एक दिन, जो खत्म होने की प्रतीक्षा बना
प्रियम्वदा !
निराशा और विषाद ने मन को घेर रखा है। मासांत दिवस जैसा चाहा था, वैसा तो नही गया है। जीवनभर में कितने ही दिन ऐसे निकलते है, जब बस हम इन्तेजार करते है, कि चलो आज का दिन खत्म तो हुआ..! निराशा व्याप्त मन के लिए तो ऐसे दिन और मुश्किल हो जाते है।
शराब, शर्म और सवालों से भरा कमरा
रविवार था, सवेरे ऑफिस जाने की कोई भी जल्दी न थी। आराम से उठकर, जगन्नाथ के दर्शन करके, पासवाली दुकान पर स्टॉप लेकर ऑफिस पहुंचा तब घड़ी में दस बज रहे थे। मौसम गर्म हो चुका था। सर्दियां बस रात रात में अपनी आहट करती है, दिनभर तो उसे छिपकर रहना पड़ता है, शायद इस समाज से? उसने भी कोई सामाजिक नियम भंग किया होगा। खेर, मैं ऑफिस पहुंचकर अपना काम निपटा रहा था, और डेढ़ बज चुका था। एक स्टाफ है, बिल्कुल ही डोलता हुआ आया, बोला "पैसे दो।" मेरी ऑफिस का छोटा सा कमरा बदबू से भर गया। उसकी यह हालत देख मैंने उसे बाहर इन्तेजार करने को कहा। अगला कुछ बड़बड़ाने लगा।
बीती रात को यह आदमी मोबाइल रिचार्ज करवाने का बोलकर मुझसे पाँचसौ रुपये ले गया था। अब पता चला कि वह पाँचसौ कहाँ गए..! प्रियम्वदा, कुछ लोगों को जीवन मे सुधरने के कितने ही मौके दे सकते है? कोई तो लिमिट होती होगी? बीती रात भी उस आदमी ने रात के बारह बजे तक सिक्युरिटी गार्ड से बदतमीजियां की थी। मुझे सवेरे पता चला, रात को पता चला होता तो रात में ही ऑफिस जाना पड़ता। मुझे यह सब समाचार सवेरे मिले थे, इसी कारण उसे बाहर बैठने को बोला था। थोड़ी ही देर में वह वापिस आया, बोला, "भाई चाबी देना।" मैंने चकित चेहरे से उसकी ओर देखा। तो वही बोला, "आपकी गाड़ी की।" तो मैंने पूछा, "क्यों?" तो कहता है, "चक्कर मारना है।" बताओ प्रियम्वदा, अपनी ही दो टांगो पर जो आदमी बेलेंस नहीं बना पा रहा है, वह कार चलाने की बात कर रहा था। इस बार मैंने थोड़ा चिढ़कर कहा, "बाहर बैठो।"
तीन शादियाँ, तीन करोड़ और शून्य समझदारी
वह फिर से बड़बड़ाता हुआ गया। इस बार मुझे सुनाई भी दिया और समझ भी आया, वह कह रहा था, कि "पगार मांगो तो बाहर बैठने को कहा जाता है इस कंपनी में।" मेरा पारा तो चढ़ रहा था, पर कुछ और काम निपटाने थे मुझे। सारे काम निपटा लिए। उतने में सरदार का फोन आया, और उसने बताया कि वह सीधा ऑफिस पर आ रहा है। अब मेरा जिम्मेदारियों का भार थोड़ा कम होने वाला था। तो मैंने अब उस बेवड़े कलीग के मजे लेने चाहे। देखो प्रियम्वदा, निराशा से घिरा हुआ लिखने बैठा था, लेकिन अब यह वाकया लिखते हुए यकीन मानों मैं मुस्कुरा रहा हूँ। खेर, मैं अपनी केबिन से बाहर आया। मेरे बाहर निकलते ही उसने फिर मुझे पकड़ा, बोला "पैसे?"
"क्या करोगे तुम यार पैसों का..?"
"अरे भाई, किस..किस्से..किश्ते कटनी है मेरी। फ..फ़ा..फ़ाइन लग जाएगा, आज किश्त नहीं चुकाई तो।"
उसके शरीर के साथ साथ उसकी जुबान भी लड़खड़ा रही थी। मैंने मजे लेने के इरादे से पूछा।
"कितने साल हो गए तुम्हे नौकरी करते हुए?"
"किसे?" उसने अपनी बिल्लियों जैसी माँजरी आंखे छोटी करते हुए पूछा।
"तुम्हे और किसे?"
"मुझे?"
"अबे हाँ तेरे को कितने साल हो गए, कबसे नौकरी कर रहा है तू?" मैंने थोड़ा चिढ़कर चिल्लाकर कहा।
"एक महीने में छह दिन कम।"
"अबे यहां - इस कम्पनी में - नहीं। टोटल बता, जिंदगीभर में कितने साल से नौकरी कर रहा है?"
"ओ.. ऐसे.. पचीस साल हो गए।"
"फिर तुझे शर्म नहीं आती? फिर भी तेरे पास किश्त चुकाने के पैसे नहीं है? मुझे भी पंद्रह साल हो गए, लेकिन कम्पनी मुझे छह महीने पगार न दे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तूने पचीस सालों में किया क्या?"
"अरे आप तो बापु हो बापु, मैं जानता हूँ, बहुत सारे बापुओं को.."
"अरे तू बात मत बदल।"
"ऐसा नहीं है। मेरे पास भी ज़मीन है। हाईवे टच, तीन करोड़ वेल्यू है उसकी।"
अब मुझे मजे लेने लायक मुद्दा मिला। मैंने बात जारी रखी। "फिर तू इधर क्या मजदूरी कर रहा है। अबे मेरे पास तीन करोड़ होते, तो मैं तो तीन करोड़ बैंक में रखकर fd करवा लेता। महीने डेढ़ लाख बैंक व्याज के देती। और मैं अपना मस्त थार फ़ॉर बाय फ़ॉर लेकर दिनभर घूमता रहता। शाम होते ही मस्त सिवास रीगल या रेड-ब्लू लेबल की बोतलें खुलती। मौज करता मौज..!"
"भाई, माँ बाप मेरे साथ है। उनका भी तो देखना है।"
"तीन करोड़ में तो आजबाजू वालों के भी माँ-बाप तू पाल सकता है। गणित ठीक कर थोड़ा।"
"अरे भाई, और भी तो फेमिली होती है। मैंने तीन शादियां की है।"
"अरे तू तो बड़ा हिम्मतवाला निकला। हम तो एक से ही तंग हो लिए है, और तू तीन तीन को थामे बैठा है। बता बता, पूरी बात बता।" मुझे तो सरदार के आने तक टाइमपास ही करना था।
"देखो भाई, पहली शादी तो मैंने मारी जात में ही करी। दूसरी ल्याया MP से। और तीसरी ल्याया मैं ब्यारण (बिहारी)।"
"अच्छा फिर इन सब को अकेला संभाल लेता है, या फिर इनको भी किश्तों में बांध रखा है।"
अब थोड़ा चिढ़ा वो। "भाई यह सब छोड़ो, पैसे दे दो मेरे जो भी बनते हो।"
"अरे पैसे कहाँ भागे जा रहे है, मुझे तो पहले यह बता, कल रात को क्या पंगा किया तूने?"
"पंगा? कुछ नही हुआ था, क्या किया मैंने?"
"मेरे से क्या पूछता है, तुझे नही पता तूने क्या किया? देख, दारू तो हर कोई पीता है, लेकिन खुद पर काबू न रख पाए तो क्या मतलब है? एन्जॉयमेंट में और क्लेश में बड़ा अंतर है। लिमिट में रहा कर थोड़ा, समझा?" अंत मे समझा शब्द पर भार दिया था मैंने, तो उसकी बिल्लियों जैसी आंखे चौड़ी हो गयी।
"अरे कोई तो कहे कंपनी में, मैंने कोई हो-हल्ला किया हो तो? मैंने दारू पी ही नहीं है।"
उतने में सरदार आ गया। वह सीधा ही एयरपोर्ट से ऑफिस आया था, क्योंकि उसे रात के बारह बजे तक हो-हल्ला के फोन पर फोन गए थे। उसने आते ही इस स्टाफ का हिसाब कर दिया। जो कि मैं पहले से तैयार किए बैठा था। क्योंकि मुझे पता चल जाता है, अगला कदम क्या होना है। खेर, ढाई बजे गए थे। मैंने अपना हिसाब किताब सरदार को सौंपा। क्योंकि अब मुझे भी आराम चाहिए था। मैं भी काफी परेशान था, क्योंकि ढाई बजे रहे थे। मैंने न तो खाना खाया था, न ही दवाई। उपर से इस बेवड़े ने बदबू से सरदर्द दिया वह अलग। कुछ लोग सुधरते नही, कभी नही। इसी स्टाफ को पहले भी दो तीन बार इन्हीं कारणों से छुट्टी किया गया था। लेकिन छुट्टी होने पर यह पैर पकड़ लेता है। भीख मांगने लगता है। दया आ जाए ऐसी हरकतें करने लगता है।
ऑफिस से निकल ही रहा था मैं, कि वह बेवड़ा फिर से मुझसे उलझने लगा। मेरे साथ एक और व्यापारी थे, उन्होंने बड़ी शांति से उसे समझाया कि, "देख भाई, तू एक बात समझ, तू है थोड़ी ऊची पोस्ट पर। कल रात को तुझे सिक्युरिटी गार्ड कूट देते तो तेरी क्या इज्जत रह जाती?" उसका इतना कहते ही वह सीधा चढ़ बैठा, "मुझे कोई हाथ नही लगा सकता, वो क्या मारते? एक दो बाय दो का डंडा पड़ता कि सारे सीधे हो जाते।" वे व्यापारी इससे और उलझना चाहते थे, लेकिन मैंने उन्हें बताया कि रहने दो, यह पहले भी कईं बार रोड पर लोट चुका है। लोगों से मार खाने की इसे आदत है। इसके मूंह मत लगो। चलो आप।
जब जिम्मेदारियाँ आती हैं… और उम्मीदें चली जाती हैं
और हम ऑफिस से निकल पड़े। मैं घर पहुंचा तब तीन बज रहे थे। मैंने थोड़ा बहुत खाना खाकर दवाइयां ले ली। कुछ देर आराम करना चाहता था, लेकिन कुँवरुभा.. वो कहाँ आराम में मानते है। कुछ देर उन्हें हुकुम बाहर घुमाकर ले आए। तब तक मैं सीढ़ियों पर बैठा अपनी बाइक को घूरे जा रहा था। विषाद छा रहा था। निराशा भी। मन में कोई बेफालतू की निराशा व्याप्त हो चुकी थी। मन मे एक ही बात बार बार घूम रही थी। वही प्रियम्वदा, वही बात, जिसे मैं न जाने कितनी ही बार अपने दिमाग से निकाल चुका हूँ। अतार्किक है, लेकिन सही लगती है। बार बार सिद्ध होती है। मेरे कितनी ही रक्षात्मक किलेबन्दी को तोड़कर वह बात मुझे हताहत कर जाती है। "मैं जिसे सबसे ज्यादा पसंद करता हूँ, वह मुझसे हमेशा दूर हो जाता है। व्यक्ति हो या वस्तु।"
एक बच्चे की जिद बनाम टूटा हुआ मन
पता नही कैसे, लेकिन यह हर बार होता है। मुझे जो चाहिए होता है, वह मुझे मिलता है, लेकिन साथ नही रहता। यह बाइक मेरी पसंद की हुई थी। मैं इसे हर हफ्ते धुलवाने ले जाता था। बाइक ही नही, और भी बहुत ऐसी व्यक्ति या वस्तु है, जो मेरे साथ बहुत लंबे समय तक नहीं टिके। खेर, छोड़ो। दिमाग इन्ही उलझनों में और उलझ रहा था। मुख पर पूर्ण निराशा थी, और मैं बस इन्हीं निराशा में तल्लीन रहना भी चाह रहा था, लेकिन कुँवरुभा आए, और किसी बात के लिए जिद्द करने लगे। मेरा बिल्कुल ही मन नहीं था उनकी जिद्द पूरी करने को। मैं एकांत चाह रहा था, और वे अपनी बात मनवाना। उन्हें कहीं जाना था, और मेरा मन नही था तो मैंने कईं बहाने मारे, "बाइक नहीं है अपने पास।" तो उन्होंने कहा, "काल (कार) ले चलो।" तो मैंने बहाना बनाया कि उसमें पेट्रोल खत्म हो गया। तो वे बोले, "पैदल चलो।" तो मैंने कहा देखो, अभी तक चोट ठीक नहीं हुई मैं कैसे चलूंगा? तो वे बोले, "मैं आपको गोद मे उठा लूंगा, लेकिन चलो।"
अब और बहस नहीं हो सकती थी। गुस्सा तो आ रहा था, लेकिन मैंने सोचा जिद्द को थकाना चाहिए। उन्हें पैदल लेकर गया। लगभग तीन किलोमीटर उन्हें पैदल चलवाया। सच बताऊं, वे तो नहीं थके, लेकिन मेरा थक के बुरा हाल हो गया। निराश मन अब व्यग्र भी हो चुका था। एक तो टांके के कारण दाहिना पैर वैसे ही सीधे के बजाए थोड़ा टेढ़ा पड़ता है। धीरे धीरे वापिस घर लौट आये हम लोग। फिलहाल वे थककर सो चुके है। और मैं दिलबाग में आराम फरमाते हुए यह दिलायरी पूरी कर रहा हूँ।
शुभरात्रि।
३०/११/२०२५
|| अस्तु ||
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