आग की लपटों में तपता मन
प्रियम्वदा !
अग्नि की लपटें कभी मंद होती है, तो कभी विकराल.. आसमान साफ है, फिर भी वही सितारे दिखाई पड़ते है, जिनकी चमक ज्यादा है। बाकी चंद्र के तेज में ओझल हो चुके है। हवाएं ठंडी तो है, लेकिन यह अग्नि के ताप से ज्यादा भीतर का ताप मुझे गर्म रखे हुए है। एक सिगरेट खत्म हो चुकी है, दूसरी अभी सुलगाने की तैयारी में हूँ। आज काफी एकांत मिल गया। इसी कारण से सिगरेट की फूंक के साथ भीतर की वेदना को और प्रज्वलित करने की कोशिश कर रहा हूँ। क्या पता नेगेटिव नेगेटिव प्लस हो जाए। लेकिन नहीं होता। वह सिर्फ गणित में होता है। वास्तव में नकारात्मकता दूगनी हो जाती है। और यह दुगनी नकारात्मकता, शीतलता को प्रवेशने नहीं देती...!
रविवार की अपेक्षा और वास्तविकता का द्वंद्व
आज रविवार के अनुसार मैंने सोचा था, जल्दी फ्री हो जाऊंगा। सवा दस बजे ऑफिस पहुंच चुका था। लेकिन फिर भी ढाई बजे गए। सुबह की शुरुआत का लाभ दिया दिलायरी को। वैसे ही आजकल व्यग्र मन है, फिर भी कल मैंने दिलायरी को थोड़ा मजाकिया करने की भरपूर कोशिश की। लेकिन तुमसे कहाँ छिपा है। अब मेरा लेखन मेरा शौक नहीं रहा। अब मेरी लेखनी से मेरी संवेदनाएं कम, और पर्दे पर चलती तस्वीरों सी हो चली है, बिना तालमेल के चित्र.. कारण मैं जानता हूँ.. लेकिन लिखना अयोग्य होगा। मैं हमेशा से दो पक्षों की ओर से सोचकर खुद ही द्विधा से लिपट जाता हूँ। ढाई बजे घर पहुंचा। माताजी ने खाना लगाया, और फिर थोड़ी देर यूँही छत पर टहलने गया। बीती रात डॉक्टर के पास गया था। उसने टांके और तीन दिन रखने को कहा। साथ मे डांट भी लगाई कि इस घाव को पानी से भीगने से क्यों बचाया?
टांकों की पीड़ा और सूखे गमलों का विलाप
खेर, इन टांको के चक्कर मे, मैं छत पर जाने से परहेजी कर रहा हूँ। क्योंकि सीढियां चढ़ते समय टांके खींचते है। तो आज दोपहर को फिर भी सीढियां चढ़कर छत पर गया, दिलबाग बर्बाद हो चुका है। शायद सर्दियों के कारण। पानी देना किसी को याद नहीं रहता। सारे गमलें सूखे हुए थे। सूखी मिट्टी में दरारें पड़ चुकी थी। लंगड़ाते हुए छतवाली टंकी से पानी भरकर सारे गमलों में पानी दिया। कुछ देर वहां बैठा, लेकिन धूप तेज थी। चार बजे भी धूप शरीर को जला रही थी। नीचे आकर कुछ देर यूँही टहलता रहा, जगन्नाथ मंदिर चला गया, फिर घर आया, फिर टहलने गया.. यूँही मैंने शाम को गिराई है। आयज शाम ढल ही नहीं रही थी मेरी। कयकन बार ऐसा होता है प्रियम्वदा, हम चाहते है, ऐसा होता ही नहीं।
भीड़ में भी जीवित एकांत का संसार
आज गरबी चौक में नीरा एकांत है। ऐसा ही एकांत, जो अब मैंने आत्मसात कर लिया है। जैसा बहुत से लोग भीड़ में रहकर भी पा सकते है। जैसा किसी भव्य भूतकाल के वृद्ध हो चुके वारिस से खंडहरों में होता है। वैसा एकांत जैसा चिता के ठंडी होने पर स्मशान में छोड़ दिया जाता है। वैसा एकांत, जैसा शॉ खत्म होने पर सिनेमाहॉल में हो जाता है। वैसा एकांत, जैसा तूफान के बाद शहरों में हो जाता है। इस एकांत में मेरी कल्पनाओं को खुला डोर मिल जाता है, लेकिन मुझे याद रखना पड़ता है, अपने शब्दों पर नकेल कसनी पड़ती है, पर्दे को बरकरार रखना पड़ता है। वह पर्दा, जो मेरे दुःखों को छिपाए रखता है। मेरे असल चेहरे की निराशा को मुस्कान में तब्दील करता पर्दा..
दुःख का पहाड़ और उसकी अघोषित कठोरता
तुम्हे पता है प्रियम्वदा, दुःखों का पहाड़ ही क्यों कहा जाता है? पहाड़ कठोर होते है। जितने सुंदर दिखते है, उतने होते नहीं, उनका कभी वजन नही हो पाता। दुःख या पीड़ा भी कुछ कुछ वैसी ही है। दुःख की गति, और भार का तोलन नहीं हो सकता, ज्यादा से ज्यादा कम्पेरिजन हो सकता है। दुःख की कठोरता को वही समझता है, जिस पर बीता हो। लेकिन वह भी उसे किसी और को समझा नहीं सकता। मुझे पीड़ा है, और मैं अपने किसी मित्र से साझा कर सकता हूँ, लेकिन वह मित्र मुझे होंसला बंधा सकता है, मेरी पीड़ा में सहभागी नहीं हो सकता। कोई लाख चाहे तब भी हमारी अपनी पीड़ा, हमारी अपनी ही रहती है, किसी ओर की नहीं हो सकती।
सहानुभूति, सिम्पथी और शब्दों की शरण
सिम्पथी, सहानुभूति, यह उस पीड़ा को कुछ देर नजरअंदाज करने का जरिया जरूर है। मैं भी तो अपने शब्दों से कईं बार अपने मन को हल्का करता हूँ। अपने मन को शब्दों पर पर्दा चढ़ाने में इतना ज्यादा थका लेता हूँ, कि फिर सिवा निंद्रा के, मन के पास कोई भी विकल्प नहीं रहता। यह भी एक सहानुभूति है, मेरे ही शब्दों द्वारा मुझे मिली सहानुभूति..! प्रियम्वदा, सहानुभूति तब और श्रद्धावान बन जाती है, जब कोई सह्रदय उसे दे। अभी एक मित्र का मैसेज मिला। पिछले कुछ दिनों से मन काफी विचलित है। और बातों बातों में मैंने अपना दुखड़ा बयान कर दिया। मैं विचलित होता हूँ, तब तो खास ध्यान रखता हूँ, किसे अपनी बात बतानी है, और किसे नहीं.. पर आज एक मित्र से बातों बातों में मुझे ध्यान न रहा। थोड़ी देर बाद मुझे एहसास हुआ, मैंने क्षमा मांग ली।
मैत्री और विश्वास की अनकही अनुमति
लेकिन प्रियम्वदा, मैत्री हो या मुहब्बत, दृढ़ विश्वास होता है, वहां एक अनकही मंजूरी होती है, साझा कर पाने की। एक नींव होती है, जज न करने की... उन्होंने ही याद दिलाया..! प्रियम्वदा, मैं कईं बार भ्रमित होता अनुभव करता हूँ, कईं बार तुलना करने लगता हूँ, काश के कयास लगाने लगता हूँ.. और तब और पीड़ा के पाश में बंध जाता हूँ। मैं कईं बार ऐसी कामनाएं बांध लेता हूँ, जिससे मैं सागरतल के समीप जा पहुंचता हूँ। खारा सागरतल।
स्थितप्रज्ञ होने की अधूरी चाह
मैं फिर उसी अशांति भरी गर्त की ओर बढ़ रहा हूँ। अग्नि की ज्वाला को मन्द होने की अनुमति मैंने प्रदान कर दी थी। अशांति में भी एक मजा तो होता है प्रियम्वदा.. खुद को समझ पाने का मजा। क्योंकि अशांति के काल में हम सबसे ज्यादा ख्याल खुद का करते है, या फिर खुद से जुड़े लोगों का। अशान्तिपूर्ण वातावरण में यदि सदैव रहना हो जाए, तब सबसे बड़ा परिणाम मिलता है, मन का निष्ठुर हो जाना। या फिर कृष्ण की गीता के उस स्थितप्रज्ञ सी स्थिति के समीप पहुंचना.. जहाँ न तो पीड़ा असरदायक होती है, न ही सुख.. न ही अशांति आंदोलन उठा पाती है, न ही शांति की सौम्यता से होता मोह। लेकिन यह दूर है, मुझ जैसे, इस अशांति को अपने उतने भीतर तक ले जाते है, जहां से सारे विचारों का उद्गम होता है। विचारों के केंद्र में उस अशांति को स्थापित कर देने से, कभी भी एकनिष्ठता नहीं आ पाती, कभी भी एक निर्णय को कटिबद्ध होना संभव नहीं होता, कभी भी विचारों में एक केंद्रीकरण नही आ पाता। यही मैं हूँ.. प्रत्येक दिशाओं से औंधे मुंह लौटकर आया हुआ.. मैं।
पूर्वजन्म का बहाना और पीड़ा का बोझ
बहुत आसान है, जब पीड़ा का भार सहन नहीं होता, तब उसे पूर्वजन्म के पाप के कर्मफल पर थोप देना। जब किसी समस्या का समाधान नहीं मिल पाता, तब हम समझौता कर लेते है। इस बात पर सहमति बनती है, कि पीड़ा सहन कर लेना ही प्रारब्ध है। क्योंकि पूर्वजन्म में कोई कर्म था, जिसका यह फलस्वरूप है। इससे आत्महीनता का भाव कम हो जाता है। क्योंकि यहां मति की सीमा आ जाती है। हम नहीं जानते है, पूर्वजन्म कुछ होता भी है या नहीं। जब पूर्वजन्म का ही नहीं पता, तो पूर्वजन्म के पापकर्म का तो क्या ही पता होगा? अतः यही सबसे आसान तरीका है, जैसे बच्चे को किसी 'हउआ' नामक कल्पना से डराकर चुप करा दिया जाता है। बड़े होने बाद वह हउआ यह पूर्वजन्म का पाप है.. मैं स्वयं भी कुछ पीड़ाओं के असमाधान पर, उन्हें पूर्वजन्म के नाम पर थोप देता हूँ। इससे पीड़ा का भार कुछ कम हुआ अनुभव होता है..!
दीपक-सी जलती उम्मीद और ठंडी रात
खेर, पीड़ाओं की प्रपंचजाल में आज दिलायरी फंस गई है। लेकिन हाँ, मैं यह अनुभव जरूर कर रहा हूँ, कि मैं आज भी सक्षम रहा हूँ, मेरे मुखौटे को बरकरार रखने में। यह छोटी सी विजय ही मेरे लिए सर्द रात में जलाशय के बीच खड़े रहकर दीपक से ऊष्मा प्राप्त करने समान है।
शुभरात्रि।
०७/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
“अगर आपके दिन भी कभी ऐसी उलझनों से भरे हों, तो कमेंट में अपनी कहानी लिखिए… शायद आपकी यादें भी किसी और की शाम हल्की कर दें।”
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