बंद कमरों की सर्दियाँ और बीती यादें
प्रियम्वदा,
यह तो नहीं सोचा था मैंने, कि यह दिलायरी इस बंद कमरे में लिखूंगा। मेरी वह एकांतपूर्ण जगह लड़कों के ठहाकों से अब गूंजती है। जहां बैठकर मैंने पिछली सर्दियां तुम्हे याद करने में, तुम्हे लिखने में बिताई थी। आसमान में चंद्र की ग्रहों के साथ युतियां बनती थी, और मैं सरसराते पीपल के पत्तों को सुनते हुए, अग्नि का ताप और प्रफुल्लित तथा प्रज्वलित करने के लिए लकड़ियां डालता जाता, और उस अग्नि की ऊष्मा को अपने भीतर जलती वेदनाओं के साथ स्वाहा करता। पिछली सर्दियों का सुनकार मुझे वापिस तो चाहिए, बशर्ते बस समय भी अनुरूप हो।
दिनचर्या की उलझनें और मन की थकान
सवेरे उठकर फिर से एक बार अपने पिछले नित्यक्रम के अनुसार चलने की योजना तो बनाई, लेकिन समय मुझसे आगे रह गया। और मैं तो हूँ ही भुलक्कड़.. गीज़र के जमाने में, आज भी मैं पानी गर्म करने के लिए रॉड का इस्तेमाल करता हूँ। और बड़ी मजेदार बात यह रही कि लगभग पंद्रह मिनिट इन्तेजार करने के बाद भी जब पानी गर्म न हुआ, तब पता चला, स्विच भी चालू करनी होती है। प्रियम्वदा, हम किसी पर निर्भर हो, उससे दुश्मनी मोल नहीं लेनी चाहिए।
आखिरकार और समय मैंने इधर उधर डोलने में व्यतीत किया, कुँवरुभा को उनके स्कूल छोड़ आया, और तब तक पानी इतना गर्म हो चुका था, कि ठंडा पानी मिलाने भर से भी नहाने योग्य नहीं हो पा रहा था। सवेरे सवेरे इन सब झमेलों के बाद नाश्ता करके पहुंचा जगन्नाथ के पास। वह काष्ठ की मूर्ति में बिराजता देव सदैव मुस्कुराता है। मैं दुःखी होऊं तब भी, मैं निराश होऊं तब भी, मैं प्रफुल्लित होऊं तब भी, और मैं गुस्सा होऊं तब भी..
ऑफिस पहुंचा, तब तक सोचा था कि आज शनिवार होने के बावजूद काम नहीं है। लेकिन यकीन मानो प्रियम्वदा, शाम तक मुझे रील देखने भर का समय नहीं मिला है। यह तो फिर भी ठीक है, बीते कल की दिलायरी पूरी करनी बाकी थी, वह भी मैंने दोपहर के लंच टाइम में पूरी की और पब्लिश की। शनिवार के नाम पर, सरदार की गैर हाजरी में, पता नहीं कैसे कैसे काम आ धमकते है। और सारे ही जरूरी होते है, एक भी काम टाला नही जा सकता। रात के साढ़े आठ बजने को आए थे, और मेरा काम तब जाकर कुछ अंश तक काबू में आया। वह भी आना तो नहीं चाहता था, मैंने जहां तहां से मार-मरोड़कर उस पर अपनी सत्ता हांसिल की है।
शब्दों का युद्ध और अपशब्दों की लय
नींद आ रही है, आज की दिलायरी भी कल लिखूंगा.. हाँ प्रियम्वदा, अब कल हो चुका है। फिर भी भूतकाल में जाकर ही लिखना पड़ेगा। मन जब व्यग्र होता है, तो उसे कोई विषय नहीं चाहिए होते, न ही उसे शब्दों से उपजते भावों की पड़ी होती है। उस समय पर बस वे शब्द ज्यादा उपयुक्त हो जाते है, जिनसे उस समय का समय बीत जाए। किसी से झगड़ा हो जाए, उस समय पर हम शब्दों का चयन नहीं करते, वह बात अलग है, जो आयोजित झगड़ा करते है।
ज्यादातर शारीरिक युद्ध से पूर्व होते वाकयुद्धों में वे शब्द प्रचुर उपयोग में लिए जाते है, जो जलती अग्नि में घी का काम करे। आमतौर पर वे शब्द किसी भंडारघर में पड़े रहते है, जैसे कोई आभूषण हो। लेकिन वाकयुद्ध का आरंभ होता है, शुरुआती सामान्य बोलचाल के बाद एकाध आभूषण भंडारघर का दरवाजा खोलकर निकल आता है, और फिर तो किले का द्वार टूटा हो, और बस केसरिया कर लेना हो, उस तरफ फुट पड़ते है वे तमाम शब्द, जिन्हें समाज ने अपशब्द कहा है।
खेर, मैं यह सोच रहा था, अपशब्द या वे शब्द जिनसे हम खुद तो बचना चाहते है, लेकि। दूसरों को देने से कतराते नहीं, उनका भाग्य भी कितना विचित्र है। जैसे एक गुजराती शब्द है, 'गांडो' हिंदी भाषा मे यह अपशब्द जैसा सुनाई पड़ता है। वहीं हिंदी का एक शब्द है, 'चुटिया' से मिलता-जुलता, वह गुजराती में एक अपशब्द है। तेलुगु शब्द है एक, 'ठंडी' से मिलता जुलता, वह हिंदी में अपशब्द है। यह बेचारे शब्द लोग खुद परेशान है, इधर सही था, उधर जाकर अपशब्द बन गया..! इधर अर्थ है, उधर अनर्थ है।
अपशब्दों में भी कितनी लचक होती है, एक लय होता है, खासकर जब अपशब्द को संबंधित किया जाए..! जैसे कि जिससे झगड़ा हुआ है, उसके प्रथम संबंधमे आते उसके माता-पिता को भी इन अपशब्दों में याद किया जाता है। और मजेदार तब हो जाता है यह अपशब्द, जब इसमें इन्वेंशन यानी कि शोध होती है, विशेषण जोड़े जाते है। जैसे कि तुम्हारी ऐसी की तैसी..!
जरूरी नहीं यह अपशब्द सिर्फ प्रतिद्वंदी को दिए जाते है। कईं बार हम अपने आप को भी दे देते है। अपने आप को दिए गए अपशब्दों की मारक क्षमता न्यूनतम होती है। कईं बार हम कर्मों को भेंट करते है वे शब्द, या कईं बार हम, स्थान या समय को भी इन शब्दों से नवाज़ते है। कभी कभी घटना को भी वे अपशब्द-पुष्प चढ़ाए जाते है। तुम्हे पता है प्रियम्वदा, दारू पीने के बाद अक्सर इन अपशब्दों का प्रचुर मात्रा मे प्रयोग होता है। मद्य के मदहोश में, लड़खड़ाती जुबान से निकले अपशब्दों में, मंद गति और तीव्र ताल होता है।
प्रकृति के विरोधाभास और जीवन के निर्णय
प्रियम्वदा ! मैं यह भी सोच रहा था, कि प्रकृति ने इतने विरोधाभास क्यों जन्मायें है? ऊष्मा है तो शीतलता है, अँधेरा है तो उजियारा भी है। भूख है, भोजन भी। लालसा है, नियंत्रण भी। भय है, वीर भी। क्रोध है, शांत भी..! सब कुछ ही एक दूसरे का कितना विरोधी है। लेकिन क्या हो अगर दिवस और रात एक साथ एक समय पर हो। प्रियम्वदा, कैसा हो अगर एक क्रोधी और एक शांत के बिच मैत्री हो जाए? यह तो वही बात हो जाएगी, कि एक म्यान में दो तलवार.. आजीवन चिंगारियां निकलती रहेगी। जीवन में कईं बार एक गलत फैसला, पुरे जीवन की खुशियां छीन जाता है। बार बार तुम्हे वह फैसला आड़े आता है, पुरे जीवनभर.. अमिट फैंसले से जीवन की दशा और दिशा, दोनों ही बदल जाते है।
एक गलत फैसला और जीवनभर की खरोंच
फेंसला करना, और खासकर तब, जब यह याद नहीं रहता है, कि फैंसले की भविष्यवाणियां भी छान लेनी चाहिए, वह सदैव चुभेगा। जिस तरह किसी वृक्ष के विकसित हो जाने पर भी उसके तने में कील लगी हुई ही रहती है। या फिर कोई ऐसा वृक्ष, जो इतना बड़ा हो चूका है, कि अब वह टायर उससे अलग नहीं हो सकता, जो कभी उसके लिए एक संरक्षण का दायरा था।
प्रियम्वदा ! हम सबको ही एक वह फैसला सदैव खटकता है, जैसे आँख में कना हो..!
शुभरात्रि,
०६/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
“अगर आपके दिन भी कभी ऐसी उलझनों से भरे हों, तो कमेंट में अपनी कहानी लिखिए… शायद आपकी यादें भी किसी और की शाम हल्की कर दें।”
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