प्रियम्वदा | धुंध, नींद और अतार्किक जीवन पर एक आत्मस्वीकार || दिलायरी : 08/12/2025

0

प्रियम्वदा : धुंध, नींद और जीवन की अतार्किकता


धुंध में डूबा सोचता हुआ व्यक्ति डायरी और फोन के साथ — भावनात्मक cartoon चित्र

धुंध नहीं, धूल का गुबार: मन का भ्रम

    प्रियम्वदा !

    चारोओर धुंध का आवरण चढ़ा है जैसे.. दरअसल तो यह धूल का गुब्बार है। जो हवाएं ठंडी होने के कारण स्थिर हुआ पड़ा है। अपने यहाँ न तो धुंध होती है, न ही कड़ाके की ठण्ड। कुछ दिनों की ठण्ड में ही हमारी सर्दियाँ सम्पूर्ण हुई मान ली जाती है। प्रियम्वदा ! मुझे ठण्ड पसंद है। कारण इतना ही, कि भरपूर नींद आती है। दिन में भी कईं बार सो जाने को मन करता है। आलस कह सकते है वैसे उसे। 


नींद, आलस और भीतर की थकान

    आज सवेरे फोन बज रहा था, मैंने आँखे खोले बिना ही फ़ोन उठाकर हेलो कहा। सामने से परिचित आवाज सुनाई पड़ी, और शब्द थे, "आज मैं ऑफिस नहीं आऊंगा।" मेरी चेतनाएं लौट आयी, फ़ोन को कान से हटाकर समय देखा, छह बजकर बयालीस मिनिट हुए थे। मैंने पुष्पा को उसकी गैरहाजरी में अटकने वाले काम बताए, उसकी छुट्टी पर जाने का कारण अटल था, तो मैंने हाँ कह दी। और फोन को यूँही सिरहाने कहीं रखकर सो गया। सोचा था, पांच मिनिट और नींद ले लेता हूँ। पांच मिनिट हुए भी नहीं थे, कि माताजी ने जगाया, बोले "काम पर नहीं जाना है क्या?" मैंने अपने फोन में समय देखा, आठ में दस कम थी। 


    तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल ही रहा था, कि एक और बार फोन की घंटी बजी। फिर से वही बात, "आज काम पर नहीं आऊंगा।" बस इस बार आवाज अलग थी। कारण पूछने पर वही सैंकड़ों बार घिसा-पीटा गया बहाना तबियत ठीक न होने का सुनने को मिला। उसे भी अनुमति दी मैंने, क्योंकि मुझे पता था, यह बहाना है, और कुछ दिनों में सबसे पहले इसी की छुट्टी करूँगा। कुछ लोग काम को गंभीरता से नहीं लेते। काम पर आते ही बुखार आने लगता है। ऐसे लोग बड़ी जल्दी छुट्टी पाते है। परमानेंट छुट्टी। 


ऑफिस की दुनिया और डेढ़-शाणे लोग

    ऑफिस पहुंचा, काम भी मेरे साथ साथ पहुँच गया था। पुष्पा की गैरहाजरी के चलते मिल का भी कुछ सेटिंग मुझे ही करना पड़ा। इधर उधर लोगों को सेट किया, और फिर ऑफिस में आ बैठा। एक तो कुछ आदमी डेढ़ शाणे क्यों बनते होंगे? उनसे जितना कहा जाए उतना करते नहीं। उनकी यह डेढ़-होशियारी के चलते, जो काम सिफ़त से हो जाने होते है, उन्हें भी एक लंबी प्रोसेस से गुजारना पड़ता है। दोपहर को लंच करके मार्किट का एक काम पूरा करना था, लेकिन वहां भी किसी की इन्तेजारी में चार बजे के बाद ही जाना हुआ। 


    वैसे आज सोमवार - शांत सोमवार था। कुछ ज्यादा काम की दौड़धाम थी नहीं। नया सप्ताह, नई ऊर्जा के साथ शुरू करना चाहा, लेकिन हुआ नहीं। आजकल मेरा सवेरा देर से होता है। नींद ही उतनी गहरी होती है, कि पिछले कितने ही महीनों से सवेरे साढ़े पांच का अलार्म बजता है, पता नहीं वास्तव में बजता भी है या नहीं.. लेकिन मैंने कभी सुना ही नहीं। बजता तो होगा, अलार्म झूठ नहीं बोलते..! गर्मियों में अनिंद्रा के चलते सवेरे जल्दी उठकर मैदान में जॉगिंग वगैरह कर लिया करता था। लेकिन अब तो नींद ही इतनी आती है, कि अलार्म भले ही बज बज कर हांफे.. अपन नहीं उठते।


डायरी क्यों केवल सच मांगती है

    सात बज रहे है, घना अंधकार छाया हुआ है, और मैं अभी तक यही सोच रहा हूँ, कि आज की दिलायरी का विस्तारण कैसे करूँ? नहीं, अंधकार का बखान तो आज नहीं करना है। विरोधाभास चाहिए मुझे भी.. यदि मैं नाखुश हूँ, तो दिलायरी को भी उसी में संलिप्त नहीं करना चाहता। वैसे डायरी तो सच्ची ही होनी चाहिए। बेशर्म सच्ची। क्योंकि अगर डायरी में ही झूठी बातें लिख दी जाए, फिर वह डायरी किस बात की? डायरी में हमेशा सच होना चाहिए, वही सत्य को भले ही किसी रूपकों के आवरण में मढ़ा गया हो। उस आवरण का भेदन सिर्फ आपको ही आता हो। वही डायरी असला मायने में डायरी हुई। 


    प्रियम्वदा ! इतनी देर में साढ़े सात हो गए.. एक अनुच्छेद लिखने में आधा घंटा खप गया। बताओ.. और बात दो टके की नहीं है। क्या करूँ.. पिछले कुछ दिनों का मानसिक तनाव ही ऐसा था, बहुत सारे घटनाक्रम मैंने अपनी कल्पनाओं में रच लिए थे। लेकिन एक भी हकीकत में न उतरा। मन बहुत कुछ करने को करता है, लेकिन वास्तविकता से परे है शायद मन। और मैं तो हूँ भी अजीब.. हर चीज के दोनों पहलुओं के साथ निष्पक्ष न्याय करना चाहता हूँ। भले ही शिबि के तरह मेरा अपना नुक्सान होता हो। 


न्याय, ईश्वर और अधूरे फैसले

    कईं बार न्याय होता ही नहीं है.. अन्याय को चुपचाप सह लेना पड़ता है। वह सब फ़िल्मी बाते है, बुद्धिजीवियों के रचित कल्पना वाक्य है, कि ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं.. न्याय आज नहीं तो कल मिलेगा.. हम है तो सब है, पैसों का क्या है.. यह सारे वाक्य बस कर्तव्य से पल्ला झाड़ने के काम आते है। मान लिया जाए कि मेरे साथ आज कोई घटना हुई है, लेकिन उसका न्याय मुझे पचीस साल बाद मिलेगा तो वह मेरे क्या काम का? दूसरा क्या था, ईश्वर के घर देर है.. फिर भला वह ईश्वर कैसा.. जो तत्काल फैंसला न करें? ईश्वर को ऐसा कौनसा एमर्जेन्सी काम आ गया  था, जो यह वाला बाद के लिए छोड़ गए? एक और था, पैसे हाथों का मेल है.. अरे पैसे होंगे तो स्विमिंग पूल में जाकर मेल निकालेंगे भला.. पैसे तो हो..!


    यह सारी बाते, सुवाक्य, बस अपना वर्तमान में घटित होती घटनाओं को नजरअंदाज करने के लिए रची गयी है। खबरों में कईं बार आता है, किसी को न्यायालय से पचीस सालों बाद अपने हक़ में फैंसला मिला.. अरे किस काम का वह फैंसला.. जिसका निर्माण होने में पचीस वर्षों का योगदान लगा..! आज किसी की फसल पकी है, लेकिन मामला कोर्ट में फंसा है, पचीस वर्ष बाद कोर्ट पक्ष में फैंसला देकर फसल काटने की अनुमति देगी.. तो वह फैंसला कितना योग्य है? ऐसा ही ईश्वर अगर आज अनुकम्पा नहीं कर रहा है.. आज प्रताड़ना से प्रीत करवा रहा है, तो आगे वह प्रेम के महासागर को सौंप दे, तब भी क्या काम का? 


    सब कुछ अटपटा है प्रियम्वदा.. अतार्किक। 

    शुभरात्रि,
    ०८/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

“अगर आपके दिन भी कभी ऐसी उलझनों से भरे हों, तो कमेंट में अपनी कहानी लिखिए… शायद आपकी यादें भी किसी और की शाम हल्की कर दें।”

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें

अग्नि, एकांत और अंतर्मन की पुकार || दिलायरी : 07/12/2025

प्रियम्वदा के नाम एक रात – यादें, द्वंद्व और अंतर्मन की आग || दिलायरी : 06/12/2025

झुंझलाहट से मुस्कान तक – एक दिन की दिलायरी : 05/12/2025

प्रियम्वदा : मजबूरियों, अंधकार और भीतर की लड़ाइयों की एक लंबी रात || दिलायरी : 04/12/2025

एक खाली दिन, ढेर सारा सब्र || दिलायरी : 03/12/2025


#Priyamvada #Dilayari #HindiDiary #EmotionalWriting #LifeThoughts #HindiBlog #AtarkikJeevan #ManKiBaat #InnerVoice #HindiLiterature


Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)