एक्सीडेंट के बाद भी ऑफिस जाना — दर्द और जिद || दिलायरी : 27/11/2025

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एक्सीडेंट के बाद भी ऑफिस जाना — एक घायल मन की दिलायरी

    प्रियम्वदा !

    मैं जानता हूँ, यह मेरी कर्तव्यनिष्ठा तो नहीं ही है। कल रात को एक्सीडेंट हुआ, और फिर भी सुबह दस बजे मैं ऑफिस आ पहुंचा था। यह कोई कर्तव्यनिष्ठा नहीं, बल्कि एक तरह का खुद को संभालने का तुक्का भर है। मैं जानता हूँ, मैं कभी भी घर पर पूरा दिन नहीं टिक सकता। उससे अच्छा मैं ऑफिस ही चला जाऊँ। घर पर टाइमपास नहीं होता है मेरा। 


Bike accident ke baad injured leg aur helmet safety ka sandesh

सूजा चेहरा, टाँके और सुबह की ज़िद

    कल रात को दवाई के प्रभाव में नींद जरूर से आ गयी। सुबह आँख खुली नहीं थी, लेकिन फिर घरवालों ने जगाया। आठ बजने को थे, कुँवरुभा को उनके स्कूल छोड़ना था, लेकिन बाइक? बाइक तो चलने लायक थी नहीं। पडोसी अपनी बाइक पर कुँवरुभा को छोड़ आया। मैं बिस्तर से उतरा, हाथ पर सूजन ज्यों की त्यों ही है। दाहिना चेहरा अभी भी सूजा हुआ है। दीखता नहीं है, लेकिन मुझे अनुभव होता है। विकट समस्या यह भी थी कि आखिरकार नहाऊं कैसे? वैसे तो डॉक्टर ने बोला था, चोट पर पानी लगे तो कोई बात नहीं। लेकिन मैं खुद अपनी और से कुछ परहेजी का पालन करता हूँ। तो एक प्लास्टिक की पन्नी को पैर में बाँध लिया। और नाहा लिया। 


मंदिर की मुस्कान और भीतर का संवाद

    कार उठायी, घर से निकलते ही पहले गया जगन्नाथ जी के पास। आज मुझे दादा मुस्कुराता लगा। पिछले कुछ दिनों से मैंने सवेरे लेट होने के चलते जगन्नाथ मंदिर जाना छोड़ दिया था। तो आज जगन्नाथ के चहरे की मुस्कान देखकर मनोमन ख्याल उठा, और मैंने यदुकूलभुषण से कहा, "दादा ! यह तरीका थोड़ा केजुअल है.. ऐसे भला कौन बुलाता है अपने पास?" और मैं अकेले अकेले हंसने लगा। खैरियत यही थी कि मंदिर में मेरे अलावा कोई नहीं था, वरना कोई देखता तो सोचता कि अच्छा पागल है, अकेले अकेले हँस रहा है। 


    प्रियम्वदा ! जब भी ऐसी कोई घटना होती है, मैं अच्छा-भला जो भी हो ईश्वर पर डाल देता हूँ। बच गया, तो ईश्वर कृपा.. चोट लगी, तो ईश्वर कृपा। मुझे याद आया, कुछ दिनों पहले एक मित्र ने बताया था, उनके फेमिली में भी बाइक एक्सीडेंट हुआ था। और मैंने कहा था कि सर्दियों में घाव ज्यादा दर्द करते है। आज मेरा भी यही हाल है। एक तो यह टाँके लिए है - स्टिचेस, जमीन पर पैर रखता हूँ, तो स्किन खींचती है। लंगड़े की तरह चलना पड़ रहा है। दुकान पर रुका, अपनी प्रतिदिन वाली विधियां निपटाई। और फिर ऑफिस के लिए निकल पड़ा। 


ऑफिस — दर्द से भागने की जगह

    यूँ तो ऑफिस न आऊं तो चल जाता, लेकिन घर पर मेरा समय नहीं निकलता, और बिस्तर में मरीज़ की तरह पड़ा रहना मुझे जरा पसंद नहीं। स्टिचेस के कारण चलने में थोड़ी समस्या तो होती है, लेकिन मैनेजेबल है। सरदार ऑफिस के बाहर ही कुर्सी डाले बैठा। मुझे कार से उतरता देख बोला, "क्या हुआ?" उसे पूरा विवरण दिया कि बीती रात ऑफिस से घर जाने के लिए निकला, और स्मशान के पास ही अच्छा-खासा एक्सीडेंट हो गया। हेलमेट के कारण अच्छा बचाव हो गया, लेकिन पैर में बूट पहने होने के बावजूद एक बड़ा कट लग गया।"


    उसने दिलगिरी व्यक्त की, और फिर मैं ऑफिस में बैठ गया। काम तो काफी थे, मुझे पता था, पुष्पा आज भी छुट्टी पर था, और मैं भी छुट्टी पर रहता तो, सरदार पागल हो जाता अकेले। घर पर मेरा वैसे भी समय नहीं निकलता, यहाँ कम से कम कुछ न कुछ कामों में मन उलझा रहता है। घाव और दर्द भूलने लगता है मन। एक तो यह चश्मा भी आज तिरछा रह रहा है, उसकी भी गलती नहीं है, एक साइड का चहेरा सूजा हुआ है हल्का। खेर, कल रात को दिलायरी लिखते लिखते ही नींद आ गयी थी, तो उसे भी पूरा करना था। बिल्लिंग्स का काम निपटाकर दिलायरी लिखकर पूरी की। शेयर करनी थी वहां शेयर भी कर दी। 


    दोपहर तो कुछ काम निपटाए, और लंच टाइम हो गया। घर जाने की आलस हो रही थी। तो पास की दुकान पर चल पड़ा, एक दूध का पैकेट लिया, और डॉक्टर की दी हुई पैन किलर दूध के साथ निगल ली। कुछ देर वहीँ दूकान वाले से गप्पे लड़ाता रहा। और ढाई बजे ऑफिस लौट आया। मैं वैसे यह सोच रहा था, वास्तव में मुझ में सहनशक्ति अधिक है? या फिर भी मैं मूर्ख हूँ। क्योंकि जितने फोन आए, हाल-चाल पूछने के लिए उन्होंने यही कहा कि एक दिन तो आराम कर लेना चाहिए। हालाँकि मुझे भी आराम करना पसंद है। लेकिन पता नहीं क्यों मेरा मन हमेशा उल्टा ही चलता है। 


    जब काम का बोझ ज्यादा होता है, तो मैं आलस करता हूँ। और आराम फरमाना चाहता हूँ। लेकिन जब ऐसी घायल अवस्था होती है, तो यह मन काम करना चाहता है। नौकरी करना चाहता है। इन्शोर्ट मुझे कभी कभी खुद पर ही शंका होने लगती है, कि कहीं मैं यह दिखावा तो नहीं कर रहा हूँ, कि देखो मैं घायल हूँ फिर भी काम कर रहा हूँ। एक तो मेरे साथ यह प्रॉब्लम शुरू से है कि मैं दोनों पक्षों की और से सोचता हूँ। नादुरस्त तबियत के बावजूद काम कर लेने का पागलपन, और एक यह दृष्टिकोण, कि लोग क्या सोचेंगे..! वाकई मेरा इस विचार में ज्यादा समय बर्बाद होता है, कि लोग क्या सोचेंगे। 


     फ़िलहाल शाम के साढ़े चार बज रहे है। ऑफिस पर अभी के लिए कुछ खास काम नहीं है। तो सोच रहा था कि बाइक का क्या करूँ? हुकुम तो बार बार यही कह रहे है कि इस बाइक को निकाल दे, और फिर से पुरानी स्प्लेंडर ही ले आ। लेकिन मुझे यह बाइक बड़ी पसंद है। और मैं इसे रखना भी चाहता हूँ। लेकिन साथ ही साथ यह भी सोच रहा हूँ, कि हुकुम का भी मत सही है, ऐसी बाइक का क्या फायदा जो मेरे अलावा किसी और के काम ही न आए.. यह मेरा अभी तक का दूसरा एक्सीडेंट है। कल रात को पत्ता हालचाल पूछने आया था, और हम लोग मेरे पहले एक्सीडेंट की बातों में लग गए थे। 


पहला एक्सीडेंट: 2010 की याद

    2010-11 की बात है, उस टाइम पर मैं वड़ोदरा में अपना इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा था। और छुट्टियों में घर पर आया था। उन दिनों मेरे पास अपनी मोटरसाइकिल नहीं थी। पत्ते के पास थी। तो मैं और पत्ता पास के प्रसिद्द हनुमान मंदिर पर दर्शन करने जा रहे थे। मोटरसाइकिल मैं ही चला रहा था। पत्ता पीछे बैठा था। उस दिन भी ज्यादा स्पीड नहीं थी, रही होगी 30-40 की। एक कुत्ता पता नहीं कहा से आया, बाइक के आगे वाले टायर के निचे आया, बाइक उसके ऊपर से निकली, बेलेन्स बिगड़ा, मैं और पत्ता दोनों ही रोड पर पसर गए। आसपास काफी लोग इकट्ठे हो गए, किसी ने बाइक खड़ी की, किसी ने हमें खड़ा किया, किसी ने पानी दिया। 


    अजीब बात यह थी, कि मैंने कुत्ते को बाइक के टायर के निचे आते देखा, लेकिन हम गिर पड़े, और मैंने ध्यान दिया, वह कुत्ता फिर कहीं नहीं दिखा। हम उठे, मैंने फिर बाइक उठायी, मेरी कोहनी से खून रिस्ता हुआ मेरी कलाई से टपकता जा रहा था। दोपहर के तीन-चार बज रहे थे शायद। और उस टाइम पर इतनी बुद्धि भी नहीं थी, कि किसी अस्पताल जाना चाहिए। मुझे एक क्लिनिक दिखा, मैंने वहीँ बाइक रोक दी। डॉक्टर नहीं था, और मुझे आज भी अच्छे से याद है, हमने अपनी ड्रेसिंग खुद से की थी। मैंने खुद एक कॉटन लेकर उसे हाइड्रो वाले लिक्विड में भिगोया, और अपना घाव पोंछा.. बड़ी जलन हो रही थी। वो मेडिसिन का नाम तो मैं भूल गया, लेकिन उसे लाल मलम कहते थे। मैंने अपने हाथ से एक नए कॉटन से मलम घाव पर लगाया, और फिर पट्टी बाँध दी। 


    पत्ते का भी ड्रेसिंग मैंने किया। उससे घाव का दर्द सहन नहीं होता, वह जब घाव पर कॉटन छूता तो चीखता था। मैंने बड़ी मुश्किल से मरहमपट्टी की थी। और फिर हम घर पर आए। पहले से घायल तो थे ही, घरवालों ने और डांटा। चुपचाप निचा मुँह करके डांट सुन ली। विकल्प कहाँ था हमारे पास? इतने भी बड़े नहीं हो गए थे हम। वह घाव की खुद से की हुई मरहमपट्टी के कारण वह निशाँ आज भी मेरे दाहिने हाथ की कोहनी के पास बैठ गया, और आज भी उस वाकिये की मुझे बार बार याद दिलाता रहता है। 


    एक बार और मैं गिरा था, उस दिन चोट तो नहीं आयी थी, लेकिन मेरी अपनी ही बाइक के निचे मेरा पैर दब गया था। उस दिन भी मैं खुद से उठ खड़ा हुआ था, बाइक के निचे से पैर नहीं निकल पा रहा था, तो मैंने बाइक की सीट पर लात मारकर बाइक को अपने दूसरे पैर के ऊपर से दूर किया था। उस दिन तो पता नहीं कैसे बाइक गिर पड़ी थी, ट्रैफिक जैम में खड़ा हुआ था मैं। जरा भी चोट नहीं आयी थी। 


बाइक बदलूँ या नहीं — मन का युद्ध

    उसके बाद फिर कल रात को गिरा। कल अच्छी खासी चोट खायी। मैंने भी और बाइक ने भी। हुकुम ने मेरे दिमाग में यह बात बिठा दी है, और अब वह बात निकल ही नहीं रही। कि यह बाइक मुझे निकाल देनी चाहिए। मेरे दो मन है। यह बाइक मुझे पसंद है, लेकिन हुकुम का आदेश भी मुझे सही लग रहा है। कि एक बार कोई धोखा देता है, तो उसे दूसरा मौका नहीं देना चाहिए। आखिरकार यह भी एक तरह का बाइक का धोखा ही है। भले गलती सामने वाले की हो। और मैं यह भी मानता हूँ, कि वहम का कोई इलाज नहीं, अब मुझे इस बाइक पर वहम हो चूका है, तो किफायती यही होगा, कि मैं बाइक बदल लू। 


    जहाँ तक मुझे लग रहा है, इस बाइक में खर्चा भी बड़ा आएगा। क्योंकि आगे का शॉकर मडगार्ड से अलग हो चूका है, और आगे का टायर भी कुछ पीछेहठ कर गया है। लेगगार्ड़ भी पूरा ही बेंड हो चूका है। इन चीजों के अलावा अगर बाइक में कोई अंदरूनी गड़बड़ हुई हो तो वह बात अलग है। इंजिन सेफ है, बाकी बाहर से बड़ी चोटें खायी है बाइक ने। यह तो मैकेनिक ही बता पाएगा, कितना अंदाज़ बैठता है। हाँ ! वैसे यह दिलासा भी अच्छा है, कि मैं ठीक हूँ.. हकीकत में तो मैं ठीक नहीं हूँ। क्योंकि मुझे पैसा दिख रहा है.. मेरा हो चूका नुकसान दिख रहा है, और आने वाला खर्चा दिख रहा है।


हेलमेट: ज़िन्दगी की आखिरी ढाल

    छोडो, यह सब तो चलता रहता है। अंत ने इतना बता देता हूँ, कि हेलमेट बड़ी जरुरी चीज है। और हाँ ! हेलमेट अच्छी कम्पनी का लेना भी बड़ा जरुरी है। मैं रॉयल एनफील्ड का हेलमेट यूज़ करता हूँ। हाफ फेस वाला। हाफ फेस में भी समस्या है, अगर कभी मुँह के बल गिरे तो पुरे चेहरे की ऐसी तैसी हो जाएगी। मैं गिरा तो गाल के बल गिरा था, इस लिए मेरे हाफ फेस हेलमेट काम कर गया। मेरा यह शहर औधोगिक नगर है। यहाँ प्रतिदिन हजारों की तादात में ट्रक चलते है, और हररोज एक्सीडेंट्स होते है। मैंने रोड पर खुला हुआ दिमाग देखा है। मैंने रोड पर जांघ को चीरकर निकली हड्डी देखी है। मैंने रोड पर सर अलग और धड़ अलग देखा है। इस लिए मुझे पता है, हेलमेट कितना जरुरी है। और हेलमेट की क्वालिटी क्या होनी चाहिए। 


    आज तो शाम ढल गयी.. दिन समाप्त हो चूका। ऑफिस पर कुछ काम थे, वे भी निपट गए। आज तो सवेरे से घड़ी सात बजे का समय दिखा रही थी, उसने भी एक झापड़ खाया, और सेकंड वाला काँटा तुरंत भागने लगा। कुछ देर पहले पुष्पा की गैरहाजरी के कारन मुझे मार्किट जाना पड़ा। और दो माले सीढ़ी चढ़नी पड़ी। उस समय स्टिचेस ने अपना अस्तित्व जरूर से उजागर किया। बाकी दिन तो ऑफिस में बैठे रहने के कारण ज्यादा दर्द या कोई समस्या अनुभव नहीं हुई। 


    शुभरात्रि। 

    २७/११/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर यह दिलायरी किसी एक व्यक्ति को भी हेलमेट पहनने पर मजबूर कर दे —
तो समझूँगा, मेरी चोटें व्यर्थ नहीं गईं।

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शायद किसी की सुबह बच जाए।

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