निराशा, दुर्घटना और द्वारिका की पुकार | दिलायरी : 02/12/2025

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निराशा, दुर्घटना और द्वारिका की पुकार

दिलायरी | 02 दिसम्बर 2025


द्वारिका मंदिर और समंदर के साथ खड़ा व्यक्ति, पास बैठा कपोतक — निराशा और शांति का प्रतीक दृश्य

    प्रियम्वदा !

    शाम के सात बज रहे है। मन अभी तक निराशा से बाहर नहीं आ पाया है। बीते कल की निराशा को मिली वाहवाही के बावजूद। वाहवाही से प्रसन्नता होनी चाहिए। लेकिन मन किसी अँधेरे खंड में व्याप्त विषाद से लिप्त हो चूका है। कुपोषित गेंदे की अधखुली कलियों सा दिन था आज का। सवेरे यही तो देखा था मैंने.. पैर घायल है तब से छत पर जाना टालता हूँ मैं। लेकिन आज गया था, मधुमालती मर चुकी है। उसके सारे पत्ते गिर गए। उसकी पतझड़ मानों अभी ही आ गयी। 


बीस हज़ार की खामोशी

    ऑफिस जाने से पूर्व - वही जगन्नाथ, और वही दुकान। प्रियम्वदा ! ऑफिस पहुंचने के बाद पहला फोन आया शोरूम से। उसने खर्चे का एस्टीमेट और बढ़ा दिया। आंकड़ा अठारह से ऊपर तक पहुँच गया है। एक तो वैसे ही कड़की चल रही है। ऊपर से यह फालतू का खर्च। खाया-पिया कुछ नहीं बाइक फोड़ा बीस हजार वाला ताल हुआ है मेरे साथ। दिनभर ऑफिस का काम ऐसा चला है कि जरा भी समय न मिला था, कुछ भी सोचने को.. वैसे भी क्या ही सोचता, आजकल दिमाग में बस यह एक्सीडेंट के आफ्टर इफेक्ट्स ही घूम रहे है। 


    अभी कुछ देर पहले, शोरूम गया था, बाइक का हेंडल से लेकर टायर तक का सारा तामझाम निकाल दिया था उन लोगो ने। चेसिस बेंड हो चुकी है। सच बताऊँ, तो इस बारे में बात ही नहीं करनी है। मन उतर गया है मेरा। इस बाइक को अब निकाल देने का मन हो रहा है।


द्वारिका की याद — जो बुलाती भी है और रोकती भी

    प्रियम्वदा ! मन तो कर रहा है, अभी ही दुवारका (द्वारिका) चला जाऊं.. कुछ दिन वहीँ भटकने को मन करता है। मुझे तो याद भी नहीं है, बहुत छोटा था, तब गया था। कितनी ही बार द्वारका के नजदीक जाकर लौटा हूँ। शायद आदेश ही नहीं होता है, न जाने कितनी ही बार द्वारिका से बस साठ किलोमीटर दूर से ही वापिस लौट आया हूँ। जब मन इस तरह उद्विग्न होता हैं न, तब द्वारिका को याद करता हूँ। और मुझे पता नहीं कैसे, लेकिन हर बार मन शांत हो जाता है, और द्वारिका जाने का विचार शांत हो जाता है। 


समुद्र : अकेलेपन का सबसे विश्वसनीय मित्र

    वहां गोमती और समुद्र के संगम पर इससे भी ज्यादा उफान मचा रहता है, जैसा अभी मेरे मन मे उठा हुआ है। एक साथ कितने ही क्षणिक विचार, समुद्र के आंदोलनों की तरह उठते है, टकराते है, और फिर शांत हो जाते है। मुझे समंदर इस लिए भी पसंद है, कि वह एकांत का साथी है। समंदर बातें करता है। प्रत्युत्तर देता है, उसकी लहरे किनारों से टकराती है, तो यही प्रतीत होता है, कि समंदर जवाब दे रहा है। वह शांत सी नदियों की तरह मूक नही पड़ा रहता। न ही वह कभी लोभी रहा है, उसने विषामृत - दोनों ही दिए थे। वह कितनी ही नदियों को अपने भीतर समाहित करके भी अपनी सीमा में बंधा रहता है। उसकी भी कभी न कभी भावनाएं आहत होती होगी? मैं सोचता हूँ, क्या नदियों से वह कभी नाराज नहीं हुआ होगा? नदियां कभी भी उसके लिए एक जैसी नहीं रही है। वर्षा में हर्षोल्लास के साथ मिलने को दौड़ती नदियां, गर्मियों में समंदर से दूरी ही बना लेती है। नदियां मतलबी है, जब वे अपनी सीमाओं में नहीं रह सकती, तो दौड़ पड़ती है, समंदर के पास।


    तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, क्या मेरा यह दृष्टिकोण सही नहीं है? छोड़ो, आज वैसे भी मैं कुछ भी लिख रहा हूँ। फिलहाल ऑफिस से लौट आया था, कार को ट्रैफिक बहुत परेशान करता है। पन्द्रह मिनिट का रास्ता पचीस मिनिट का हो जाता है। फिलहाल दिलबाग में टहल रहा हूँ। पैर का घाव अब ठीक हो रहा है, क्योंकि लगातार वहां खुजली हो रही है, नई स्किन बनती है, तभी यह होता है। काफी देर से चल रहा था, शायद इस कारण से भी हुआ हो। क्योंकि अब टांकों के बावजूद एक रूटीन बनता जा रहा है। पहले की ही तरह चलने फिर पाने का रूटीन। टांके खींचते है, लेकिन अब आदत सी हो गयी। पत्ता कह रहा था, टांके लगे रहने देते है, लेकिन मैं सोचता हूँ, मोटापे में दो ग्राम भी यह एक्स्ट्रा वजन क्यों लेना है। 


कबूतर और कपोतक — शोर और शांति का अंतर

    आज मैं ऑफिस में बैठा था, तो देखा सामने के शेड पर एक कबूतर बार बार दूसरे कबूतर के साथ चोंच से चोंच मिलाता था। मानव सहज भाव तो यही उत्पन्न हुआ था, कि यह लोग लिपलॉक टाइप कुछ कर रहे है। लेकिन ध्यान से देखा, तो एक कबूतर, दूसरे को खाना खिला रहा था। यह थोड़ा असामान्य लगा, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ अंडे से निकले बच्चों के लिए पक्षी करते है ऐसा। कोई भी मादा पंछी दाना ले आती है, और घोंसले में रखे नए जन्मे बच्चों को खिलाती है। यही प्राकृतिक नियम है। मादा ही बच्चों का पालन करती है। लेकिन यह शेड के ऊपर वाले कबूतर तो दोनों ही बराबर कद के थे, फिर ऐसा क्यों किया होगा? फिर मैंने अंदाज़ लगाया, कि निश्चित ही उनमे से एक कबूतर पति होगा, दूसरा पत्नी.. तभी तो वह कमाकर लाया हुआ अपनी पत्नी को दे रहा था। अरे हाँ, फेमिनिस्टों का ध्यान रखना पड़ेगा। यह भी हो सकता है कि कबूतरी कमाकर लायी हो।


    वैसे यह तो नारीवादियों को शांत रखने के लिए कहा, बाकी जो खिला रहा था, वह नर था, जो खा रही थी वह निःशंक मादा थी। कद और कंठ से इतना अंदाज़ लगाया जा सकता है। वैसे मुझे कबूतर बिल्कुल पसंद नही। क्योंकि यह पंछी अमर्यादित रूप से अपनी तादात बढाता जा रहा है। तुम्हे पता है, यह पंछी जंगली है, प्राकृतिक रूप से यह आक्रमक भी है। लेकिन मानव के सेवा भाव ने, और जंगलों के दोहन के फलस्वरूप, यह कबूतर आसान चारे के इंतजाम में मानव बस्ती के पास आकर बसने लगे। बड़ी आसानी से मानव बस्ती के आसपास इनको दानापानी मिल जाता। तो इनके पास भी एक ही काम बचा, दाना चुगो, अंडे दो और चिरको.. शहरों में तो हालात ऐसे है कि कुछ बिल्डिंगे तो इन कबूतरों की हगार से भरी पड़ी रहती है।


    कबूतर का मल सूखकर हवामें घुल जाता है। यह श्वसन के माध्यम से फेफड़ों में प्रवेश कर जाता है। और असाध्य रोगों का कारण बनता है। मैं रोग का नाम याद नहीं कर पा रहा हूँ। कुछ दिनों पूर्व मुम्बई जैसे शहर में कबूतरों को दाना डालने पर प्रतिबंद लगाया गया था, बड़ा सही कदम था। क्योंकि कबूतरों को आसानी से दाना मिल जाता है, और है तो अबुध पंछी, चुग लेता है। खाएगा तो निकालेगा भी.. मलत्याग के बाद फिर भूखा का भूखा.. तो खाओ, पीओ, चिरको, और अंडे दो.. यही इनका एकमात्र आरामदायक काम हो चला है। 


ओढा जाम और होथल — विरह का इतिहास

    मुझे तो कबूतर कतई पसंद नहीं। मुझे ज्यादा अच्छे लगते है कपोतक (Dove)। यह असल मे शांति का प्रतीक है। मुझे भी वे भूरे कबूतर ही शांति के प्रतीक है ऐसा लगता था। लेकिन कबूतरों के परिवार में पचीस से तीस अलग अलग रंग रूप के कबूतर होतें है। तपकिरी रंग का यह पंछी सदा ही अकेला बैठा मिलता है। गुजराती में होला कहते है। यह पंछी बड़ी मुश्किल से जोड़े में दिखता है। एकदम ही शांत, और सरल.. बचपन मे हम सुनते थे कि यह सदैव प्रभु का नाम स्मरण करता है। क्योंकि यह पंछी जब आवाज करता है, बोलता है, तो उसका स्वर कुछ यूं सुनाई देता जैसे वह बोल रहा हो, "प्रभु तू".. असल मे तो घु घु घु.. करता है। लेकिन भ्रमणा बनती है, "प्रभु तू" की। इसके अकेलेपन तो एक प्रसिद्ध दोहा है..


“विसारूं जो वल्हा, रूदिया मां थी रूप,
लगे ओतर जी लूक, थर-बाबीडी थई फरां।”


    इतिहास का एक रोचक प्रसंग है। लेकिन कुछ प्रसंग कहानियों के रूप में रसदार बन जाते है। पूरा प्रसंग लिखने का तो मौका नहीं है फिलहाल, लेकिन संक्षेप में कहूँ, तो कच्छ से ओढा जाम को देश निकाला मिला था। काला अश्व, काली वेशभूषा में ओढा जाम कच्छ से निकल पड़ा। अपने मौसेरे भाई विशलदेव वाघेला की चढ़ती कला थी। सोलंकियों की सत्ता अब वाघेलाओं के हाथ मे थी। विशलदेव ने ओढा को आश्रय दिया। लेकिन बातों-बातों में एक दिन ओढा को अपने मौसेरे भाई विशलदेव की एक अधूरी प्रतिज्ञा के बारे में पता चला। विशलदेव ने सौगंध ली थी, कि सिंध के पास बांभणीया के बादशाह की सात-बीसा सांढ़, यानी कि एकसौ चालिश ऊंट लूटकर उसका घमंड चकनाचूर करना था। ओढा जाम अपने चुनिंदा साथियों को साथ लेकर यह प्रतिज्ञा पूरी करने निकला।


    ऐसी ही किसी प्रतिशोध की भावना से होथल नामक एक पद्मिनी स्त्री भी, पुरुष परिधान में, एकलमल नाम धारण करके निकली थी। वह युद्धकला में निपुण थी। बात तो काफी रोचक है, लेकिन रास्ते मे ओढा जाम और होथल की भेंट होती है। दोनों का उद्देश्य एक ही था, इस लिए दोनों ने एक पक्ष में रहना तय किया। बादशाह को हराया, उसके 140 ऊंट लूटे। होथल की तो प्रतिज्ञा पूरी हुई, उसने बंटवारे के ऊँटो का हिस्सा भी ओढा को दे दिया। वियोग की घड़ियां आयी। ओढा को पता नही था, कि इतने अल्प समय मे उसकी जिसके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो चुकी है वह एकलमल, असल मे एक स्त्री है। वह उसे पुरुष योद्धा ही समझ रहा था। विदा होते होते ओढा ने पूछ लिया, कि "मित्र मुझे याद तो रखोगे न?"


    तब एकलमल, यानी कि होथल प्रत्युत्तर में उपरोक्त दोहा कहती है कि,


“विसारूं जो वल्हा, रूदिया मां थी रूप,
लगे ओतर जी लूक, थर-बाबीडी थई फरां।”


    और ओढा और होथल अपने अपने अलग रास्ते चल देते है। ओढा को मन ही मन इस दोहे में एक विरह की भावना अनुभव हो रही थी। उसने दोहे को ठीक से समझ लिया था आखिरकार।


    "हे ओढा जाम ! वल्हा / प्रिय, मैं यदि अपने ह्रदय में से तुम्हारी छवि भूल जाऊं, तो मुझे उत्तर के दिशाओं (रेगिस्तान) की लू लगे। और थरपारकर समान उज्जड प्रदेश में बाबीडी (मादा कपोतक) का अवतार लेकर मेरा प्राण भटकता रहे।"


    ओढा को आखिरकार समझ आया, ऐसा विरहपूर्ण दोहा एक स्त्री ही कह सकती है। क्योंकि बाबीडी (मादा पक्षी) का रूपक तो एक स्त्री ही मांग सकती है। और फिर ओढा अपने साथियों को ऊंटों के साथ विशलदेव के पास भेज देता है, और खुद एकलमल की असली पहचान जानने के लिए उसका पीछा करता है। आगे कहानी और भी है, कि चकासर तालाब के किनारे पर दोनों की पुनः भेंट होती है, विवाह होता है, सन्तति होती है। और एक दिन यह स्वर्ग की अप्सरा पद्मिनी स्त्री ओढा द्वारा दिए गए एक वचन के भंग पर होने पर स्वर्ग लौट जाती है। ओढा को विरह में अकेला छोड़कर।


आखिर में : अकेलापन, जो मेरा नहीं — मैं उसका हूँ

    प्रियम्वदा, वह कपोतक कुदरत ने उसे रूप दिया है, लेकिन संगाथ नहीं.. वह अकेलेपन के साथ, अपनी ही मस्ती में रहता है.. जैसे मैं रहने की कोशिश करता हूँ.. निराशा में से आशा की किरण खोजने को प्रयत्नरत। निराशा से लिपटकर आशा को भी न छोड़ने के भगीरथप्रयास में.. झूझना मुश्किल नहीं है.. बस असमय नहीं होना चाहिए। और मैं, मैं तो समय का पालन तभी करता हूँ, जब अनिवार्यता का आगमन हो जाता है। फिलहाल यह दिलायरी कि लंबाई देखकर, अनिवार्यता यही कहती है,


    शुभरात्रि।

    ०२/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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