“झुंझलाहट से मुस्कान तक – एक दिन की दिलायरी : 05/12/2025”

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झुंझलाहट से मुस्कान तक – एक दिन की दिलायरी


“मायूस चेहरे वाला वही तयशुदा किरदार—अपनी बाइक पर बैठा, हैंडल पर लटके पुराने स्पेयर पार्ट्स के पॉलिथिन बैग के साथ, पास रखी आग तापते हुए—सादा सफेद पृष्ठभूमि में।”

सुबह की अनबन और मन का बोझ

    प्रियम्वदा !

    आज की भी दिलायरी परदे में रहेगी.. दिन पर दिन ऐसे बीत रहे है, कि कोई हाल पूछे तो कहूं कि हाँ ! भाई, सब ठीक चल रहा है। दुःख, दर्द, पीड़ा.. इनके बिना जीवन अधूरा है शायद.. उससे भी विशेष रुदन। स्त्रियों के लिए कितना आसान है रो लेना.. लेकिन पुरुष के लिए रोना उतना ही मुश्किल है, जितना मध्याह्न के सूर्य को एकटक देखना..! सवेरे सवेरे कोई अनबन हो जाए और मन मायूस हो जाए, उससे भला क्या ही हो एक लिखने वाले के लिए..?


सर्विस सेंटर की भागदौड़ और आर्थिक चोट

    कल दोपहर को झपकी लेते हुये सर्विस सेंटर से फोन आया था, कि बाइक तैयार हो गयी है। तो आज सवेरे पुष्पा को सीधे मेरे घर ही बुला लिया था, ताकि वो मुझे सर्विस सेंटर छोड़कर खुद ऑफिस चला जाए। मैं पैदल पैदल जगन्नाथ के द्वार पहुंचा। दूर से ही उसकी धजा लहलहाती थी। मन पीड़ित था, फिर भी दादा मुस्कुरा रहा था। मैं उसे कोसते हुए निकल गया। दूकान पर सिगरेट पीते हुए फिर से पुष्पा को फोन लगाया, और अब उसे घर के बदले यहाँ दूकान पर आने को कहा। 


    सर्विस सेंटर पर पंहुचा, बाइक बाहर ही खड़ी मिली। उन लोगों ने रिपेयरिंग काम तो कर दिया था, पर न तो वाशिंग की थी, न ही ब्रेक ठीक की थी। धीरे धीरे साढ़े नौ बजे तक सब आए। जॉबवर्क जो लेते है वे जल्दी आ गए थे। उनसे कुछ बातचीत करता रहा। ग्यारह बज गए। बाइक उनलोगोंने वाशिंग करवा दी। सवेरे सवेरे एक मोटी रकम उन्हें ट्रांसफर की। शारीरिक चोट से ज्यादा पीड़ादायक यह आर्थिक चोट लगती है। छोटी-मोटी शारीरिक चोट दस पंद्रह दिन में ठीक हो जाती है, लेकिन यह आर्थिक चोट तो तीन चार महीनों का बजट बिगाड़ देती है। 


    वैसे ही घर से गुस्से में निकला था, ऊपर से यह सर्विस सेंटर वालों ने समय बहुत खाया। दिमाग पहले ही हिला हुआ था, तो मैंने उन से दरखास्त की, कि आपने जो जो सामान बदली किया है, वह पुराना सामान मुझे वापिस चाहिए। उन्होंने एक पॉलीथिन का थैला भर दिया। बोले ले जाओ.. मैंने तो यूँही पैसों की चोट के कारण सामान वापिस माँगा था, इन्होने सच में भर दिया। अब मना करूँ तो जान जाएगा, कि यह परेशां करने के लिए माँगा था। मैं हमेशा अपने साथ बंजी टाई रखता हूँ, पिछली सीट पर यह साइड के शॉकर, और पाइप वगैरह बाँध लिया। और ऑफिस के लिए जा ही रहा था, कि याद आया BLO ने पैन कार्ड की कॉपी मांगी थी। 


ऑफिस का दबाव और दोपहर की थकावट

    ऑफिस जाने के बजाए घर चल दिया। यह बाइक का पुराना सामान उतारा और कन्याशाला में बैठे BLO को पैनकार्ड की कॉपी दे आया। आज दोपहर को एक मित्र के घर विवाह के भोजन का कार्ड था। जाना तो अनिवार्य था, लेकिन बारह बज गए थे, ऊपर से ऑफिस से फोन पर फोन आने लग रहे थे। तो किसी मित्र को फोन पर चांदलो ट्रांसफर किया, और ऑफिस की ओर ही चल दिया। बाइक बिलकुल सही चल रही थी। लेकिन बाइक का हेंडल अब भी एक तरफ को हल्का मुड़ा हुआ महसूस होता है। हेंडलबार तो नया ही है, लेकिन तब भी थोड़ा मुड़ा हुआ लगता है। 


    दोपहर को एक बजते ही एक तरफ लंच टाइम अनाउंस हुआ, और मेरे पास काम पर काम की बौछार बरस पड़ी। एक तो वैसे ही खोपडा खराब था, ऊपर से लंच के समय काम करना पड़े, अच्छे-भले का पारा चढ़ जाए। काम भी अनिवार्य ही थे। कुछ टेक्निकल समस्या के कारण लंच का समय मिल गया। पास के ही एक होटल से पार्सल मंगवा लिया। और लंच करके तुरंत फिर से ऑफिस के कामों में लग गया था। 


    कुछ दिन ऐसे बुरे होते है, कि कोई हद्द नहीं होती। सवेरे घर से मगझमारी कर निकला था, शोरूम पर सर्विस वालों से परेशां हुआ। दोपहर को विवाह के भोज के न्यौते के पैसे दिए, और खाना खाने न गया, लेकिन ऑफिस पर होटल से खाना मांगा कर खाना पड़ा। शाम होते होते ओवरलोड काम के चलते वैसे ही दिमाग ख़राब हो रहा था। ऊपर से कुछ बातें ऐसी हो जाती है, जिनके कारण और मानसिक प्रताड़ना महसूस होती है। 


शाम की आग, किस्से और हल्की गर्माहट

    पूरा दिन झुंझलाहट रही। शाम को सोचा आराम से गरबी चौक जाऊंगा.. कोई होगा नहीं, और मस्त अपना आग सेंकते हुए दिलायरी पूरी कर लूंगा। लेकिन नहीं.. मैं गरबी चौक पहुंचा उससे पहले लड़के लोग पहले से आग जलाए बैठे थे। अच्छी डींगे हाँक रहे थे। हर कोई अपने नॉस्टाल्जिया में खोया हुआ था। ज्यादातर लड़के हॉस्टल लाइफ एक न एक बार जी चुके है। तो वही किस्से सुना रहे थे। मैं अपना चुपचाप सुन रहा था। क्योंकि मेरे किस्से इन लोगों को सुनाने लायक हैं नहीं। अच्छी भली थोड़ी आबरू है, वह भी बिगाड़ लू क्या? एक ने पूछा भी, कि आप कभी हॉस्टल में नहीं रहे हैं क्या.. इस सवाल पर तो पूरी एक महागाथा मेरे कंठ तक आ पहुंची थी। 


    लेकिन मैंने थूक के साथ उसे वापिस निगल ली। और जवाब में बस इतना ही कहा, "हाँ ! तीन साल रहा हूँ।" उतने में एक और भाईसाहब थे, उन्होंने अपनी कहानी शुरू कर दी। उनका एक किस्सा उनकी जुबानी बताता हूँ..

    "तो एक बार की बात है, हम लोग स्कूल में हुआ करते थे, तब की स्कूलिंग तो बिलकुल ही अलग लेवल की हुआ करती थी। मास्टर लोग खूब कूटते भी थे। आजकी तरह ही तब भी पेरेंट्स को बुला लिया जाता था। एक दिन क्या हुआ, व्यायाम का पीरियड था। और व्यायाम वाले मास्टर आए नहीं थे। तो हम लोग लगे क्रिकेट खेलने। अब पता नहीं वो मास्टर अचानक से कहाँ से आ गया। उसने अपनी क्लास लेनी चाही, लेकिन हम लोग तो क्रिकेट खेल रहे थे। वह भी शर्त वाली मैच थी। उसने दो तीन लोगों को दो-तीन बार बुलाने भेजा, लेकिन हम मैच को छोड़कर गए नहीं। 


    तो मास्टर सीधा मैदान में आ गया, स्टंप-वम्प उखाड़कर सीधा प्रिंसिपल ऑफिस में। प्रिंसिपल भी अलग लेवल का करैक्टर थे। दांत भींचकर ही बात करते। पता नहीं, मुँह में क्या समस्या थी उनके, आधे शब्द तो मुँह न खोल पाने के कारण भीतर ही रह जाते, फिर भी हमें पूरी बात समझ लेने को योग्य माना जाता। उन्होंने अपनी ऑफिस में एक डायरी लगा रखी थी। डायरी का नाम था, "गुंडा डायरी".. स्कूल के सारे बच्चे इस डायरी में अपना नाम चढ़ जाने से बचना चाहते थे। क्योंकि एक बार अगर इस डायरी में नाम चढ़ गया, और उसके बाद स्कूल में अगर कोई भी कांड हुआ, तो उन प्रत्येक लोगों को प्रिंसिपल ऑफिस में हाजरी लगानी पड़ती, जिनका नाम इस गुंडा डायरी में हो।


    वो व्यायाम वाले मास्टर ने बढ़ा-चढ़ाकर बातें बतायी, और हम सब जो क्रिकेट खेल रहे थे उनका नाम इस गुंडा डायरी में शामिल हो गया। प्रिंसिपल ने सबके हाथ पर एक एक स्केल का निशाँ छोड़ा, और अगले दिन वाली (पेरेंट्स) को बुलाकर ले आने को हुकुम दे दिया। सारे पेरेंट्स इस प्रिंसिपल को अच्छे से पहचानते थे। और गाँवों में प्रिंसिपल को तो बुजुर्ग भी आदर्श मानते थे। तो कोई भी अपने वाली को बुला नहीं सकता था, क्योंकि घर से और मार पड़ती। गुजराती में 'पेरेंट्स' को 'वाली' कहते है। तो हम लोगोने तय किया, वाली को ही बुलाना है न.. तो बुला लेते है। 


    दरअसल, गाँव में एक दातुन बेचने वाली बूढी औरत थी, और उसका नाम ही वाली था, वालीबेन। तो हमने जाकर उससे कहा, "कि आपको प्रिंसिपल ने बुलाया है।" वह भी चकित थी। लेकिन उसे लगा बुलाया है, तो जाना तो पड़ेगा। दूसरे दिन सवेरे स्कूल में प्रार्थना के बाद प्रिंसिपल ने हम लोगो को भीड़ से अलग किया, और अपनी ऑफिस में ले गए, और पूछा, "वाली को ले आये हो?" हमने भी हामी भरी। और कहा, अभी बुला लाते है। हमने स्कूल के आँगन में नीम की छांया में बैठी वालीबेन को बुलाया और प्रिंसिपल के ऑफिस में भेज दिया। और हम लोग छिपकर सुनने लगे। 


    प्रिंसिपल की ऑफिस के यह वृद्धा वालीबेन चलती हुई पहुंची, प्रिंसिपल से पूछा, "हाँ ! मास्टरजी, बुलाया था।" प्रिंसिपल अपने दांत भींचकर बोले, "आप कौन? मैंने कब बुलाया आपको?" तो वालीबेन ने कहा, "मैं वाली हूँ। मुझे उन लड़कों ने कहा था, कि आपने मुझे बुलाया है।" अब प्रिंसपल को सारा कारस्तान समझ में आ गया, और फिर तो हमें क्या दौड़ा दौड़ा कर पिटा है, पुरे स्कूल में दौड़ाया था।"


रात का आत्मसंवाद—दिलायरी की राहत

    ऐसे ही किस्से सुनते हुये सवेरे से बोझिल मन अब शांत हुआ। सोचा था, कि अकेले बैठकर ताप सेंकते हुए दिलायरी पूरी करूँगा.. अपने गम, पीड़ा और मानसिक प्रताड़ना को दिलायरी में उतारूंगा। लेकिन यहाँ गरबीचौक में तो मामला ही अलग था। मेरी तमाम व्यग्रता मैं भूल गया था। मेरा निराश मन प्रफुल्लित हो रहा था। इन मजेदार किस्सों में मुझे अपनी भी यादें ताज़ा होने लगी थी। सवेरा जितना बुरा था, शाम उतनी ही मस्तानी हो गयी थी। दिनभर ऑफिस में हुए तनाव ने यहाँ शाम की इस महफ़िल से अलविदा कर ली थी। 


    फर्क यही है प्रियम्वदा, मैं अकेला बैठता, तो दिलायरी पीड़ा से संलिप्त होती। मैं अकेला बैठा होता, तो दिलायरी से निराशा छलकती। लेकिन फ़िलहाल दूसरे दिन की दोपहर को भी यह लिखते हुए हँसी आ रही है। 


    शुभरात्रि। 

    ०५/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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