“फ़िल्में, युद्धकथा और शनिवार का संघर्ष: 120 बहादुर व स्काई फ़ोर्स समीक्षा || दिलायरी : 20/12/2025”

2

फ़िल्में, युद्धकथा और शनिवार का संघर्ष: 120 बहादुर व स्काई फ़ोर्स समीक्षा


“Cartoon character watching 120 Bahadur and Sky Force movies on laptop at office desk — plain white background.”

शुरुआती दिनचर्या और काम का दबाव

    प्रियम्वदा !

    हररोज मैं मूवीज देख रहा हूँ। हररोज.. आज भी, दो मूवीज देखी है। शनिवार के भार को दरकिनार करके मैंने पूरी दो फ़िल्में देखी है। यूँ तो शनिवार अपने यहाँ सप्ताह का अंत मानते है, क्योंकि रविवार को रजा का दिन घोषित किया गया है। लेकिन मेरी फिल्ड में रविवार यानी कि अलग काम का दिवस। और शनिवार मतलब स्ट्रेस का दिवस। लेबर के हिसाब से लेकर स्टॉक के रिपोर्ट्स तक। सारे काम आज करने अनिवार्य है। आज सवेरे उठकर तैयार होकर ऑफिस के लिए निकला, पहले दूकान, फिर एक रिश्तेदार के घर और फिर ऑफिस। कहीं भी जाना हो, दूकान स्किप नहीं करता हूँ मैं। दूकान को मैं अपनी प्रेमिका का दरज्जा दे सकता हूँ प्रियम्वदा?


फ़िल्म चुनने की दुविधा और वॉलीबॉल का प्रसंग

    ऑफिस पहुंचकर काम इतना ज्यादा नहीं था.. काम इतना ही महत्वपूर्ण था, कि एक तरफ फोन में फिल्म देखते हुए कलम चलायी जा सकती थी। समस्या यह थी, अब देखु तो देखु क्या? काफी सारी फ़िल्में देख चूका हूँ पिछले कुछ दिनों में। और अब हर कहानी एक जैसी लगने लगती है। एक खलनायक होता है, और उसका विनाश करने के लिए एक नायक मैदान में उतरता है। अंत में खलनायक को मारकर नायक विजेता बन जाता है। खलनायक बेचारा पूरी फिल्म में ऐशो-आराम करता है, अंत में कुत्ते की मौत मरने के लिए। 


    मैं सारी फिल्म की लिस्ट देख रहा था, तभी व्हाट्सप्प पर नोटिफिकेशन्स के लहर चल पड़ी। वॉलीबॉल ग्रुप में मैसेजिस की बौछार हो रही थी। कारन था, बीती रात को वॉलीबॉल खेल रहे थे। दो मैच खेल लिए थे, दो मैच खेलने बाकी थे, उससे पहले बॉल जा गिरी बेर की झाडी में। बेचारी बॉल तो वो "काँटा लगा... हाय लगा.." वाला गाना बुदबुदाने लगी। लेकिन हमें सिर्फ फुस्स्स की ही आवाज सुनाई पड़ रही थी। अर्थ स्पष्ट था, आगे गेम नहीं खेली जा सकती थी। तो हमने गरबी चौक लॉक किया और घर चल दिए थे। आज उसी वॉलीबॉल को पंक्चर ठीक करवाने एक व्यक्ति ले गया था, तो ग्रुप में सब पुराने बॉल के घायल होने पर शोक, और अब ठीक हो जाने पर अभिनन्दन की वर्षा कर रहे थे। 


120 बहादुर: वास्तविकता, इतिहास और व्यक्तिगत अनुभव

    ग्रुप को कुछ देर के लिए म्यूट कर के मैं फिल्मों की लिस्ट देख रहा था। 120 बहादुर के अलावा और कोई मूवी फ़िलहाल मन में बैठ नहीं रही थी। 120 बहादुर की कहानी मैं सेंकडो बार सुन चूका हूँ। देखने का मन तो नहीं था, लेकिन और कोई आकर्षक विकल्प की अनुपलब्धता के चलते यही मूवी देख ली। कुछ दिनों पहले इस मूवी पर सोशल मीडिया पर खूब हो हल्ला हुआ था। क्योंकि यह मूवी की कहानी के असली पात्र इतिहास में उलझ गए थे। 1962 में जब रेजांगला की यह लड़ाई हुई थी, तो रेजांगला की उस पोस्ट का नेतृत्व कर रहे थे मेजर शैतान सिंह भाटी। उनके पास केवल 120 सिपाही थे। सामने तीन हजार से अधिक चीनी सिपाही अध्यतन हथियारों के साथ हमला करने के लिए आगे बढ़ रहे थे। मेजर शैतानसिंह भाटी राजपूत थे। उनके 120 जवान अहीर थे। बस सोशल मीडिया पर राजपूत vs अहीर का मामला बिचकने लगा था। 


इतिहास और विवाद की परतें

    मैं अब ऐसे मुद्दों पर नहीं उलझता। शहीद हो चुके योद्धा किसी भी जाति के रहे हो, वे अब वीर है, क्योंकि उन्होंने इस भूमि के रक्षणार्थ अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। रेजांगला का युद्ध मैं बहुत बार पढ़-सुन चूका हूँ। उस इतिहास को फिल्म के रूप में देखना अलग लगेगा यही सोचा था मैंने। लेकिन मैं गलत रहा। मैंने जो सुना-पढ़ा था, और उसके परिणाम स्वरुप जो कल्पना रची थी मन में.. बिलकुल वैसी ही मूवी है। हालाँकि ऐसी युद्ध से जुडी हुई फिल्मों में, मेरे मन पर तो आज भी बॉर्डर मूवी ही छायी रहती है। उसकी तुलना में आज भी बाकी सारी फिल्मे फीकी ही लगती है। वैसे अच्छी मूवी बनायीं गयी है। कहानी को रिप्रेजेंट करने का तरीका अलग और बेहतर है। पर, फरहान अख्तर की एक्टिंग मुझे तो समझ नहीं आती। 


स्काई फ़ोर्स : युद्ध, साहस और कहानी का सच

    दोपहर को आज लंच ब्रेक में एक और मूवी देख ली। स्काई फाॅर्स। अक्षय कुमार की मूवीज अब राष्ट्रभक्ति वाली ज्यादा होती है। उन्हीं में से एक कहानी है स्काई फाॅर्स की। 1962 में हुए चीन से युद्ध के पश्चात 1965 में पाकिस्तान को फिर से मार खाने की खुजली हुई, और उसने वॉर फ्रंट खोल दिए। भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों की चारो खाने चित्त किया। इसी युद्ध के शांति समझौते में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु भी हुई। इस युद्ध में भारतीय हवाई सेना ने पाकिस्तान के भीतर जाकर सरगोधा में बॉम्बिंग की थी। इस एयर ऑपरेशन के सिपाही में से एक सिपाही की यह कहानी है। उन्हें मरणोपरांत बहुत वर्षों बाद महावीर चक्र से नवाजा गया था। 


1965 के युद्ध से नई कहानी का उदय

    अच्छी मूवी थी। कुछ नई जानकारियां भी मिली। युद्धों में बहुत सारी कहानियां होती है। बस प्रसिद्धि उन्हें ही मिलती है, जिनकी कहानी कहने वाला कोई बचा हो। रेजांगला में से एक सैनिक कहानी बयां करने के लिए जीवित बचा था, इस लिए हमें वह वीरोचित कहानी मिली। इसी तरह इस स्काई फाॅर्स मूवी के नायक की कहानी भी हमें तब मिली, जब असल में जांच-पड़ताल हुई। 


जीवन और काम के बीच देखने का समय

    खेर, शाम के सवा सात बज रहे है। आज मच्छरों की त्रासदी भारी है। पता नहीं कौनसी ब्रीडिंग कर ली है इन मच्छरों ने, बड़े ही कद्दावर मच्छर है। धीरे धीरे उड़ते है। ढेरों की तादात में है। और यूँही ताली पीटो तो एकाध तो बीचमे आ ही जाए। काम अभी भी कईं सारे बाकी पड़े है। आराम से करेंगे। वैसे भी कल रविवार को दोपहर के तीन ऑफिस पर ही बज जाते है। तो कल चार बज जाए तो भी क्या फर्क पड़ता है? कईं बार मैं इसी तरह काम को कल पर टाल देता हूँ। नौकरी में व्यस्त रहने से ज्यादा व्यस्त दिखना जरूरी है। यह हकीकत है। और उससे भी बड़ी हकीकत यह है, कि हम नौकरी पेशा लोग हमेशा घर पर यही कहते है, कि हम बहुत काम करते है। जबकि सच बात यह होती है, कि हफ्ते के छह दिन में से केवल तीन दिन ज्यादा काम होता है। 


    इस पुरे सप्ताह में मैंने धुरंधर, क्रिमिनल जस्टिस, स्पेशल ऑप्स, जॉली LLB 3, भागवत चैप्टर 1, जाट, और आज 120 बहादुर, और स्काई फाॅर्स देखी। इस सप्ताह में मेरे पास इन फिल्मों को देखने का समय मिला ही था। नौकरी करने वाला हमेशा बिजी नहीं होता। कईं बार वह कामों को टाल भी सकता है। जब काम आते है, तो एक साथ बहुत सारे आते है, और सारे काम एक साथ मैनेज किये जा सकते है। मैं अपने अनुभव से यही सीख और समझ पाया हूँ, कि काम को मैनेज करना चाहिए। एक साथ सारे काम कोई नहीं कर सकता.. बस प्राधान्य किसे देना है, यह आना चाहिए। 


    शुभरात्रि,

    २०/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर आपने भी इन फ़िल्मों को देखा है या देखने का सोच रहे हैं, तो अपने अनुभव ज़रूर साझा कीजिए। नीचे कमेंट में बताइए — कौनसी फ़िल्म ने दिल को ज़्यादा छुआ और क्यों?

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

📌 और भी पढ़ें

भागवत चैप्टर 1 – दिनचर्या के बीच शब्दों की तलाश | दिलायरी : 19/12/2025

सत्ता, नियंत्रण और निर्णय | स्पेशल ऑप्स 2 व जॉली एलएलबी 3 समीक्षा के साथ जीवन पर चिंतन || दिलायरी : 18/12/2025

खाली समय, यादों का शोर और मन का बहकावा || दिलायरी : 17/12/2025

सितारे, काम का बोझ और अधूरी कविता || दिलायरी : 16/12/2025

कुर्सियों का समाज, जोखिम का रामसेतु और असमय न्याय || दिलायरी : 15/12/2025


#Dilayari #MovieReview #120Bahadur #SkyForce #IndianArmy #IndianAirForce #Rajput #Ahir #RezangLa #AkshayKumar #FarhanAkhtar #HindiBlog #DailyDiary #SaturdayVibes #LifeandMovies #DilawarsinhBlog


Post a Comment

2Comments
  1. जिस काम को प्राधान्यता देनी हो वो मन का ना हो तो !? 😭

    ReplyDelete
    Replies
    1. ऐसे में सिवा अफ़सोस के साथ काम निपटाने के विकल्प है?

      Delete
Post a Comment