नया अर्थ

    खेर, आज का दिन भी ठीक निकला है। न बढ़िया, न बेकार। यही जीतना भी है। क्योंकि हम जीत को ख़ुशी के शोर में, खबरों की सुर्ख़ियों में नापते है। लेकिन हकीकत में मुकाबले के समय कोई भी प्रत्यक्ष दर्शक मौजूद नहीं होता। सबसे बड़ी जीत अक्सर बिना दर्शक के ही लड़ी जाती है। हररोज सुबह उठकर लड़ाई में कूद जाना ही महावीरता है। और उससे भी अधिक बीते कल की ही तरह हार माने बिना डटे रहना आज भी। हर कोई मुस्कुराता हुआ निकलता जरूर है, लेकिन अपने भीतर टूटा हुआ एक अध्याय लेकर चलता होता है। कोई नौकरी से टूटा है, कोई रिश्तो से, तो कोई जिम्मेदारियों के बोझ से। लेकिन फिर भी हम अगली सुबह फिर से उस रन में कूद पड़ते है। 


उम्मीद — सबसे बड़ा हथियार

    एक बात और भी तो है, कईं बार परोक्ष विजय मिलती है हमें। अपने आप को न खो देने का विजय। उम्मीद को हररोज ढूंढकर जेब में रख लेनी चाहिए, होंसला यही तो बनती है, अगले दिन में फिर से टिक पाने के लिए। मुझे कभी कभी यही लगता है, कि अगर दिनभर में एक उम्मीद न मिले तब भी हम बड़े निराश हो जाते है। हम युद्ध तो करना चाहते है, लेकिन हमारा वह हथियार - एक उम्मीद - हमें कहीं ढूंढने पर भी मिलता नहीं। बस वह उम्मीद खो जाने के भय से भी हम आधी हार स्वीकार लेते है। दरअसल हमें तलाश को और तेज़ करना चाहिए। लेकिन ज्यादातर यह तलाशें ऊपर-ऊपर होती है, भीतर तक नहीं उतरती। 


धैर्य — वरदान या अभिशाप?

    प्रियम्वदा ! मैं यह मीठी ज्ञानी बातें कर तो लेता हूँ, लेकिन जब आचरण की बात आती है, तो मैं भी छिछरी तलाश ही कर पाता हूँ। जहाँ धैर्य की जरूरत है, वहां मैं उसे धारण करता नहीं। और जहाँ नहीं है, वहां मैं उसे पालकर बैठा हूँ। कुछ रिश्तों में हम फंस जाते है। आजीवन उन्हें निभाना होता है, न चाहते हुए भी.. वहां यह धैर्य बड़ी भूमिका निभाता है। जरूरत नहीं होती है, लेकिन जिस पिंजरे ने बांधे रखा है, वहां से भी तो मुक्ति नहीं है। फिर धीरे धीरे धैर्य ही हमें वहां लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ हम अशक्त अनुभव करते है। शक्तिहीन यह ढांचा फिर तो बस समर्पण ही करने योग्य रह जाता है। धैर्य का यह गेरलाभ है। 


रेगिस्तान और उपवन का रूपक

    जहाँ विरोध करना चाहिए, वहां यदि धैर्य धारण कर लिया गया, फिर वहां कभी उपवन नहीं खिलता। वहां रेगिस्तान होते है। निर्विरोध हवाएं जहाँ विचरण करती है, वे रेगिस्तान। जहाँ विषाक्त जिव अपना बसेरा बनाते है, वैसा रेगिस्तान। यह एक रूपक है। रेगिस्तान, उपवन। प्रियम्वदा ! तुम्हे समझ आए तो मुबारक, न आए तो मुझे..!


    शुभरात्रि। 

    २९/११/२०२५ 

|| अस्तु ||


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